Wednesday, December 12, 2018

सुधर जाओ कि ‘सिहांसन‘ खाली कराने ‘जनता‘ आती है और अब क्या कहने को बाकी है


दो बातों की वजह से आज ये लेख लिखने का मन किया. (एक) जो मन से मांगा उसका पूरा होना और (दो)े समय के साथ ‘आत्मविश्वास‘ से माथा दमकते देखना.

पहले बात, पहली वजह की. जब 5 राज्यों में विधानसभा चुनाव की तारीखें घोषित हुई तो दिल से कहीं ये इच्छा जागृत हुई कि इस बार ये तारीखें सब उलट-पलट कर दें. एक्ज्टि पोल के नतीजों से मन खिन्न था लेकिन मतदान के प्रतिशत पर नतीजों के पलटने का यकीन भी था. और जो हुआ वह वही था जो जनता ने चाहा था. भाजपा शासित राज्यों में उसकी हार से मेरी प्रसन्नता की वजह आम लेकिन खास थी, जिसका जिक्र आगे करूंगी. 2014 के आम चुनाव के लिए मैं खुद भाजपा और मोदी पर ‘सपोटिव‘ लेख लिखा करती थी. लेकिन आज ठीक इसके उलट मैं उसके खिलाफ खड़ी नजर आती हूं. आखिर क्यों ऐसा करने को मैं या कोई आम जन मजबूर हो जाता है. क्या इस पर कभी ‘मन की बात‘ को सुना जाता है.

दरअसल सत्ता परिवर्तन की नौबत तब आती है जब आप पिछली सरकारों के रवैये से त्रस्त हो जाते है और बेहतरी के लिए दूसरी पार्टी को ही उससे बेहतर मानते हुए उसे मौका देना चाहते है. हालांकि आप जिस सोच के साथ किसी भी पार्टी का चुनाव करते है अक्सर वे सभी कुछ समय बाद फेल भी नजर आते है. क्योंकि सभी सरकारें बेसिक समस्या के बात करके सबसे पहले उसे ही नजरअंदाज करती है. सत्ता मिलते ही वह ‘उनकी‘ तुष्टि के साधन पहले ढूढ़ने लगती है जिन्होंने अपनी पूंजी का दांव उन पर खेला होता है. ऐसे में भला मूर्ख जनता से किए गये वायदों की किसे परवाह? लेकिन जनता भी चुनाव की ताक में बैठी होती है. तमाम तरह के गुणा-भाग के बाद उसे भी फिर ‘भूतकाल‘ ‘वर्तमान‘ से कम अवसरवादी या कम बेईमान नजर आने लगता है. और यही सत्ता परिवर्तन का एक बड़ा कारण बन जाता है.


2014 में जब भाजपा मोदी के चेहरे के साथ इस नारे को लेकर उतरी कि अच्छे दिन आने वाले है तो बहुतों को यकीन हो चला कि वाकई अच्छे दिन आने ही वाले है. इसी नारे ने उन्हें पूर्ण बहुमत वाली सरकार बना दिया. कुछ दिन तक तो लगा कि जैसे देश और देशवासियों के दिन फिरने वाले है लेकिन 2 साल बीतते ना बीतते सरकार और उसकी मंशा जाहिर होने लगी. अपनी ही पं्रशसा में डूबी सरकार और उसके नुमांइदों को अपने ही ‘मन की बात‘ कहने-करने से फुर्सत नहीं मिल रही. यहां तक कि पिछले 60 साल में हुए विकास के आंकड़े  को भी ‘जीरो‘ फीगर देने में भी उन्हें गुरेज नहीं हुआ. ‘सरकार‘ के झूठ को भी सच की चादर में लपेट के पेश करने की अदा पर एक शेर याद आ रहा है-
आइना देख तू अपनी वफा का
कि तू कैसा था और कैसा लगे है

कहने का मतलब ये है कि आपने चुनाव से पहले जो विकास का चेहरा दिखाया वह अंत तक आते-आते जीवनमारक की शक्ल में सामने आया. आप अपने ‘सो कॉल्ड‘ विकास की पोटली को अपने मन से चाहे जैसे भी बढ़ा-चढ़ा के दिखाना चाहे ‘विकास‘ की वास्तविकता का सामना तो आम जनता ही करती है या कहे दिन-प्रतिदिन झेलती है. जिस देश की आधी से ज्यादा आबादी अभी भी भूखे-नंगो की श्रेणी में आती हो, जिस देश में विकास की परिभाषा महज मुंबई, दिल्ली, बंगलौर, चेन्नई, कोलकत्ता तक ही सीमित हो, जहां आज भी शौच करने आदमी खेतों का रूख करता हो, लड़कियां पैदा होते ही फेंक या मार दी जाती हो, जहां स्वच्छता के नाम पर महज कागजी काम किए जाते हो, जहां अनियंत्रित ट्रैफिक कल्चर से आपको रोज दो-दो हाथ करने पड़ते है और जहां वीआईपी के लिए अलग कानून और आमजन के लिए अलग कानून हो वहां विकास की बातें बेमानी नहीं लगती?

सरकार जनता के मन के काम कर रही है ये बात तो तब साबित हो जब बुलेट ट्रेन की जगह नियमित रेल सफर को सुरक्षित और सुगामी बनाने की कवायद की जाए. इंटरनेशन ब्रांड को तरजीह देने की जगह अपने यहां के प्रोडक्ट की मार्केटिंग को पहले तरजीह दी जाए. फास्ट फूॅड के चेन पर चेन खुलवाने के बजाए कोई भूखा न सोए, इसकी व्यवस्था की जाए. लोग सिविल सेन्स का पालन कड़ाई से करें इसके लिए सख्त इंतजाम किए जाएं. दुरूस्त सड़क यातायात, बेहतर सीवर प्रणाली, बेहतर बिजली-पानी की व्यवस्था, नदियों की स्वच्छता, हरियाली बढ़ाने के लिए काम किया जाए. हर हाथ में काम हो ऐसा तरीका अपनाया जाए तब जाकर कहीं विकास की बात पर आप खरे उतर पाएंगे.

लेकिन आपने क्या कर रहे है? आप जनता से मिली इस ताकत का दुरूपयोग करने में लगे है. स्वंत्रत रूप से काम करने वाली संस्थाओं को अपने कब्जे में करने की आपकी हिटलरशाही, आपके बेतुके बोल, आपके जनविरोधी फैसलों ने ही जनता को आपके विजय रथ को रोकने पर मजबूर कर दिया. कुछ दिन पहले तक भले ही लोग 2019 के लिए भाजपा को ही एकमात्र पार्टी मान कर चल रहे होगे लेकिन क्या इन पांच राज्यों के नतीजों ने ये साबित नहीं कर दिया कि जनता ही जनार्दन है और वह कब किसे सिंहासन सौप दे इसकी भनक भी नहीं लगने देती. एक तरह से भाजपा के सामने लचर दिखने वाली कांग्रेस को देखकर फिर से आस तो जग ही गई. तो ‘साहेब और पार्टी‘ अब भी न चेते तो राम नाम सत्य है ये जताने में जनता देर न करेगी.

अब बात दूसरी करना चाहूंगी. पांच राज्यों के चुनाव नतीजों के बाद कांग्रेस की प्रेस कांफ्रेस में राहुल गांधी को देखकर मुझे पहली बार ये अहसास हुआ कि ये शख़्स इतना भी ‘इग्नोर‘ करने वाला नहीं लग रहा. कहीं न कहींं अचानक से उनके हावभाव में दिखते आत्मविश्वास ने ये साबित करने पर मुझे मजबूर किया कि यकीनन ये नरम सा दिखने वाला चेहरा आने वाले वक्त में फायर ब्रांड में अवतरित हो सकता है और इस पर जनता अपना दांव खेल सकती है. नरम ‘हिंदुत्व‘ से गरम ‘ब्रांड‘ में अवतरित होकर लिखी जाती इस एक नई इबारत को लोग अब दिल से पढ़ना चाहेगें. चाहेगें क्या पढ़ना शुरू कर दिया है.

कांग्रेस की इस जीत के पीछे कुछ हद तक दुआ में उठे वे हाथ भी रहे जो भाजपाईयों को कही न कहीं सबक सीखाना चाहते थे और 2019 के लिए एक मजबूत विपक्ष को खड़ा कर देना चाहते थे. इसमें उन्हें सफलता मिली. अपनी उपस्थिति बनाये रखने के लिए राजनीतिक चौसर में चालें क्या चली जाएगी ये एक अलग विषय है फिलहाल जनता ने अपना रूख स्पष्ट कर दिया. राहुल गांधी ने अपनी नेतृत्व क्षमता का शानदार प्रदर्शन कर विपक्षियों के ही हथियार से उनको मात दे दी. 67 जनसभाएं और हर जगह मंदिरों-मस्जिदों में माथा टेक कर अपनी एकपक्षीय सेक्यूलर इमेज को धो डाला. राजस्थान के चुनाव में तो उनका हिंदुत्व रूप अपने प्रखरता के सीमा पर रहा. क्या ख्वाजा की दरगाह, क्या पुष्कर के मंदिर, वे हर जगह मौजूद नजर आये. इस तरह से भाजपा के हिदुत्व के गढ़ में सेंध कर कर उन्होंने अपना विजय रथ पूरे आत्मविश्वास के साथ उतार दिया. पार्टी अध्यक्ष में रूप में अभी उनका एक साल ही पूरा हुआ है. ऐसे में यह जीत असाधारण परिणाम के तौर पर सामने है जो संभवतः 2019 के आम चुनाव में अपने पूरे जालो-जलाल के साथ भाजपा को चुनौती देने की स्थिति में होगी.

रामधारी सिंह दिनकर की कालजयी कविता के कुछ पंकितयां लिखे बिना इस लेख की इतिश्री न हो सकेगी-

हुंकारों से महलों की नींव उखड़ जाती,
सांसों के बल से ताज हवा में उड़ता है,
जनता की रोके राह,समय में ताव कहां?
वह जिधर चाहती, काल उधर ही मुड़ता है.
सिहांसन खाली करो कि जनता आती है.

ये चेतावनी नही तो क्या है, ये भाजपाईयों को अब तो समझ ही लेना चाहिए.

Wednesday, December 5, 2018

मजाज़, जो बक़ौल फ़ैज़ अहमद 'फ़ैज़' इन्कलाब का 'ढ़िढोरची' नहीं, इन्कलाब का 'मुतरिब' था





इन्कलाबी शायर ‘मजाज़’, महज 44 साल की छोटी सी उम्र में, उर्दू साहित्य को आला दर्जे की अपनी शायरी से नवाज दुनिया से कूच कर गये थे. ’मजाज’ को उर्दू शायरी का ‘कीट्स’ कहा जाता है, क्योंकि उनके पास ’अहसास-ए-इश्क़’ व्यक्त करने का बेहतरीन लहजा था, जो उनके समकालीन शायरों के पास नहीं था. वहीं उनका इंकलाबी मिजाज आपको चौंका देता है. बका़ैल फिराक़ गोरखपुरी, ’मजाज़’ की कविता में बौद्धिक पहलू काफी निखरा हुआ मिलता है किंतु इश्क़ उनकी चेतना का आधार मालूम होता है. प्रेम की असफलता की कसक उनके काव्य में साफ मालूम होती है, लेकिन वे असका आधार सामाजिक असमानता मानते है. जो भी हो इस बात का अफसोस ताउम्र उनके चाहने वालों को रहेगा कि एक बेहद जिंदादिल, हाज़िर जवाब, यारों के यार और महफिलों की शान कहे जाने वाले इंसान असरार-उल-हक ’मजाज’ की जिन्दगी का ज्यादातर हिस्सा मुसीबतों और तकलीफों के दरम्यान गुजरा.
अजमेर के ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती के गुरु ख़्वाजा उस्मान हारुनी के खानदान से ताल्लुक रखने वाले असरार को अलीगढ़ यूनीवर्सिटी में वह सब मिला, जिनकी मौजूदगी में मजाज़ के फन को रौशनी मयस्सर होना लाजमी था. विश्वविद्यालय के मस्त माहौल ने मजाज को रूमानी शायर बनने में खासी मदद की. उनकी एक बेमिसाल नज्म् “नज्र-ए-अलीगढ़”, इसी दौरान लिखी गई. इस नज्म् के लिखे जाने के पीछे भी एक किस्सा है. एक मर्तबा भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी गए, तो उन्होंने वहां के विद्वान मंडली से ये जानना चाहा कि क्या यूनिवर्सिटी का अपना कोई तराना है, जो उसे खास पहचान देता है. कोई पुख्ता जवाब न मिलने पर उन्होंने हैरान होकर कहा कि उन्हें इस बात का यकीन नहीं हो रहा कि अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी जैसी नामी संस्था का अपना कोई तराना नहीं. नेहरु की इस बात का गहरा असर हुआ. पहली मर्तबा असरार उल हक के लिखे तराने को स्ट्रेचे हॉल में गाया गया-
ये मेरा चमन है मेरा चमन, मैं अपने चमन का बुलबुल हूँ
सर शार-ए-निगाह-ए-नरगिस हूँ, पाबस्ता-ए-गेसू-ए-सुंबुल हूँ
फितरत ने सिखाई है हमको, उफताद यहाँ परवाज यहाँ
गाए हैं वफा के गीत यहाँ, छेड़ा है जुनूं का साज यहाँ
इस फर्श से हमने उड़-उड़कर, अफ़लाक के तारे तोड़े हैं
नाहीद से की है सरगोशी, परवीन से रिश्ते जोड़े हैं
आ-आके हजारों बार यहाँ, खुद आग भी हमने लगाई है
फिर सारे जहाँ ने देखा है ये आग हमीं ने बुझाई है
हर आह है खुद तासीर यहाँ, हर ख्वाब है खुद ताबीर यहाँ
तदबीर के पाए संगीं पर, झुक जाती है तक़दीर यहाँ
जर्रात का बोसा लेने को, सौ बार झुका आकाश यहाँ
खुद आँख से हमने देखी है, बातिल की शिकस्त-ए-फाश यहाँ
जो अब्र यहाँ से उठेगा, वो सारे जहाँ पर बरसेगा
हर जू-ए-रवां पर बरसेगा, हर कोहे गरां पर बरसेगा
हर सर्व-ओ-समन पर बरसेगा, हर दश्त-ओ-दमन पर बरसेगा
खुद अपने चमन पर बरसेगा, गैरों के चमन पर बरसेगा
हर शहर-ए-तरब पर गरजेगा, हर कस्रे तरब पर कड़केगा
ये अब्र हमेशा बरसा है, ये अब्र हमेशा बरसेगा

मजाज़ के आलोचक मानते है अलीगढ़ का ये दौर उनकी जिन्दगी को नया मोड़ देने वाला रहा। यहां तक आते-आते उनकी शायरी रूमानी से इन्कलाबी शायरी में में तब्दील होने लगी. साहित्यकारों की बड़ी फौज इन्कलाब के गीत गा रही थीं. भला अलीगढ़ इससे कैसे अछूता रह सकता था. अलीगढ़ तमाम जाने माने कवि-लेखकों का गढ़ बनता जा रहा था. डा0 अशरफ, अख्तर हुसैन रामपुरी, सब्त हसन, सज्जाद जहीर सभी अलीगढ़ आ चुके थे. अंग्रेजी हुकूमत का दौर जोरों पर था.पत्र पत्रिकाएं प्रकाशित होकर ’जब्त ’हो रही थीं. ऐसे में मजाज़ और उनकी शायरी इससे कैसे अछूती रहती. दूसरे समाजवादी साथियों की सोहबत में मजाज़ भी तरक्की पसंद तथा इंकलाबी शायरों की सोहबत में शामिल हो गये. ऐसे माहौल में मजाज़ ने ’इंकलाब’ जैसी नज्म बुनी. इसके बाद तो जैसे नज़्म का दौर ही शुरू हो गया और उन्होंने रात और रेल ,नजर, अलीगढ, नजर खालिदा, अंधेरी रात का मुसाफिर, सरमायादारी जैसे रचनाएं उर्दू अदबी दुनिया को दी. उनके इंकलाबी तेवर इस नज़्म में दिख जाएंगे-

बोल ! अरी, ओ धरती बोल !
राज सिंहासन डाँवाडोल!
बादल, बिजली, रैन अंधियारी, दुख की मारी परजा सारी
बूढ़े, बच्चे सब दुखिया हैं, दुखिया नर हैं, दुखिया नारी
बस्ती-बस्ती लूट मची है, सब बनिये हैं सब व्यापारी बोल !
और यहां मजाज जब कविता करते हैं तो कुछ और ही नजर आते हैं। देखिये-
इक नन्ही-मुन्नी सी पुजारिन
पतली बाहें, पतली गर्दन
भोर भये मन्दिर आई है
आई नहीं है माँ लाई है
वक्त से पहले जाग उठी है
नींद अभी आँखों में भरी है
ठोड़ी तक लट आई हुई है
यूँही सी लहराई हुई है ...
’मजाज’ औरत की आजादी के कायल थे। उन्होंने उसे इसका अहसास कराया और लिखा-

तेरे माथे पे ये आँचल तो बहुत ही खूब है लेकिन
तू इस आँचल से इक परचम बना लेती तो अच्छा था

ऐसे इंकलाबी शायर का आल इण्डिया रेडियो की पत्रिका ‘आवाज’ के सहायक संपादक के तौर पर दिल्ली आना ज़िंदगी का रूख बदल गया बुखारी भाईयों, जिन का महकमे में बहुत दबदबा था, के फिरका-परस्त और नापाक ख़्यालात ’मजाज़’ बर्दाश्त नहीं कर पाये और महज 2 वर्ष की मुलाज़मत के बाद ही रेडियो छोड़ दिया. इस दौरान दिल्ली में हुए नाकाम इश्क ने उन्हें ऐसे दर्द दिये कि जो ’मजाज़’ को ताउम्र सालते रहे. इश्क में नाकामी से मजाज़ ने शराब पीना शुरू कर दिया. शराब की लत इस कदर बढ़ी कि लोगों ने कहना शुरू कर दिया कि मजाज़ शराब को नहीं, शराब ’मजाज’ को पी रही है. ये दो बरस उन पर बेहद भारी पड़े और वो नफ़्सीयाति तौर पर इस सदमे को दिल से लगा बैठे और दिल्ली को छोड़ लखनऊ आ गये. दिल्ली से विदा होते वक्त उन्होंने कहा-

रूख्सत ए दिल्ली! तेरी महफ़िल से अब जाता हूं मैं
नौहागर जाता हूं मैं नाला-ब-लब जाता हूं मैं

’मजाज़’ ऐसे शायर थे जिनके शेरों में इश्क़ की इंतहा देखी जा सकती है तो टूटे दिल की खामोशी को सुना जा सकता है और ये महज कल्पना की उड़ान पर उतर के आये हो ऐसा नहीं. मजाज़ यॅूं भी दिल से रूमानी शायर थे. फिर ऐसे शख़्स को मोहब्बत होना लाजिमी था. लेकिन इश्क़ में हारे मजाज़ ने जब इस तल्ख़ तजुर्बे का घूंट पिया तो उनकी ज़माने से शिका़यत ने भी लफ़जों की शक्ल में ही निकलना गवारा किया-

मैं आहें भर नहीं सकता कि नगमें गा नहीं सकता,
सुकूं लेकिन मेरे दिल को मयस्सर आ नहीं सकता
कोई नगमें तो क्या अब मुझ से मेरा साज भी ले ले
जो गाना चाहता हूँ, आह, वो मैं गा नहीं सकता
वो मुझको चाहती है और मुझ तक आ नहीं सकती
मैं उसको पूजता हूँ और उसको पा नहीं सकता
हदें वो खींच रखी हैं हरम के पासबानों ने
के बिन मुज़रिम बने पैग़ाम भी पहुँचा नहीं सकता

मजाज को माशूका से ज्यादा रवायती, दकियानूसी सोच, समाजी ढाँचे और उसके निजाम से नाराजगी थी और उसने इसी को अपनी नाकाम मोहब्बत की वजह समझा.

मुझे शिकवा नहीं दुनिया की उन जुहराजबीनों से
हुई जिनसे न मेरे शौक-ए-रुस्वा की पजीराई
जमाने के निजामे-जंग-आलूदा से शिकवा है
कवानीने-कुहन आईने-फर्सूदा से शिकवा है

लखनऊ आकर मजाज़ 1939 में सिब्ते हसन ,सरदार जाफरी के साथ मिलकर ’नया अदब’ का सम्पादन करने लगे, जो आर्थिक कठिनाईयों की वजह से ज्यादा दिन तक नहीं चल सका. कुछ दिनों बाद में मजाज़ ने फिर दिल्ली वापसी की और ‘हार्डिंग लाइब्रेरी’ में असिस्टेन्ट लाइब्रेरियन के पद पर काम किया. लेकिन मायूस दिल को अब दिल्ली कहां रास न आने वाली थी. निराश होकर एक बार फिर दिल्ली छोड़ी और बंबई चले गए, लेकिन उन्हें बंबई भी रास न आया. बंबई की सडकों पर आवारा ’मजाज़’ ने वो लिख दिया जो हरशख़्स की जुबान पर बेसाख़्ता चढ़ गया. यू तो इसमें मजाज़ ने अपने दिल की बात कही, लेकिन पढ़ने वाले हर शख़्स ने उसे अपना दर्द समझा. अपनी इस सर्वाधिक लोकप्रिय नज्म ‘आवारा’ के मार्फत उन्होंने दिल के तारों को झनझना दिया-

शहर की रात और मैं, नाशाद-ओ-नाकारा फिरूँ
जगमगाती जागती, सड़कों पे आवारा फिरूँ
गैर की बस्ती है, कब तक दर-ब-दर मारा फिरूँ
ऐ गम-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ
झिलमिलाते कुमकुमों की, राह में जंजीर सी
रात के हाथों में, दिन की मोहिनी तस्वीर सी
मेरे सीने पर मगर, चलती हुई शमशीर सी
ऐ गम-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ
ये रुपहली छाँव, ये आकाश पर तारों का जाल
जैसे सूफी का तसव्वुर, जैसे आशिक का ख़याल
आह लेकिन कौन समझे, कौन जाने जी का हाल
ऐ गम-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ
फिर वो टूटा एक सितारा, फिर वो छूटी फुलझड़ी
जाने किसकी गोद में, आई ये मोती की लड़ी
हूक सी सीने में उठी, चोट सी दिल पर पड़ी
ऐ गम-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ
रात हँस-हँस कर ये कहती है, कि मयखाने में चल
फिर किसी शहनाज-ए-लालारुख के, काशाने में चल
ये नहीं मुमकिन तो फिर, ऐ दोस्त वीराने में चल
ऐ गम-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ
हर तरफ बिखरी हुई, रंगीनियाँ रानाइयाँ
हर कदम पर इशरतें, लेती हुई अंगड़ाइयां
बढ़ रही हैं गोद फैलाये हुये रुस्वाइयाँ
ऐ गम-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ
रास्ते में रुक के दम लूँ, ये मेरी आदत नहीं
लौट कर वापस चला जाऊँ, मेरी फितरत नहीं
और कोई हमनवा मिल जाये, ये कि़स्मत नहीं
ऐ गम-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ
मुंतजिर है एक, तूफान-ए-बला मेरे लिये
अब भी जाने कितने, दरवाजे है वहां मेरे लिये
पर मुसीबत है मेरा, अहद-ए-वफा मेरे लिए
ऐ गम-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ
जी में आता है कि अब, अहद-ए-वफा भी तोड़ दूँ
उनको पा सकता हूँ मैं ये, आसरा भी छोड़ दूँ
हाँ मुनासिब है ये, जंजीर-ए-हवा भी तोड़ दूँ
ऐ गम-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ
एक महल की आड़ से, निकला वो पीला माहताब
जैसे मुल्ला का अमामा, जैसे बनिये की किताब
जैसे मुफलिस की जवानी, जैसे बेवा का शबाब
ऐ गम-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ
दिल में एक शोला भड़क उठा है, आखि़र क्या करूँ
मेरा पैमाना छलक उठा है, आखि़र क्या करूँ
जख्म सीने का महक उठा है, आखि़र क्या करूँ
ऐ गम-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ
मुफलिसी और ये मजाहिर, हैं नजर के सामने
सैकड़ों चंगेज-ओ-नादिर, हैं नजर के सामने
सैकड़ों सुल्तान-ओ-जबर, हैं नजर के सामने
ऐ गम-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ
ले के एक चंगेज के, हाथों से खंजर तोड़ दूँ
ताज पर उसके दमकता, है जो पत्थर तोड़ दूँ
कोई तोड़े या न तोड़े, मैं ही बढ़कर तोड़ दूँ
ऐ गम-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ
बढ़ के इस इंदर-सभा का, साज-ओ-सामाँ फूँक दूँ
इस का गुलशन फूँक दूँ, उस का शबिस्ताँ फूँक दूँ
तख्त-ए-सुल्ताँ क्या, मैं सारा कस्र-ए-सुल्ताँ फूँक दूँ
ऐ गम-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ
जी में आता है, ये मुर्दा चाँद-तारे नोंच लूँ
इस किनारे नोंच लूँ, और उस किनारे नोंच लूँ
एक दो का जिक्र क्या, सारे के सारे नोंच लूँ
ऐ गम-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ

......ये नज़्म ‘मजाज’ की ‘आहंग’ नाम की किताब से है. इस किताब की चाहत इस कदर थी कि चाहने वालों ने कई-कई कॉपियां खरीद डालीं. तोहफे में ‘आहंग’ ही भेंट की जाती. हर शहर में ‘आहंग’ की ही धूम थी. आंहग उनका एकमात्र काव्य संग्रह है, जिसकी भूमिका में फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ ने लिखा है कि “मजाज़ इन्कलाब का ढ़िढोरची नहीं, इन्कलाब का मुतरिब है, उसके नज़्में में बरसात के दिन की सी सुकूंबख़्श खुनकी है और है बहार की रात की सी गर्म जोश तासीर आफ़रीनी.“ वास्तव में ये कहना गलत न होगा कि इश्क़ की जो तड़प ’मजाज’ ने पैदा की उतनी शायद ही किसी और शायर के नसीब में आई हो. कुछ शेर पढ़ें, आप खुद ही इसे मानने लगेंगे-

दफ्न कर सकता हूँ सीने में तुम्हारे राज को
और तुम चाहो तो अफ्साना बना सकता हूँ मैं
इश्क़ का जौक़-ए-नजारा मुफ्त में बदनाम है
हुस्न खुद बे-ताब है जल्वा दिखाने के लिए
कब किया था इस दिल पर हुस्न ने करम इतना
मेहरबाँ और इस दर्जा कब था आसमाँ अपना
कुछ तुम्हारी निगाह काफिर थी
कुछ मुझे भी खराब होना था
मुझ को ये आरजू वो उठाएँ नकाब खुद
उन को ये इंतिजार तकाजा करे कोई
तुम्हीं तो हो जिसे कहती है नाखुदा दुनिया
बचा सको तो बचा लो कि डूबता हूँ मैं
हम अर्ज-ए-वफा भी कर न सके कुछ कह न सके कुछ सुन न सके
याँ हम ने जबाँ ही खोली थी वाँ आँख झुकी शरमा भी गए
हिन्दू चला गया न मुसलमाँ चला गया
इंसाँ की जुस्तुजू में इक इंसाँ चला गया
हुस्न को शर्मसार करना ही
इश्क का इंतिकाम होता है
बहुत मुश्किल है दुनिया का सँवरना
तिरी जुल्फों का पेच-ओ-ख़म नहीं है
देखना जज्बे मोहब्बत का असर आज की रात
मेरे शाने पे है उस शोख का सर आज की रात
नर्गिस-ए-नाज में वो नींद का हल्का सा खुमार
वो मेरे नगमा-ए-शीरीं का असर आज की रात
हुस्न को बे-हिजाब होना था
शौक को कामयाब होना था
क्या कहूँ किस शौक से आया था तेरी बज्म में
छोड़ कर खुल्दे अलीगढ़ की हजारों महफिलें
कितने रंगीं अहदो पैमां तोड़ कर आया था मैं
दिल नवाजाने चमन को छोड़ कर आया था मैं
इक नशेमन मैंने छोड़ा इक नशेमन छूट गया
साज बस छेड़ा ही था मैंने के गुलशन छूट गया
दिल में सोजे ग़म की इक दुनिया लिए जाता हूँ मैं
आह तेरे मय क़दे से, बे-पिए जाता हूँ मैं

मजाज को लखनऊ बेहद पसन्द था. लखनऊ के बारे में उनकी यह नज्म उनके लगाव को खूबसूरती से प्रकट करती है.
फिरदौसे हुस्नो इश्क़ है दामाने लखनऊ
आंखों में बस रहे हैं गजालाने लखनऊ
एक जौबहारे नाज को ताके है फिर निगाह
वह नौबहारे नाज़ कि है जाने लखनऊ।
याद आएंगे मुझे तेरे ज़मीनो आसमाँ
रह चुके हैं, मेरी जौलाँगाह तेरे बोस्ताँ

दिल-खुश और अजीम शायर ’मजाज़’ की हाजिरजबाबी के किस्से भी खूब है. सोहबत उनकी हर बड़े शायर के साथ थी लेकिन ’सीरत’ ऐसी कि किसी को नहीं बख्शते थे. बात अधूरी रहेगी अगर मजाज़ के बेतकल्लुफ अदा का जिक्र न किया जाए. ऐसे ही कुछ किस्सों में से कुछ यहां आपके लिए-

एक रोज एक दम तन्हा बैठे मजाज़ एक कॉफी हाउस में दोस्तों का इंतजार कर रहे थे. मजाज इस कॉफी हाउस में अक्सर आते रहते थे. कुछ ही देर में एक साहब जो उनसे वाक़िफ थे, इसी कॉफी हाउस में आ पहुंचे और मजाज़ के बगल वाली कुर्सी पर जम गए. इब्तेदाई तकल्लुफ और इधर-उधर की एक दो बातों के बाद अपने लिए कॉफी का ऑर्डर दिया और गुनगुनाना शुरू कर दिया-
अहमकों की कमी नहीं गालिब
एक ढूंढो हजार मिलते हैं
मजाज़ ने भी मौके का फायदा उठाया और उनकी तरफ देखते हुए कह दिया -“ढूंढने की नौबत भी कहाँ आती है हजरत! खुद-ब-खुद तशरीफ ले आते हैं.“
.................................................................
अदबी बहस और गुफ्तगू के दौरान मजाज़ और फिराक़ में बहुत ठनती थी. ऐसी ही एक संजीदा गुफ़्तगू के दौरान फिराक ने आव देखा न ताव अचानक ही लहजा बदल कर मजाज़ की खिल्ली उड़ाने की गरज से हंसते हुए कहा, “मजाज़ ! तुमने क़बाब बेचने क्यों बंद कर दिए ?”
“आपके यहाँ से गोश्त आना जो बंद हो गया फ़िराक साहब”, मजाज़ ने बड़ी संजीदगी से जवाब दिया.
फ़िराक, मजाज को जोश समझने की ग़लती का ख़ामियाजा मज़ाक ही मज़ाक में उठा चुके थे.
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‘जोश’ मलीहाबादी शराब पीते वकत टाइम पीस सामने रख कर पीते थे और हर पंद्रह मिनट के बाद नया पेग बनाते थे, हालांकि बाज दफा ये पाबंदी तीसरे-चौथे पेग के बाद नज़रे-जाम हो जाया करती थी. ऐसे ही एक शब किसी सोहबत में पी रहे थे, जिसमें मजाज़ भी शामिल थे. पहले पेग को हलक से नीचे करते ही टाइम पीस की तरफ देख कर मजाज़ से कहने लगे -“देखो मजाज़ ! मैं कितने डिसिपिलन से शराब पीता हूँ, अगर तुम भी घड़ी सामने रख कर पिया करो तो बद-एहतियाती से महफूज़ रहोगे. “
ये पहले पेग का असर था या ‘जोश’ साहब के पठानी तेवर का कारनामा, मक्खी के छत्ते को छेड़ चुके थे .मजाज़ ने दफ़अतन जवाब दिया -
“घड़ी तो क्या ‘जोश’ साहब ! मेरा बस चले तो घड़ा सामने रख कर पिया करूँ . “
‘जोश’ साहब के एक पेग का नशा भी जाता रहा.
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शराब को लेकर एक दफा राजा महमूदाबाद ( महमूदाबाद इस्टेट, सल्तनत-ए-अवध की सबसे बड़ी रियासत थी. इस का बादशाह आजादी के जमाने में मुस्लिम लीग का खास मेंबर और जिन्नाह का करीबी दोस्त भी था) ने बहुत प्यार से मजाज़ से कहा ,“मजाज़ अगर तुम मान लो तो एक बात कहूँ !”
“आपका हुक्म सर आँखों पर, फरमाइये राजा साहब क्या इरशाद है ?”, मजाज ने निहायत शाइस्ता लहजे़ में जवाब दिया.
“मैं चाहता हूँ के तुम्हारे लिए दो सौ रुपये माहवार का वज़ीफा मुक़र्रर कर दूँ.”
“बड़ा करम है हुजूर का “
“लेकिन तुम खुदा के लिए ये शराब पीना छोड़ दो। ये लत अच्छी नहीं और तुम जैसे नामी-गिरामी शायर को ये शोभा भी नहीं देता “
“शराब पीना छोड़ दूँ?, मजाज़ ने निहायत हैरानी और बेचारगी से राजा साहब की तरफ देखते हुए कहा, “फिर आपके दो सौ रुपये मेरे किस काम आया करेंगे?”

तो ऐसी थी मजाज़ की सीरत. उनकी ’आवारा’ नज़्म ने मुझ पर कुछ ऐसा जादू चलाया कि मैं मजाज़ की क़ायल हो गई. कहीं उनके दर्द को महसूस करने लगी. जितना उन्हें जानने की कोशिश की उतना उस शायर के लिए तक़लीफ हुई. उनके दर्द का इलाज शराब भी न कर सकी. हां, इस लत ने जरूर उनके शरीर में जहर का काम किया. आखिरकार वही हुआ जिसका डर सभी को था.

5 दिसम्बर 1955 की एक तन्हा ठंडी रात मस्तिष्क की नस फट गई और मजाज़ को हर दर्द से निज़ात दे गई. एक शायर की कहानी और उसकी नज़्म हर उस दिल की अमानत हो गई जो इश्क में फ़ना हो जाने की कूवत रखता हो. कुछ इस तरह-
मिटते हुओं को देख के क्यों रो न दें ’मजाज़’
आखिर किसी के हम भी मिटाये हुये तो हैं

Thursday, August 2, 2018

'मेहरे-गर्दूं' मिर्जा असदुल्लाह खॉं ’ग़ालिब’




ज़माना सख़्त कम-आज़ार है बजाने-’असद’
वगर्ना हम तो तवक़्क़ो ज़ियादा रखते है

दायम पड़ा हुआ तेरे दर पर नहीं हूॅं मैं
ख़ाक ऐसी ज़िन्दगी पे कि पत्थर नहीं हूॅं मैं

क्यों गर्दिशे-मुदाम से घबरा न जाए दिल
इन्सान हॅूं, पियाला-ओ-साग़र नहीं हूॅं मैं

यारब! ज़माना मुझको मिटाता है किसलिए
लोहे-जहां पे हर्फे़-मुकर्रर नहीं हूॅं मैं

बिला शक.....ये कहना अतिश्योक्ति न होगी कि उर्दू अदब मिर्जा ’ग़ालिब’ यानी मिर्जा असदुल्लाह खॉं ’ग़ालिब’ की शायरी के बगैर अधूरा है। हालांकि ’ग़ालिब’ के बारे में अक्सर कहा जाता है कि उनके यहां स्पष्ट दर्शन नहीं मिलता तो कुछ ये भी फरमाते है कि गालिब एक दार्शनिक कवि थे। उनके विरोधियों का कहना है कि गालिब के यहां कोई व्यवस्थित चिन्तन नहीं मिलता। हां, व्यवस्थित चिंतन के प्रति विद्रोह जरूर मिलता है जबकि उनके चाहने वालों का मानना है कि ’ग़ालिब’ की चेतना इतनी विस्तृत थी कि उसने प्रत्येक व्यवस्था के बंधन को तोड़ दिया। दरअसल ’ग़ालिब’ किसी भी प्रकार की व्यवस्था के खिलाफ थे। उनका व्यक्तिवाद सबसे बढ़-चढ़ के था। उनकी चेतना इतनी प्रखर थी कि उनके इस तोड़-फोड़ में भी निर्माण की झलक मिलती है। उनका हर बात पर नई बात पैदा कर देना, हर बात को एक नई तर्ज पर कह देना यहां तक कि नियमों की उपेक्षा कर देना उनकी रचनात्मकता को खुला आकाश देता है। उनका आजाद रौ मतलब स्वाधीन प्रकृति का हाल ये था कि धार्मिक कर्मकांड को तिलांजलि दे रखी थी। रोजा, नमाज आदि से कोई सरोकार न था। उनके हृदय में शिया-सुन्नी, हिन्दू-मुसलमान किसी भी प्रकार का भेदभाव नहीं था। राजनीति में उन्हें किसी से विरोध न था। वे बहादुरशाह जफर और वाजिद अली शाह के साथ ही अंग्रेज हाकिमों की प्रशंसा में कसीदे करते थे। कहने वाले ये भी कहते है कि उनके इस मिजाज़ को अवसरवादिता का नाम देना गलत होगा। दरअसल उनका मानसिक संसार सबसे अलहदा था, जहां किसी प्रकार के सामाजिक सिद्धांत लागू नहीं होते। वे न किसी के साथ थे, न किसी के विरूद्ध। अपनी इस मंनोरंजक स्थिति को उन्होंने इस शेर के जरिए बयां कर दिया-

बाजीचए अत्फ़ाल है दुनियां मेरे आगे
होता है शबो-रोज तमाशा मेरे आगे
ईमां मुझो रोके है तो खैंचे है मुझो क्रुफ
काबा मेरे पीछे है कलीसा मेरे आगे

उनके इसी अन्तर्द्वन्द्व के चलते उनके आलोचकों को ’ग़ालिब’ से शिकायत रहती थी जो मानवीय जीवन और अनुभव को स्याह-सफेद में बांटकर देखने के आदी रहे। ईमान और कुफ्र, शिकस्त और हसरते-तामीर के इसी अन्तर्द्वन्द्व के चलते ’ग़ालिब’ में गहरी वेदना देखने को मिलती है, वहीं ऐसी विनोदप्रियता भी नजर आती है, जो वेदना में घुलकर आत्म-व्यंग्य में परिवर्तित हो जाती है। यही आत्म-व्यंग्य ग़ालिब की ख़ुसूसियत है जो उन्हें औरों से अलग करता है। गहरी पीड़ा को भी हंसकर टाल जाना, ये तो ग़ालिब का ही व्यक्गित हुनर हो सकता है-
गा़लिब वज़ीफ़ाख़्वार हो दो शाह को दुआ
वो दिन गये कि कहते थे नौकर नहीं हूॅ मैं

यही मिर्जा नालिश ठोके जाने पर अदालत में बड़े मुत्तमईन होकर फरमाते है-

कर्ज़ की पीते थे मै लेकिन समझते थे कि हॉं
रंग लायेगी हमारी फ़ाक़ामस्ती एक दिन

’ग़ालिब’ की शायरी की सबसे खूबसूरत बात जो मुझे नजर आई वह ये कि उनकी शायरी किसी एक रंग या किसी एक एहसास से बंधी नहीं, हर मौजू पर उनका शेर मौजूद है। बात हुस्नों ईश्क की हो, या बेवफाई की, या फिर दुनियावी मुश्किलात की...उनका कोई न कोई शेर जिंदगी के किसी भी मौके पर नज़र किया जा सकता है। वे अकेले शायर है जो आम से आम आदमी की जबान पर आज भी पूरे तसव्वुर के साथ ज़िंदा है। जैसे-
वो आयें घर में हमारे, खुदा की कुदरत है
कभी हम उनको, कभी अपने घर को देखते हैं

हरेक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है
तुम्हीं कहो कि ये अन्दाज़े-गुफ़्तगू क्या है

इश्क़ पर जोर नहीं, है ये वो आतश ’ग़ालिब’
कि लगाये न लगे और बुझाये न बने

तुम जानो तुमको ग़ैर से जो रस्मो-राह हो
मुझको भे पूछते रहो तो क्या गुनाह है

’ग़ालिब’ की यही बात निराली है कि उनके द्वारा लिखे गये शेर तब भी वास्तविकता लिये हुए थे तो आज की परिस्थितियों में भी उनकी हकीकत आइने के माफ़िक साफ है। मीर तक़ी ’मीर’ ने जब पहली बार ग़ालिब को सुना तो उन्होंने कहा कि अगर इस लड़के को कोई काबिल उस्ताद मिल गया और उसने इसे सीधे रास्ते पर डाल दिया, तो लाजवाब शायर बनेगा, वरना मोहमल (अर्थहीन) बकने लगेगा। मीर का कहना सौ फीसद सही निकला। ग़ालिब लाजबाव निकले। अचरज की बात है कि 180000 से ज्यादा ग़ज़ल लिख चुके मीर केवल 1500 शेरों के मालिक ’गालिब’ की तुलना में कम जाने जाते हैं। बकौल शीन काफ़ निज़ाम-ग़ालिब अहसास को इस्तेआरा (रूपक) और ख़ुदकलामी (आत्मसंवाद) को मुकालमा (वार्तालाप) बना देते है। वो मौजमद से ज्यादा इम्कानी (संभावित) मानी के शाइर हैं। रिवाइत (परंपरा) में जिद्दत (नवीनता) और जिद्दत में रिवायत देखने वाली नज़र के सबब मिर्जा ग़ालिब हमाअस्र (सर्वकालीन) शाइर हैं। डा0 अब्दुर्रहमान बिजर्नरी ने तो दीवाने-ग़ालिब को मुक़द्दस वेद के बराबर ही रख दिया।   

ग़ालिब की शायरी का एक बड़ा हिस्सा फ़ारसी में है। वंश परपरा के नजरिए से ईरानी गालिब ने, अब्दुस्समद नामक व्यक्ति से फ़ारसी भाषा और उनके मुहावरों आदि की शिक्षा प्राप्त की थी। छोटी सी उम्र से कविता लिखने के शौक़ीन मिर्जा पहले फ़ारसी में ही लिखा करते थे। हिन्दुस्तान से फारसी की विदाई ने उन्हें उर्दू में लिखने को मजबूर कर दिया और जल्द ही फ़ारसी के तख़ल्लुस ’असद’ से वे ’गालिब’ हो गये। उर्दू में उन्होंने बहुत कम लिखा है, लेकिन जितना लिखा है वह ही आने वाले कई जमानों तक लोगों को सोचने पर मजबूर करने के लिए काफी है। मिर्जा गालिब के फ़ारसी के 6600 शेर और उर्दू के 1100 शेर वाला संग्रह ’दीवान’ कहलाता है। दीवान का सीधा सा अर्थ है शेरों का संग्रह-

’ग़ालिब’ के इसी दीवान से कुछ बानग़ी पेश है-
हम को मालूम है जन्नत की हकीकत लेकिन
दिल के खुश रखने को ’गालिब’ ये खयाल अच्छा है

न था कुछ तो खुदा था कुछ न होता तो खुदा होता
डुबोया मुझ को होने ने न होता मैं तो क्या होता

रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं काइल
जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है

बे-वजह नहीं रोता इश्क में कोई गालिब
जिसे खुद से बढ़ कर चाहो वो रूलाता जरूर है

कासिद के आते-आते खत एक और लिख रखूँ
मैं जानता हूँ जो वो लिखेंगे जवाब में

गम-ए-हस्ती का असद किस से हो जूझ मर्ज इलाज
शमा हर रंग मैं जलती है सहर होने तक

इश्क की इंतहा देखिये

फिर उसी बेवफा पे मरते हैं
फिर वही जिन्दगी हमारी है
बेखुदी बेसबब नहीं ‘गालिब’
कुछ तो है जिस की पर्दादारी है

इश्क ने “गालिब” निकम्मा कर दिया
वरना हम भी आदमी थे काम के

उन के देखे से जो आ जाती है मुँह पर रौनक
वो समझते हैं कि बीमार का हाल अच्छा है

मोहब्बत में नहीं है फर्क जीने और मरने का
उसी को देख कर जीते हैं जिस क़ाफिर पे दम निकले

और मायूसी का आलम ये कि-

ये न थी हमारी किस्मत कि विसाल-ए-यार होता
अगर और जीते रहते यही इंतिज़ार होता

मैं नादान था जो वफा को तलाश करता रहा गालिब
यह न सोचा के एक दिन अपनी साँस भी बेवफा हो जाएगी

हमने माना के तग़ाफुल न करोगे लेकिन,
ख़ाक हो जायेंगे हम तुमको ख़बर होने तक

और पता बताने का निराला अंदाज़

बल्ली मारां की वो पेचीदा दलीलों की-सी गलियाँ
एक कुरआने सुख़न का सफ्हा खुलता है
असद उल्लाह खाँ ग़ालिब का पता मिलता है

’ग़ालिब’ जीवन के हर रंग, हर जगह मौजूद है। उनके शेरों को समझने-जानने से पहले उनके व्यक्तित्व को समझना जरूरी है। ग़ालिब को अपने उच्च वंशीय होने पर गर्व था। आत्मसम्मान उन्हें बहुत प्यारा था। इस संबंध में फिराक़ गोरखपुरी लिखित ’उर्दू भाषा और साहित्य’ में से एक किस्सा बताना चाहूंगी। 1852 ई में जब उन्हें टामसन साहब ने दिल्ली कालेज में फ़ारसी के अघ्यापन के लिए सौ रूपया महीना पर ’ग़ालिब’ को बुलाया, तो वह गये। लेकिन इस प्रतीक्षा में पालकी में ही बैठे रहे कि साहब स्वागत के लिये आयें तो जाऊं। साहब को पता लगा तो उन्होंने आकर उनसे कहा कि आप गर्वनर के दरबार में रईस की तरह आते तो हम स्वागत करते। इस समय आप नौकरी के लिए आये है, नियमानुसार हम आपका वैसा स्वागत नहीं कर सकते। तब मिर्जा ने कहा कि मैंने सरकारी नौकरी को यह समझा था कि इससे मेरा सम्मान बढे़गा लेकिन अगर पूर्व-पुरूषों का अर्जित सम्मान भी चला जाये तो नौकरी से क्या फायदा? यह कहकर वे चले आये। यह संभव है कि आज की मानसिक स्थिति में मिर्जा का यह व्यवहार विचित्र मालूम हो, किंतु इससे यह तो मालूम ही होता है कि मिर्जा अपने सम्मान के मानदंडों पर पूरे उतरते थे। उनके स्वभाव को उनके ही एक शेर से आप बेहतर समझा लेगें-

आजाद रौ हॅूं और मेरा मसलक है सुलहे-कुल
हरगिज कभी किसी से अदावत नहीं मुझे

मिर्जा मन से तो धनी थे ही उनका बाहरी व्यक्तित्व भी कम आकर्षक नहीं था। ईरानी चेहरा, गोरा-लम्बा कद, सुडौल एकहरा बदन, ऊँची नाक, कपोल की हड्डी उभरी हुई, चौड़ा माथा, घनी उठी पलकों के बीच झाँकते दीर्घ नयन, संसार की कहानी सुनने को उत्सुक लम्बे कान, अपनी सुनाने को उत्सुक, मानों बोल ही पडेंगे। सुन्दर गौर वर्ण, समस्त जिन्दादिली के साथ जीवित, इसी दुनिया के आदमी, इंसान और इंसान के गुण-दोषों से लगाये-यह थे ’मिर्जा’ व ’मीरजा ग़ालिब’। रईसजादे थे और जन्म भर अपने को वैसा ही समझते रहे। वस्त्र-विन्यास का खासा ध्यान रखते थे। जब घर पर होते, प्रायः पाजामा और अंगरखा पहिनते थे। सिर पर कामदानी की हुई मलमल की गोल टोपी लगाते थे। जाड़ों में गर्म कपड़े का कलीदार पाजामा और मिर्जई। बाहर जाते तो अक्सर चूड़ीदार या तंग मोहरी का पाजामा, कुर्ता, सदरी या चपकन और ऊपर क़ीमती लबादा होता था। आर्थिक परेशानी के दौर में भी उन्होंने अपना रईसी अंदाज न छोड़ा। जौक़ के बाद ग़ालिब ही थे जिन्हें बहादुरशाह ’जफर’ के दरबारी होने के कारण अंग्रेज हुकूमत से पेंशन मिला करती थी।

उर्दू गद्य-लेखन की नींव रखने के कारण उन्हें वर्तमान उर्दू गद्य का जन्मदाता भी कहा जाता है। इनकी रचनाओं में देश की तत्कालीन सामाजिक, राजनीतिक तथा आर्थिक स्थिति का वर्णन हुआ है। ग़ालिब अपनी फ़ारसी में लिखी रचनाओं को अधिक बेहतर मानते थे। एक फारसी शेर में वे कहते है कि मेरी उर्दू रचनाएं बेकार है, देखना है तो फ़ारसी देखो। लेकिन सच तो ये है कि गद्य हो या पद्य, उनकी ख्याति उर्दू में लिखी रचनाओं के कारण ही हुई। ग़ालिब उन बिरले कवियों में रहे जिनके आलोचको की भरमार थी, फिर भी उनकी योग्यता और विद्वत्ता की धाक के आगे बड़े-बड़े नतमस्तक थे। उनके शिष्यों में उस समय के नवाब, सामंत, सरकारी पदाधिकारी सभी शामिल थे। कुछ दिनों के लिए वे बहादुरशाह ’जफर’ के भी वे उस्ताद भी रहे। उनके अतिरिक्त बंगाल में मैसूर के राजवंश के सदस्य राजकुमार बशीरउद्दीन और खान बहादुर अब्दुल गफूर ’नस्साख’, सूरत में मीर गुलाम बाबा खाँ, लोहारू के सुपुत्र मिर्जा अलाउद्दीन और उनके भाई नवाब जियाउद्दीन मिर्जा के शिष्य थे। बड़ौदा-नरेश नवाब इब्राहीम अली खाँ अपनी गजलें संशोधन के लिए उनके पास भेजते थे। अलवर के महाराजा मिर्जा के बड़े प्रशंसकों में से एक थे। उर्दू भाषा और साहित्य के संदर्भ से ज्ञात होता है कि मिर्जा के शिष्यों में सबसे पहले ख्वाजा अलताफ़ हुसैन ’हाली’ का नाम आता है, जिन्होंने ग़ालिब की सहमति से ही उनसे अलग रास्ता अख्तियार किया और उर्दू काव्य में अमर हो गये।

ग़ालिब के निधन के पश्चात ग़ालिब के दो समकालीनों ने उनकी जीवनियाँ लिखी। मोहम्मद अल्ताफ हुसैन ’हाली’ ने ’यादगारे-ए-ग़ालिब’ (1897) और मिर्जा मोज ’हयात-ए-गालिब’ (1899)। ये जीवनियाँ हमें उनके जीवन और समय को समझने की अंतदृष्टि प्रदान करती है। ग़ालिब के उर्दू दीवान का पहला संस्करण 1841 में प्रकाशित हुआ। ’मयखाना-ए-आरजू’ शीर्षक के अंतर्गत फ़ारसी लेखन का संग्रह 1895 में प्रकाशित हुआ। उनकी फ़ारसी डायरी ’दस्तम्बू’ (1858) सिपाही विद्रोह और दिल्ली पर इसके प्रभाव का प्रामाणिक दस्तावेज है। 1868 में ’कुल्लियत-ए-नत्र-ए-फ़ारसी-ए ग़ालिब’ नाम से उनका फ़ारसी लेखन का एक और संग्रह प्रकाशित हुआ जिसमें पत्र, प्राक्कथन, टिप्पणियाँ आदि थे। एक गद्य लेखक के रूप में उनकी ख़्याति उनके पत्रों के कारण अधिक है, जो ’उद्-ए-हिंदी’ (1868) और ’उर्दू-ए-मुअल्ला’ (1869) नाम के दो संकलनों में प्रकाशित है। ग़ालिब से पहले उर्दू शायरी गुल-बुलबुल और हुस्न-औ-इश्क की चिकनी-चुपड़ी बातें हुआ करती थी। उन्हें वे ’गजल की तंग गली’ कहा करते थे। ग़ालिब के पुख्ता शेर उस गली से नहीं निकल सकते थे। यह एक कम जानी बात है कि गालिब का बस एक ही ’ब्लैक एंड व्हाइट’ फोटो है, जिसके आधार पर अनेक कलाकारों ने उनके चित्र बनाए हैं। गालिब के दौर में ’पिन-होल’ कैमरा नया-नया आया था और उस समय इस कैमरे से अवध के नवाब ’वाजिद अली शाह’ और ’ग़ालिब’ के दोस्त ’बहादुर शाह जफर’ के फोटो भी लिए गए थे। ग़ालिब का पहला और एक तरह से अंतिम फोटो दिल्ली के फोटोग्राफर रहमत अली ने उतारा था।

ग़ालिब अपनी उर्दू और फ़ारसी शायरी के लिए तो विख्यात हैं ही, साथ ही अपने मित्रों तथा आत्मीयों को लिखे अपने सैकड़ों पत्रों के लिए भी जाने जाते हैं जो अनौपचारिकता और फक्कड़पन की एक अलग ही दुनिया की रचना करते हैं। ग़ालिब ने अपने पत्रों में उस समय प्रचलित सामंतवादी युग की दिखावटी विनम्रता का त्याग करते हुए एक ऐसी सरल, दोस्ताना और संवाद की सुखद अनुभूति जगाने वाली शैली को अपनाया जो उर्दू गद्य में अब तक उपलब्ध नहीं। बाद के साहित्यकारों को गालिब की इस नयी शैली ने बहुत प्रभावित किया। ग़ालिब के पत्र भी उनकी शायरी की ही भांति खूबसूरत और लोकप्रिय थे और वे किसी ख़जाने की भांति साहित्य की दुनिया में आज भी बहुमूल्य माने जाते हैं। कुछेक पत्र देखें-

यूसुफ़ मिर्ज़ा को उनके पिता के इंतकाल पर लिखा गया पत्र
“यूसुफ़ मिर्ज़ा! त्ुझको क्योंकर लिखूं कि तेरा बाप मर गया और अगर लिखॅू तो फिर आगे क्या लिखूॅं कि अब क्या करो मगर सब्र। यह एक शेवए फ़रसूदा अब्नाए-रोजगार का है। ताज़ियत यॅूं ही किया करते है और यही कहा करते है कि सब्र किया करो। भला एक का कलेजा कट गया और लोग उसे कहते है कि तू न तड़प। भला क्यों न तड़पेगा? सलाह इसमें नहीं बतायी जाती, दुआ को दख़्ल नहीं, दवा का लगाव नहीं। पहले बेटा मरा फिर बाप। मुझसे कोई पूछे कि बे-सरो-पा किसे कहते है तो मैं कहूंगा यूसुफ़ मिर्ज़ा को। तुमहारी दादी लिखती है कि रिहाई का हुक्म हो चुका था। यह बात है तो जवां मर्द एक बार दोनों क़ैदों से छूट गया, न कै़दे-हयात रही न कै़दे-फ़िरंग।“

नवाब अलाउद्दीन खॉं के नाम लिखा पत्र
“ मियॉं ! बड़ी मुसीबत में हूं। महलसरा की दीवारें गिर गयीं, पाखना ढह गया, छतें टपक रही हैं। तुम्हारी फूफी कहती है हाय! दबी, हाय! मरी। दीवान-खाने का हाल महलसरा से बदतर है। मैं मरने से नहीं डरता, लेकिन फु़कदाने-राहत से घबरा गया हूॅं। अब्र दो घेटे बरसे तो छत आठ घंटे बरसती है। अगर कोई चाहे कि मरम्मत करे तो क्यों कर करे। मेंह खुले हो तो सब कुछ हो और फिर अस्नाए-मरम्मत में बैठा किस तरह रहूं। अगर तुमसे हो सके तो बरसात तक भाई से मुझको वह हवेली जिसमें मीर हसन रहते थे, अपनी फूफी को और कोठी में से वह बारानख़ा मए-दालानें-जे़रों जो इलाही बख़्श मरहूम का मसक़न था, मेरे रहने को दिलवा दो। बरसात गुज़र जायेगी, मरम्मत हो जायेगी। फिर साहब और मेम और बाबा लोग अपने क़दीम मसक़न में आ रहेंगे। तुम्हारे वालिद के जहां मुझ पर बहुत अहसान है, एक यह मुरव्व्त का अहसान मेरे पायाने-उम्र में और सही। “
लफ़्ज़ों की ऐसी मिठास, चुहल और नज़ाकत मिर्जा के पास ही हो सकती थी और उनकी विनोदप्रियता....उसके चर्चे भी खूब थे। ’हाली’ ने अपने खास अंदाज में ग़ालिब के इस पक्ष का बड़ा सुन्दर वर्णन किया है, जिसकी बानगी आपको निम्नलिखित प्रसंगों के माध्यम से भलीभांति हो जायेगी।

सुना है कि गदर के बाद जब मिर्जा ग़ालिब बर्न के सामने गए तो उस वक्त कुलाह-ए-पपाक (ऊंची तुर्की टोपी) उनके सर पर थी। उन्होंने मिर्जा को देख कर पूछा,
“वैल, तुम मुसलमान?”
मिर्जा ने कहा, “आधा”.
कर्नल ने कहा, “इस का क्या मतलब?”
मिर्जा ने कहा, ”शराब पीता हूँ, सूअर नहीं खाता.”
कर्नल यह सुन कर हंसाने लगा। फिर मिर्जा ने वजीरे हिन्द की चिट्ठी दिखाई जो कि मलिका-ए-मुअज्ज़मा के क़सीदे के जवाब में आई थी। कर्नल ने कहा, “तुम सरकार की फतह के बाद पहाड़ी पर क्यों न हाजिर हुए?”
मिर्जा ने कहा, ”मैं चार कहारों का अफसर था, वह चारों मुझे छोड़ कर भाग गए. मैं क्योंकर हाजिर होता?”
कर्नल ने निहायत मेहरबानी से मिर्जा और उनके तमाम साथियों को रुखसत कर दिया।
.....................
गदर के बाद जब कि मिर्जा ग़ालिब की पेंशन बंद थी और दरबार में शरीक होने की इजाजत न हुई थी, पंडित मोती लाल मिर्जा साहब से मिलने आये। कुछ पेंशन का जिक्र चला। मिर्जा साहब ने कहा, ”तमाम उम्र में एक दिन शराब न पी हो तो क़ाफिर और एक दफ़ा नमाज पढ़ी हो तो गुनाहगार। फिर नहीं जानता कि सरकार ने किस तरह मुझे बागी मुसलामानों में शुमार किया?”

ग़ालिब यकीनन बेहद प्रतिभाशाली थे और इस कारण वह स्व-निर्मित शख्स बने। लेकिन उन्हें ’उस्ताद’ के रूप में उन्हें कोई पदवी नहीं मिली, क्योंकि वह उस स्तर तक पढ़े नहीं थे। लेकिन जिस भी मुशायरे में गये, अपने कलाम के साथ जबर्दस्त मौजूदगी का अहसास कराते थे। इन्हें उच्च कोटि के शायर होने का इंतरख्वाब हासिल था। यद्यपि मिर्जा गालिब ने प्यार, खूबसूरती और खुशियों को ही तकसीम करने का प्रयास किया। लेकिन उन्होंने सबसे बेहतरीन कार्यों को तब लिखा था, जब वह सबसे ज्यादा अवसाद में डूबे हुए थे।

सन् 1868 में 72 वर्ष की उम्र में इस महान का इंतकाल हुआ। ऐसा माना जाता है कि मृत्यु के मुहाने पर पहुंच कर वह शराब से ज्यादा ही दोस्ती कर बैठे। आर्थिक दुश्वारियों ने भी उन्हें घेर लिया था और वृद्ध अवस्था के भी अपने तक़ाजे थे। बहरहाल, ग़ालिब दुनिया को जो दे गये, वह कभी न भूलने वाली उनकी नज़्म उनके शेर है। ग़ालिब जैसे महान शायर तक किसी का पहुंचना नाममुकिन है। और ये हम नहीं कहते, खुद ग़ालिब ने बहुत पहले ही इसे लिखकर अमर कर दिया-

हैं और भी दुनिया में सुखन-वर बहुत अच्छे
कहते हैं कि ’गालिब’ का है अंदाज-ए-बयाँ और

Wednesday, May 30, 2018

एक अदद लड़के की चाह में ‘अवांछनीय’ कोटे के अधिकार की जंग जारी है

एक प्रतिष्ठित दैनिक समाचार पत्र में छपे मनीषा सिंह का लेख पढ़ रही थी कि भारतीय समाज में एक अदद लड़के की चाह में लड़कियां पैदा की जाती हैं और फिर उन्हें ‘अवांछनीय’ कोटे में डाल दिया जाता है. उन्होंने एक सवें का जिक्र करते हुए कहा कि वर्ष 2017-18 के आर्थिक सर्वे ने इस अंतर को बाकायदा दर्ज करते हुए बताया है कि दश में 2.1 करोड़ बेटियां ऐसी हैं, जिनके पैदा होने की उम्मीद उनके परिवारों ने नहीं की थी.
इस सर्वेक्षण में अवांछित बेटियों के साथ 6.3 करोड़ गायब बेटियों का आंकड़ा भी दिया गया है. यानी गर्भ में बेटी की सूचना मिलने पर देष में अब तक 6.3 करोड़ भ्रूण हत्याएं कराई गई हैं. पिछले कुछ दशकों में निकाले गए औसत के मुताबिक हर साल करीब 20 लाख ऐसी बेटियां गायब हो जाती हैं, जिनके मां-बाप उन्हें दुनिया में नहीं लाना चाहते. इन गायब या अनचाही बेटियों का असर देश के सामाजिक परिदृश्य पर इस तरह पड़ा कि उत्पादन क्षेत्र में जुड़े आर्थिक विकास में लैंगिक अनुपात बिगड़ गया है और महिला सशक्तीकरण का मुद्दा हाशिये पर चला गया है.
इन अंवाछित बेटियों की बात करते हुए मैं जनसत्ता की एक खबर का जिक्र करना चाहूंगी जिससे अपको समाज की कुत्सित सोच देखने को मिलेगी. मंदसौर जिला मुख्यालय से 35 किलोमीटर दूर बिल्लौद गांव के दो परिवार वालों को मन्नतें मांगने के बाजूद लड़का न हुआ तो उन्होंने अपनी आखिरी बेटी का नाम ही ’अनचाही’ रख दिया. इनके जन्म प्रमाणपत्र से लेकर सभी तरह के परिचय पत्र पर इनका नाम अनचाही ही लिखा है. मां-बाप का तर्क सुनेगे तो हैरानी होगी. कहते है चार लड़कियों के बाद जब फिर लड़की हुई तो सोचा ये नाम रखने से अगला लड़का ही होगा, इसलिए रख दिया. पर उसके बाद भी लड़की ही हुई जो डेढ़ साल बाद मर गई. दूसरे ने 2 लड़कियां होने के बाद मायूस होकर तीसरी का नाम अनचाही घोषित कर दिया.
इन दो अनचाही लड़कियों में से अब एक बीएससी प्रथम वर्ष की छात्रा है तो दूसरी अभी छठी कक्षा में है. सोचिए जरा उस लड़की की क्या स्थिति होती होगी जब उसे अपने नाम के अवांछित होने का अहसास होता है. ये हाल मध्यप्रदेश का है जहां शिवराज सरकार ने लाडली लक्ष्मी योजना चला रखी है. अफसोस की बात है कि सरकारों के तमाम प्रयासों के बावजूद सोच बदलने का नाम नहीं ले रही जबकि आज लड़कियां लडकों से बेहतर काम कर रही. और तो और मां-बाप का सहारा बन रही.
मनीषा सिंह आगे लिखती है कि देष के कार्य बल में महिलाओं की जो हिस्सेदारी 2005-06 में 36 फीसदी थी, वह 2015-16 में घटकर 24 प्रतिषत रह गई है. ये हालात तब हैं जब देष में ‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’ और सुकन्या समृद्धि जैसी योजनाओं के साथ सरकारी और निजी क्षेत्र में कार्य करने वाली महिलाओं को मातृत्व के लिए 26 सप्ताह का अवकाश देने और 50 से अधिक कर्मचारियों वाली फर्मो में क्रेच की सुविधा अनिवार्य की गयी है.
साफ है कि सरकारी स्तर पर महिला सशक्तीकरण की योजनाओं का तभी कुछ हासिल है, जब समाज के स्तर पर लड़कियों को अनचाहा मानने की प्रवृत्ति थमे. उन्होंने ये बात भी सही कही कि हमारे समाज में अब भी बेटियों को बोझ माना जाता है. यहां आज भी लड़के-लड़की का भेद जारी है और इस कारण गर्भ से ही बेटियों के साथ उपेक्षा व हिकारत षुरू हो जाती है. इस भेदभाव का ही परिणाम है कि 1991 में जहां राष्ट्रीय स्तर पर जन्में लड़कों के मुकाबले लड़कियों की संख्या 42 लाख कम थी, वह अंतर 2001 में बढ़कर 71 लाख पहुंच गया था. बीते करीब ड़ेढ दषक में आंकड़ों की यह खाई और गहरी हो चुकी है.
लैंगिक भेदभाव खत्म करने की दो षर्ते हैं. पहली यह कि महिलाओं को समुचित शिक्षा मिले और दूसरी उनका राजनीतिक प्रतिनिधित्व बढ़े. राजनीति में तो स्त्रियों का दखल बढ़ा है, पर महिला आरक्षण विधेयक अब भी जिस तरह लोकसभा में अटका है, उससे संदेह होता है कि हमारा समाज महिलाओं को बराबरी पर लाने का इच्छुक नहीं है. महिलाओं का राजनीतिक सशक्तिकरण अहम है, पर स्त्री शिक्षा का समुचित प्रबंध भी जरूरी है.
खाड़ी और उत्तर अफ्रीकी देशों में लंबे समय तक लैंगिक असमानता कायम रही, पर अब खाड़ी देशों ने महिलाओं को शिक्षा दिलाने में निवेश करना शुरू कर दिया है. नतीजतन संयुक्त अरब अमीरात में विश्वविद्यालय स्तर की उच्च शिक्षा में महिलाओं ने पुरूषों को पीछे छोड़ दिया है. आगे चलकर इसका असर यह होगा कि महिलाएं अच्छे रोजगारों पर अपना आधिपत्य जमाएंगी.
भारत में भी हालात बदले जा सकते हैं, पर इसकी पहल समाज के स्तर पर करनी होगी. समाज को अपनी यह मानसिकता बदलनी होगी कि जो स्त्री घर से बाहर काम करने निकली है, उसका उद्देश्य घर और समाज में पुरूषों को नीचा दिखाना नहीं, घर-समाज में बराबरी का योगदान देना है. इसी तरह घरेलू कामकाज को कुशलता से निपटाने वाली महिलाओं के आर्थिक महत्व को समझने और श्रेय देने की जरूरत है. तभी लैंगिक असमानता की हालत में सुधार आ सकता है.

Friday, May 25, 2018

जापान में कंस्ट्रक्शन उद्योग में महिला-विरोधी माहौल आज भी नहीं बदला

न्यूयार्क टाइम्स में मारी साइतो का लेख पढ़ रही थी. उससे एक बात तो साफ समझ आई कि पुरूष-महिला की बराबरी के अधिकार की समस्या भारत की ही नहीं, बल्कि हर देश की है. भारत में भी एक समय था महिलाओं को शिक्षा से वंचित रखा जाता था, मुख्यधारा से नही जुड़ने दिया जाता था और न ही कोई रोजगार करने दिया जाता था, उन्हें सिर्फ घर की चारदीवारी में कैद करके रखकर कभी मंगलसूत्र के बन्धन में तो कहीं ममता के मोह में बांधकर, कहीं पत्नी के रूप में तो कहीं मां के रूप में कैद रखा गया. यह सच है कि अब हालात पहले जैसे नही हैं महिलाएं, शिक्षित होने लगीं हैं, हर क्षेत्र में आगे बढने लगी हैं.
भारतीय संविधान ने भी महिला व पुरुष को समानता का अधिकार दिया है, साथ ही हमारी सरकारों ने भी महिलाओं के लिए अनेक योजनाएं चालू की हैं, इसके बावजूद समाज में महिला-पुरुष को लेकर अनेक तरह के भेद-भाव बना दिए गये हैं और हर जगह महिलाओं को कमतर आंकने की कोशिश की गई है. जापान की स्थिति पढ़कर तो मुझे फिर भी भारत में औरतों की हालत इतनी बुरी भी नहीं लगती.
मारी साइतो के लेख के अनुसार जापान में नौकरी करने वाली महिलाओं को महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों से दूर रखा जाता है और उन्हें वेतन व मजदूरी भी तुलनात्मक रूप से कम दी जाती है. उसमें भी कंस्ट्रक्शन उद्योग का माहौल महिला-विरोधी होने के लिए कुख्यात है.
कार्यस्थलों मे महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के लिए प्रधानमंत्री शिंजो आबे ने ‘वुमैनोमिक्स’ नाम से एक पहल की है. इसके तहत महिला कर्मचारियों को महत्व देने और आगे बढ़ाने वाली कंपनियों को प्रोत्साहित किया जाता है. इसका नतीजा ये है कि जापान में महिला कर्मचारियों की जितनी संख्या अभी है, उतनी पहले कभी नहीं थी. यही नहीं, इस देष के कार्यबल में महिला कामगारों के शामिल होने की दर अमेरिका से अधिक है. लेकिन कंस्ट्रक्शन क्षेत्र में महिलाओं की कमी पहले जैसी ही है.
एक छोटी कंस्ट्रक्शन कंपनी जैमकेन की मुख्य कार्यकारी जुनको कोमोरिता कहती है, जापान में अब भी ऐसे बहुत लोग हैं, जो कार्यस्थल में किसी महिला से निर्देश लेना पसंद नहीं करते.
साइतो बताती है इंजीनियर की नौकरी में निशिहाको इसका सबसे ताजा उदाहरण है.सुपरवाइजर की अपनी नौकरी के पहले दिन जापान की एक कंस्ट्रक्शन साइट पर माहो निशिहोका का अनुभव बहुत अच्छा नहीं था. जिन लोगां के काम पर उसे नजर रखनी थी, उन्होंने उसके निर्देषों की अनदेखी तो की है, उससे बात करने तक से इन्कार कर दिया था. उस साइट पर वह अकेली प्रषिक्षित इंजीनियर थी, इसके बावजूद एक आदमी ने उसे कंकरीट के एक पुल का निरीक्षण करने से न सिर्फ रोक दिया, बल्कि निशिहाको पर चिल्लाते हुए कहा था, औरत होकर तुम सुपरवाइजर का काम क्यों कर रही हो? निशिहाको का डरना स्वाभाविक था. नौकरी करते उन्हें बीस साल बीत चुके हैं, लेकिन माहौल में आज भी कोई फर्क नहीं आया है.
मारी साइतो अपने लेख में आगे कहती है कि यह उस देष का हाल है, जहां जन्म दर कम होने और प्रवासी कामगारों से जुड़े कानून के सख्त होने के कारण श्रमिकों की भारी कमी है. इसका खामियाजा सिर्फ कंस्ट्रक्शन उद्योग को नहीं, अर्थव्यवस्था को भी भुगतना पड़ रहा है. हालांकि निर्माण उद्योग और सरकार, दोनों अब महिलाओं को रोजगार देने के मामले में प्रयत्नषील है. मसलन, अनेक कंस्ट्रक्शन कंपनियां महिला कामगारों के लिए पोर्टेबल शौचालय और ड्रेसिंग रूम उपलब्ध करा रही हैं लेकिन पिंक टाॅयलेट्स की व्यवस्था देख पुरूष श्रमिक बिफर जाते हैं.
निशिहोका कहती हैं कि सरकार को ऐसा माहौल बनाना चाहिए, जिससे श्रमिकों के लिए काम करना आसान हो. युहो नाकामुरा एक सुपरवाइजर हैं, जिन्हें व्यस्त महीनों में आधी रात तक रूकना पड़ता है. दरअसल निर्माण क्षेत्र में महिलाओं के न आने की एक बड़ी वजह काम की लंबी अवधि भी है. एक तो उन्हें देर शाम तक रोके रखा जाता है, उस पर कई बार उन्हें सप्ताहांत में भी बुला लिया जाता है.

Wednesday, February 21, 2018

धर्म का मक़सद फ़क़त शोलानवाई नहीं हो सकता

एक कार्यक्रम के दौरान एक व्यक्ति ने एक पंडित से प्रश्न किया कि आप सबसे अच्छा धर्म किसे मानते है, हिंदू धर्म या इस्लाम। उन पंडित जी का जबाव था जो धर्म यह प्रमाणित करने की क्षमता रखता हो कि वह केवल मानवता के लिए प्रकाश को सृजित करने के लिए है और जो मानव के जीवन को सौभाग्य भी प्रदान करता हो। यकीनन सबसे अच्छा धर्म वह है जो इंसान को इंसान से प्रेम करना सिखाये। जहां तक हिन्दू धर्म का सवाल है जो वह दुनिया का सबसे पुराना धर्म माना गया है। जिसके पास प्राचीन ग्रन्थ ज्ञान का अथक भंडार हैं और जिसके किसी भी ग्रंथ इंसान को इंसान के खिलाफ करना नहीं सिखाया गया।

पिछले दिनों एक वीडियो सोशल मीडिया वेबसाइट यूट्यूब पर डाली गई है, जिसमें एक मुस्लिम शख्स लोगों को वेद और श्रीमद्भगवत् गीता के माध्यम से इंसानियत का संदेश देता दिख रहा है। यह शख्स इस वीडियो में बताता है कि किस तरह भगवान और अल्लाह एक ही हैं। ये तो इंसान हैं जो आपस में भेदभाव करते हैं। भगवत् गीता में पहला संदेश वाहदत-ए-खुद और दूसरा संदेश वाहदत-ए-इंसानियत का दिया गया है। वाहदत-ए-खुद का मतलब ईश्वर एक है और वाहदत-ए-इंसानियत मतलब सभी इंसान एक साथ हैं। उदाहरण पेश करते हुए मुस्लिम शख्स ने कहा कि जब आप सुबह के वक्त टहलने निकलते हैं और किसी हिन्दू भाई से पूछते हैं कि क्या हाल-चाल हैं, तो जवाब में निश्चित तौर पर वह कहेगा कि ऊपर वाले की दया है। वहीं अगर किसी मुसलमान भाई से पूछ लें कि आपके क्या हाल हैं? तो उनका जवाब होगा ऊपर वाले की मेहरबानी। इससे पता चलता है कि दोनों के यहां ऊपर वाला एक ही है। जितनी भी गड़बड़ है वह तो नीचे वालों में है। इस शख्स ने वेदों में लिखे एक श्लोक का भी उच्चारण किया, जोकि इस प्रकार है,
अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम्
उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्

अर्थात जिन लोगों का सोच छोटी होती है वही अपनों और परायों की बात करते हैं। लेकिन जिन लोगों का दिल और दिमाग ऊंचा होता है वह इस तरह रहते हैं मानो पूरा संसार ही उनका परिवार हो। इस वीडियो को यूट्यूब पेज प्दबतमकपइसम प्दकपंष्े ने पोस्ट किया है।
जब लोग कट्टरवाद के खिलाफ लड़ते हैं तो आपको नजर आता है कि एक कट्टरवादी दूसरे कट्टरवादी को समाज का मुजरिम बना रहा है। वह कट्टरवाद से कहीं ज्यादा दूसरे धर्म पर आरोप-प्रत्यारोप लगाने में अपनी उर्जा का क्षरण कर रहा है। और इन्हें आपस में लड़ता देख सभी धर्मो का इंसान यह सोचने को मजबूर हो जाता है कि यह कौन सा नया धर्म है जो समझ से परे है और जो दूसरे धर्म की खिलाफत को उकसा रहा है। जहां अपने धर्म को सही बताने के लिये दूसरों पर जुल्म किये जाते है, इल्जाम लगाये जाते है, झूठ बोले जाते है, साजिश की जाती है। नफरत से भरी धर्म की इस नई परिभाषा में अंधविश्वासी आदमी बदले की भावना से भर जाता है। यहीं से आरंभ होता है इंसानों को बाँटने का काम। हकीकत में यह सारा खेल सत्ता के लालचियों का रचा हुआ है, जिन्होंने धर्म की नयी परिभाषा के सहारे आदमी को आदमी से अलग कर दिया। ऐसे धर्म की भड़काऊ भाषा ने जज्बाती या अज्ञानी इंसान को दूसरे धर्म के इंसानों का दुश्मन बना दिया। बहुत से सांप्रदायिक दंगो में गंदी राजनीति करने वाले पार्टियों का ही काम होता है जो छदम वेश में ये काम करती है। और प्रकट में हर धर्म की हिफाजत किये जाने का ढोल बजा लाती है।
किसी से यह सवाल करना की क्या आप सच्चे हिन्दू है? क्या आप सच्चे मुसलमान या ईसाई या बौद्ध हैं उचित सवाल नहीं है? क्योंकि जो पाक है साफ है उसे किसी के धर्म से कोई लेना देना नहीं। वह तो केवल इंसानी धर्म को समझता है। उसके लिये उसका धर्म सिर्फ और सिर्फ अपने दीन की तलाश और उसको पाने से है। लेकिन दिलों में नफरत भरे हुए इंसान एक दूसरे पर ही नहीं, उसके धर्म पर भी कीचड़ उछालने को आज अपना धर्म मान बैठा है। धर्म कहता है इंसान की जान की कीमत मंदिर और मस्जिद से अधिक है। इंसान की जान गयी तो वह वापस नहीं आएगा जबकि मस्जिद और मंदिर टूटे तो फिर बन जाएंगे। साफ बात तो यह है कि जो भी हिन्दू और मुसलमान धर्म को समझता है ,उसके पवित्र उददेश्य को जानता है वह इसके नाम पर हो रही राजनीति को भी समझता है। और ऐसे इंसानों की किसी भी मजहब में कोई कमी नहीं। ऐसे ही सच्चे इंसानों की बदौलत धर्म टिका है, इंसानियत जिंदा है।
आवश्यकता इस बात की है कि इंसान अपने धर्म की तलाश करे और उसके बताये रास्ते पर जितना चल सकता है चलने की कोशिश करे। किसी भी धर्म की राजनीतिक फायदे के लिए बनाई गयी परिभाषा से अलग हट के सोचे, तब उसके आगे यह हकीकत खुल के सामने आएगी कि किसी भी धर्म का सन्देश इंसानियत के खिलाफ नहीं या कि कोई भी धर्म से नफरत के पैरोकार नहीं है। बल्कि किसी भी धर्म का एक ही संदेश है और वह यह कि अपने भीतर इंसानियत को जिंदा रखना और हर जीव से प्रेम करनां
लोकसभा में सिख गुरूद्वारा संशोधन विधेयक 2016 पर हुई चर्चा का जवाब देते हुए केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा था कि हर धर्म के लोगों को अपने धर्म को चलाने की स्वतंत्रता है। उन्होंने कहा कि किसी धर्म विशेष के लोग ही यह फैसला ले सकते हैं कि उन्हें अपने धर्म को कैसे चलाना है। ये सही है कि हर धर्म के लोगों को अपने मजहब को चलाने की पूर्ण आजादी मिलनी ही चाहिये लेकिन दूसरे के धर्म पर टीका टिप्पणी या उसको नीचा दिखाने की इजाजत कतई नहीं हनेी चाहिये। साथ ही इस बात की ताक़ीद होनी चाहिए कि कोई भी धर्म इंसानियत से बड़ा नहीं हो सकता।
साहिर लुधियानवी ने क्या खूब कहा है -

मुझे इंसानियत का दर्द भी बख़शा है कुदरत ने,
मेरा मक़सद फ़क़त शोलानवाई हो नहीं सकता।

शोलानवाई (उत्तेजित करना)

Wednesday, January 24, 2018

शिक्षा का पूर्ण ’डोज’ किसी ’गर्भनिरोधक’ से कम नहीं

’राष्ट्रीय स्वास्थ्य सर्वे’ की एक हालिया रिर्पोट का जिक्र करना चाहती हूं, जिसके अनुसार बेटियां जितना पढं़ेगीं,जनसंख्या का बोझ देश पर उतना कम होगा। 2015-16 के विश्लेषण पर आधारित ’इंडिया स्पेंड’ की रिर्पोट के मुताबिक 12 साल या उससे ज्यादा पढ़ने वाली लड़कियों की, पहले बच्चे को जन्म देते समय, उम्र 24.7 होती है। जबकि कभी स्कूल न जाने वाली लड़कियां औसतन 20 साल की उम्र में मां बन जाती हैं। वहीं कोई लड़की 12 साल या उससे ज्यादा पढ़ती है तो वह औसतन 2.01 बच्चों को जन्म देती हैं। जबकि कभी स्कूल न जाने वाली लड़कियां औसतन 3.82 बच्चों की मां बनती है। एक अन्य रिर्पोट के मुताबिक देश के 33.6 फीसदी बच्चे किशोर लड़कियों की संतान होते हैं। अगर इन लड़कियों की उम्र बढ़ाई जाए तो 2050 तक देश की संभावित 1.7 अरब की आबादी में एक चैथाई की कमी आ सकती है। इस बारे में मैं ’पापुलेशन फाउंडेशन आॅफ इंडिया की निदेशक पूनम मुतरेजा के कथन से, कि शिक्षा से बेहतर कोई गर्भनिरोधक नहीं, पूर्णतया सहमत हूं। दुनिया के कई देशों ने महिलाओं को शिक्षित करके ही अपने देश की जनसंख्या को नियंत्रित किया है।

ये तो रही एक सर्वे की रिर्पोट, जो एक सपने को हकीकत का जामा पहनाने की कोशिश कर रही है। इससे इतर एक कड़वी सच्चाई है जो ’सैम्पल रजिस्ट्रेशन सिस्टम बेसलाइन सर्वे’ की रिर्पोट में है। इसकी 2014 की रिपोर्ट के अनुसार 15 से 17 साल की लगभग 16 प्रतिशत लड़कियां स्कूल बीच में ही छोड़ देती हैं। ’मानव विकास मंत्रालय’ ने भी 2013 में एक रिर्पोट जारी की थी जिसके अनुसार प्रति वर्ष पूरे देश में 5वीं तक आते-आते करीब 23 लाख छात्र-छात्राएं स्कूल छोड़ देते हैं। हो सकता है इन रिर्पोट में सुधार के नजरिये से, तब से कुछ फर्क आया हो। लेकिन ये फर्क आज भी बहुत बड़ा अंतर नहीं दिखायेगा। क्योंकि स्कूल छोड़ने के कारणों में फर्क नहीं आया। ये वजहें दकियानूसी सोच का होना या बेटी-बेटा में अंतर समझना, विद्यालयों का दूर होना, लड़कियों के लिए स्कूलों में शौचालयों की सुविधा का ना होना या फिर असुरक्षा का भय... या कुछ भी हो सकता है, जो वैसे का वैसा ही है।

ये बड़े ही शर्म की बात है कि देश के 61 लाख बच्चे आज भी शिक्षा की पहुंच से दूर है। इसमें उत्तर प्रदेश की स्थिति भी बहुत बेहतर नहीं है। तमाम सरकारी प्रयासों के बावजूद अभी 16 लाख बच्चे शिक्षा के कोसों दूर है। यह आंकड़े यूनिसेफ की वार्षिक रिपोर्ट द स्टेट ऑफ द वल्र्डस चिल्ड्रेन के हैं, जिसकी रिपोर्ट के अनुसार स्कूल जाने वाले बच्चों में भी 59 प्रतिशत बच्चे ऐसे हैं जो ठीक से पढ़ भी नहीं पाते हैं। जिस देश में  लडकियों की शिक्षा और स्वास्थ्य की बेहतरी से कहीं ज्यादा जोर उसकी घरेलू शिक्षा-दीक्षा और शादी-ब्याह पर दिया जाता हो, वहां देश के बेहतर भविष्य की उम्मीद रखना बेकार है। भारत में 22 लाख से भी ज्यादा लड़कियों की शादी कम उम्र में कर दी जाती है। और इस मामले में केरल को छोड़कर, जहां की साक्षरता दर 100 प्रतिशत है, बाकी राज्य अपवाद है।

आपको आश्चर्य होगा ये जानकर कि आर्थिक विकास के अपने मॉडल के लिए विश्व भर में सुर्खियाँ बटोरने वाला राज्य, गुजरात, लडकियों की शिक्षा के मामले में देश के सबसे पिछड़े राज्यों में से एक है। गुजरात में 15 से 17 साल की 26.6 प्रतिशत लड़कियां किसी न किसी कारण से स्कूल छोड़ देती हैं। मतलब राज्य में 26.6 प्रतिशत लड़कियां 9वीं और 10वीं कक्षा तक भी नहीं पहुंच पाती हैं। ’सैम्पल रजिस्ट्रेशन सिस्टम बेसलाइन सर्वे’ के सर्वे में शामिल 21 राज्यों में गुजरात लड़कियों की शिक्षा के मामले में 20 वें स्थान पर है। इस सर्वे के अनुसार 15 से 17 साल की स्कूल जाने वाली लड़कियों का राष्ट्रीय औसत छतीसगढ़ में 90.1 प्रतिशत, असम में 84.8 प्रतिशत, बिहार में 83.3 प्रतिशत, झारखंड में 84.1 प्रतिशत, मध्यप्रदेश में 79.2 प्रतिशत, यूपी में 79.4 प्रतिशत और उड़ीसा में 75.3 प्रतिशत है। ये वे लड़कियां है जो हाई स्कूल के पहले ही स्कूल छोड़ देती हैं। अगर 10 से 14 साल की लड़कियों की शिक्षा की छोड़ने की बात करें तो इसमें सबसे निचले पांच राज्यों में उत्तर प्रदेश भी आता है।

कर्नाटक में 30 प्रतिशत से भी अधिक लड़कियों का 18 वर्ष की आयु के पहले विवाह कर दिया जाता है। जबकि वहां की सरकार द्वारा कम उम्र में विवाह न किये जाने को लेकर कई तरह के जागरूक एवं प्रोत्साहित करने वाले कार्यक्रम चलाये जा रहे है। लेकिन आज भी ऐसे कई ढाँचागत सामाजिक कारण है जो सरकार के जागरूक कार्यक्रमों और प्रोत्साहन भरी योजनाओं का मखौल उड़ा रहे है। इनमें से एक कारण स्कूल की भौगोलिक स्थिति का सही न होना, घर के निकट हाईस्कूल का न होना, कई मील पैदल स्कूल जाना आदि है। दूसरा कारण पारंपरिक प्रक्रिया है जो ग्रामीण इलाकों में अधिकांशत नजर आती है। बचपन से ही लड़कियों को, उच्च शिक्षा के लिए तो दूर की बात है, बेसिक ज्ञान देने के लिए ही प्रेरित करना ’बेकार की बात’ है। इसके बजाय उसे शादी के लिए तैयार किया जाता है। लड़की के 14-15 साल के होते ही उसका यौन शोषण का भय, उसकी सुरक्षा का अभाव और शादी कर देने का सामाजिक दबाव आदि भी लड़कियों के स्कूल छुड़वा देने और जल्द शादी कर दिए जाने के अन्य बड़े कारण हैं। गरीब तबकों, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति या अल्पसंख्यक परिवारों की लड़कियां तो इस तरह के जोखिमों से ज्यादा घिरी पायी जाती है। इस तरह के वर्गों के लोगों की शिकायत पर पुलिस का दोस्ताना व्यवहार कैसा होता है, ये हम सब जानते है। फिर ऐसे मामले में अगर किसी रसूखदार का नाम आ गया तो पुलिस पीड़ित के घर झांकने भी नहीं आयेगी। ऐसी ही परिस्थिति से डर कर और सुरक्षा का कोई विकल्प न देखकर माता-पिता अपनी लड़कियों को घर पर ही रखना पसंद करते है या फिर जल्द से जल्द उसका विवाह कर देते हैं। कम उम्र में विवाह, एक के बाद एक बच्चे किसी भी लड़की का स्वास्थ्य और जीवन दोनों तबाह करने के लिए काफी है।

शिक्षा को लेकर सरकार के प्रयासों में भले कमी रही हो लेकिन सरकारी अभियानों से शिक्षा की स्थिति में सुधार आया है. खासतौर पर सर्व शिक्षा अभियान के माध्यम से स्कूल जाने वाले बच्चों की संख्या बढ़ी है। जरूरत बालिका शिक्षा को बढ़ाने और उन्हें उचित वातावरण और सुरक्षा का ’कमिटमेंट’ करने की भी है। हालांकि कई राज्यों ने यह सुनिश्चित करने के लिए प्रभावशाली कदम उठाए हैं कि बच्चे, विशेष रूप से लड़कियाँ, स्कूल जरूर जाए और अधिक से अधिक समय तक अपना पढ़ना जारी रखें। इसी के तहत सरकार आरक्षित वर्ग की छात्राओं के स्कूल ड्राप आउट को कम करने की पहल पर प्रयास कर रही है।  दरअसल केन्द्र सरकार कस्तूरबा गांधी आवासीय बालिका विदयालय को 12वीं तक विस्तार देने की तरफ काम कर रही है। इस मुताल्लिक केन्द्र सरकार ने वित मंत्रालय को बजट सत्र में इस योजना के विस्तार को लेकर फंड मुहैया कराने की मांग की है। सरकार का ये प्रयास निश्चित तौर पर सराहनीय है। अभी तक आठवीं के बाद कक्षा न होने के कारण ड्राप आउट संख्या बढ़ जा रही है। 12वीं कक्षा तक शिक्षा की व्यवस्था हो जाने से इसमें बहुत कमी आएगी। लेकिन सिर्फ 100 बालिकाओं के इस विदयालय के लिए ’नम्बर आॅफ स्टूडेंट’ को बढ़ाने की मांग पर भी सरकार को काम करना होगा। सुरक्षा और शिक्षा की दृष्टि से कस्तूरबा आवासीय विदयालय श्रेष्ठ है। यहां ग्रामीण और गरीब बेटियों के लिए सुरक्षित वातावरण है तो अच्छे आचार-व्यवहार की सीख के साथ, खेलकूद एवं बेहतर शिक्षा की व्यवस्था है। सरकार की इस योजना के तहत निश्चित तौर पर हम आने वाले वर्षों में राष्ट्रीय स्वास्थ्य सर्वे के आंकड़ों को सच्चाई में बदल सकेगें जो कहती है कि बच्चियों के शिक्षित होने से आने वाली पीढ़ी उज्जवल ही नहीं होगी बल्कि आबादी को कंट्रोल करने में भी सक्षम होगी। या मुतरेजा के शब्दों में यूं कहें कि शिक्षा का पूर्ण ’डोज’ किसी ’गर्भनिरोधक’ से बेहतर काम करेगा।




Tuesday, January 16, 2018

आखिर कब थमेंगी असुरक्षित मासूम बचपन की चीख़ें

’पूरा पाकिस्तान एक जनाजे के बोझ के नीचे दबा है, कोई भी अकेली बच्ची इस देश में महफूज नही’...मानवता के खिलाफ उठी इस वीडियो को भारत के हर चैनल ने प्रमुखता से कवर किया तो हर सोशल साइट में खूब शेयर भी हुई। पाकिस्तान न्यूज चैनल की एक एंकर ने, लाइव शो में अपनी बेटी को गोद में बिठाकर, लड़कियों की सुरक्षा के मुद्दे पर जो चिंता जताई, उसने एक बार फिर ’चाइल्ड अब्यूज’ का मामला गरमा दिया। पाकिस्तान के कसूर जिले में आठ साल की जैनब की लाश उनके घर से दो किलोमीटर दूर कूड़े के ढेर में मिली है। पुलिस का कहना है कि बच्ची का रेप करने के उसका बाद कत्ल किया गया। इस खौफनाक वारदात से पाकिस्तान में ही नहीं भारत में भी लोगों में बेहद नाराजगी देखी गई। छह लाख से अधिक सोशल मीडिया यूजर्स ने ’जस्टिसफॉरजैनब’ लिखकर बच्चों के यौन शोषण की व्यापक समस्या पर गहरी चिंता जताते हुए अधिकारियों से कार्रवाई की मांग की। अधिकतर संदेशों में लोगों का भय और शोक नजर आया। दरअसल बच्चे हांे या कोई महिलाएं, वे न तो पाकिस्तान में महफूज है और न ही भारत में। इन देशों में उनकी सुरक्षा की गारंटी न के बराबर है। घर-परिवार में जहां हिंसक और वहशियाना बरताव होता हो, वहां एक बेहतर समाज की कल्पना करना नामुमकिन भी है। बाहर भी वही है तो मासूम बचपन हो या व्यस्क महिला की सुरक्षा कौन करे।
महज चार दिन के भीतर हरियाणा में बलात्कार की तीन घटनाओं ने लोगों को स्तब्ध कर दिया। पानीपत, जींद और फरीदाबाद में हुई इन घ्टनाओं में दो लड़कियां नाबालिग थी। इससे पहले रोहतक, हिसार में हुई घटनाएं महिला सुरक्षा की पोल खोल देते है। हरियाणा हो या उत्तर प्रदेश, दिल्ली या कोई फिर और स्टेट हो, हर जगह औरत और बच्चों की सुरक्षा दांव पर लगी है। परिवार हो, पड़ोस हो, प्ले-स्कूल हो, ट्यूशन हो या फिर क्रेच...उनकी सुरक्षा को लेकर माता-पिता संदेह के घेरे में है। हाल ही में भारत सरकार द्वारा कराए गए एक सर्वे में पाया गया कि देश के आधे से भी अधिक बच्चे कभी ना कभी यौन दुर्व्यवहार का शिकार हुए हैं। इसमें ज्यादा चिंता की बात यह है कि इनमें से केवल 3 फीसदी मामलों में ही शिकायत दर्ज की जाती है। शिकायत न दर्ज होना मामले को दबा देता है और इससे अपराध में बढ़ोत्तरी ही होती देखी गई है। यौन शोषण कंे मामले में अक्सर चुप्पी साधना ही विकल्प समझा जाता है। अब इसकी वजह धमकी है या समाज का डर, परिस्थिति पर निर्भर करता है।
बहुत ही मासूम और निर्दोष होता है बचपन। उसे किसी पर शक-संदेह करना नहीं आता। एक टाॅफी के नाम पर वह आपका हो जाता है। उसकी मासूम मुस्कुराहट किसी के मन के मैल को पढ़ना नहीं जानती। मजहब, जात-पात, ऊंच-नीच, अमीरी-गरीबी से परे बचपन को राजनीति करनी नहीं आती। हर शक्ल में अपना जैसा चेहरा ढूंढने वाले ऐसे पाक साफ बचपन को कुचलने वाला आदमी किसी वहशी दंरिदे से कम नहीं। अफसोस कि ऐसे दंरिदे आज कहां किस रूप में बैठे है, कहना मुश्किल है। पानीपत की हालिया घटना है जिसमें मुंहबोले नाना-मामा ने लोहड़ी देने के बहाने उसके साथ दुराचार किया और फिर उसे जान से भी मार दिया। नोएडा के एक मदरसे में 8 साल की बच्ची के साथ दुष्कर्म की कोशिश की गई। शर्म की बात है कि हम जिस समाज में रहते है वहां की असलियत दरअसल कुछ और है।
सच तो ये है कि हम जैसे माता-पिता ये उनके साथ हुआ है की सोच या फिर अपने बच्चे से ज्यादा रिश्तेदार या पड़ोसी की बात पर यकीन कर जाने की सोच पर व्यवहार करते है। तो ये सोच गलत है। इसलिए एक बात पूरी तरह से दिल में बैठा ले कि ये उसका बच्चा था, उसके साथ हुआ और हमारे बच्चे या बच्ची के साथ ऐसा कुछ नहीं हो सकता, सोचना ही गलत है। ये बच्चा आपका भी हो सकता है कि सोच ही इस तरह के कुकर्म को होने से रोक सकती है। दूसरी ये सोच कि बच्चे को नुकसान कोई दुश्मन या कोई पराया पुरुष या महिला ही पहुंचा सकती है, निहायत बेतुकी सोच है। क्योंकि इस तरह की कई घटनाओं से यह पूरी तरह स्पष्ट हो चुका है कि बच्चों को शिकार बनाने वालों में 92 प्रतिशत जिम्मेदार रिश्तेदार या दूर पास के जानने वाले होते हैं। एक तो बच्चे बेरोक टोक इनके पास आते-जाते है। दूसरे इन्हें मालूम होता है कि माता-पिता जल्दी बच्चे की बात पर यकीन नहीं करेगे। इस तरह की सोच भी ऐसे मामलों को बढ़ावा ही देती है। कोई माने या ना माने, कहे या न कहे, 95 प्रतिशत लोगों का बचपन कभी न कभी किसी न किसी बहाने से यौन शोषण का शिकार बना है। इनमें से अघिकांशतः कुछ डर से तो कुछ शर्म से अपनी तकलीफ का बयान उम्र भर नहीं कर पाते, तो कहीं मां-बाप की अनदेखी या व्यस्तता उन्हें उनके करीब जाने से रोकती है। और ये बात स्वंय माता-पिता से बेहतर कोई नही जानता।
एक नजर सरकार के ’बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ अभियान की ओर भी डालते है। जिस तेजी से इसका प्रचार-प्रसार किया जा रहा है, क्या वाकई में उस तेजी से बेटियां बचाई भी जा रही है। आये दिन की इन घटनाओं से लगता तो नहीं। सरकार समझें कि बेटी बचेंगीं तो ही पढ़ेगी। अगर बेटी बचाने से मकसद सिर्फ भ्रूण हत्या को रोकने से है, तो जो जिंदा है, असुरक्षित माहौल में जीने को मजबूर है, उनका क्या? भय का आलम ये है कि अगर किसी मां का बच्चा थोड़ी देर के लिए भी आॅंख से ओझल होता है तो अनहोनी की आशंका से उसका दिल काॅंप उठता है। फिर बलात्कार जैसी घटनाएं तो पूरे परिवार की मनःस्थिति को बिगाड़ देती है। बेटे से ज्यादा जवान होती बेटी की सुरक्षा की चिंता मां-बाप को खाती है। लेकिन जब बचपन ही खतरे में पड़ जाये तो कहां जाये। बेटी बचाओ के अन्तर्गत भ्रूण रक्षा से आगे, े अस्तित्व रक्षा का भी संकल्प होना जरूरी है। सुरक्षा के लिए ऐप बना देने से या मोबाइल पर एक नंबर शुरू कर देने से सुरक्षा का दावा नहीं किया जा सकता। फिर बलात्कार जैसे जघन्य अपराध तो व्यक्ति की मनोदशा पर निर्भर करते है। उसमें लड़का है कि लड़की, ये मायने नहीं रखता। ऐसे में महज मनोवैज्ञानिक कारणों के निदान की तलाश जरूरी है। हालांकि एक सच ये भी है कि हर बात का ठीकरा सरकार पर भी नहीं फोड़ सकते। लेकिन सरकार स्कूल, क्रेच या ट्रेनिंग सेंटर को तो सख्त नियम-कानून के अंदर लाये जा सकते है।
मुझे याद है दिल्ली में हुए निर्भया रेप कांड के बाद भारत में महिलाओं की सुरक्षा एक बड़ा मुद्दा बन गया। यहां तक कि 2014 के आम चुनाव में भाजपा ने इसे चुनावी मुद्दा भी बना दिया। उस वक्त अपनी चुनावी सभाओं में मोदी ने ’एक्ट नहीं एक्शन’ और ’गुड गवर्नेंस’ का नारा भी दे दिया था। भाजपा जीत कर आ गई लेकिन महिलाओं की सुरक्षा का मुद्दा जस का तस रहा। उसके बाद की जो स्थिति है वह आंकड़ो में सामने है। 2015 में देश भर में बलात्कार के 34,000 से ज्यादा मामले सामने आए। 2016 में यह संख्या बढ़कर 34,600 के पार चली गई। ये संख्या तब है जबकि कईक मामले घर की चारदीवारी में ही दफन हो जाते है। समाज-शर्म की बेड़ियां थानों तक पहंुचने की हिम्मत नहीं दिखा पाती। जीडीपी ग्रोथ के मुकाबले यहां स्थिति में होता इजाफा देश की शर्मनाक स्थिति को दर्शाता है। ’एक्ट नहीं, एक्शन चाहिए’ कहने वाले मोदी अब प्रधानमंत्री है। उनके सामने हजारों मसले हैै, लेकिन क्या महिलाओं की सुरक्षा का मसला किसी भी अन्य समस्या की तुलना में कम है। इस बिगड़ती मनोदशा का जिम्मेदार जो भी हो, उस पर लगाम लगाया जाना जरूरी है। जरा सोचिये उस मासूम बचपन की जो ऐसे हादसों में जान की बाजी तो जीत जाते है लेकिन मन की कुंठा से जीवन भर मुक्त नहीं हो पाते। आखिर क्यों? तो इसका जबाब है एक अनाम कवि की ये पक्तियां
बचपन से हर शख्स याद करना सिखाता रहा,
भूलते कैसे है ? बताया नही किसी ने.....

Thursday, January 11, 2018

लघु कथा/ मोती

घर के दरवाजे पर बंधे चार बड़े-बड़े तंदरूस्त, अपने साथियों को देखकर वह समझ गया था कि इस घर के मालिक उनसे बहुत प्यार करते है। और फिर कई दिन की ’रेकी’ करने के बाद ही, यह सोचकर वह भी निश्चिन्त हो पाया था कि यही घर उसके लिए भी ’परफेक्ट घर’ बन सकता है। दिन भर इधर-उधर मारे-मारे फिरने, दूसरों की गालियां खाने से तो अच्छा है  िकवह भी इस घर में अपने इन साथियों के साथ रहे।

लेकिन घर में दाखिला कैसे लिया जाये, यह उसे समझ नहीं आ रहा था। दो तीन दिन घर के चारों ओर चक्कर लगाने के बावजूद उस पर किसी की नजर ही नहीं पड़ रही थी। नजर पड़े भी तो कैसे? उसका न तो कोई डील-डौल है और न ही देखने में शक्ल प्यारी। गली कूचे में कोई देखता तो उसे दुत्कार ही देता। पर अब उसे इसकी परवाह नहीं करनी चाहिए। उसे तो बस इस घर में कैसे आसरा पाया जाये, यही सोचना है।

और उस दिन उसे घर की स्वामिनी जिसे सब ’मनीषा’ पुकार रहे थे, उसे नजर आ गई। कैसा तो प्यार झलक रहा था उनकी आॅंख से। उसने तय कर लिया कि वह इस गृहस्वामिनी को अपना बना के रहेगा। फिर क्या था उसने अपनी इस नई मालकिन पर नजर रखनी शुरू कर दी। एक दिन सुबह-सुबह जब वह अपने उसके साथियों को टहलाने घर से निकली, वह भी उनके पीछे-पीछे कुछ दूरी बनाकर चलने लगा। उनके पीछे चलते हुए वह सोच रहा था कि ऐसा क्या करे कि मालकिन की नजर उस पर पड़ जाये।

घर को लौटते समय वह उनके बिल्कुल करीब पहुंचने की कोशिश करने लगा। जाहिर है उसके साथियों को उसका ये व्यवहार अच्छा नहीं लगा। लेकिन वह उनके पास आता गया। तभी उनमें से एक ने उस पर झपटा मारा, लेकिन मालकिन ने उसे अपनी तरफ खींच लिया। और इसी समय उनकी नजर उस पर पड़ गई। उसने भी तुरंत एक्शन दिया और अपनी दुम जोर-जोर से हिलाकर खुशी का इजहार करने लगा। वह भी मुस्कुरा दी। बस फिर क्या था? उसे तो जैसे बोटी दिख गई। वह भी उनके पीछे-पीछे चल पड़ा।

घर के गेट पर पहुंच कर वह रूक गया और उसके वे चारों बिरादर भीतर जाकर दालान में बैठ गये। मालकिन भीतर चली गई। वह गेट पर खड़ा रहा। भीतर जाना चाहता था लेकिन उन खुूंखार साथियों के कारण उसकी हिम्मत नहीं हो रही थी। तभी उसने देखा घर की मालकिन उनका खाना लेकर आई। उन्होंने बारी-बारी से सबको सहलाते हुए खाना दिया। और ये क्या....वह तो अब उसकी ओर आ रही है। गेट के बाहर आकर उन्होंने उसका खाना रख दिया और उसे देखते हुए मुस्कुराते हुए फिर घर के अंदर चली गई। वह उन्हें जाते देखता रहा, मगर खाने को मुंह तक नहीं लगाया। उसे ये बात बहुत बुरी लगी कि उन्होंने उसको पुचकारा तक नहीं।

कुछ देर बाद उसने देखा वह बाहर आई और बैठकर उसके साथियों के साथ खेलने लगी। उनकी नजर उस पर भी पड़ी। उसको खाना न खाते हुए देखकर शायद उन्हें अपनी गलती का अहसास हुआ। वह उठी और उसके पास आकर उसे सहलाने लगी। जैसे ही उन्होंने प्यार से पुचकारते हुए उसे ’मोती’ पुकारा, उसे तो जैसे अपनी दुनिया मिल गई। फिर वह उसे गेट के भीतर ले गई और अपने हाथ से खाना खिलाने लगी। उसके साथी गुर्रा रहे थे। लेकिन उसे अब उनकी परवाह नहीं थी। वह जो अब मालकिन की शरण में था।

उस दिन के बाद से उसकी घर के गेट के भीतर इंट्री को कोई नहीं रोक सका। मालकिन भी जब सबको खाना देती तो उसके पास आकर उसे भी खाना देती और हां, उसको पुचकारना और उस पर हाथ फेरना नहीं भूलती। मोती खा पीकर दिन भर इधर-उधर घूमता रहता। धीरे-धीरे उसकी उन चारों से भी दोस्ती हो गई। कभी-कभी वह उनके काम भी कर देता। घर की हिफाजत करना अब उसकी भी जिम्मेदारी थी। सब बहुत अच्छा चल रहा था कि...

एक दिन पड़ोस के गुप्ता जी मालिक से मोती की शिकायत करने पहुंच गये। उनको नाराजगी थी कि मोती रोज अपनी ’शिट’ उनके गेट पर कर जाता है। बात सही थी। मोती उनसे बहुत चिढ़ता था। उन्होंने कई बार मोती को आवारा कह कर झिड़का भी था। लेकिन अभी तो वह उसके मालिक-मालकिन पर नाराज हो रहे है। उसे गुस्सा तो बहुत आ रहा है, लेकिन वह क्या करे? उसने देखा उसकी मालकिन उसकी ओर देख-देखकर कुछ बोल रही है। बाद में मोती को उन्होंनेअऐसा न करने के लिए बहुत समझाया। मोती ने उनकी बात रखी भी।

लेकिन कुछ दन बाद शर्मा अंकल मोती की शिकायत लेकर आ गये। उसके कुछ दिन बाद महेश अंकल, सुनीता आंटी मालिक से बहस करने पहुंच गये। मोती देख रहा था मालिक परेशान हो रहे थे, लेकिन वह मालकिन की वजह से कुछ कर नहीं पा रहे थे। सब मालिक पर उसे वहां से भगा देने का दबाव बना रहे थे। उस दिन अचानक ’डाॅग-कैचर’ का नाम सुनकर मोती के कान भी खड़े हो गये थे। उस वक्त तो वह वहां से भाग लिया। लेकिन मालकिन की एक आवाज पर वह फिर चला आया और उनका दुलार पाकर सब भूल गया। आखिर मालकिन की मोहब्बत में वह कालोनी छोड़ कर दूसरी जगह भी तो नहीं जा सकता।

और फिर एक दिन उसने ’डाॅग-कैचर’ गाड़ी को देखा। उनसे छुप कर वह भाग निकला। उसके बाद तो कई दिन तक ये लुक्का-छुपी का खेल चलता रहा, पर वह उनके हाथ नहीं लग सका। लेकिन एक दिन वह हो गया, जिसकी मोती को भी उम्मीद नहीं थी। उसे ’डाॅग-कैचर’ वालों ने पकड़ लिया। अपने पकड़े जाने का उसे दुख नहीं था। उसे तो इस बात का सदमा था कि उसे पकड़वाने में मदद करने वाला कोई और नहीं उसकी मालकिन थी। कितने प्यार से उन्होंने रोज की तरह उस दिन भी, उसे आवाज देकर बुलाया और खाना दिया। साथ बैठी रही और पुचकारती भी रही। ठीक उसी समय ’डाॅग-कैचर’ वालों ने उसे पकड़ लिया। वह खूब चिल्लाया, गुर्राया। न उन लोगों ने छोड़ा, न मालकिन ने उनसे उसे छोड़ने को कहा। बस चुपचाप उसे जाते देखती रही। लेकिन गाड़ी में बंद होते-होते मोती ने देखा कि वह अपनी आंख के आंसू पोंछ रही थी और ऊपर वाले शर्मा जी अपनी खिड़की से झांकते हुए मुस्कुरा रहे थे।