Friday, August 28, 2015

'ताकत के दम पर' जातिगत हक़ की नुमांइदगी के ये नये अंदाज


जिस दिन हार्दिक पटेल ने अहमदाबाद में हुक्मरानों को देख लेने की बात कही उस दिन कुछ देर के लिए तो ऐसा लगा जैसे ये आंधी गुजरात ही नहीं देश को भी हिला कर रख देगी। महज 22 साल की उम्र के हार्दिक पटेल के नेतृत्व में गुजरात के पाटीदारों ने पटेलों के आरक्षण के लिए जो तेवरों दिखाए उससे राजनीति के धुरंधर खिलाड़ी भी हक्का बक्का रह गये। लेकिन अफसोस, अपनी ताकत दिखाने का ये जश्न 10 लोगों की जान का काल बनकर भी आया। अब आरक्षण के लिए सत्ताधारियों को ललकारते हार्दिक पटेल की गरम जोशी ने पटेलों को क्या स्वप्न दुःस्वप्न दिखाए, इसका जबाव तो समय को देना हैे। लेकिन क्या अब समय नहीं आ गया कि आरक्षण की हदें तय की जाए और इससे होते ’साइड एफेक्ट’ पर चिंता व्यक्त की जाए। स्थिति भयावह होती जा रही है। अधिकार स्वरूप मांगी जाने वाली आरक्षण की नई परिभाषा भारतीय समाज के टुकड़े टुकड़े कर रही है। योग्यता के ऊपर हक को काबिज़ करने की जोर आज़माईश किसी भी देश काल परिस्थिति के लिए ’आइडियल’ नहीं हो सकती। निश्चित रूप से पूर्व में लिए गए फैसले आज अपना असर दिखा रहा है। देश को जाति धर्म के आरक्षण में लपेटने वाले मंडल कमीशन का जहर अब रग़ों में जहर बन कर दौड़ने लगा है। वक़्त के साथ साथ ये जहर समाज को नफरत की आग में झोंक देगा, ये जानते हुए भी हम अपनी ढपली अपना राग की तर्ज पर झूम रहे हैं।
सामाजिक शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों की स्थिति की समीक्षा के लिए मोरारजी देसाई सरकार ने जब बिंदेश्वरी प्रसाद मंडल की अध्यक्षता में छह सदस्यीय पिछड़ा वर्ग आयोग के गठन की घोषणा की थी तब उन्हें भी संभवतः इसकी कल्पना नहीं होगी कि उनका ये फैसला भविष्य में किस तरह से अपना नकारात्मक प्रभाव दिखायेगा... आरक्षण के नाम पर जाति धर्म कुकरमुत्तों की तरह निकल आएंगे और वोट बैंक का रूप लेते जाएंगे। आज आरक्षण की मांग का राजनीतिकरण नेताओं की चांदी कर रहा है तो बेवकूफ जनता अपने ’सो काॅल्ड’ रहनुमाओं के इशारे पर नाच अपने दिन फिर जाने का सपना देख रही है। अपना उल्लू सीधा करने वाले इन सत्ताधारियों की चाल को नाकाम करने की कोशिश भी की जाती रही है। आपको याद होगा तत्कालीन प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने जब मंडल कमीशन की रिपोर्ट लागू करने की घोषणा की थी तब 14 अगस्त 1990 अखिल भारतीय आरक्षण विरोधी मोर्चे के अध्यक्ष उज्जवल सिंह ने आरक्षण प्रणाली के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी। संभवतः उन्हें भी इसके साइड एफेक्ट का इल्म होगा।  सुप्रीम कोर्ट ने उनकी याचिका पर अपने ’ऐतिहासिक फैसले’ में मंडल आयोग की सिफारिशें लागू करने के फैसले को वैध ठहरा दिया था। लेकिन फैसले में आरक्षण की अधिकतम सीमा 50 प्रतिशत रखने और पिछड़ी जातियों के उच्च तबके को इस सुविधा से अलग रखने का निर्देश दिया था। उस वक्त इस आरक्षण की आग ने देश की आत्मा को झकझोर दिया था और एसएस चैहान, राजीव गोस्वामी, मीनाक्षी जैसे कितने आरक्षण के विरोध की चपेट में आकर अपनी जान गंवा बैठे।
तब से अब तक इस मुत्तालिक़ स्थितियां बदली हो, ऐसा नहीं है। ’आरक्षण’ इस एक शब्द ने धर्म को जाति में और जाति को उपजाति में बदल दिया। सरकारी नौकरी में विकलांग के लिए आरक्षण की मान्यता ने उन्हें भी आंख नाक कान से विकंलाग बना दिया जो शारीरिक रूप से पूर्णतया स्वस्थ हैं। देश काल का न होकर आदमी धीरे धीरे इस आरक्षण के लालच में अपने लोग अपने समाज तक सिमट गया। स्वार्थी हो चुके समाज में आप फिर जिस चीज को हवा दे सकते है तो वो है सिर्फ और सिर्फ नफरत। इस नफरत से अगर किसी ने अपनी रोटी सेंकी तो वो है राजनैतिक पार्टियां और नफरत करने वाले, राजनीतिकारों के खेल को न तब समझ सके, न आज ही समझ पा रहे हैं। ये खेल कुछ नया भी नहीं। 22 साल पहले भी जब मंडल आयोग की सिफारिशें स्वीकार हुई थीं, इसके पीछे सामाजिक बदलाव की इच्छा से अधिक दबाब राजनीतिक समीकरणों का था। इसीलिए इस रिर्पोट के लागू होने के बाद देश में दो चीजें एक साथ हुईं। एक- देश की अर्थव्यवस्था में बड़े पैमाने पर उदारीकरण शुरू हो गया। दो-सरकारी खर्च और वित्तीय घाटा कम करने की कवायद शुरू हो गई। जिसके कारण सरकारी नौकरियों में कटौती जैसी चीजें शुरू हुईं। सरकारी क्षेत्र में रोजगार के अवसर कम होने लगे तो निजी क्षेत्र में रोजगार के अवसर बेतहाशा बढ़ने लगे। अब चूंकि निजी क्षेत्र में किसी के लिए आरक्षण की कोई संभावना नहीं थी इसलिए मंडल आयोग की सिफारिशें लागू होने पर वो वग घाटे में ही रहा जिसके लिए इतना तूफान मचा।
यही वजह है कि आज 25 साल बाद भी जो तर्क आरक्षण के पक्ष और विपक्ष में उस समय दिए जाते थे, वे आज भी अपनी जगह कायम हैं। उस समय जो आरक्षण के समर्थक और विरोधी थे, वे भी वहीं खड़े हैं। जो बदलाव हुआ भी, उसने पिछड़े वर्ग के राजनीतिक आक़ाओं की रफ्तार जरूर तेजी से बढ़ा दी। पिछड़े तो वैसे ही कमजोर और असहाय रहे, उनके कर्णधार जरूर सशक्त होते चले गए। इन सालों में पिछड़े वर्गो का प्रतिनिधित्व करने वाली राजनीतिक ताकतें भी खूब उभरकर सामने आईं। उत्तर प्रदेश व बिहार जैसे राज्यों में पिछड़े वोटों के सहारे कद बढ़ाती ये पार्टियां भी आरक्षण के बीज को सींचने से पीछे नहीं हटी। वैसे भी सत्ताधारियों की इच्छा गरीब पिछड़ों के जीवन को बेहतर करने से ज्यादा उनकी पहचान को समूह में बांटने की अधिक रही है। फिर हर चुनाव में इस समूह से किए गये वायदे, जीत के पक्की तौर पर मिल जाने का यकीन तो करा ही देते है। ऐसी ही परिस्थितियों में प्रतीक के तौर पर कोई एक महत्वाकांक्षी ’हार्दिक’ खड़ा कर ही दिया जाता है। तभी तो राजनीति के आकाश में अचानक ही से हार्दिक पटेल जैसा कोई चमकने लगता है और उन पटेलों की चिंता पर आग बबूला होने लगता है जो अब तक गुजरात ही क्या देश-दुनिया के समृद्धों मे गिने जाते रहे हैं।
हार्दिक पटेल भी कुछ इसी तरह के सपनों को बेचने निकल पड़े है। इस कम व्यस्क नौजवान की राजनीतिक मंशा औरों से कुछ कमतर नजर नहीं आती। पाटीदारों को आरक्षण के नाम पर इकट्ठा कर इसने भी युवा नस्ल की उसी नस को ही छुआ है जिसे बेरोजगारी की मार कहते है। इसलिए इस आंदोलन को उन्होंने ‘अधिकारों की लड़ाई’ कहा है। इस सम्बन्ध में उन्होंने सरकार को आगाह भी कर दिया है कि अगर जरूरत पड़ी, तो वे इस अधिकार को ‘ताकत के दम पर’ भी हासिल करने से परहेज नहीं करेंगे। मतलब स्पष्ट है कि शांति और अहिंसा से अगर मांग पूरी नहीं हुई, तो वे ‘हिंसा का रास्ता चुनने से भी नहीं डरेंगे’। हार्दिक पटेल के इस साफ नजरिये से चैंकने से ज्यादा उस वक्त के लिए सहमने की जरूरत है जबकि भविष्य में ऐसे ही कोई और हार्दिक पटेल किसी और समाज की चिंता लेकर खड़ा होगा और अपने हक के लिए अपनी ताकत का मुज़ाहिरा करेगा ?
अफसोस होता है कि आज़ादी के बाद, दशकों की यात्रा के बाद भी देश में मूल अधिकारों के लिए कोई अपनी ताकत की आजमाईश नहीं करना चाहता। शिक्षा, रोजगार जैसी मूल समस्याएं आज भी भारतीय व्यक्ति के विकास में बाधा बनी हुई है। शिक्षा की कमी जहां सोच का विकास नहीं कर रही वहीं बेरोजगारी का चक्र आत्मविकास के रास्ते में रोड़े अटका रहा है। बेहतर होता हार्दिक पटेल जैसे युवा अपना आक्रोश, अपनी उर्जा आरक्षण का हक मांगने के बजाय इन मूल अधिकारो से लड़ने में लगाते। लेकिन हार्दिक भी जानते है कि इस तरह के रास्ते त्याग और तपस्या की मांग करते है और आपकी महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति में खरे नहीं उतरते। राजनीति के हलकों में शीर्ष तक पहंुचने के लिए राजनीतिक पायदान ही काम आते है। उनके लिए आरक्षण के नाम पर दिखाई गई ये ताकत उस मुकाम की पहली सीढ़ी साबित हुई जहां तक वह पहुंचना चाहते हंै।












Saturday, August 22, 2015

अदालती फरमान की चाबुक तले सरकारी नौकरी बनाम सरकारी स्कूल

गत दिनों इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक बड़ा फैैसला सुनाते हुए राज्य सरकार को निर्देश दिया कि सभी नौकरशाहों और सरकारी कर्मचारियों के लिए उनके बच्चों को सरकारी प्राथमिक विद्यालय में पढ़वाना अनिवार्य किया जाए। हाईकोर्ट के निर्देशानुसार व्यवस्था तुरंत अमल में लाई जाए ताकि अगले शिक्षा-सत्र से इसका अनुपालन सुनिश्चित हो सके। न्यायमूर्ति सुधीर अग्रवाल की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने शिवकुमार पाठक की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह बात कही।याचिका में कहा गया था कि सरकारी परिषदीय स्कूल में शिक्षकों की नियुक्ति पर नियमों का पालन नहीं किया जा रहा है जिसके चलते अयोग्य शिक्षकों की नियुक्ति हो रही है और जिसके चलते बच्चों को स्तरीय शिक्षा नहीं मिल पा रही है। इसकी चिंता ना तो सम्बंधित विभाग के अधिकारियों को है और ना ही प्रदेश के उच्च प्रशासनिक अधिकारियों को है।
इस याचिका पर फैसला देते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट की मंशा साफ जाहिर हो रही थी कि वह सरकारी मुलाजिमों पर अदालती चाबुक चलाकर उनसे उस व्यवस्था में खुद शामिल होने को कह रहा है जो उसी की बनाई है। यकीनन अदालत के इस फैसले के जरिए उन सरकारी अफसरों को लताड़ देने की कोशिश भी की गई जो अपने बच्चे के लिए तो कान्वेट और हाई प्रोफाइल स्कूलों का चयन करते हैं लेकिन बात जब गरीब तबके को मुफ्त और बेहतर शिक्षा देने की आती है तो समझौतों और बहानों का तबसरा पढ़ने लगते है। इसलिए अदालत ने ये फैसला देना लाजिमी समझा कि जब इन स्कूलों में अफसरानों-हुक्मरानों के बच्चे इन स्कूलों में पढ़ने जाएंगे तो शिक्षा का स्तर सुघारने और शिक्षकों के चयन प्रकिया की उचित तरीके को अलमी जामा पहनाने की कोशिश की जाएगी।
सख्त रवैये का परिचय देते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मुख्य सचिव से यह सुनिश्चित करने के लिए कहा कि सरकारी कर्मचारी, निर्वाचित जनप्रतिनिधि, न्यायपालिका के सदस्य एवं वे सभी अन्य लोग जिन्हें सरकारी खजाने से वेतन एवं लाभ मिलता है, अपने बच्चों को पढ़ने के लिए राज्य के माध्यमिक शिक्षा बोर्ड द्वारा संचालित प्राथमिक विद्यालयों में अपने बच्चों को भेजें। न्यायमूर्ति सुधीर अग्रवाल ने अपने फैसले में यह भी कहा कि आदेश का उल्लंघन करने वालों के लिए दंडात्मक प्रावधान किए जाएं। उदाहरण के तौर पर यह भी साफ कर दिया कि यदि किसी बच्चे को किसी ऐसे निजी विद्यालय में भेजा जाता है जो कि यूपी बोर्ड की ओर से संचालित नहीं है तो ऐसे अधिकारियों या निर्वाचित प्रतिनिधियों की ओर से फीस के रूप में भुगतान किए जाने वाली राशि के बराबर धनराशि प्रत्येक महीने सरकारी खजाने में तब तक जमा की जाए जब तक कि में ऐसी शिक्षा जारी रहती है। केवल यही नहीं ऐसे व्यक्तियों को, यदि वे सेवा में हैं तो उन्हें कुछ समय (जैसा मामला हो) के लिए अन्य लाभों से वंचित रखा जाए जैसे वेतन वृद्धि, पदोन्नति या जैसा भी मामला हो।’’ निश्चित तौर पर अदालत का फैसला स्वागत योग्य है। लेकिन इस आदेश को मानने से वे  माता पिता इंकार कर सकते है जो हर हाल में अपने बच्चे की तालीम का स्तर ऊंचा रखना चाहते है।
देश के अधिकांश भागों में सरकारी स्कूलों की शिक्षा का प्रदर्शन औसत से नीचे और हद से ज्यादा दयनीय होना अपने आप में किसी भी विकासशील देश के लिए शर्मिंदगी की बात है। आज देश का बड़े से बड़ा अधिकारी, नेता या स्वंय सरकारी शिक्षक भी अपनेे बच्चे को सरकारी स्कूल में पढ़ाने की गलती नहीं करना चाहता। हो सकता है इनमें से कुछ इन स्कूलों से पढ़कर आये हो लेकिन अपने बच्चे का भविष्य ये किसी भी हालत में दांव पर नहीं लगाना चाहेगें। देश हो या प्रदेश इन्हें सरकारी स्कूलों की एजुकेशन पर कतई भरोसा नहीं। आपको आश्चर्य नहीं होना चाहिए ये जानकर कि ये वो ही लोग है जो सर्व शिक्षा की गाइडलाइन बनाते है या इसको चलाने में किसी न किसी रूप में शामिल हैं। आप इसी से इन स्कूलों के हालात का पता लगा लें कि एक चतुर्थ श्रेणी का सरकारी कर्मचारी भी केन्द्रीय स्कूल को भी स्तरीय स्कूलों में नहीं गिनता। इसीलिए अधिकांश कर्मचारियों के बच्चे या तो विदेशों में पढ़़ रहे हैं या देश के बेस्ट प्राइवेट स्कूलों में। यही कारण है कि है आज साधन सुविधा प्राप्त सरकारी विद्यालयों का स्तर भी गिरता जा रहा है। दुखद स्थिति तो तब और हो जाती है जब शहरी झुग्गी बस्तियों के गरीब मां-बाप भी अपने बच्चांे को मुफ्त में सरकारी स्कूलों में पढ़ाने की जगह फीस देकर निजी स्कूलों में पढ़ाना बेहतर समझते हैं। विषयवार योग्य शिक्षकों की कमी, विद्यालय भवनों की जर्जर हालत, सामान्य सुविधाओं का पर्याप्त अभाव इन स्कूलों के स्तर को उठने नहीं देता। इन्हीं बातों का फायदा उठाकर और बढ़ती आवश्यकता को देखकर निजी विद्यालय चांदी काट रहे हैं। शहर तो शहर अब गांवों में भी निजी विद्यालयों की भीड़ बढ़ रही हैं। इनमें कई विद्यालय तो ऐसे मिलेगें जो बिना सरकारी अनुज्ञप्ति के ही चल रहे हैं।
दूर दराज के सरकारी स्कूलों के तो ये हालात तो और भी खराब है। यहां निःशुल्क पुस्तकों से लेकर, ड्रेस, मध्याह्न भोजन, साइकिल आदि की सुविधा लेने के नाम पर बच्चों का नाम तो लिखा दिया जाता है पर बहुत जल्दी ही बच्चे आना भी बंद कर देते है। ये हालात तब है जबकि देश के विभिन्न भागों के शोधकर्ताओं ने यह साबित कर दिया है कि निजी स्कूल के प्रति छात्र पर होने वाला खर्च सरकारी स्कूल की तुलना में कहीं कम है। यही नहीं निजी और गैर-वित्तीय सहायता प्राप्त स्कूलों के शिक्षकों का वेतन तक सरकारी स्कूलों की तुलना में 5-7 गुना कम है। ग्रामीण शिक्षा पर काम करने वाली गैर सरकारी संस्था आशा फॉर फाउंडेशन के एक संयोजक के अनुसार, ”पिछले कुछ वर्षों में गाँवों के लोग अपने बच्चों नाम निजी स्कूलों में लिखा रहे हैं, क्योंकि अभिभावक अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा देना ही चाहते हैं। निजी स्कूलों में बच्चों के अंदर शुरूआत से प्रतिस्पर्धा की भावना आ जाती है, जबकि सरकारी स्कूल के अध्यापक इस बात पर ध्यान नहीं देते हैं, जिससे बच्चे पिछड़ जाते हैं। जहां तक सरकारी स्कूलों में न जाने की बात है तो गाँवों में बच्चों का बस स्कूल में नाम लिखा देते हैं और आगे ध्यान नहीं देते हैं।”
सरकारी स्कूलों की बद से बदतर होती हालत की दूसरी वजह है जवाबदेही का अभाव। स्कूल का प्रधानाचार्य बच्चों के स्कूल न आने की माता पिता की दिलचस्पी न लेने की वजह बताता है तो उसके ऊपर बैठे अधिकारी कमजोर सरकारी व्यवस्था और अपर्याप्त संसाधनों रोना रोते है। उसके ऊपर बैठा आदमी शिक्षक और शिक्षण के लिए बनी व्यवस्था में समय के अनुसार बदलाव न होन की शिकायत करता है या फिर धन की कमी का गान करने लगता है। जबकि शिक्षा के लिए भारत सरकार भारी भरकम बजट निकालती है है। बावजूद इसके स्कूलों की दिशा और दशा अपनी हालत को रो रही हैं। शिक्षकों के रिक्त पदों को भरने के लिए धरना प्रदर्शन तो खूब होते है। लेकिन इनमें कितने ऐसे होगें जो व्यवस्था में बढ़ते छेदों की जिम्मेदारी स्वंय को भी देना चाहें। प्रशासनिक अधिकारी ही जब अपनी जबावदेही से भाग रहे हो तो भला शिक्षक क्योंकर अपनी जिम्मेदारी निभाने आगे आए। अयोग्य शिक्षकों की भर्ती इस संस्थान के गिरते स्तर का एक बड़ा कारण है। शिक्षकों के पढ़ाने के तरीके भी सरकारी हिसाब-किताब के जैसे ही है। ऐसे में जबरन स्कूल तक खींच कर लाए गये बच्चे कहां पढ़ने वाले।
प्रथम’ संस्था की वर्ष 2014 के लिए 13 जनवरी को जारी वार्षिक स्टेटस एजूकेशन सैंपल सर्वे रिपोर्ट के अनुसार 2014 शिक्षा का अधिकार कानून के तहत आने वाले बच्चों का नामांकन 96 प्रतिशत रहा है, लेकिन प्रदेश के ग्रामीण सरकारी विद्यालय की कक्षा पांच में पढ़ रहे 55.9 प्रतिशत बच्चे नहीं पढ़ पाते। ‘प्रथम’ की इस रिपोर्ट में ग्रामीण भारत में स्कूली शिक्षा और बुनियादी शिक्षण को लेकर अध्ययन किया गया है। संस्था की दसवीं रिपोर्ट में देश के 585 जिले शामिल किए गए थे, जिनमें 69 जिले यूपी के थे। वहीं देश के 5.7 लाख बच्चों पर यह सर्वे किया गया। इनमें उत्तर प्रदेश के 92 हजार बच्चे थे। इस तरह से देखा जाए तो साल दर साल प्रदेश में बच्चों का नामांकन तो बढ़ता चला जाता है लेकिन बच्चे स्कूल में नहीं मिलते। प्रदेश में स्कूल न जाने वाले बच्चों का प्रतिशत 3.3 प्रतिशत रहा। दूसरी ओर ग्रामीण इलाकों में 4.1 प्रतिशत बच्चे आज भी स्कूल नहीं जा पा रहे हैं, जबकि राष्ट्रीय स्तर पर यह औसत 2.9 प्रतिशत है।
कुल मिलाकर स्थिति बेहद भयावह है। शिक्षा किसी भी समाज का सबसे मजबूत हथियार माना जाता है। किंतु यहां इस हथियार का सदुपयोग करने वाले गिनती में मिलेगें। कुछ की आवाज ऐसी याचिकाओं के बहाने ही बाहर सुनाई पड़ती है तो कुछ शिक्षा का नाश करने वालों पर बस गरजते बरसते ही रह जाते हैं। इन्हीं बरसने वालों का कहना है कि अफसरान अदालती आदेश को कितनी गंभीरता से लेगें, ये तो समय ही बताएगा। लेकिन अब ऐसा लगता है कि इसको दुरूस्त करने के लिए थर्ड डिग्री उपचार की ही आवश्यकता है। भले ही वह भविष्य में अपना रंग दिखाए।

Friday, August 14, 2015

बार बार खंडित की जाती संसदीय गरिमा

261 करोड़ और 198 घंटे की बर्बादी के साथ ही इस बार का मानसून सत्र भी निपट गया। अपने-अपने स्वार्थ के लिए तमाम दलों द्वारा मचाए कोहराम के चलते संसद का मानसून सत्र बिना किसी परिणाम के, बिना किसी काम के इन माननीयों की बेजा हरकतों की बलि चढ़ गया। संसदीय इतिहास में ये सत्र काले अक्षरों में दर्ज किए जाने लायक है। बेहद शर्मनाक और गैरजिम्मेदाराना व्यवहार वाले हमारे माननीय किसी भी हाल में सम्मानजनक शब्दावली के अधिकारी नहीं है। इस सत्र के कड़ुवे अनुभव आने वाले समय में होने वाले सत्रों को कोई सीख दे पाएं कहना मुश्किल है। समय के साथ-साथ आप इनके और अधिक बदरंग होने की उम्मीद जरूर कर सकते है। तकलीफ कि बात तो यह है कि अपने अपने राम के चलते किसी को यह देखने की फुरसत ही नहीं रही कि इस देश की जनता अपने इन कर्णधारों की नंगई से कितनी शर्मसार हो रही है। अफसोस इस बात का भी होता है कि जब पार्टी दिग्गज या कहें पार्टी आलाकमान भी इस हंगामें में अपने सासंदों को पूरा सहयोग करते है।

एक वक्त था कि सत्र शुरू होने का इंतजार रहता था। यह सोचकर आनंद आता था कि सत्र के दौरान किस दिग्गज का भाषण सुनने लायक होगा और किस बिल पर बहस के दौरान ससंद का माहौल कितना जोशोखरोश भरा होगा। किसी वक्त अनुशासित और शिष्ट वातावरण में चलती ससंद आज इतिहास के पन्नों तक सीमित रह गई है। जिन नेताओं की झलक पाने और उन्हें सुनने की युवाओं, घर के बड़े बुजुर्गों में जेरे बहस तारी होती थी। आज इसके ठीक उलट हंगामा, शोरगुल करने में माहिर होते सासंदों को देशवासी नफरत से देख रहे है। एक तरह से कहा जाए तो अपने फैसले पर षर्मिंदा हो रहे है। शिष्टाचार की धज्जियां उड़ाने वाले ये सासंद कौन सा उदाहरण अपने देश के आगे रख रहे है। मेज कुर्सी माइक पटकने से लेकर अभद्र भाषा का प्रयोग आज आम बात हो गई है। वेल तक पहुंचना तो आम बात होती जा रही है, अब प्ले कार्ड तक पीठासीन के सामने लहराए जाने लगे है। कामकाज निपटाने की जगह ससंद को जंतर मंतर बनाया जा रहा है, जहां धरना प्रदर्शन और नारेबाजी ही अपनी बात को कहने या रखने का एकमात्र साधन समझा जाता है।

एक ओर इस पूरे सत्र के दौरान सत्ता पक्ष यह दिखाने में लगा रहा कि वह तो ससंद चलाना चाह रहा है प्रतिपक्ष ही उसे ऐसा करने से रोक रहा है। दूसरी ओर विपक्ष अपनी मांगों से पीछे हटने को तैयार न होकर सत्ता पक्ष को ही इस सब का दोषी बताता रहा। बड़े बड़े नेताओं की समझदारी पर इस देश की जनता कुर्बान। इनमें से किसी ने भी आपसी मतभेदों को दूर करने कराने की चेष्टा तक नहीं की। जिन बातों को सत्र से पहले सुलझाने की कोशिश होनी चाहिए उन्हें सत्र में हंगामाखेज बनाने के लिए रख छोड़ा गया। सत्ता पक्ष को पता था कि विपक्ष सत्र चलने नहीं देगा जब तक सुषमा स्वराज, वसुंधरा राजे ललितगेट मामले में और शिवराज सिंह चैहान व्यापम घोटाला मामले पर इस्तीफा नहीं दे देते। फिर भी भाजपा इस्तीफे वाली बात पर किसी तरह की असमंजस वाली स्थिति में नजर नहीं आई। संसदीय दल में प्रस्ताव पारित कर उसने कांग्रेस को विध्वंसकारी विपक्ष बता दिया। यही नहीं कांगेस को बाधा डालने वाली तथा विकास विरोधी नीतियों पर काम करने वाली कहकर उसकी कड़ी आलोचना कर डाली। प्रस्ताव में दो-टूक कह दिया गया कि सुषमा स्वराज, वसुंधरा राजे और शिवराज सिंह चैहान का इस्तीफा मांगने का कोई आधार नहीं है। अतः भाजपा संसदीय दल ने विपक्ष का निशाना बने इन तीनों नेताओं के साथ खड़े रहने का संकल्प जता दिया।

भाजपा और विपक्ष ऐसी किसी साझा सहमति की तरफ बढ़ते नहीं दिखे, जिससे संसदीय गतिरोध दूर होता। कांग्रेस और उसके साथ लेफ्ट पार्टियों एवं जनता दल (यू) ने इस्तीफा नहीं तो काम नहीं का चरम रुख अपना रखा है। तीनों नेताओं के इस्तीफे से पहले वे संसद में किसी चर्चा या सत्ता पक्ष का स्पष्टीकरण सुनने को तैयार नहीं हैं। और फिर लोकसभा से एक साथ 25 सांसदों के निलंबन से आग में घी का काम तो हो गया, ससंद की कार्यवाही के मामले में नतीजा सिफर ही रहा। इस बात पर नाराज कांग्रेस सांसदों ने संसद भवन पर धरना दे दिया जिसका नेतृत्व खुद सोनिया गांधी ने संभाला। पार्टी आलाकमान के आने से और साथ साथ नारे लगाने से कांग्रेस का मनोबल तो बढ़ा ही, इस प्रदर्शन में कुछ अन्य विपक्षी दल भी शामिल हो गए।

यकीनन सत्र में बार-बार कार्यवाही स्थगित होने से प्रश्नकाल जाया होता है। संसद और सांसद दोनों का ही प्रयोजन व्यर्थ हो जाता है। समस्याएं जस की तस रह जाती हैं और अपना कीमती वोट देने वाले निमित्त मात्र से लगने लगता है। संसद न चलने से जहां एक ओर महत्वपूर्ण कामकाज नहीं हो पाता और देश के विकास से जुड़े तमाम बिल अटके रह जाते हैं। वहीं संसद में जारी गतिरोध के कारण देश के खजाने को आर्थिक नुकसान भी होता है। संसदीय मामलों के मंत्रालय के अनुमान के मुताबिक, संसद में कामकाज न होने से देश को प्रति मिनट ढाई लाख रुपये का नुकसान होता है। अगर इसके आधार पर एक दिन का नुकसान लगाया जाए तो यह तकरीबन 10 करोड़ रुपये बैठता है।

सत्र के दौरान भारी हंगामें को देखकर विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने जज्बाती भाषण जब दिया तो एकबारगी लगा कि संभवतः अब सांसद शांत बैठ जाए पर ये दांव भी खाली चला गया। उल्टे कांग्रेस के हमले तेज हो गए। सोनिया गांधी ने उन्हें ड्रामा करने में माहिर बताया, तो राहुल गांधी ने विदेश मंत्री से यह बताने को कहा कि उनके परिवार को ललित मोदी से कितने पैसे मिले? सवालों से परेशान भाजपा किसी तरह सदन को चलाये रखने की कोशिश में दिखी तो वहीं दूसरी ओर संसद में काम न चलने देने पर कांग्रेस यह सोच सोच कर फूल कर कुप्पा होती दिखी कि यह सत्र राजनीतिक रूप से उसके लिए फायदेमंद रहा। भ्रष्टाचार के कथित मामलों को लेकर अधिकांश विपक्षी दल भी उसके साथ गोलबंद था तो उसे ये लगना लाजमी भी है कि संसदीय कार्यवाही को पंगु बनाने में वह कामयाब रही।

सही मायने में कहा जाए तो यह सत्र भाजपा को कांग्रेस का जबाव रहा। अगर आपको याद हो तो पिछली दो लोकसभाओं के दौरान उसके संसदीय आचरण का रिकॉर्ड इतिहास में दर्ज मिल जाएंगे। संसद को अवरुद्ध करने को उचित राजनीतिक रणनीति बताने की शुरुआत भाजपा ने ही की। तब उस वक्त भरी बहुमत से जीत कर सत्ता में आए कांग्रेसी नेता कहते थे कि भाजपा आम चुनाव में अपनी हार नहीं पचा पाई, इसलिए असंसदीय व्यवहार कर रही है। आज वस्तुस्थिति उलट है। अब भाजपाई कांग्रेस पर यही इल्जाम लगा रहे हैं।

देखा जाए तो असंसदीय व्यवहार का ताना देने वाले जब खुद सत्ता में होते है तो अपना समय भूल जाते है। दोनों ही अपने अपने वक्त में अपनी जिम्मेदारियों का ठीकरा दूसरे पर मढ़ते नजर आते है। ना जाने कब इन्हें ये समझ आएगा कि देश चलाने के लिए दोनों ही पक्ष जरूरी है। यदि सत्तापक्ष जनादेश का राजकाज चलाने के लिए है तो विपक्ष उसके काम की निगरानी करने के लिए है। आपसी टकराव में तो वे केवल देश के कामकाज ही ठप कर रहे हैं।

जनता के लिए जनता के द्वारा चुने गए सांसदो को यह नहीं भूलना चाहिए कि आज जिस जगह बैठ कर वे अकड़ रहे है यहां से उतारने में जनता भी देर नहीं करेगी। जैसे लगातार संसदीय अवरोध खड़ा करने का अंजाम 2009 में भाजपा भुगत चुकी हैै। संसद का कार्य बाधित कर अपनी रणनीति की सफलता को राजनीतिक फायदे समझकर बैठी कांग्रेस भविष्य के प्रति भी आगाह रहे तो बेहतर होगा।