Friday, November 20, 2015

मौके की नज़ाकत को समझना भी जरूरी है

बिहार के नतीजों ने देष की सबसे बड़ी सियासती पार्टी को हिला कर रख दिया है। भाजपा इस बार बिहार में चमत्कार कर दिखाएगी, ये मंसूबा धरा का धरा रह गया। बिहार जीतने के बाद यूपी फतह करने का सपना बुन रहे भाजपाई तो मुंह के बल गिरे ही समाजवादी पार्टी भी समिधियाने से मिली चोट से बलबला गई है। इस चुनाव में मोदी ‘चमत्कार’ भी भाजपा को बचा नहीं सका। विकास की बात करने वाले बिहार में जातीय गणित समझने की भूल कर बैठे। जातीय ध््राुवीकरण की आंधी में बहे बड़े-बड़े दिग्गज मतदाता के मन की बात चीन्ह न सकने में असमर्थ रहे और नीतीष लालू आंधी में बिहार से बाहर हो गए। भाजपा और सपा अब भले की हार के कारणों की समीक्षा करें, आगे की लड़ाई उसके लिए आसान नहीं ये तो साबित हो गया।

बिहार के चुनावी नतीजों से एक बात तो तय है कि भाजपा को अपनी साख बचाने के लिए अब कुछ नया पैंतरा आजमा होगा। अमित शाह के संचालन में हुई इस दूसरी षिकस्त ने भाजपा को राजनैतिक चौसर में कई कदम पीछे फेंक दिया है। मोदी का जादू भी अब कमोबेस मंद पड़ रहा है, इसे मानकर भाजपा को भविष्य में होने वाले चुनावों में अपनी लाज बचाने की सोचनी होगी। दिल्ली चुनाव में भाजपा की हार के पीछे जो मुख्य बात नजर आई वह थी व्यक्तिवाद को बढ़ावा। इस व्यक्तिवाद को पार्टी के भीतर पनप रहे अहमवादी दृष्टिकोण से जोड़कर भी देखा जा सकता है। पार्टी का जो मूल भाव अर्थात ‘हम की भावना है को छोड़ ‘मैं का दृष्टिकोण ज्यादा परिपुष्ट दिखाई देता है। यदि इस चुनाव में ‘हम का भाव तथा तत्वनिष्ठा को सर्वोपरि मानकर निर्णय लिए जाते तो शायद इतने खराब परिणाम सामने नहीं आते। यह सच है कि संगठन में पार्टी अध्यक्ष और सरकार में प्रधानमंत्री सर्वोपरि होता है। लेकिन इसका अर्थ यह कदापि नहीं कि शेष सभी को दरकिनार कर दिया जाए।

भाजपा जैसी पार्टी को इस बात को कतई नहीं भूलना चाहिए कि वह एक कार्यकर्ता आधारित दल है इसलिए वह जो भी निर्णय ले वह कार्यकर्ता को केन्द्र में रखकर लें। यह इस दृष्टि से भी महत्वपूर्ण होता है कि पार्टी के वैभवशाली स्वरूप से प्रभावित होकर अन्य दलों के नेताओं को पार्टी में शामिल करने से पूर्व कार्यकर्ताओं अथवा वरिष्ठ पार्टी नेताओं के सोच को जरुर ध्यान रखा जाए। दिल्ली में किरण बेदी को पार्टी में शामिल करने से लेकर उन्हें मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किए जाने तक न तो कार्यकर्ताओं का मन टटोला गया और न ही पार्टी के वरिष्ठजनों की राय ली गई। परिणाम सामने था। ऐसा ही कुछ बिहार में हुआ। विवादित बयान देने के लिए प्रसिद्ध हो चुके भाजपा नेताओं के अगर लगाम न लगी तो कोई आष्चर्य नहीं कि 2017 के विधान सभा चुनाव में बिहार की तरह मुस्लिम भाजपा के खिलाफ सपा-बसपा किसी एक के पक्ष में लामबंद हो जाए। दिल्ली और बिहार के नतीजों के बाद अगर अब भी भाजपा मौके की नजाकत को समझने से बाज आई तो पार्टी जिस आंधी के साथ सत्ता तक पहुची उसी आंधी के साथ उड़ जाएगी। इस मामले में कांग्रेस से बड़ा सबूत उसके सामने और क्या हो सकता है।

2017 में उत्तर प्रदेष का चुनाव है जो राजनैतिक दृष्टि से बेहद अहम है जहां दो प्रमुख पार्टियों सपा बसपा के बीच खुद को स्थापित कर पाना भाजपा के लिए अब मुष्किल जान पड़ रहा है। उत्तर प्रदेष में सपा बसपा मजबूत पार्टिया है । सुगबुगाहट तो ये भी है कि भाजपा को यहां रोकने के लिए बिहार की ही तर्ज पर इस बात के लिए कोषिष की जा सकती है कि सपा बसपा आपस में संधि कर ले और कांग्रेस जो कि साइड लाइन है इन्हें अपना सहयोग कर दें। हालांकि ये मुष्किल है पर नामुमकिन नहीं। सपा बसपा का आपसी कलेष जगजाहिर है लेकिन राजनीति में कोई किसी से चिर दुष्मनी नहीं कर सकता। परिस्थितियां और राजनैतिक समीकरण जहां उचित बैठे वहीं बात बन जाती है।

उत्तर प्रदेष को वोट बैंक के नजरिए से अगर देखा जाए तो यहां मुस्लिम वोटों का धु्रवीकरण करना बहुत आसान है जबकि हिन्दू वोट ब्राहमण, दलित-महादलित, पिछड़ा के बीच रस्साकषी जैसा मामला है। यूपी में दोबारा राज करने का सपना देख रही सपा को पंचायत चुनाव के बाद बिहार के नतीजों ने स्पष्ट कर दिया है कि उत्तर प्रदेष की सत्ता इतनी भी आसान नहीं और तब तो कहीं और अधिक जब पार्टी भीतरी कलहों और प्रदेष में बढ़ते अपराध को रोक पाने में अक्षम साबित हो रही हो। मुस्लिम मतदाता जिन पर सपा को सबसे अधिक भरोया है, गाहे बगाहे असमंजस की स्थिति में उनके खिलाफ भी चला जाता है। लोकसभा चुनाव इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। सपा प्रमुख की बयान बाजियों ने उस वक्त भाजपा के पक्ष में वोटिंग करा दी और महज 5 सीटों के साथ सपा लोकसभा में अपनी आबरू बचा सकी। बिहार में ऐन वक्त पर गठबंधन से नाता तोड़ना सपा के हित में नहीं रहा। राजनैतिक हलकों में मुलायम सिंह सरीखे नेता पर अविष्वास की हवा बन गई। 146 सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़ा कर देने से जातिगत वोटिंग वाले राज्य में संदेष गलत चला गया।

अफवाह फैलाने वालों ने हवा बना दी कि मुलायम सपा उम्मीदवारों के जरिये महागठबंधन का समीकरण बिगाड़ना चाहते हैं। पिछड़ी जातियों पर इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ना ही था। मुस्लिम फिर भ्रमित हो गया ये सोचकर की कहीं लालू-नीतीश को कमजोर करने की कोशिश से बिहार में भाजपा न मजबूत हो जाए। तो वह भी एकजुट होकर उधर ही चल पड़ा जहां उसे पूरी निष्चिंतता थी। यही स्थिति अगर 2017 के चुनाव में नजर आई तो सपा का वोट बैंक माना जाने वाला यह वर्ग विकल्प के तौर पर बसपा की तरफ मुड़ जाएगा। पंचायत चुनाव में इसके संकेत सामने आ भी चुके हैं। दरअसल उत्तर प्रदेष में भी जातीय संतुलन के साथ साथ तो मजहबी संतुलन को भी साधे रखना जरूरी है। दोबारा सत्ता हासिल करने के लिए ऐसे संतुलन के अलावा यह भी बहुत जरूरी है कि आपके निष्पक्ष सुशासन और विकास के एजेंडे से जनता जनार्दन संतुष्ट हो। बिहार चुनाव के नतीजे के पीछे एक वजह नीतीश की सुशासन बाबू की छवि है जिसे विकास विकास के नाम पर तोड़ने की पुरजार कोषिष धरी की धरी रह गई।

Friday, October 30, 2015

जाति-धर्म की बाजी पर बढ़ती सत्ता की चाह

डा0 लोहिया कहते थे “धर्म और राजनीति के दायरे अलग-अलग हैं, पर दोनों की जड़ें एक हैं। ’धर्म’ दीर्घकालीन राजनीति है, ’राजनीति’ अल्पकालीन धर्म है। धर्म का काम है, अच्छाई करे और उसकी स्तुति करे। राजनीति का काम है बुराई से लड़े और उसकी निन्दा करे। जब धर्म अच्छाई न करे केवल स्तुति भर करता है तो वह निष्प्राण हो जाता है और राजनीति जब बुराई से लड़ती नहीं, केवल निन्दा भर करती है तो वह कलही हो जाती है। इसलिए आवश्यक है कि धर्म और राजनीति के मूल तत्व समझ में आ जाए। धर्म और राजनीति का अविवेकी मिलन दोनों को भ्रष्ट कर देता है, फिर भी जरूरी है कि धर्म और राजनीति एक दूसरे से सम्पर्क न तोड़ें, मर्यादा निभाते रहे।“ धर्म और राजनीति के साथ साथ चलने का जिक्र जब डा0 लोहिया ने किया था तब उन्होंने सोचा भी न होगा कि आने वाले समय में राजनीति मंषाओं को पूरा करने का केन्द्र जाति-धर्म को बना दिया जाएगा। यह सत्य है कि आज कोई भी चुनाव जाति और धर्म की राजनीति से मुक्त नहीं। अमूमन सभी दल जाति और संप्रदाय के आधार पर ध्रुवीकरण का प्रयास करते है। बिहार का चुनाव तो जातिगत वोटों के आधार पर लड़ा जा रहा है लेकिन जहां तक 2017 में होने वाला यूपी का चुनाव है, वह धर्म आधारित होगा या व्यक्ति विषेष पर टिका होगा ऐसे कयासों पर चर्चाओं का बाजार गरम होने लगा है।

कुछ माह पूर्व ‘दलित जातिवादी राजनीति बनाम हिंदुत्व’ शीर्षक से मैंने एक लेख पढ़ा था जिसकी कुछेक बातों से मैं सहमत थी कि 2014 के चुनाव में भाजपा ने धर्म और जाति, दोनों का इस्तेमाल बड़ी रणनीति के साथ किया, जिसके पीछे वह चालाकी से ‘विकास’ की बात करके जनता को भ्रमित करने में सफल रही, जबकि असली मुद्दा धार्मिक ध्रुवीकरण का ही था। इस दौरान बसपा, सपा और जद (एकी) के सीटें न जीत पाने को मीडिया द्वारा भी इसी तरह प्रस्तुत किया गया कि अब जाति की राजनीति के दिन लद गए। जबकि यह सच नहीं है। जहां तक जाति की राजनीति का सवाल है, भाजपा हमेशा से ऊंची जातियों और हिंदुत्व की राजनीति करती रही है, उसने इस बार भी की। यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है कि विमर्शकारों को भाजपा जाति और धर्म की राजनीति करती नहीं दिखती, जबकि सामाजिक न्याय की राजनीति करने वाले दलों पर हमेशा जातिवादी राजनीति करने का आरोप लगाया जाता रहा है।

राजनीतिक विषेषज्ञ योगेंद्र नारायण का कहना है कि यह सच है कि वोट पर जाति धर्म का असर पड़ता है। आप मतदाता हों या उम्मीदवार, मतदान पर आपके समुदाय का असर पड़ता है। कभी-कभार जाति के आधार पर ध्रुवीकरण इतना तीखा होता है मानो जाति के सिवाय और कुछ नहीं है। लेकिन आंकड़े बताते हैं कि जाति या धर्म वोट पर असर डालने वाले कारकों में से एक है, एकमात्र कतई नहीं। पिछले 10-15 साल में उत्तर प्रदेश और बिहार की परिस्थितियों ने सब के मन में कहीं न कहीं पूरे देश की छवि बना ली है। जबकि हकीकत यह है कि उत्तर प्रदेश और बिहार का जातीय ध्रुवीकरण भारतीय लोकतंत्र में एक अपवाद है उसका सामान्य नियम कतई नहीं। आपको याद होगा जब राष्ट्रीय जनगणना में जाति आधारित जनगणना पर संसद में लालू यादव और मुलायम सिंह यादव ने मांग उठाई तो चिंता हुई थी कि यह कहीं मंडल कमीषन की तरह हंगामाखेज न बन जाए। जो जाति व्यवस्था के खिलाफ थे, उन्हें लगा कि कहीं इससे जाति व्यवस्था को बढ़ावा न मिले। खिलाफत गलत भी नहीं थी। जाति को भी जनगणना में शामिल करने का मुख्य लक्ष्य देर सबेर अपने अपने वोट बैंक को सेट करना था। पंचायत चुनाव हों या विधानसभा या लोकसभा भीतरी इलाकों में आज इसी दम पर जीत हासिल की जाती है। डा0 लोहिया कहा करते थे कि जाति बुरी चीज है, लेकिन जाति जैसी कठोर सच्चाई भी दूसरी नहीं है और जाति तो एक ऐसा सच है, जिसका विश्व में कहीं और उदाहरण ही नहीं मिलता....धर्म आसान है, जाति कठोर है।

कुछ ऐसा ही धर्म के साथ भी है। कहते है धर्म और राजनीति के अविवेकी मिलन से दोनों ही भ्रष्ट हो जाते हैं। साम्प्रदायिक कट्टरता का जन्म इनके मिलन से होता है। यदि धर्म और राजनीति को अलग रख कर देखा जाए तो साम्प्रदायिक कट्टरता से बचा जा सकता है। लेकिन राजनीति करने वाले अपने वोट बैंक और स्वार्थलोलुपता के कारण धर्म का दुरुपयोग करते है और धर्म भी आदर्श का त्यागकर राजनीतिक गलियारों में अपना रुतबा कायम करने की कोशिश में लग पड़ता है। ऐसी स्थिति में जातिगत वोट का स्थान धर्म ले लेता है। बिहार में जातिगत वोट की वजह ही जाति को प्रमुखता देने से है। किंतु उत्तर प्रदेष में दलित वोट बैंक से अलग हटकर अगर कोई वोट बैंक इस बार बनाने का पंयास होगा तो वह धर्म के नाम पर होगा। 2012 का चुनाव जाति धर्म से अलग हटकर व्यक्ति विषेष था। अखिलेष की धुंआधार सायकिल यात्रा ने सपा की छवि को साफ करने में मदद की और दलितों की मसीहा बसपा दरकिनार हो गई। उस वक्त कांग्रेस भाजपा इन दोनों के बीच कहीं नहीं थी। लेकिन आज भाजपा पहले ही तुलना में मजबूत है और उत्तर प्रदेश की सत्ता पाना उसका परम लक्ष्य। लोहिया के समाजवाद के सिद्धांत की समर्थक समाजवादी पार्टी मुस्लिम वोट बैंक को अपना प्रबल पक्षधर मानती थी। कांग्रेस फिलहाल किसी भी जनाधार के बिना इस वक्त मैदान में है। ऐसे में भाजपा और सपा ही रह जाते है जो धर्म के नाम पर उत्तर प्रदेष में अपने राजनीति दांव खेल सकते है। भाजपा राष्ट्रवाद की बात करती है लेकिन उसकी अपनी छवि हिन्दू पार्टी की है जिसका मुख्य जनाधार हिन्दू वोट बैंक ही है। तीसरी पार्टी बसपा है जो दलित वोट बैंक, जिनकी जनसंख्या में भागेदारी 21.6 प्रतिशत हैं, पर प्रबल दावेदारी रखती है। लोकसभा में दलित वोट बैंक के खिसकने से जो बसपा को कमजोर पार्टी समझ बैठे बात उन्हें हाल में मायावती ने एक बार फिर साबित कर दिखया कि बसपा अभी भी उत्तर प्रदेश में अपनी मजबूत पकड़ रखती है। जिस वक्त बिहार चुनाव में बाकी पार्टियां व्यस्त रही मायावती ने कांशीराम के 11वें परिनिर्वाण दिवस के मौके पर आयोजित कार्यक्रम में बड़ी संख्या में भीड़ जुटा कर दूसरे दलों को जता दिया कि पारम्परिक मतदाता आज भी उनके साथ है।

एक बात और है कि पार्टिया भले ही धर्म जाति की राजनीति करे, मतदाता अक्सर अपनी बुद्धिमता का परिचय ही देते मिला है। इसलिए पार्टिया भले ही जाति धर्म के नाम पर जहर का बीज बोने का प्रयास करें, संदेह नहीं कि कहीं भी कोई बड़ी सांप्रदायिक घटना हो या फिर सांप्रदायिक गोलबंदी हो रही हो तो उसके जवाब में एकजुटता की भावना ही उभरकर सामने आती है। जहां तक भारत में रहने वाले मुसलमानों का सवाल है वह वोट देते समय किसी मुस्लिम उम्मीदवार या इस्लामी पार्टी के होने का ख्याल नहीं रखता। यही बात भारत के मुसलमानों को दुनिया के मुसलमानों से अलग करती है। वे हमेषा अपनी आस्था ऐसी पार्टियों में जताते है जिनका नेतृत्व हिंदू के हाथों में रहा है और जिनकी विचारधारा इस्लाम से कतई प्रभावित नहीं रही हो। अगर उन इलाकों को छोड़ दें जहां सीधे-सीधे कांग्रेस और भाजपा में मुकाबला है तो ऐसी कोई जगह नहीं है जहाँ मुसलमानों का 70-80 प्रतिशत वोट किसी एक पार्टी को मिलता हो। यानी कि हिंदुस्तान का मुसलमान उस मायनों में वोट बैंक नहीं है जिस मायने में अमेरिका के अश्वेत, डेमोक्रेटिक पार्टी के हैं या फिर ब्रितानिया के अल्पसंख्यक समूह वहाँ की लेबर पार्टी के वोट बैंक हैं। यही वजह है कि लोकसभा चुनाव में नरेन्द्र मोदी के नाम पर हर मतदाता जात-पांत से उठकर वोट करने चल पड़ा और रिकार्डतोड़ मतों से भाजपा को, जो कि हिंदू पार्टी है, सत्ता पर बिठा दिया।

उत्तर प्रदेश में होने वाले 2017 के चुनाव को राजनीतिक पार्टियां धर्म जाति से प्रभावित करने की कोशिश करेगीं, लेकिन जहां तक मतदाताओं का सवाल है तो अधिकांश का वोट व्यक्ति विशेष पर अधिक होगा। और एक बात कहना चाहूंगी कि जात-पांत धर्म से ऊपर एक और चीज है जिसे ’हवा का रूख’ कहते है। वह जिस ओर होगी, जिसकी होगी सत्ता उसी की होगी।                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                          

Saturday, October 3, 2015

कश्मीर का राग अलापना छोड़ दें आप मियां नवाज शरीफ साहब!

वाल्डोर्फ एस्टोरिया होटल में एक संवाददाता सम्मेलन के दौरान जब प्रधानमंत्री मियां नवाज शरीफ ने पाकिस्तान के आंतरिक मामलों में भारतीय हस्तक्षेप और भारत द्वारा पाकिस्तान की धरती पर आतंकवाद भड़काने संबंधी फाइल को जल्द ही कि उस संयुक्त राष्ट्र के महासचिव को सौंप दिए जाने की बात जब कही तब मैंने अपनी याददाश्त के साथ जोर आजमाईश कर ये याद करने की कोशिश की कि भारत ने कब और कौन सा ऐसा आतंकवादी हमला पाकिस्तान की जमीन पर कियाकी फाइल पाकिस्तान तैयार किए बैठा हैै? इस फाइल की जानकारी देने के बाद उनका ये कहना तो और भी चैंकाने वाला था कि पाकिस्तान शांतिपूर्ण पड़ोसी के संबंधों के लिए उत्सुक है, जबकि उनके ’अशांतिपूर्ण’ रवैये का गवाह अमेरिका, संयुक्त राष्ट्र से लेकर उनका हमजोली चीन भी है।
पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ जब 2014 में नरेन्द्र मोदी के शपथग्रहण समारोह में भारत आए तो उनके व्यवहार से एकबारगी ऐसा लगा कि हो न हो ये दो कद्दावर नेता इस बार किसी नतीजे पर जरूर पहुंचेगे।। उपहारों के आदान-प्रदान ने दोनों देशों के बीच फैले तनाव भरे माहौल को नरम भी किया लेकिन जल्द ही इस बात का यकीन भी दिला दिया कि ये तो महज औपचारिकताएं थी जो निभाई जा रही थीं, अन्यथा परिस्थितियां वैसी ही है जैसी थी। धीरे-धीरे पाकिस्तानी प्रधानमंत्री के बदलते सुरों ने इस बात का भी यकीन दिला दिया कि कठपुतली सरकार चला रहे नवाज शरीफ सेना के दबदबे के आगे लाचार है। इसी दबाव के चलते पाकिस्तानी प्रधानमंत्री अन्तर्राष्ट्रीय मंचों पर अक्सर कश्मीर राग अलापते मिल जाएंगें। बरसों से अलापे जा रहे इस राग का आज भी कोई सुनने वाला नहीं ये जानते हुए भी पाकिस्तान पड़ोसी मसलों को विश्व मंचों पर रखने से बाज नहीं आता। सोच का फ्रर्क देखिये जहां भारत का प्रधानमंत्री ऐसे मंचों का उपयोग आतंकवाद के खिलाफ एक होकर लड़ने के लिए करता है और अपने समय का पूरा सदुपयोग कर देश हित के लिए लोगों से मिलता है तो वहीं पाकिस्तान का प्रधानमंत्री अपना रोना रोकर स्थानीय पाकिस्तानी रेस्ट्रोरेन्टों का मजा लेने चला जाता है। ऐसा लगता है जैसे इस तरह के मंच का उपयोग वे मात्र ’उन’ घरेलू लोगों को संतुष्ट करने के लिए करते है जो गाहे बगाहे इस मसले पर उनकी नीयत पर शक करने लगते है। इसलिए इस बार के यूएन समिट में इस मुद्दे को उठाते हुए उन्होंने न केवल कश्मीर की मांग को दोबारा उठाया वरन् ’शांतिदूत’ का नकाब ओढ़ दोनों मुल्कों में शांति के लिए चार सूत्र भी बता दिए, जिसके जबाव में भारत की विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने उन्हें चार की जगह सिर्फ एक सूत्र पर ही ध्यान देने को कहा और वह यह है कि आतंकवाद छोड़िए और बैठकर बातचीत कीजिए।
कश्मीर और उससे जुड़े ढेरों तथ्यों के बीच एक बात सौ फीसद सही है कि न भारत उसको अपना अभिन्न अंग मानना छोड़ेगा और ना पाकिस्तान इस बात को मानने को तैयार होगा कि कश्मीर भारत का है। यूं कह लें कि कश्मीर का मामला दिमाग से नहीं सीधे दिल से जुड़ा हुआ है। और दिल पर किसकी हुकुमत चली है। दरअसल कुछ मसले ऐसे होते है जिन पर देशों के सियासतदार भी फैसला करने से डरते है। इसके उदाहरण भी मिल जाते हंै। कुछ दिनों पहले मैंने सोशल मीडिया की एक साइट पर पढ़ा था कि सरदार वल्लभभाई पटेल कश्मीर को पाकिस्तान को दे देना चाहते थे, जबकि पंडित जवाहरलाल नेहरू कश्मीरी होने के नाते कश्मीर को भारत के साथ रखना चाहते थे। यह बात पत्रकार कुलदीप नैय्यर की जीवनी से उद्धृत कर पोस्ट की गई थी। अब साठ-सत्तर साल पहले की इन बातों को पूरी प्रामाणिकता के साथ खंगालना आसान काम नहीं है। कुछ लोग महाराजा हरीसिंह को दोष देते है जिन्होंने भारत के साथ विलय के दस्तावेजों पर सहर्ष हस्ताक्षर कर दिए थे। आपको जानकर हैरानी होगी कि जिस कश्मीर को लेकर इतनी हाय तौबा मची है वह आठ-नौ सौ साल पहले एक हिंदू बहुल भूभाग था। इस धरती के पूर्वज (शैव धर्म के अनुयायी) हिंदू थे। बाद में हुए धर्मांतरण ने घाटी में हिंदुओं को अल्पसंख्यक बना दिया, जबकि असल में कश्मीर में हिंदू बहुसंख्यक थे। अब हिंदू बहुसंख्यक हो या मुस्लिम अल्पसंख्यक, सियासत के खेल में, रचे गए कुचक्र में आज कश्मीर दोनों देशों के बीच जातीय दुश्मनी का सबसे बड़ा कारण बन गया है।
एक विदेशी अखबार के संपादकीय में मैंने पढ़ा था कि उन्होंने शरीफ को व्यवहारिक पक्षों को समझकर कश्मीर समस्या के हल के लिए आगे बढ़ने की नसीहत दी थी और ये तक कहा कि उसकी इस कोशिश में साथ देने को भारत सदैव तैयार दिखेगा। दुनिया में कितने उदाहरण ऐसे मिल जाएंगें, जहाँ वर्षो से चली आ रही व्यापक समस्याओं का समाधान बातचीत से ही निकला। लेकिन पाकिस्तान में सत्ता परिवर्तन के बावजूद उम्मीद की कोई किरण कभी नजर नहीं आई। जिस तरह से पाकिस्तान सीजफायर का उल्लधंन करता है वह किसी सभ्य पड़ोसी का सभ्य व्यवहार नहीं कहा जा सकता। सदा से भारत पर किए जाते पाकिस्तान समर्थित आतंकवादियों के हमलों की अनदेखी करना और भारत की ओर से पेश किए जाते सबूतों को मानने से इंकार करना पाकिस्तान की हठधर्मिता का सबसे बड़ा सबूत है। 27 जुलाई को सेना की वर्दी में कपड़े पहने बंदूकधारियों ने पाकिस्तान के साथ सीमा के पास एक भारतीय पुलिस स्टेशन पर हमला किया और जिसमें कम से कम नौ लोग मारे गए थे। इस तरह की बेजा हरकतों को रोकने के बजाय पाकिस्तानी प्रधानमंत्री भारत पर ही उल्टा आतंकवाद फैलाने का ठीकरा फोड़ रहे है।
बेहतर होगा पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इस बात पर गौर फरमाएं कि सिर्फ कश्मीर मुद्दे को उछालते रहने से न तो उनका भला होने वाला है और न ही पाकिस्तान को ही कुछ मिलने वाला है। अफसोस होता है इस बात पर कि ब्रिटिश औपनिवेशिक साम्राज्य के विभाजन में बने पाकिस्तान को 60 से अधिक वर्ष हो रहे है किंतु आज भी कश्मीर विवाद को लेकर उसका अड़ियल रुख नहीं बदलता। इस मुद्दे पर कई मर्तबा निर्णायक समझौते की स्थिति आते-आते रह गई और इसकी वजह अधिकाशतः पाकिस्तान के भीतर राज करते लोग रहे है। फिर भी इस मामले में बातचीत का पहल का रास्ता भारत ने खुला रहा जबकि पाकिस्तान इस मुद्दे के समाधान की दिशा में किसी सकारात्मक पहल की तरफ बढ़ने से बाज आता रहता है। आज स्थ्तिि ये है कि उसकी कथनी और करनी की पोल दुनिया के सामने खुली पड़ी है और इसका सबसे बड़ा उदाहरण लादेन है। लादेन को पाकिस्तान में सेना की मदद से महफूज रहने की उसकी करतूत ने अमरीका की नजरों में उसका भरोसा खत्म कर दिया। संयुक्त अरब अमीरात, जो कि पाकिस्तान का प्रबल समर्थक रहा है, ने गत दिनों भारत के प्रधानमंत्री के संयुक्त अरब अमीरात के दौरे के अवसर पर भविष्य में भारत के साथ घनिष्ठ संबंधों को तवोज्जोह देने के अपने मंसूबों को तब जाहिर कर दिया जब एक संयुक्त बयान के जरिए भारत और अमीरात ने आतंकवाद का औचित्य साबित करने के लिए धर्म के प्रयोग की निंदा की और आतंकवाद का मिलकर मुकाबला करने में आपस में पूर्ण सहयोग का वादा किया। एक के बाद एक झटके खता पाकिस्तान अब अपने लिए नये रहनुमाओं को खोजता फिर रहा है। संयुक्त राष्ट्रसंघ के मंच से उनकी पीड़ा को कितनों ने सुना इस बात से हम आप सब वाकिफ है। चीन से उसकी करीबी जगजाहिर है अब अमेरिका के घोर विरोधी रूस को भी वह अपना बना लेने की कवायद में जुटा है। 
पाकिस्तान हो या उसके सिपहसलाहकार भारत की तरक्की उन्हें फांस की तरह चुभती है। ब्रिटिशराज के खात्मे के साथ एक ही वक्त में फिर से विकास का रास्ता पकड़ने में पाकिस्तान कहीं पीछे छूट गया और भारत आगे बढ़ गया। इसलिए किसी तरह भारत में अस्थिरता बनाए रखना ही उसने अपना मकसद बना लिया है। वरना ऐसा क्या है कि दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक जुड़ाव में बेइंतहाई जुड़ाव होने के बाद भी सियासतदारों के दिल इतने तल्ख़ है। इस मुत्तालिक़ फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ साहब का एक शेर याद आ रहा है- 

इक तर्ज़-ए-तग़ाफ़ुल है सो वो उनको मुबारक़
इक अर्ज़-ए-तमन्ना है सो हम करते रहेगें     (तग़ाफ़ुल-बेपरवाही)





Sunday, September 27, 2015

बिहार की राजनीति ’विकास’ पर नहीं ’जाति’ के दम पर चलती है

नीतीश कुमार बिहार के विकास को लेकर ’आत्मविश्वास’ से लबरेज नजर आ रहे है तभी तो उन्होंने एक चैनल के कार्यक्रम के दौरान बिहार के विकास पर लंबा तर्क दे डाला ये पूछते हुए कि कौन कहता है बिहार में विकास नहीं हो रहा?े इस तरह के आत्मविश्वास का प्रदर्शन करना अच्छी बात है और तब तो और अधिक अच्छी बात है जबकि आप किसी राज्य या देश के मुखिया हों। आपने काम किया है तो उसे जग जाहिर करने का भी आपको पूरा हक है। लेकिन नीतीष जी का आत्मविश्वास मुझे उनका ’ओवर कांफिडेंस’ ज्यादा लग रहा था। जबकि बिहार की वस्तुस्थिति हम सब के सामने है। अपने किए के कसीदे पढ़ना या फिर न दिखने वाले विकास को बढ़-चढ़ कर बताना राजनीति का एक आजमाया हुआ ’फंडा’ तो हो सकता है पर सच्चाई नहीं। सच तो ये है कि जमीनी हकीकत कुछ भी हो ये सत्तासीन लोग, क्या दिखा लेते है या क्या समझा लेते हैं इसी पर इनकी सारी काबिलियत टिकी है। जहां तक मतदाता का सवाल है उसे लुभाने के लिए दो काम भी कर दिये या फिर कुछ और वादे कर दिए तो हो गया इनका काम और फिर बिहार के विकास को लेकर बिहार की जनता उतनी परेशान नहीं दिखती जितने चितिंत विपक्षी नजर आ रहे हैै।
इसीलिए मुख्यमंत्री नीतीश कुमार आजकल ’बढ़ चला बिहार’ के साथ अपने कार्यकाल की उपलब्धियां गिनाकर मतदाताओं के बहाने विपक्षियों को जबाव देने में लगे है जैसे कि बिहार में शिक्षा की अनेक योजनाएं शुरू की गईं, लड़कियों को स्कूल भेजने के लिए साइकिल योजना आरंभ की गई, स्कूलों में लड़कों व लड़कियों की संख्या लगभग बराबर हो चुकी है, स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी हालात बदल गए हैं, मानव विकास पर ध्यान दिया जा रहा है, शिशु मृत्यु व मातृ मृत्यु दर घट गए, पोलियो का उन्मूलन हुआ, टीकाकरण में हम राष्ट्रीय औसत से भी आगे निकल गए हैं वगैरह वगैरह। चुनाव से पहले विकास के दावे करना और विपक्षियों द्वारा लगाए आरोप का उन्हीं की जुबान में जबाव देना कोई नई बात नहीं है। अपना बखान करते हुए अपनी जीत दर्ज करने के लिए कुछ और वादे करना भी पुराना चुनावी हथकंडा है जिसे नीतीश कुमार भी आजमा रहे है। तभी तो कल्याणपुर में सीएम नीतीश कुमार अपनी चुनावी जनसभा को संबोधित करते हुए कह रहे है कि वे हर जिले में हर युवा को दो भाषा हिंदी व अंगरेजी सिखाने का प्रबंध करेंगे, ताकि उसे रोजगार में दिक्कत नहीं हो। वे दावा कर रहे है कि उनका शासन फिर से आने से युवाओं के जीवन में नया उजाला आयेगा। हर जिले में कौशल विकास केंद्र खोलेंगे और वहां रजिस्ट्रेशन होगा, ताकि हमारे युवा स्वरोजगार कर सकें।
युवाओं को रिझाने के पीछे नीतीश की मंशा भले ही विपक्षियों के हथियारों को कमजोर करने की हो लेकिन वे उस हकीकत से कतई अनजान नहीं हो सकते जिसे ’बेरोजगारी’ कहते है और जो बिहार के युवा का सबसे बड़ा मसला है। इस मुत्तालिक श्रम मंत्रालय के आंकड़ों पर एक नजर डालें तो पता चलता है कि अगर देश में 15 से 17 वर्ष के 17 प्रतिषत बेरोजगार है तो अकेले बिहार में इस उम्र के 31 प्रतिशत बेरोजगार हैं। 18-31 वर्ष के बेरोजगारों की संख्या यदि देष में 13 प्रतिशत है तो बिहार में इनकी संख्या 17 प्रतिशत है। मसलन बिहार के लगभग 10.4 करोड़ युवाओं में से 48 प्रतिशत के आगे बेरोजगारी की समस्या मुह बाएं खड़ी है। श्रम मंत्रालय के अनुसार विभिन्न पेषों में यहां अगर किसी रोजगार में युवाओं की दिलचस्पी है तो वह खेती है। इसलिए सबसे अधिक रोजगार के अवसर कृषि में (45.2 प्रतिशत) है, बाकी व्यवसायों जैसे कंस्ट्रक्शन (20.1 प्रतिषत), व्यापार (11.8 प्रतिषत), मैन्यूफैक्चरिंग (10.60 प्रतिषत) और शिक्षा (8.4 प्रतिषत) भर ही रोजगार हैं।
इन आकड़ों को देखने के बाद आप या तो बिहार में विकास का दावा कर रहे नीतीश पर गलतबयानी का आरोप लगा सकते है या फिर उन आंकडों को गलत कह सकते हैं जिनके द्वारा बिहार की असलियत दिखाने की कोशिश की गई है। कुछ और आंकड़े है जो बिहार की जमीनी हकीकत दिखा रहे है। एनुवेल सर्वे आॅफ इंडस्ट्रीज की 2013 की रिर्पोट के हवाले से किए गए सर्वेक्षण के अनुसार बिहार में कुल 3345 उद्योग है जो देष भर का मात्र 1.5 फीसद भर है। शिक्षा के नजरिए से नीतीश राज की साक्षरता दर अफ्रीकी देशों जैसे मलावी, कांगो और सूडान से भी बुरी है। वर्ष 2011 की जनगणना के मुताबिक भारत में सबसे कम साक्षरता दर बिहार की है। इस जनगणना के मुताबिक बिहार के 64 फीसदी लोग यानी 10 करोड़ 40 लाख लोग निरक्षर हैं। गरीब राज्यों में बिहार में शिक्षा की स्थिति वाकई चिंताजनक है। यूडीआईएसई (सेकेंड्री) के अनुसार 2013-14 में हाईस्कूल में दाखिला लेने वाले बच्चों का प्रतिशत 60 प्रतिशत रहा जिसमें 2012-13 के मुकाबले महज 15 प्रतिशत बढ़ा।
नीतीश बिहार को ’जंगलराज 2’ कहने पर घोर आपत्ति करते है। वे इसके बजाय बिहार में हो रहे विकास पर ध्यान देने को कहते है। लेकिन गंभीर अपराध के मामले बिहार में इतने है कि विकास नजर ही नहीं आता। इस मामले में बिहार का दर्जा उत्तर प्रदेश के बाद आता है और इस हकीकत से वे नावाकिफ तो नहीं हो सकते। नेषनल क्राइम रिकार्ड्स ब्यूरो के 2013 के आंकड़ों के हिसाब से 30213 मामले गंभीर अपराध के नाम पर दर्ज है। इसी वर्ष में 3441 मामले सिर्फ हत्या के ही दर्ज हुए है। 2013 में ही महिलाओं के खिलाफ हुए अपराध में ही 13609 मामले दर्ज हुए है।
इन सर्वे रिर्पोट्स में षिुषु मृत्यु दर और प्रसव के समय होने वाली महिलाओं की मृत्यु दर में आती कमी की रिर्पोट ही जरूर बिहार के मुख्यमंत्री को मुस्कुराने की वजह दे सकती है अन्यथा आर्थिक दृष्टि से पिछड़ रहे बिहार की हालत कतई अच्छी नहीं कही जा सकती। आर्थिक सर्वेक्षण के आंकड़ों के अनुसार अगर देश में प्रति व्यक्ति आय 80,388 है तो बिहार में ये प्रति व्यक्ति 31,229 है। यानी देश के मुकाबले सूबे की प्रति व्यक्ति आय 40 फीसदी से भी कम है। छत्तीसगढ़, झारख्ंाड के बाद  गरीबी में बिहार का नंबर तीसरा है। इंडियास्पेंड की रिसर्च को अगर ठीक से खंगाला जाए तो ऐसे कई और कई मुद्दे है जो बिहार की वस्तुस्थिति को सामने रखते है और नीतीश राज की पोल खोलते हैं। बिहार की हर नब्ज से वाकिफ नीतीश कुमार मतदाताओं और विपक्षियों के आगे तो बिहार में होते बदलाव और विकास की बात करते है वहीं दूसरी ओर केंद्र से बिहार को विशेष राज्य का दर्जे दिए जाने की मांग को लेकर बिहार बंद, अनशन आदि भी करते हैं। इस संबंध में भाजपा से शिकायत भी कर चुके हैं कि कांग्रेस के साथ सीमांध्र को विशेष दर्जा दिलाते वक्त भाजपा ने बिहार को क्यों याद नहीं रहा?
इन आंकड़ों पर नजर डालने के बाद तो नीतीश कुमार के ’अति आत्मविश्वास’ पर अफसोस ही होता है। आपके किए कार्यों का गुणगान दूसरे करें तो एक बात है लेकिन आप ही जब उनका बढ़ चढ़ कर बखान करने लगे वह भी तब जबकि जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां करती हो। अफसोस होता है ये देखकर कि सत्ता में बने रहने की चाह ने नीतीश कुमार को भी नहीं बख्शा। ये वही नीतीश कुमार है जो लालू राज का खात्मा कर जब सत्ता में आए तो बिहार ही नहीं देश में हर किसी ने उनका दिल से स्वागत किया था। उस वक्त हर किसी को लगा था कि बिहार की किस्मत अब बदल जाएगी। बिहार की किस्मत तो नहीं बदली हां नीतीश कुमार के विचारों में जरूर भारी बदलाव आ गया, जिसके नमूने वे कई मर्तबा पेश कर चुके हैं। फिर भी इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि आंकड़ों की नजर से अगर लालूराज के आंकड़ों को देखें तो मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के कार्यकाल में बिहार में विकास दर कुछ सुधरा है। लेकिन विकास दर में सुधार के बावजूद बिहार कई मामलों में अब भी अन्य राज्यों की तुलना में सबसे निचले पायदान पर ही नजर आता है।
बिहार में विधानसभा की कुल 243 सीटें हैं जो 38 जिलों में फैली हुई हैं। कुल क्षेत्रफल 94,163 वर्ग किलोमीटर और 2011 की जनगणना के मुताबिक कुल आबादी 10.38 करोड़, जो संख्या के हिसाब से उसे देश का तीसरा सबसे बड़ा राज्य बनाती है। आबादी में फिलीपिंस की आबादी के बराबर के बिहार को नीतीश कुमार के राजकाज संभालने के बाद कुछ गति अवष्य मिली, लेकिन बेरोजगारी और गरीबी के मामले में देखा जाए तो राज्य अब भी पिछड़ा है। यहीं कारण है कि विपक्षी जब-जब वार करता है तब-तब बिहार के अति पिछड़े होने पर ही चोट करता है। ’बढ़ चला बिहार’ की हकीकत को वहां रहने वाले लोगों से बेहतर कौन समझ सकता है।
हालांकि बिहार के चुनाव की एक अदद सच्चाई यह भी है कि यहां विकास के नाम पर नहीं जाति के नाम पर वोट अधिक पड़ते है। असाक्षरता का इस तरह का आलम भी कभी कभी इन नेताओं के लिए वरदान साबित हो जाता है। सोशल मीडिया पर आजकल एक चुटकुला खूब चल रहा है कि बिहारी वर्णमाला को इस हिसाब से देखते है। उनके लिए ’सी’ (कास्ट) पहले आता है और ’डी’ (डेवलेपमेन्ट) बाद में। हमेषा की तरह इस बार भी बिहार चुनाव में तीन ’सी’ (केन्डीडेेट, कास्ट और कांसिटयून्सी ) ही मुख्य फैक्टर है। अब विरोधी भले ही विकास-विकास चिल्लाता रहे, मतदाताओं की ऐसी सोच के चलते नीतीश इस मामले में राहत की सांस तो ले ही सकते है।


Friday, September 18, 2015

बधाई! तो इस बार भी डेंगू की ही जीत हुई

महज सात साल का था अविनाश। अभी तो उसे पूरी जिंदगी जीनी थी। उसके मां बाप ने उसे लेकर ढेरों सपने सजाए थे, जिसे एक ही रात की काली स्याही से धो डाला गया। मूलचंद, मेडसिटी, साकेत मैक्स और फिर आईरीन, एक के बाद एक अस्पताल के चक्कर काटते मां-बाप की बेचारगी की कल्पना आप कर सकते है जिनके लाल की सांसें उनकी गोद में उखड़ रही हो और कोई अस्पताल उसे लेने को तैयार न होे। अपने इकलौते बेटे की मौत के सदमें ने अविनाश के मां बाप को कुछ ऐसा तोड़ा कि उन्होंने अपनी ही जिंदगी को समाप्त कर देना उचित समझा। इस दर्दनाक सत्य को सुनने और सिस्टम की कमियों को समझने के बाद हमारे अस्पतालों की व्यवस्था में कोई बड़ा भारी परिवर्तन आ गया हो या जाएगा, ऐसा कतई नहीं है। हां, इस सत्य ने जहां डाक्टरों की चरम संवेदनहीनता का नमूना पेश किया वहीं सरकारी व्यवस्था की बखिया को एक बार फिर से उधेड़ दिया।
इस साल जब से डेंगू का अटैक शुरू हुआ है तब से मेरे जानने वाले कुछ लोगों की पूछताछ ने मुझे निरूत्तर कर दिया। उनकी जिज्ञासा महज इतना जानने में थी कि अगर किसी अस्पताल में मेरा कोई खास परिचय हो तो उनके डेंगू पीड़ित संबंधी को अस्पताल में बेड मिल जाए या फिर थोड़ी खास तव्वोजोह दे दी जाए। ये वाकई हैरानी की ही बात है कि सामान्य सी प्रक्रिया के लिए भी कहना-कहलाना ’सिस्टम’ से ’डील’ करने की एक कड़ी बनती जा रही है। इस सत्य से हम सब दो चार हो रहे है है। अविनाश की मौत नहीं होती, अगर उसके पिता किसी नामी गिरामी शख्सियत से नाता रखते होते। लेकिन क्या सिर्फ एक यही वजह है कि अस्पतालों में बेड नहीं दिए जाते क्योंकि वे किसी खास के लिए आरक्षित होते है या फिर खास के कहने पर ही दिए जाते है। अगर ये सत्य है तो यह भी एक बड़ा सच है कि बढ़ती बीमारों की तादाद और बिस्तरों की होती कमी से भी ’सिस्टम’ का हाल बेहाल है।  
जिस देश में बीमारों की तादाद बीमारियों से कहीं अधिक है वहां अस्पतालों की कमी का रोना जारी रहना स्वाभाविक सी बात है। जितने बेड होते है उससे कहीं ज्यादा तो मरीज अस्पताल का रूख करते है। निम्नतर आय वाले हो या कहें मध्य आय वर्ग का आदमी उसके लिए सरकारी अस्पताल का ही एकमात्र सहारा होता है। और जब इस तरह की बीमारी फैलती है तो यही वर्ग सबसे ज्यादा इसके शिकार भी होते है। डेंगू फैलने वाली बीमारी है और इसका शिकार हर वह शख्स जो लापरवाही का शिकार है। अब फिर चाहे इसके लिए वह स्वंय दोषी हो या फिर उसके आसपास का वातावरण या वह व्यवस्था, जिसमें रहने को वह मजबूर है।
डेंगू का आतंक देश में 1996 से बदस्तूर जारी है। भारत के अलावा लैटिन अमेरिकी देश जैसे अर्जेंटीना, मक्सिको, चिली और एशियाई देश जैसे पाकिस्तान भी इसकी गिरफ्त में हैं। अध्ययन के अनुसार डेंगू एक ऐसे मच्छर के काटने पर होता है जिसकी लार में डेंगू के वायरस मौजूद होते हैं। इंसान के जिस्म में पहुंचा डेंगू वायरस सबसे पहले त्वचा में मौजूद प्रतिरोधी कोशिकाओं यानी इम्यून सेल्स को संक्रमित करना आरंभ करता है। इसके बाद वायरस शरीर के लिम्फैटिक सिस्टम में प्रवेश कर जाता है। फिर ये खून की नलिकाओं से होकर मरीज के पूरे शरीर में फैल जाता है इसे वेरेमिया कहते हैं। इस दौरान तेज बुखार आता है, जिसे डेंगू हेमोरैजिक (ीमउवततींहपब, फीवर कहते हैं। इसमें खून की नलियों से रिसाव शुरू हो जाता है और उससे प्लाज्मा की लीकेज शुरू हो जाती है। अगर मच्छर किसी डेंगू के मरीज को काटता है तो उसके खून में मौजूद वायरस अपने साथ लेकर दूसरे स्वस्थ लोगों में फैलाने का काम करता है।
इस जानलेवा बीमारी के बारीकियों को जानते हुए भी इसके प्रति बरती जाती लापरवाही यकीनन अफसोसजनक है। जिस हिसाब से साल दर साल डेंगू के मरीजों की तादाद बढ़ रही है उस हिसाब से अस्पतालों की व्यवस्था में बदलाव या कहें इजाफा नहीं हो पा रहा। सरकारी अस्पतालों में अगर एक बेड पर 3-3 मरीजों को भर्ती किया जा रहा हैं तो प्राइवेट का पूरा हिसाब किताब आपकी हैसियत पर टिका है। अपनी-अपनी चलाते इन अस्पतालों पर सरकारी दबाब तब बनना शुरू होता है जब पानी सिर से ऊपर गुजरने लगता है।
डेंगू की आहट ऐसा नहीं है कि सरकारों को सुनाई नहीं देती लेकिन जब तक कुछ अमानवीय नहीं घट जाता वो भी नहीं जागती। हर बात के लिए हो हल्ला करना तो जैसे आज की जरूरत बनता जा रहा है। जिन जनसुविधा से जुड़ी चीजों के लिए विकसित देशों में सबके लिए सुलभ सुचारू व्यवस्था है, उन चीजों के लिए जुगाड़ के तरीके ढूढ़ने पड़ते है। इस मसले पर दरअसल दोष किसी एक के सिर मढ़ना उचित नहीं। कुछ स्वंय हम तो कुछ इस ’सिस्टम’ को चलाने वाले इसकी जिम्मेदारी लेने से भागते हैं। स्वच्छता का पाठ तो पढ़ना-पढ़ाना चाहते हैं पर उसे लागू नहीं करना चाहते। जानते हुए है कि किन वजहों से ये बीमारियां पनप रही है सफाई को तवज्जो नहीं देना चाहते। जानते है बिना सख्त अनुशासन के ये काम नहीं हो सकता फिर भी कठोर होने से बचते है। महज जबानी जमाखर्च कर अपनी जिम्मेदारी निभा लेना चाहते है।
अनपढ़ गरीब आदमी को डेंगू होता है तो इसका दोष इनकी गंदगी में रहने की आदत को दे दिया जाता है। किसी हैसियत वाले को डेंगू होता है तो इसका दोष सिस्टम की लापरवाही पर मढ़ दिया जाता है। इस दो तरह की सोच में मौत गरीब के ही हिस्से में आती है। पर उन्हें इस गंदगी में रहने को मजबूर करता कौन है? हमारी व्यवस्था ही कुछ ऐसी बनी है कि उनके इलाकों में सफाई जरूरी नहीं समझी जाती। अनपढ़ गरीब आदमी भी सफाई पसंद होता है या साफ वातावरण में रहना चाहता है। अगर ऐसा न होता तो तो जो आदमी सड़क पर थूकता चलता है वह आलीशान माॅल या फिर मेट्रो स्टेशनों में क्यों गंदगी फैलाने से बाज आता है। वजह साफ है। वहां के नियम, चमक-दमक और चकाचैंध ऐसा करने से उन्हें रोकती है। गंदगी को भी किसी नजरिए से देखने की जिम्मेदारी अगर किसी की है तो वह है सिर्फ और सिर्फ नगर निगम या उन्हें चलाने वाले सिस्टम की है। जो स्वंय तो ढंग से काम नहीं करते और न ही सख्त नियमों का पालन करवाते है। इन्हें ख्याल है तो सिर्फ उन इलाकों का जिनमें वीवीआई पी रहते हैं। आखिर क्यों केवल इन्हीं इलाकों को साफ रखने में सारी सेना लगा दी जाती है, जबकि स्लम एरियाज में कोई कूड़ा उठाने तक नहीं जाता। दरअसल नगर निगमों का काम भी इलाके और व्यक्ति की पहुंच के हिसाब से आरंभ और खत्म होता है।
गरीब होना गुनाह है, ये गलत नहीं कहा जाता। संभवतः यही कारण है कि सस्ते या मुफ्त इलाज के चक्कर में गरीबों को मौत को गले लगाना पड़ता है। अस्पताल की सुविधाएं भी उन्हें ही सहज उपलब्ध है जिनके पास पैसा है, या वे वीआईपी श्रेणी में आते हैं या फिर उनके करीबी है। तभी तो अस्पताल अथाॅरिटीज किसी बेफिजूल इंसान का वेंटिलेटर निकाल कर उसे लगाने में देर नहीं करती जो स्वंय उसके लिए बहुत महत्वपूर्ण हो। अस्पतालों में अगर आप कभी जनरल वार्ड की तरफ या इमरजेंसी की तरफ भूले से चले जाएं तो मैले कुचैले कपड़ों में लिपटे लोग आपको डाक्टर भी नहीं, उनके असिस्टेंट या ट्रेनी डाक्टर से करबद्ध याचना करते मिल जाएंगे। उनकी बेबस आंखें कभी अपनी मरीज को तो कभी उस धरती के देवता को याचना से निहारती मिलती हैं जो उसकी ओर देख भी नहीं रहा।
बीमारी हो, आपदा हो या फिर आए दिन की समस्याएं इस देश के जिम्मेदार अपनी जिम्मेदारी से भागते फिरते है। अपना ठीकरा दूसरे के सिर फोड़ देना, दूसरे का तीसरे, तीसरे का चैथे के सिर मढ़ देना आम कवायद है। ये भी क्या कम मजाक की बात है कि डेंगू का भी राजनीतिकरण कर दिया जाए। अंसवेदनशीलता का आलम यह है कि सोच सिर्फ “मैं“ तक सीमित होती जा रही है। अगर व्यवस्था मेरे लिए अनुकूल है तो सब ठीक है। यही वजह है कि डाक्टर हो या अस्पताल किसी नोटिस या किसी धमकी से नहीं डरते, चूंकि वे भी अच्छी तरह से जानते है कि नोटिस पकड़ाने वालों को भी उनकी आवश्यकता पड़ती रहती है। मामले को “एडजस्ट“ कर लेने की कूवत सख़्त क़ानून को भी काग़जों तक ही सीमित कर देती है।







Monday, September 14, 2015

’सत्ता’ के क़ाहिलपन ने किया भारत की ’आदर्श’ शिक्षा का नाश

’भारत में अंग्रेजी राज’ (प्रकाशक-ओंकार प्रेस, इलाहाबाद) के तीसरे संस्करण (1938) के छतीसवें अध्याय को पढ़कर, इस बात पर मुझे घोर आश्चर्य हुआ कि भारत किसी समय उच्च सार्वजनिक शिक्षा प्रणाली का केन्द्र ही नहीं रहा अपितु शिक्षण के नजरिए से दूसरे देशों के लिए ’आदर्श’ भी माना गया। इस पुस्तक के अनुसार देश में अंग्रेजी शासन से पहले भारत में शिक्षा हर नागरिक का पहला अधिकार थी। किंतु अंग्रेजी राज के दौरान नरेशों की अकण्र्यमता का लाभ उठाकर बाहरी ताकतों ने देश में शिक्षा के अधिकार को जिस तरह से कुछ लोगों तक सीमित कर दिया, पढ़ने लिखने वाले हिन्दुस्तानियों को रोजी रोटी के लिए मोहताज कर दिया, हिन्दी भाषा की जगह अंग्रेजी भाषा और साहित्य को महत्व दिया, उसका असर आज भी नजर आता है। जो देश कभी उच्च शिक्षा के लिए मानक माना जाता था और अपनी शिक्षा प्रणाली के सहारे विश्व भर में विख्यात था, आज उसी देश के नागरिक गरीबी, काहिलता, रूढ़िवादिता और बेबसी का दामन पकड़े शिक्षा के प्रति बेरूखापन अपनाए हुए है। अंधविश्वास और दकियानूसी परंपराएं उन्हें अक्षरज्ञान का महत्व समझाने में बाधा डाल रही हैं।
सच तो ये है कि तमाम सरकारी प्रयासों के बावजूद शिक्षा को लेकर अभी भी जो बेरूखापन है, इसका बीज बहुत पहले ही अंग्रेज बो कर चले गए। कहने को हम गुलामी से मुक्त हो चुके है लेकिन क्या वाकई ऐसा है? जिस शिक्षा को अंग्रेजों ने अपने स्वार्थ सिद्धि के लिए, हिन्दुस्तानियों से दूर रखने में अपना हित समझा, वैसे ही आज के सरपरस्त भी अपने स्वार्थ से लबरेज, हालात सुधारने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाना चाहते। अंग्रेजों को इस देश से गए सदियां बीत चुकी लेकिन उनके हाथों किए गए शिक्षा के सर्वनाश से हम अभी तक उबर नहीं पा रहे। प्राचीन भारतीय शिक्षा के उच्चतर से निम्नतर और फिर उसके सर्वनाश के इसी मूल का जिक्र इस छत्तीसवें अघ्याय में है।
आज से सवा सौ साल पहले तक यूरोप के किसी भी देश में शिक्षा का प्रचार-प्रसार भारत जितना न था और न ही आबादी के हिसाब से पढ़े लिखों का प्रतिशत भारत से ही अधिक था। इतिहासकार ही नहीं उस वक्त के अंग्रेज प्रशासनिक अधिकारी भी भारतीय शिक्षा की उच्च व्यवस्था के गवाह रहे हंै। प्राचीन समय में या यूं कहें देश में ईस्ट इंडिया कंपनी के आने से पहले भारत के जनसामान्य को मुख्यतः चार प्रकार की संस्थाओं के योगदान से शिक्षित करने का प्रावधान था। एक तरफ असंख्य ब्राहमण आचार्य अपने अपने घरों पर अपने शिष्यों को शिक्षा देते थे तो दूसरी ओर अनेक मुख्य नगरों में उच्च संस्कृत साहित्य की शिक्षा के लिए विद्यापीठ कायम थीं। उर्दू और फारसी की शिक्षा के लिए जगह जगह मक़तब और मदरसे थे, जिनमें हिन्दू मुस्लिम बालक शिक्षा ग्रहण करते थे। इसके अतिरिक्त देश के प्रत्येक छोटे से छोटे ग्राम में भी गांव के समस्त बालकों की शिक्षा के लिए कम से कम एक पाठशाला अवश्य होती थी। उस वक्त ग्राम के समस्त बच्चों की शिक्षा की व्यवस्था करना प्रत्येक ग्राम पंचायत अपना परम कत्र्तव्य मानती थी। ये व्यवस्था तब तक चलती रही जब तक कि ईस्ट इंडिया ने आकर ग्राम पंचायतों को नष्ट नहीं कर दिया। इस संदर्भ में इतिहासकार लडलो ने ब्रिटिश भारत के इतिहास में लिखा है,“ प्रत्येक ऐसे हिन्दू गांव में, जिसका कि पुराना संगठन अभी तक कायम है, मुझे विश्वास है कि आम तौर पर सब बच्चे यहां लिखना पढ़ना और हिसाब करना जानते हंै। किन्तु जहां कहीं कि हमने ग्राम पंचायत का नाश किया है, जैसे बंगाल में, वहां ग्राम पंचायत के साथ साथ गांव की पाठशाला भी लुप्त हो गई है।“
प्राचीन भारत के ग्रामवासियों की शिक्षा के सम्बन्ध में 1823 की कंपनी की एक सरकारी रिपोर्ट में लिखे बयान को देखकर आप उस वक्त की शिक्षा के उत्कृष्ट स्तर का अंदाजा लगा सकते है। इसमें लिखा है कि -“शिक्षा की दृष्टि से संसार के किसी भी अन्य देश में किसानों की व्यवस्था इतनी ऊंची नहीं है जितनी ब्रिटिश भारत के अनेक भागों में।“ यही कारण है कि 19वीं सदी के आरंभ में डा0 एड्रूबेल नामक एक अंग्रेज शिक्षा प्रेमी ने इंगलिस्तान वापस जाकर अपने देश के बच्चों को भारतीय शिक्षा प्रणाली के अनुसार पढ़ाना शुरू किया। 3 जून सन् 1814 को कंपनी के निदेशकों ने बंगाल के गर्वनर के नाम जो पत्र लिखा वह भारतीय शिक्षा की उत्कृष्टता का साक्ष्य है। इसमें लिखा था-“ शिक्षा का जो तरीका बहुत पुराने समय से भारत में वहां के आचार्यों के अधीन है उसकी सबसे बड़ी प्रशंसा यही है कि डा0 बेल, जो कि मद्रास में पादरी रह चुके है, वही तरीका इस देश में प्रचलित कर रहे है। अब हमारी राष्ट्रीय संस्थाओं में इसी तरह के अनुसार शिक्षा दी जा रही है, क्योंकि हमें विश्वास है कि इससे भाषा को सिखाना बहुत सरल और सीखना सुगम हो जाता है। उन्होंने यह भी लिखा कि हिन्दुओं की इस अत्यन्त प्राचीन और लाभदायक शिक्षण संस्था को सल्तनतों के उलट फेर भी कोई हानि नहीं पहुंचा सके।“ ये भारत की उस उच्च शिक्षा के कलमबद्ध साक्ष्य है जिन्हें अपनी आंखों से उस वक्त के इतिहासकारों और अधिकारियों ने देखा और उसका अनुसरण किया।
आज की पश्चिमी शिक्षा प्रणाली में जिसे “म्यूचुअल ट्यूशन“ कहा जाता है यह पश्चिम ने भारत से ही सीखा। इस संन्दर्भ में बेलारी जिले के कलेक्टर ए0 डी0 कैम्पबेल की सन् 1823 की एक रिपोर्ट पर भी गौर करना जरूरी है। वो लिखते है-“ जिस व्यवस्था के अनुसार भारत की पाठशालाओं में बच्चों को लिखना सिखाया जाता है और जिस ढंग से ऊंचे दर्जो के विद्यार्थी नीचे दर्जो के विद्यार्थियों को शिक्षा देते है और साथ-साथ अपना ज्ञान भी पक्का करते हैं, वह समस्त प्रणाली निःसंदेह प्रशंसनीय है और इंगलिस्तान में उसका जो अनुकरण किया गया है उसके सर्वथा योग्य है।“
भारत की इस प्राचीन सार्वजनिक शिक्षा प्रणाली का नाश 19वीं में आरंभ हुआ जबकि ईस्ट इंडिया कंपनी ने देश में अपने पैर जमाने शुरू कर दिए। एक ओर जहां कंपनी की लूट से भारतीय उद्योग धंधो का नाश होने लगा और देश की दरिद्रता में इजाफा होने लगा था। नन्हें नन्हें बच्चे इस दरिद्रता से बचने के लिए पाठशाला जाना छोड़ माता-पिता का मेहनत मजदूरी कर हाथ बंटाने लगे। वहीं दूसरी ओर प्राचीन ग्राम पंचायतों को समाप्त कर दिए जाने से ग्राम पाठशालाओं का भी अंत होने लगा था।
बेलारी जिले के अंग्रेज कलेक्टर ए0 डी0 कैम्पबेल जो अपने से पूर्व और अपने समय की शिक्षा की दशा के गवाह रहे, लिखते है-इस जिले की लगभग 10 लाख आबादी में से इस समय 7 हजार बच्चे भी शिक्षा नहीं पा रहे है, जिससे पूरी तरह जाहिर है कि शिक्षा में निर्धनता के कारण कितनी अवनति हुई है। बहुत से ग्रामों में, जहां पहले पाठशालाएं मौजूद थीं, वहां अब कोई पाठशाला नहीं है और बहुत से अन्य ग्रामों में जहां पहले बड़ी बड़ी पाठशालाएं थीं वहां अब केवल धनाढ्य लोगों के थोड़े से बालक शिक्षा पाते हैं। दूसरे लोगों के बालक निर्धनता के कारण पाठशाला नहीं जा सकते। कैम्पबेल आगे लिखते है कि जिले में अब घटते घटते 533 संस्थाएं रह गई हैं और मुझे यह कहते लज्जा आती है कि इनमें से किसी एक को भी अब सरकार की ओर से किसी तरह की सहायता राशि नहीं दी जाती। प्राचीन व्यवस्था के तहत शिक्षा व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने के लिए हिन्दुू मुस्लिम राजा शिक्षण संस्थाओं को आर्थिक सहायता या जागीरें भेंट किया करते  थे। जिस पर बाद में कंपनी ने रोक लगा दी थी।
जे सी मार्शमैन के एक बयान के अनुसार 1792 में जब ईस्ट इंडिया कंपनी के लिए नया चारटर एक्ट पास होने का समय आया तो पार्लियामेंट के एक सदस्य विलबरफोर्स ने नये कानून में एक धारा ऐसी जोड़नी चाही जिसका अभिप्राय भारतवासियों के लिए शिक्षा के प्रबंध से था। इसके विरोध में पार्लियामेंट के सदस्यों के साथ साथ कंपनी के हिस्सेदारों ने इतना हंगामा काटा कि विलबरफोर्स को अपनी तजबीज वापस लेनी पड़ी। नए अंग्रेज शासक भी हिन्दुस्तानियों की शिक्षा के विरोध में खड़े हो गए थे। ये शासक भारतीयों की शिक्षा को अपने लिए हितकर में नहीं मानते थे। कुल मिलाकर कर इस विरोध का मकसद, भारतवासियों को सदा जात-पात, मत-मतान्तरों के भेद में फंसाना, आपस में एक दूसरे से लड़ाना, उन्हें अशिक्षित रखना था और अंग्रेजी राज की सलामती की चाह रखना सर्वोपरि था।
इस सोच से थोड़ा सा अलग हटकार लार्ड मैकाले का उद्येश्य अंग्रेजी भाषा, साहित्य, विज्ञान को ’हिंदुस्तानी हाई सोसाइटी’ तक पहुंचाना था। मैकाले ऐसे हिन्दुस्तानियों को शिक्षा देना चाहते थे जो रंग और रक्त की दृष्टि से भले ही भारतीय हो किंतु जो अपनी रूचि, भाषा, भाव और विचार में अंग्रेज हों और अंग्रेज सत्ता चलाने के लिए जिनका उपयोग, एक यंत्र की माफिक किया जा सकें। इस तरह से लार्ड मैकाले के इस प्रयोग ने अंग्रेजी पढे़ लिखों भारतीयों की एक ऐसी अलग जाति बना दी जिन्हें अपने देशवासियों के साथ या तो जरा सी भी सहानुभूति नहीं थी और यदि थी भी तो वह भी बहुत कम। देशी भाषाओं को पनपने से रोकने में भी र्लार्ड मैकाले और तत्कालीन गर्वनर जनरल विलियम बेंटिग ने कोई कसर न छोड़ी। यही वजह है कि आज भी देश में हिंदी को जिस सम्मान का अधिकारी होना चाहिए उसे मैकाले की तर्ज में दी गई शिक्षा के आगे अपना वर्चस्व ढूंढना पड़ रहा है। क्या ये वास्तविकता नहीं है कि आज भी मैकाले इस देश में चंद अंग्रेजीदां लोगों के जरिए अपनी ही सत्ता चला रहा है?
भारतीय प्राचीन शिक्षा को बनाए रखने में भी उस वक्त के राजा जहां अपने काहिलपन और अपने स्वार्थ की वजह से अंग्रेजों के आगे घुटने टेकते रहे, आज वैसे ही सत्ता और उसके अन्तर्गत चल रही व्यवस्था का काहिलपन भारतीय शिक्षा को वह मुकाम नहीं दे पा रहा जो कभी उसका हुआ करता था। कंपनी ने भारतीय समाज की जिस कमजोर नस को उस वक्त दबाकर राज किया था आज का शासित वर्ग भी जनता की उसी नस को दबाए हुए है। गरीबी, अंधविश्वास, रूढिवादी परंपरा, जातपात, भेदभाव को हवा देकर जिन अंग्रेजों ने राज किया और देश के विकास में रोड़ा अटका दिया, वहीं आज का सत्ताधारी इन कारणों के बने रहने में ही अपना हित साधने में लगा है। अंग्रेज चले गए, नीति निर्माता भी बदल गए पर नीतियां वही रही और हम कहते है कि हम आजाद हो गए?

Friday, September 4, 2015

’पेज 3’ कल्चर और स्याह-सफ़ेद जिंदगी के कड़ुवे सच

अधिक दिन नहीं हुए इस बात को गुजरे जबकि ’अरूषी हत्याकांड’ से हम सब भौंचक रह गये थे। तब ये यकीन करना मुश्किल हो रहा था कि कोई मां बाप कैसे अपनी ही औलाद को कत्ल कर सकते है। इस मर्डर के कारणों ने पिछले कई हाई प्रोफाइल हत्याओं को बहुत का पीछे छोड़ दिया। पत्नी, प्रेमिका या पति की बेवफाई या फिर किसी अन्य कारण से हुए मर्डर में ’अरूषी हत्याकांड’ माता पिता के निष्कपट संबंधों पर भी एक प्रश्नचिह्नलगा गया। फिर भी अरूषी की हत्या एक सोची समझी साजिश नहीं कही जा सकती थी। लेकिन शीना की हत्या पूर्व नियोजित थी। हैरान कर देने वाली बात यह है कि जिस समय नुपुर तलवार और उनके पति डा0 तलवार पर अपनी ही बेटी की हत्या का केस में मुजरिम साबित हो रहे थे, उसी समय एक मां अपनी ही बेटी की हत्या को अंजाम देने की तैयारी कर रही थी।
शीना बोरा, यह नाम है उस बदकिस्मत लड़की का, जिसे बचपन में ही उसके माता-पिता ने त्याग दिया और उसके जीवन का अंत अपनी ही मां इंद्राणी मुखर्जी के हाथों हो गया। जिस तरह अरूषी हत्याकांड की परत दर परत चैंका रही थी वैसे ही शीना बोरा हत्याकांड के जितने खुलासे हो रहे हैं, वह ना सिर्फ चैंकाने वाले हैं, बल्कि यह सवाल भी खड़े कर रहे हैं कि कोई मां अपनी बेटी के साथ ऐसा कैसे कर सकती है। शीना की जिंदगी कितनी भयावह थी इसका अंदाजा उसकी डायरी पढ़ने से होता है। उसकी डायरी के कुछ अंश ही उसकी निजी जिंदगी और हाई प्रोफाइल स्टेटस रखने वाली मां इंद्राणी मुखर्जी के बीच के संबंधों को उजागर करते है, जो आइएनएक्स मीडिया की पूर्व सीइओ रह चुकी हैं।
दरअसल, शीना हो या इंद्राणी या फिर अरूषी, ये जिन संस्कारों से पल कर...बल्कि ’पल कर’ कहना गलत होगा, जिस तरह के माहौल से गुजर कर आते है उसका अंजाम कुछ ऐसा ही होता है। जहां अधिकांशत अपने संस्कारों की बलि चढ़ाकर महानगरों की हाई प्रोफाइल सोसाइटी या फिर हाई प्रोफाइल पदों तक पहंुचने का सफर महत्वाकांक्षाओं की सीढ़ी चढ़कर ही पूरा किया जाता है, इसकी परवाह किए बगैर कि उसके लिए क्या देना होगा और कैसे देना होगा।जब आप पैसा, स्टेट्स की अंधी दौड़ में शामिल हो जाते है तो वह किसी भी कीमत पर चाहिए ही होती है। इसके लिए परपंरा संस्कार की गठरी लपेट के बैठना ’आर्थोडाक्स’ सोच जैसा लगता है। ऐसे महत्वाकांक्षी लोगों की सोच तो ये होती है कि अगर आपमें हुनर है, काम के तरीके आते है और आपमें आकर्षण भी है, तो फिर उस लाइन में मत खड़े हों जिसमें पहले से ही कई खड़े अपना भाग्य आजमा रहे है। बेहतर है थोड़ा से अलग हटकर, अपनी मर्जी और किसी का सहारा लेकर उस स्टेटस तक पहुंचे। ये स्टेट्स और पावर के भूखे उस वक्त नींद से जागते है जब इनको अपने किए, अपने बनाए पर पछतावा होता है।
शीना बोरा की हत्या हाई सोसाइटी के लोगों द्वारा किया गया कोई पहला कांड नहींहै। इससे पहले भी कई ऐसी हत्याएं र्हुउ है जिनमें मामले हाई प्रोफाइल लोगो से जुड़े थे। 1999 में दिल्ली के एक नाइट क्लब में मॉडल जेसिका लाल की हत्या का मुख्य आरोपी मनु शर्मा एक राजनैतिक परिवार से ताल्लुक रखता था। मनु शर्मा को 2006 में उम्रकैद की सजा सुनाई जा चुकी है। नोएडा (उत्तर प्रदेश) में 2008 में 14 वर्षीय आरुषि तलवार और उसके नौकर हेमराज की घर में रहस्यमय तरीके से हत्या हुई और यह केस कई सालों तक सुर्खियों में रहा। टीवी एग्जीक्यूटिव नीरज ग्रोवर की 2008 में कन्नड़एक्ट्रेस मारिया सुसाइराज और उसके प्रेमी जेरॉम मैथ्यू ने बेरहमी से हत्या की थी। इस दिल दहला देने वाले क्राइम में मर्डर के बाद शव को कई टुकड़ों में काटा भी गया था। इस सनसनीखेज हत्याकांड के आरोपियों को सजा मिल चुकी है। हिट एंड रन केस का नाम आते ही दो केस दिमाग में आते हैं, जिसमें पहला है अभिनेता सलमान खान और दूसरा दिल्ली के बिजनेसमैन संजीव नंदा का है। साल 1999 में दिल्ली के लोधी रोड इलाके में रहने वाले बिजनेसमैन फैमिली के संजीव नंदा ने सात लोगों को अपनी कार से कुचल दिया था। अंकुर अरोड़ा मर्डर केस, भंवरी देवी मर्डर केस, नानावती मर्डर केस सभी हाई सोसाइटीज से जुड़े थे। इन हत्याओं की पृष्ठभूमि ने उस सोसाइटी के चेहरे से नकाब उतार दिया जिसे हम उच्च संभ्रात समाज के नाम से जानते है।
हालांकि ये हम सभी जानते है कि कोई भी इंसान दुर्गुणों या बुरे कर्मों के साथ पैदा नहीं होता। उसके बचपन से लेकर युवावस्था तक परिस्थितियां कैसी है और कैसे वह उससे बच के या उसमें ढल कर आता है, इस बात पर बहुत कुछ तय होता है। इंद्राणी भी कुछ इसी तरह के माहौल से दो चार होकर ’टाॅप कुर्सी’ तक पहंुची। महत्वाकांक्षाओं की तेज जद में उसने हर उस संबंध को बेमानी समझा जिसमें उसके लिए कुछ नहीं था और ये उसे उसके पिछले अनुभवों ने ही सिखाया। अपने परिवार में जब हम घर के बड़ों को त्याग, सहनशीलता के साथ व्यवहार करते देखते हैं तो कहीं न कहीं हम भी उन संस्कारों का अनुकरण करने को बाध्य होते है। यहीं बाध्यता हमें इंसान बनाती है और संबंधों का मान रखना सिखाती है। ऐसे संस्कार सीखने से नहीं, अहसास से आते है। लेकिन आज के समाज में पैसा, जायदाद, स्वार्थ में फंसे ऐसे कई परिवारों की संख्या बढ़ रही है जिनके लिए इन संस्कारों का कोई मतलब नहीं।ये समस्या बिंदास और खुले विचारों वाली इंद्राणी की ही नहीं उसके जैसे कईयों कीहैं जो तेजी से उस मुकाम तक पहुंचने के लिए अपने जमीर की भी परवाह नहीं करते तो संबधों को कैसे समझेगें। अफसोस तो इस बात का है कि इनकी बढ़ती तादाद जाने अनजाने में हमारे समाज-परिवार को संस्कारहीन और दिखावटी बनाने में सहयोग कर रही है।
आपको मधुर भंडारकर की फिल्म ’पेज थ्री’ अगर याद हो तो आपको उसमें दिखाई गई हाई सोसाइटीज और उनके दोहरे चरित्र भी याद होंगे। इससे बिल्कुल भी अलग नहीं है ये समाज, जो खुलकर ’लाइफ’ का मजा लेता है, किसी भी तरह के बंदिश को नहीं मानता औरशराब- शबाब के बीच अपने व्यवसायिक हितों की क्षतिपूर्ति करता है। एक तरह से कहा जाए तो अपनी मर्जी के हर वो काम करता है जो उसे हर तरह का सुख दे और किसी भी तरह के तनाव से दूर रखें। दूसरों के प्रति पत्थर सी भावनाएं रखने वाले इन लोगों पर जब भावनात्मक प्रहार होता है तो ये बिलबिला उठते हैं। डा0 तलवार हो या इंद्राणी जब अपने पर पड़ी तो जान लेने पर उतारू हो गएं। डा0 तलवार जिस तरह की ’लाइफ’ जीते रहेे उससे उन्होंने अपने ही घर को जलते देखा तो सहन नहीं कर सके। मुझे तो इन पढ़े लिखे समझदार कहे जाने वाले लोगों से बेहतर गांव के वो अनपढ़ गंवार लगते है जो अपने घर को पारंपरिक संस्कारों के साथ चलाते है और एक सभ्य समाज का निर्माण करते हैं।
शीना की हत्या की चाहे कोई भी वजह रही हो, हमें एक सभ्य समाज पर पड़ते इसके असर पर जरूर गौर करना चाहिए। समय कभी पलट कर नहीं आता इसलिए इसके और भयावह होने का ही खतरा अधिक रहता है। हाई सोसाइटीज की उस बनावटी दुनिया में खुद की असलियत छुपाती इंद्राणी आज अपने अतीत के पन्नों के साथ खुली किताब की मानिंद अखबारों और चैनलों में सनसनीखेज खबर के तौर पर परोसी जा रही है। इस हाई प्रोफाइल ड्रामे पर चैनल ही नहीं बालीवुड भी कमाई करने को तैयार है। अरूषी हत्याकांड पर दो दो डायरेक्टर फिल्म बना चुके है एक निर्देशक मनीष गुप्ता तो दूसरी मेघना गुलजार।फिर महेश भट्ट क्यों पीछे रहे उन्होंने शीना हत्याकांड को लेकर मिलती जुलती अपनी फिल्म की स्क्रिप्ट की घोषणा कर दी है। महेश भट्ट हो या फिर रामगोपाल वर्मा, ये सब भी उसी सोसाइटी से आते है जिसमे दूसरों के लिए कोई इमोशन नहीं। भले ही किसी की जान गई हो या कोई अपनी जिंदगी की दुर्गति पर रो रहा हो, इनके लिए वह महज एक स्टोरी प्लाॅट से अधिक कुछ नहीं। ’पेज 3’ कल्चर और स्याह-सफ़ेद जिं़दगी के कड़ुवे सच जब सामने आते है तो हर किसी को उसमें दिलचस्पी होने लगती है। सेक्स, रोमांस और कानपरेन्सी ही कहानी को रोचक बनाती है और फिर वह हाई सोसाइटी से हो तो क्या कहने!

Friday, August 28, 2015

'ताकत के दम पर' जातिगत हक़ की नुमांइदगी के ये नये अंदाज


जिस दिन हार्दिक पटेल ने अहमदाबाद में हुक्मरानों को देख लेने की बात कही उस दिन कुछ देर के लिए तो ऐसा लगा जैसे ये आंधी गुजरात ही नहीं देश को भी हिला कर रख देगी। महज 22 साल की उम्र के हार्दिक पटेल के नेतृत्व में गुजरात के पाटीदारों ने पटेलों के आरक्षण के लिए जो तेवरों दिखाए उससे राजनीति के धुरंधर खिलाड़ी भी हक्का बक्का रह गये। लेकिन अफसोस, अपनी ताकत दिखाने का ये जश्न 10 लोगों की जान का काल बनकर भी आया। अब आरक्षण के लिए सत्ताधारियों को ललकारते हार्दिक पटेल की गरम जोशी ने पटेलों को क्या स्वप्न दुःस्वप्न दिखाए, इसका जबाव तो समय को देना हैे। लेकिन क्या अब समय नहीं आ गया कि आरक्षण की हदें तय की जाए और इससे होते ’साइड एफेक्ट’ पर चिंता व्यक्त की जाए। स्थिति भयावह होती जा रही है। अधिकार स्वरूप मांगी जाने वाली आरक्षण की नई परिभाषा भारतीय समाज के टुकड़े टुकड़े कर रही है। योग्यता के ऊपर हक को काबिज़ करने की जोर आज़माईश किसी भी देश काल परिस्थिति के लिए ’आइडियल’ नहीं हो सकती। निश्चित रूप से पूर्व में लिए गए फैसले आज अपना असर दिखा रहा है। देश को जाति धर्म के आरक्षण में लपेटने वाले मंडल कमीशन का जहर अब रग़ों में जहर बन कर दौड़ने लगा है। वक़्त के साथ साथ ये जहर समाज को नफरत की आग में झोंक देगा, ये जानते हुए भी हम अपनी ढपली अपना राग की तर्ज पर झूम रहे हैं।
सामाजिक शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों की स्थिति की समीक्षा के लिए मोरारजी देसाई सरकार ने जब बिंदेश्वरी प्रसाद मंडल की अध्यक्षता में छह सदस्यीय पिछड़ा वर्ग आयोग के गठन की घोषणा की थी तब उन्हें भी संभवतः इसकी कल्पना नहीं होगी कि उनका ये फैसला भविष्य में किस तरह से अपना नकारात्मक प्रभाव दिखायेगा... आरक्षण के नाम पर जाति धर्म कुकरमुत्तों की तरह निकल आएंगे और वोट बैंक का रूप लेते जाएंगे। आज आरक्षण की मांग का राजनीतिकरण नेताओं की चांदी कर रहा है तो बेवकूफ जनता अपने ’सो काॅल्ड’ रहनुमाओं के इशारे पर नाच अपने दिन फिर जाने का सपना देख रही है। अपना उल्लू सीधा करने वाले इन सत्ताधारियों की चाल को नाकाम करने की कोशिश भी की जाती रही है। आपको याद होगा तत्कालीन प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने जब मंडल कमीशन की रिपोर्ट लागू करने की घोषणा की थी तब 14 अगस्त 1990 अखिल भारतीय आरक्षण विरोधी मोर्चे के अध्यक्ष उज्जवल सिंह ने आरक्षण प्रणाली के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी। संभवतः उन्हें भी इसके साइड एफेक्ट का इल्म होगा।  सुप्रीम कोर्ट ने उनकी याचिका पर अपने ’ऐतिहासिक फैसले’ में मंडल आयोग की सिफारिशें लागू करने के फैसले को वैध ठहरा दिया था। लेकिन फैसले में आरक्षण की अधिकतम सीमा 50 प्रतिशत रखने और पिछड़ी जातियों के उच्च तबके को इस सुविधा से अलग रखने का निर्देश दिया था। उस वक्त इस आरक्षण की आग ने देश की आत्मा को झकझोर दिया था और एसएस चैहान, राजीव गोस्वामी, मीनाक्षी जैसे कितने आरक्षण के विरोध की चपेट में आकर अपनी जान गंवा बैठे।
तब से अब तक इस मुत्तालिक़ स्थितियां बदली हो, ऐसा नहीं है। ’आरक्षण’ इस एक शब्द ने धर्म को जाति में और जाति को उपजाति में बदल दिया। सरकारी नौकरी में विकलांग के लिए आरक्षण की मान्यता ने उन्हें भी आंख नाक कान से विकंलाग बना दिया जो शारीरिक रूप से पूर्णतया स्वस्थ हैं। देश काल का न होकर आदमी धीरे धीरे इस आरक्षण के लालच में अपने लोग अपने समाज तक सिमट गया। स्वार्थी हो चुके समाज में आप फिर जिस चीज को हवा दे सकते है तो वो है सिर्फ और सिर्फ नफरत। इस नफरत से अगर किसी ने अपनी रोटी सेंकी तो वो है राजनैतिक पार्टियां और नफरत करने वाले, राजनीतिकारों के खेल को न तब समझ सके, न आज ही समझ पा रहे हैं। ये खेल कुछ नया भी नहीं। 22 साल पहले भी जब मंडल आयोग की सिफारिशें स्वीकार हुई थीं, इसके पीछे सामाजिक बदलाव की इच्छा से अधिक दबाब राजनीतिक समीकरणों का था। इसीलिए इस रिर्पोट के लागू होने के बाद देश में दो चीजें एक साथ हुईं। एक- देश की अर्थव्यवस्था में बड़े पैमाने पर उदारीकरण शुरू हो गया। दो-सरकारी खर्च और वित्तीय घाटा कम करने की कवायद शुरू हो गई। जिसके कारण सरकारी नौकरियों में कटौती जैसी चीजें शुरू हुईं। सरकारी क्षेत्र में रोजगार के अवसर कम होने लगे तो निजी क्षेत्र में रोजगार के अवसर बेतहाशा बढ़ने लगे। अब चूंकि निजी क्षेत्र में किसी के लिए आरक्षण की कोई संभावना नहीं थी इसलिए मंडल आयोग की सिफारिशें लागू होने पर वो वग घाटे में ही रहा जिसके लिए इतना तूफान मचा।
यही वजह है कि आज 25 साल बाद भी जो तर्क आरक्षण के पक्ष और विपक्ष में उस समय दिए जाते थे, वे आज भी अपनी जगह कायम हैं। उस समय जो आरक्षण के समर्थक और विरोधी थे, वे भी वहीं खड़े हैं। जो बदलाव हुआ भी, उसने पिछड़े वर्ग के राजनीतिक आक़ाओं की रफ्तार जरूर तेजी से बढ़ा दी। पिछड़े तो वैसे ही कमजोर और असहाय रहे, उनके कर्णधार जरूर सशक्त होते चले गए। इन सालों में पिछड़े वर्गो का प्रतिनिधित्व करने वाली राजनीतिक ताकतें भी खूब उभरकर सामने आईं। उत्तर प्रदेश व बिहार जैसे राज्यों में पिछड़े वोटों के सहारे कद बढ़ाती ये पार्टियां भी आरक्षण के बीज को सींचने से पीछे नहीं हटी। वैसे भी सत्ताधारियों की इच्छा गरीब पिछड़ों के जीवन को बेहतर करने से ज्यादा उनकी पहचान को समूह में बांटने की अधिक रही है। फिर हर चुनाव में इस समूह से किए गये वायदे, जीत के पक्की तौर पर मिल जाने का यकीन तो करा ही देते है। ऐसी ही परिस्थितियों में प्रतीक के तौर पर कोई एक महत्वाकांक्षी ’हार्दिक’ खड़ा कर ही दिया जाता है। तभी तो राजनीति के आकाश में अचानक ही से हार्दिक पटेल जैसा कोई चमकने लगता है और उन पटेलों की चिंता पर आग बबूला होने लगता है जो अब तक गुजरात ही क्या देश-दुनिया के समृद्धों मे गिने जाते रहे हैं।
हार्दिक पटेल भी कुछ इसी तरह के सपनों को बेचने निकल पड़े है। इस कम व्यस्क नौजवान की राजनीतिक मंशा औरों से कुछ कमतर नजर नहीं आती। पाटीदारों को आरक्षण के नाम पर इकट्ठा कर इसने भी युवा नस्ल की उसी नस को ही छुआ है जिसे बेरोजगारी की मार कहते है। इसलिए इस आंदोलन को उन्होंने ‘अधिकारों की लड़ाई’ कहा है। इस सम्बन्ध में उन्होंने सरकार को आगाह भी कर दिया है कि अगर जरूरत पड़ी, तो वे इस अधिकार को ‘ताकत के दम पर’ भी हासिल करने से परहेज नहीं करेंगे। मतलब स्पष्ट है कि शांति और अहिंसा से अगर मांग पूरी नहीं हुई, तो वे ‘हिंसा का रास्ता चुनने से भी नहीं डरेंगे’। हार्दिक पटेल के इस साफ नजरिये से चैंकने से ज्यादा उस वक्त के लिए सहमने की जरूरत है जबकि भविष्य में ऐसे ही कोई और हार्दिक पटेल किसी और समाज की चिंता लेकर खड़ा होगा और अपने हक के लिए अपनी ताकत का मुज़ाहिरा करेगा ?
अफसोस होता है कि आज़ादी के बाद, दशकों की यात्रा के बाद भी देश में मूल अधिकारों के लिए कोई अपनी ताकत की आजमाईश नहीं करना चाहता। शिक्षा, रोजगार जैसी मूल समस्याएं आज भी भारतीय व्यक्ति के विकास में बाधा बनी हुई है। शिक्षा की कमी जहां सोच का विकास नहीं कर रही वहीं बेरोजगारी का चक्र आत्मविकास के रास्ते में रोड़े अटका रहा है। बेहतर होता हार्दिक पटेल जैसे युवा अपना आक्रोश, अपनी उर्जा आरक्षण का हक मांगने के बजाय इन मूल अधिकारो से लड़ने में लगाते। लेकिन हार्दिक भी जानते है कि इस तरह के रास्ते त्याग और तपस्या की मांग करते है और आपकी महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति में खरे नहीं उतरते। राजनीति के हलकों में शीर्ष तक पहंुचने के लिए राजनीतिक पायदान ही काम आते है। उनके लिए आरक्षण के नाम पर दिखाई गई ये ताकत उस मुकाम की पहली सीढ़ी साबित हुई जहां तक वह पहुंचना चाहते हंै।












Saturday, August 22, 2015

अदालती फरमान की चाबुक तले सरकारी नौकरी बनाम सरकारी स्कूल

गत दिनों इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक बड़ा फैैसला सुनाते हुए राज्य सरकार को निर्देश दिया कि सभी नौकरशाहों और सरकारी कर्मचारियों के लिए उनके बच्चों को सरकारी प्राथमिक विद्यालय में पढ़वाना अनिवार्य किया जाए। हाईकोर्ट के निर्देशानुसार व्यवस्था तुरंत अमल में लाई जाए ताकि अगले शिक्षा-सत्र से इसका अनुपालन सुनिश्चित हो सके। न्यायमूर्ति सुधीर अग्रवाल की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने शिवकुमार पाठक की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह बात कही।याचिका में कहा गया था कि सरकारी परिषदीय स्कूल में शिक्षकों की नियुक्ति पर नियमों का पालन नहीं किया जा रहा है जिसके चलते अयोग्य शिक्षकों की नियुक्ति हो रही है और जिसके चलते बच्चों को स्तरीय शिक्षा नहीं मिल पा रही है। इसकी चिंता ना तो सम्बंधित विभाग के अधिकारियों को है और ना ही प्रदेश के उच्च प्रशासनिक अधिकारियों को है।
इस याचिका पर फैसला देते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट की मंशा साफ जाहिर हो रही थी कि वह सरकारी मुलाजिमों पर अदालती चाबुक चलाकर उनसे उस व्यवस्था में खुद शामिल होने को कह रहा है जो उसी की बनाई है। यकीनन अदालत के इस फैसले के जरिए उन सरकारी अफसरों को लताड़ देने की कोशिश भी की गई जो अपने बच्चे के लिए तो कान्वेट और हाई प्रोफाइल स्कूलों का चयन करते हैं लेकिन बात जब गरीब तबके को मुफ्त और बेहतर शिक्षा देने की आती है तो समझौतों और बहानों का तबसरा पढ़ने लगते है। इसलिए अदालत ने ये फैसला देना लाजिमी समझा कि जब इन स्कूलों में अफसरानों-हुक्मरानों के बच्चे इन स्कूलों में पढ़ने जाएंगे तो शिक्षा का स्तर सुघारने और शिक्षकों के चयन प्रकिया की उचित तरीके को अलमी जामा पहनाने की कोशिश की जाएगी।
सख्त रवैये का परिचय देते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मुख्य सचिव से यह सुनिश्चित करने के लिए कहा कि सरकारी कर्मचारी, निर्वाचित जनप्रतिनिधि, न्यायपालिका के सदस्य एवं वे सभी अन्य लोग जिन्हें सरकारी खजाने से वेतन एवं लाभ मिलता है, अपने बच्चों को पढ़ने के लिए राज्य के माध्यमिक शिक्षा बोर्ड द्वारा संचालित प्राथमिक विद्यालयों में अपने बच्चों को भेजें। न्यायमूर्ति सुधीर अग्रवाल ने अपने फैसले में यह भी कहा कि आदेश का उल्लंघन करने वालों के लिए दंडात्मक प्रावधान किए जाएं। उदाहरण के तौर पर यह भी साफ कर दिया कि यदि किसी बच्चे को किसी ऐसे निजी विद्यालय में भेजा जाता है जो कि यूपी बोर्ड की ओर से संचालित नहीं है तो ऐसे अधिकारियों या निर्वाचित प्रतिनिधियों की ओर से फीस के रूप में भुगतान किए जाने वाली राशि के बराबर धनराशि प्रत्येक महीने सरकारी खजाने में तब तक जमा की जाए जब तक कि में ऐसी शिक्षा जारी रहती है। केवल यही नहीं ऐसे व्यक्तियों को, यदि वे सेवा में हैं तो उन्हें कुछ समय (जैसा मामला हो) के लिए अन्य लाभों से वंचित रखा जाए जैसे वेतन वृद्धि, पदोन्नति या जैसा भी मामला हो।’’ निश्चित तौर पर अदालत का फैसला स्वागत योग्य है। लेकिन इस आदेश को मानने से वे  माता पिता इंकार कर सकते है जो हर हाल में अपने बच्चे की तालीम का स्तर ऊंचा रखना चाहते है।
देश के अधिकांश भागों में सरकारी स्कूलों की शिक्षा का प्रदर्शन औसत से नीचे और हद से ज्यादा दयनीय होना अपने आप में किसी भी विकासशील देश के लिए शर्मिंदगी की बात है। आज देश का बड़े से बड़ा अधिकारी, नेता या स्वंय सरकारी शिक्षक भी अपनेे बच्चे को सरकारी स्कूल में पढ़ाने की गलती नहीं करना चाहता। हो सकता है इनमें से कुछ इन स्कूलों से पढ़कर आये हो लेकिन अपने बच्चे का भविष्य ये किसी भी हालत में दांव पर नहीं लगाना चाहेगें। देश हो या प्रदेश इन्हें सरकारी स्कूलों की एजुकेशन पर कतई भरोसा नहीं। आपको आश्चर्य नहीं होना चाहिए ये जानकर कि ये वो ही लोग है जो सर्व शिक्षा की गाइडलाइन बनाते है या इसको चलाने में किसी न किसी रूप में शामिल हैं। आप इसी से इन स्कूलों के हालात का पता लगा लें कि एक चतुर्थ श्रेणी का सरकारी कर्मचारी भी केन्द्रीय स्कूल को भी स्तरीय स्कूलों में नहीं गिनता। इसीलिए अधिकांश कर्मचारियों के बच्चे या तो विदेशों में पढ़़ रहे हैं या देश के बेस्ट प्राइवेट स्कूलों में। यही कारण है कि है आज साधन सुविधा प्राप्त सरकारी विद्यालयों का स्तर भी गिरता जा रहा है। दुखद स्थिति तो तब और हो जाती है जब शहरी झुग्गी बस्तियों के गरीब मां-बाप भी अपने बच्चांे को मुफ्त में सरकारी स्कूलों में पढ़ाने की जगह फीस देकर निजी स्कूलों में पढ़ाना बेहतर समझते हैं। विषयवार योग्य शिक्षकों की कमी, विद्यालय भवनों की जर्जर हालत, सामान्य सुविधाओं का पर्याप्त अभाव इन स्कूलों के स्तर को उठने नहीं देता। इन्हीं बातों का फायदा उठाकर और बढ़ती आवश्यकता को देखकर निजी विद्यालय चांदी काट रहे हैं। शहर तो शहर अब गांवों में भी निजी विद्यालयों की भीड़ बढ़ रही हैं। इनमें कई विद्यालय तो ऐसे मिलेगें जो बिना सरकारी अनुज्ञप्ति के ही चल रहे हैं।
दूर दराज के सरकारी स्कूलों के तो ये हालात तो और भी खराब है। यहां निःशुल्क पुस्तकों से लेकर, ड्रेस, मध्याह्न भोजन, साइकिल आदि की सुविधा लेने के नाम पर बच्चों का नाम तो लिखा दिया जाता है पर बहुत जल्दी ही बच्चे आना भी बंद कर देते है। ये हालात तब है जबकि देश के विभिन्न भागों के शोधकर्ताओं ने यह साबित कर दिया है कि निजी स्कूल के प्रति छात्र पर होने वाला खर्च सरकारी स्कूल की तुलना में कहीं कम है। यही नहीं निजी और गैर-वित्तीय सहायता प्राप्त स्कूलों के शिक्षकों का वेतन तक सरकारी स्कूलों की तुलना में 5-7 गुना कम है। ग्रामीण शिक्षा पर काम करने वाली गैर सरकारी संस्था आशा फॉर फाउंडेशन के एक संयोजक के अनुसार, ”पिछले कुछ वर्षों में गाँवों के लोग अपने बच्चों नाम निजी स्कूलों में लिखा रहे हैं, क्योंकि अभिभावक अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा देना ही चाहते हैं। निजी स्कूलों में बच्चों के अंदर शुरूआत से प्रतिस्पर्धा की भावना आ जाती है, जबकि सरकारी स्कूल के अध्यापक इस बात पर ध्यान नहीं देते हैं, जिससे बच्चे पिछड़ जाते हैं। जहां तक सरकारी स्कूलों में न जाने की बात है तो गाँवों में बच्चों का बस स्कूल में नाम लिखा देते हैं और आगे ध्यान नहीं देते हैं।”
सरकारी स्कूलों की बद से बदतर होती हालत की दूसरी वजह है जवाबदेही का अभाव। स्कूल का प्रधानाचार्य बच्चों के स्कूल न आने की माता पिता की दिलचस्पी न लेने की वजह बताता है तो उसके ऊपर बैठे अधिकारी कमजोर सरकारी व्यवस्था और अपर्याप्त संसाधनों रोना रोते है। उसके ऊपर बैठा आदमी शिक्षक और शिक्षण के लिए बनी व्यवस्था में समय के अनुसार बदलाव न होन की शिकायत करता है या फिर धन की कमी का गान करने लगता है। जबकि शिक्षा के लिए भारत सरकार भारी भरकम बजट निकालती है है। बावजूद इसके स्कूलों की दिशा और दशा अपनी हालत को रो रही हैं। शिक्षकों के रिक्त पदों को भरने के लिए धरना प्रदर्शन तो खूब होते है। लेकिन इनमें कितने ऐसे होगें जो व्यवस्था में बढ़ते छेदों की जिम्मेदारी स्वंय को भी देना चाहें। प्रशासनिक अधिकारी ही जब अपनी जबावदेही से भाग रहे हो तो भला शिक्षक क्योंकर अपनी जिम्मेदारी निभाने आगे आए। अयोग्य शिक्षकों की भर्ती इस संस्थान के गिरते स्तर का एक बड़ा कारण है। शिक्षकों के पढ़ाने के तरीके भी सरकारी हिसाब-किताब के जैसे ही है। ऐसे में जबरन स्कूल तक खींच कर लाए गये बच्चे कहां पढ़ने वाले।
प्रथम’ संस्था की वर्ष 2014 के लिए 13 जनवरी को जारी वार्षिक स्टेटस एजूकेशन सैंपल सर्वे रिपोर्ट के अनुसार 2014 शिक्षा का अधिकार कानून के तहत आने वाले बच्चों का नामांकन 96 प्रतिशत रहा है, लेकिन प्रदेश के ग्रामीण सरकारी विद्यालय की कक्षा पांच में पढ़ रहे 55.9 प्रतिशत बच्चे नहीं पढ़ पाते। ‘प्रथम’ की इस रिपोर्ट में ग्रामीण भारत में स्कूली शिक्षा और बुनियादी शिक्षण को लेकर अध्ययन किया गया है। संस्था की दसवीं रिपोर्ट में देश के 585 जिले शामिल किए गए थे, जिनमें 69 जिले यूपी के थे। वहीं देश के 5.7 लाख बच्चों पर यह सर्वे किया गया। इनमें उत्तर प्रदेश के 92 हजार बच्चे थे। इस तरह से देखा जाए तो साल दर साल प्रदेश में बच्चों का नामांकन तो बढ़ता चला जाता है लेकिन बच्चे स्कूल में नहीं मिलते। प्रदेश में स्कूल न जाने वाले बच्चों का प्रतिशत 3.3 प्रतिशत रहा। दूसरी ओर ग्रामीण इलाकों में 4.1 प्रतिशत बच्चे आज भी स्कूल नहीं जा पा रहे हैं, जबकि राष्ट्रीय स्तर पर यह औसत 2.9 प्रतिशत है।
कुल मिलाकर स्थिति बेहद भयावह है। शिक्षा किसी भी समाज का सबसे मजबूत हथियार माना जाता है। किंतु यहां इस हथियार का सदुपयोग करने वाले गिनती में मिलेगें। कुछ की आवाज ऐसी याचिकाओं के बहाने ही बाहर सुनाई पड़ती है तो कुछ शिक्षा का नाश करने वालों पर बस गरजते बरसते ही रह जाते हैं। इन्हीं बरसने वालों का कहना है कि अफसरान अदालती आदेश को कितनी गंभीरता से लेगें, ये तो समय ही बताएगा। लेकिन अब ऐसा लगता है कि इसको दुरूस्त करने के लिए थर्ड डिग्री उपचार की ही आवश्यकता है। भले ही वह भविष्य में अपना रंग दिखाए।

Friday, August 14, 2015

बार बार खंडित की जाती संसदीय गरिमा

261 करोड़ और 198 घंटे की बर्बादी के साथ ही इस बार का मानसून सत्र भी निपट गया। अपने-अपने स्वार्थ के लिए तमाम दलों द्वारा मचाए कोहराम के चलते संसद का मानसून सत्र बिना किसी परिणाम के, बिना किसी काम के इन माननीयों की बेजा हरकतों की बलि चढ़ गया। संसदीय इतिहास में ये सत्र काले अक्षरों में दर्ज किए जाने लायक है। बेहद शर्मनाक और गैरजिम्मेदाराना व्यवहार वाले हमारे माननीय किसी भी हाल में सम्मानजनक शब्दावली के अधिकारी नहीं है। इस सत्र के कड़ुवे अनुभव आने वाले समय में होने वाले सत्रों को कोई सीख दे पाएं कहना मुश्किल है। समय के साथ-साथ आप इनके और अधिक बदरंग होने की उम्मीद जरूर कर सकते है। तकलीफ कि बात तो यह है कि अपने अपने राम के चलते किसी को यह देखने की फुरसत ही नहीं रही कि इस देश की जनता अपने इन कर्णधारों की नंगई से कितनी शर्मसार हो रही है। अफसोस इस बात का भी होता है कि जब पार्टी दिग्गज या कहें पार्टी आलाकमान भी इस हंगामें में अपने सासंदों को पूरा सहयोग करते है।

एक वक्त था कि सत्र शुरू होने का इंतजार रहता था। यह सोचकर आनंद आता था कि सत्र के दौरान किस दिग्गज का भाषण सुनने लायक होगा और किस बिल पर बहस के दौरान ससंद का माहौल कितना जोशोखरोश भरा होगा। किसी वक्त अनुशासित और शिष्ट वातावरण में चलती ससंद आज इतिहास के पन्नों तक सीमित रह गई है। जिन नेताओं की झलक पाने और उन्हें सुनने की युवाओं, घर के बड़े बुजुर्गों में जेरे बहस तारी होती थी। आज इसके ठीक उलट हंगामा, शोरगुल करने में माहिर होते सासंदों को देशवासी नफरत से देख रहे है। एक तरह से कहा जाए तो अपने फैसले पर षर्मिंदा हो रहे है। शिष्टाचार की धज्जियां उड़ाने वाले ये सासंद कौन सा उदाहरण अपने देश के आगे रख रहे है। मेज कुर्सी माइक पटकने से लेकर अभद्र भाषा का प्रयोग आज आम बात हो गई है। वेल तक पहुंचना तो आम बात होती जा रही है, अब प्ले कार्ड तक पीठासीन के सामने लहराए जाने लगे है। कामकाज निपटाने की जगह ससंद को जंतर मंतर बनाया जा रहा है, जहां धरना प्रदर्शन और नारेबाजी ही अपनी बात को कहने या रखने का एकमात्र साधन समझा जाता है।

एक ओर इस पूरे सत्र के दौरान सत्ता पक्ष यह दिखाने में लगा रहा कि वह तो ससंद चलाना चाह रहा है प्रतिपक्ष ही उसे ऐसा करने से रोक रहा है। दूसरी ओर विपक्ष अपनी मांगों से पीछे हटने को तैयार न होकर सत्ता पक्ष को ही इस सब का दोषी बताता रहा। बड़े बड़े नेताओं की समझदारी पर इस देश की जनता कुर्बान। इनमें से किसी ने भी आपसी मतभेदों को दूर करने कराने की चेष्टा तक नहीं की। जिन बातों को सत्र से पहले सुलझाने की कोशिश होनी चाहिए उन्हें सत्र में हंगामाखेज बनाने के लिए रख छोड़ा गया। सत्ता पक्ष को पता था कि विपक्ष सत्र चलने नहीं देगा जब तक सुषमा स्वराज, वसुंधरा राजे ललितगेट मामले में और शिवराज सिंह चैहान व्यापम घोटाला मामले पर इस्तीफा नहीं दे देते। फिर भी भाजपा इस्तीफे वाली बात पर किसी तरह की असमंजस वाली स्थिति में नजर नहीं आई। संसदीय दल में प्रस्ताव पारित कर उसने कांग्रेस को विध्वंसकारी विपक्ष बता दिया। यही नहीं कांगेस को बाधा डालने वाली तथा विकास विरोधी नीतियों पर काम करने वाली कहकर उसकी कड़ी आलोचना कर डाली। प्रस्ताव में दो-टूक कह दिया गया कि सुषमा स्वराज, वसुंधरा राजे और शिवराज सिंह चैहान का इस्तीफा मांगने का कोई आधार नहीं है। अतः भाजपा संसदीय दल ने विपक्ष का निशाना बने इन तीनों नेताओं के साथ खड़े रहने का संकल्प जता दिया।

भाजपा और विपक्ष ऐसी किसी साझा सहमति की तरफ बढ़ते नहीं दिखे, जिससे संसदीय गतिरोध दूर होता। कांग्रेस और उसके साथ लेफ्ट पार्टियों एवं जनता दल (यू) ने इस्तीफा नहीं तो काम नहीं का चरम रुख अपना रखा है। तीनों नेताओं के इस्तीफे से पहले वे संसद में किसी चर्चा या सत्ता पक्ष का स्पष्टीकरण सुनने को तैयार नहीं हैं। और फिर लोकसभा से एक साथ 25 सांसदों के निलंबन से आग में घी का काम तो हो गया, ससंद की कार्यवाही के मामले में नतीजा सिफर ही रहा। इस बात पर नाराज कांग्रेस सांसदों ने संसद भवन पर धरना दे दिया जिसका नेतृत्व खुद सोनिया गांधी ने संभाला। पार्टी आलाकमान के आने से और साथ साथ नारे लगाने से कांग्रेस का मनोबल तो बढ़ा ही, इस प्रदर्शन में कुछ अन्य विपक्षी दल भी शामिल हो गए।

यकीनन सत्र में बार-बार कार्यवाही स्थगित होने से प्रश्नकाल जाया होता है। संसद और सांसद दोनों का ही प्रयोजन व्यर्थ हो जाता है। समस्याएं जस की तस रह जाती हैं और अपना कीमती वोट देने वाले निमित्त मात्र से लगने लगता है। संसद न चलने से जहां एक ओर महत्वपूर्ण कामकाज नहीं हो पाता और देश के विकास से जुड़े तमाम बिल अटके रह जाते हैं। वहीं संसद में जारी गतिरोध के कारण देश के खजाने को आर्थिक नुकसान भी होता है। संसदीय मामलों के मंत्रालय के अनुमान के मुताबिक, संसद में कामकाज न होने से देश को प्रति मिनट ढाई लाख रुपये का नुकसान होता है। अगर इसके आधार पर एक दिन का नुकसान लगाया जाए तो यह तकरीबन 10 करोड़ रुपये बैठता है।

सत्र के दौरान भारी हंगामें को देखकर विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने जज्बाती भाषण जब दिया तो एकबारगी लगा कि संभवतः अब सांसद शांत बैठ जाए पर ये दांव भी खाली चला गया। उल्टे कांग्रेस के हमले तेज हो गए। सोनिया गांधी ने उन्हें ड्रामा करने में माहिर बताया, तो राहुल गांधी ने विदेश मंत्री से यह बताने को कहा कि उनके परिवार को ललित मोदी से कितने पैसे मिले? सवालों से परेशान भाजपा किसी तरह सदन को चलाये रखने की कोशिश में दिखी तो वहीं दूसरी ओर संसद में काम न चलने देने पर कांग्रेस यह सोच सोच कर फूल कर कुप्पा होती दिखी कि यह सत्र राजनीतिक रूप से उसके लिए फायदेमंद रहा। भ्रष्टाचार के कथित मामलों को लेकर अधिकांश विपक्षी दल भी उसके साथ गोलबंद था तो उसे ये लगना लाजमी भी है कि संसदीय कार्यवाही को पंगु बनाने में वह कामयाब रही।

सही मायने में कहा जाए तो यह सत्र भाजपा को कांग्रेस का जबाव रहा। अगर आपको याद हो तो पिछली दो लोकसभाओं के दौरान उसके संसदीय आचरण का रिकॉर्ड इतिहास में दर्ज मिल जाएंगे। संसद को अवरुद्ध करने को उचित राजनीतिक रणनीति बताने की शुरुआत भाजपा ने ही की। तब उस वक्त भरी बहुमत से जीत कर सत्ता में आए कांग्रेसी नेता कहते थे कि भाजपा आम चुनाव में अपनी हार नहीं पचा पाई, इसलिए असंसदीय व्यवहार कर रही है। आज वस्तुस्थिति उलट है। अब भाजपाई कांग्रेस पर यही इल्जाम लगा रहे हैं।

देखा जाए तो असंसदीय व्यवहार का ताना देने वाले जब खुद सत्ता में होते है तो अपना समय भूल जाते है। दोनों ही अपने अपने वक्त में अपनी जिम्मेदारियों का ठीकरा दूसरे पर मढ़ते नजर आते है। ना जाने कब इन्हें ये समझ आएगा कि देश चलाने के लिए दोनों ही पक्ष जरूरी है। यदि सत्तापक्ष जनादेश का राजकाज चलाने के लिए है तो विपक्ष उसके काम की निगरानी करने के लिए है। आपसी टकराव में तो वे केवल देश के कामकाज ही ठप कर रहे हैं।

जनता के लिए जनता के द्वारा चुने गए सांसदो को यह नहीं भूलना चाहिए कि आज जिस जगह बैठ कर वे अकड़ रहे है यहां से उतारने में जनता भी देर नहीं करेगी। जैसे लगातार संसदीय अवरोध खड़ा करने का अंजाम 2009 में भाजपा भुगत चुकी हैै। संसद का कार्य बाधित कर अपनी रणनीति की सफलता को राजनीतिक फायदे समझकर बैठी कांग्रेस भविष्य के प्रति भी आगाह रहे तो बेहतर होगा।