Wednesday, January 24, 2018

शिक्षा का पूर्ण ’डोज’ किसी ’गर्भनिरोधक’ से कम नहीं

’राष्ट्रीय स्वास्थ्य सर्वे’ की एक हालिया रिर्पोट का जिक्र करना चाहती हूं, जिसके अनुसार बेटियां जितना पढं़ेगीं,जनसंख्या का बोझ देश पर उतना कम होगा। 2015-16 के विश्लेषण पर आधारित ’इंडिया स्पेंड’ की रिर्पोट के मुताबिक 12 साल या उससे ज्यादा पढ़ने वाली लड़कियों की, पहले बच्चे को जन्म देते समय, उम्र 24.7 होती है। जबकि कभी स्कूल न जाने वाली लड़कियां औसतन 20 साल की उम्र में मां बन जाती हैं। वहीं कोई लड़की 12 साल या उससे ज्यादा पढ़ती है तो वह औसतन 2.01 बच्चों को जन्म देती हैं। जबकि कभी स्कूल न जाने वाली लड़कियां औसतन 3.82 बच्चों की मां बनती है। एक अन्य रिर्पोट के मुताबिक देश के 33.6 फीसदी बच्चे किशोर लड़कियों की संतान होते हैं। अगर इन लड़कियों की उम्र बढ़ाई जाए तो 2050 तक देश की संभावित 1.7 अरब की आबादी में एक चैथाई की कमी आ सकती है। इस बारे में मैं ’पापुलेशन फाउंडेशन आॅफ इंडिया की निदेशक पूनम मुतरेजा के कथन से, कि शिक्षा से बेहतर कोई गर्भनिरोधक नहीं, पूर्णतया सहमत हूं। दुनिया के कई देशों ने महिलाओं को शिक्षित करके ही अपने देश की जनसंख्या को नियंत्रित किया है।

ये तो रही एक सर्वे की रिर्पोट, जो एक सपने को हकीकत का जामा पहनाने की कोशिश कर रही है। इससे इतर एक कड़वी सच्चाई है जो ’सैम्पल रजिस्ट्रेशन सिस्टम बेसलाइन सर्वे’ की रिर्पोट में है। इसकी 2014 की रिपोर्ट के अनुसार 15 से 17 साल की लगभग 16 प्रतिशत लड़कियां स्कूल बीच में ही छोड़ देती हैं। ’मानव विकास मंत्रालय’ ने भी 2013 में एक रिर्पोट जारी की थी जिसके अनुसार प्रति वर्ष पूरे देश में 5वीं तक आते-आते करीब 23 लाख छात्र-छात्राएं स्कूल छोड़ देते हैं। हो सकता है इन रिर्पोट में सुधार के नजरिये से, तब से कुछ फर्क आया हो। लेकिन ये फर्क आज भी बहुत बड़ा अंतर नहीं दिखायेगा। क्योंकि स्कूल छोड़ने के कारणों में फर्क नहीं आया। ये वजहें दकियानूसी सोच का होना या बेटी-बेटा में अंतर समझना, विद्यालयों का दूर होना, लड़कियों के लिए स्कूलों में शौचालयों की सुविधा का ना होना या फिर असुरक्षा का भय... या कुछ भी हो सकता है, जो वैसे का वैसा ही है।

ये बड़े ही शर्म की बात है कि देश के 61 लाख बच्चे आज भी शिक्षा की पहुंच से दूर है। इसमें उत्तर प्रदेश की स्थिति भी बहुत बेहतर नहीं है। तमाम सरकारी प्रयासों के बावजूद अभी 16 लाख बच्चे शिक्षा के कोसों दूर है। यह आंकड़े यूनिसेफ की वार्षिक रिपोर्ट द स्टेट ऑफ द वल्र्डस चिल्ड्रेन के हैं, जिसकी रिपोर्ट के अनुसार स्कूल जाने वाले बच्चों में भी 59 प्रतिशत बच्चे ऐसे हैं जो ठीक से पढ़ भी नहीं पाते हैं। जिस देश में  लडकियों की शिक्षा और स्वास्थ्य की बेहतरी से कहीं ज्यादा जोर उसकी घरेलू शिक्षा-दीक्षा और शादी-ब्याह पर दिया जाता हो, वहां देश के बेहतर भविष्य की उम्मीद रखना बेकार है। भारत में 22 लाख से भी ज्यादा लड़कियों की शादी कम उम्र में कर दी जाती है। और इस मामले में केरल को छोड़कर, जहां की साक्षरता दर 100 प्रतिशत है, बाकी राज्य अपवाद है।

आपको आश्चर्य होगा ये जानकर कि आर्थिक विकास के अपने मॉडल के लिए विश्व भर में सुर्खियाँ बटोरने वाला राज्य, गुजरात, लडकियों की शिक्षा के मामले में देश के सबसे पिछड़े राज्यों में से एक है। गुजरात में 15 से 17 साल की 26.6 प्रतिशत लड़कियां किसी न किसी कारण से स्कूल छोड़ देती हैं। मतलब राज्य में 26.6 प्रतिशत लड़कियां 9वीं और 10वीं कक्षा तक भी नहीं पहुंच पाती हैं। ’सैम्पल रजिस्ट्रेशन सिस्टम बेसलाइन सर्वे’ के सर्वे में शामिल 21 राज्यों में गुजरात लड़कियों की शिक्षा के मामले में 20 वें स्थान पर है। इस सर्वे के अनुसार 15 से 17 साल की स्कूल जाने वाली लड़कियों का राष्ट्रीय औसत छतीसगढ़ में 90.1 प्रतिशत, असम में 84.8 प्रतिशत, बिहार में 83.3 प्रतिशत, झारखंड में 84.1 प्रतिशत, मध्यप्रदेश में 79.2 प्रतिशत, यूपी में 79.4 प्रतिशत और उड़ीसा में 75.3 प्रतिशत है। ये वे लड़कियां है जो हाई स्कूल के पहले ही स्कूल छोड़ देती हैं। अगर 10 से 14 साल की लड़कियों की शिक्षा की छोड़ने की बात करें तो इसमें सबसे निचले पांच राज्यों में उत्तर प्रदेश भी आता है।

कर्नाटक में 30 प्रतिशत से भी अधिक लड़कियों का 18 वर्ष की आयु के पहले विवाह कर दिया जाता है। जबकि वहां की सरकार द्वारा कम उम्र में विवाह न किये जाने को लेकर कई तरह के जागरूक एवं प्रोत्साहित करने वाले कार्यक्रम चलाये जा रहे है। लेकिन आज भी ऐसे कई ढाँचागत सामाजिक कारण है जो सरकार के जागरूक कार्यक्रमों और प्रोत्साहन भरी योजनाओं का मखौल उड़ा रहे है। इनमें से एक कारण स्कूल की भौगोलिक स्थिति का सही न होना, घर के निकट हाईस्कूल का न होना, कई मील पैदल स्कूल जाना आदि है। दूसरा कारण पारंपरिक प्रक्रिया है जो ग्रामीण इलाकों में अधिकांशत नजर आती है। बचपन से ही लड़कियों को, उच्च शिक्षा के लिए तो दूर की बात है, बेसिक ज्ञान देने के लिए ही प्रेरित करना ’बेकार की बात’ है। इसके बजाय उसे शादी के लिए तैयार किया जाता है। लड़की के 14-15 साल के होते ही उसका यौन शोषण का भय, उसकी सुरक्षा का अभाव और शादी कर देने का सामाजिक दबाव आदि भी लड़कियों के स्कूल छुड़वा देने और जल्द शादी कर दिए जाने के अन्य बड़े कारण हैं। गरीब तबकों, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति या अल्पसंख्यक परिवारों की लड़कियां तो इस तरह के जोखिमों से ज्यादा घिरी पायी जाती है। इस तरह के वर्गों के लोगों की शिकायत पर पुलिस का दोस्ताना व्यवहार कैसा होता है, ये हम सब जानते है। फिर ऐसे मामले में अगर किसी रसूखदार का नाम आ गया तो पुलिस पीड़ित के घर झांकने भी नहीं आयेगी। ऐसी ही परिस्थिति से डर कर और सुरक्षा का कोई विकल्प न देखकर माता-पिता अपनी लड़कियों को घर पर ही रखना पसंद करते है या फिर जल्द से जल्द उसका विवाह कर देते हैं। कम उम्र में विवाह, एक के बाद एक बच्चे किसी भी लड़की का स्वास्थ्य और जीवन दोनों तबाह करने के लिए काफी है।

शिक्षा को लेकर सरकार के प्रयासों में भले कमी रही हो लेकिन सरकारी अभियानों से शिक्षा की स्थिति में सुधार आया है. खासतौर पर सर्व शिक्षा अभियान के माध्यम से स्कूल जाने वाले बच्चों की संख्या बढ़ी है। जरूरत बालिका शिक्षा को बढ़ाने और उन्हें उचित वातावरण और सुरक्षा का ’कमिटमेंट’ करने की भी है। हालांकि कई राज्यों ने यह सुनिश्चित करने के लिए प्रभावशाली कदम उठाए हैं कि बच्चे, विशेष रूप से लड़कियाँ, स्कूल जरूर जाए और अधिक से अधिक समय तक अपना पढ़ना जारी रखें। इसी के तहत सरकार आरक्षित वर्ग की छात्राओं के स्कूल ड्राप आउट को कम करने की पहल पर प्रयास कर रही है।  दरअसल केन्द्र सरकार कस्तूरबा गांधी आवासीय बालिका विदयालय को 12वीं तक विस्तार देने की तरफ काम कर रही है। इस मुताल्लिक केन्द्र सरकार ने वित मंत्रालय को बजट सत्र में इस योजना के विस्तार को लेकर फंड मुहैया कराने की मांग की है। सरकार का ये प्रयास निश्चित तौर पर सराहनीय है। अभी तक आठवीं के बाद कक्षा न होने के कारण ड्राप आउट संख्या बढ़ जा रही है। 12वीं कक्षा तक शिक्षा की व्यवस्था हो जाने से इसमें बहुत कमी आएगी। लेकिन सिर्फ 100 बालिकाओं के इस विदयालय के लिए ’नम्बर आॅफ स्टूडेंट’ को बढ़ाने की मांग पर भी सरकार को काम करना होगा। सुरक्षा और शिक्षा की दृष्टि से कस्तूरबा आवासीय विदयालय श्रेष्ठ है। यहां ग्रामीण और गरीब बेटियों के लिए सुरक्षित वातावरण है तो अच्छे आचार-व्यवहार की सीख के साथ, खेलकूद एवं बेहतर शिक्षा की व्यवस्था है। सरकार की इस योजना के तहत निश्चित तौर पर हम आने वाले वर्षों में राष्ट्रीय स्वास्थ्य सर्वे के आंकड़ों को सच्चाई में बदल सकेगें जो कहती है कि बच्चियों के शिक्षित होने से आने वाली पीढ़ी उज्जवल ही नहीं होगी बल्कि आबादी को कंट्रोल करने में भी सक्षम होगी। या मुतरेजा के शब्दों में यूं कहें कि शिक्षा का पूर्ण ’डोज’ किसी ’गर्भनिरोधक’ से बेहतर काम करेगा।




Tuesday, January 16, 2018

आखिर कब थमेंगी असुरक्षित मासूम बचपन की चीख़ें

’पूरा पाकिस्तान एक जनाजे के बोझ के नीचे दबा है, कोई भी अकेली बच्ची इस देश में महफूज नही’...मानवता के खिलाफ उठी इस वीडियो को भारत के हर चैनल ने प्रमुखता से कवर किया तो हर सोशल साइट में खूब शेयर भी हुई। पाकिस्तान न्यूज चैनल की एक एंकर ने, लाइव शो में अपनी बेटी को गोद में बिठाकर, लड़कियों की सुरक्षा के मुद्दे पर जो चिंता जताई, उसने एक बार फिर ’चाइल्ड अब्यूज’ का मामला गरमा दिया। पाकिस्तान के कसूर जिले में आठ साल की जैनब की लाश उनके घर से दो किलोमीटर दूर कूड़े के ढेर में मिली है। पुलिस का कहना है कि बच्ची का रेप करने के उसका बाद कत्ल किया गया। इस खौफनाक वारदात से पाकिस्तान में ही नहीं भारत में भी लोगों में बेहद नाराजगी देखी गई। छह लाख से अधिक सोशल मीडिया यूजर्स ने ’जस्टिसफॉरजैनब’ लिखकर बच्चों के यौन शोषण की व्यापक समस्या पर गहरी चिंता जताते हुए अधिकारियों से कार्रवाई की मांग की। अधिकतर संदेशों में लोगों का भय और शोक नजर आया। दरअसल बच्चे हांे या कोई महिलाएं, वे न तो पाकिस्तान में महफूज है और न ही भारत में। इन देशों में उनकी सुरक्षा की गारंटी न के बराबर है। घर-परिवार में जहां हिंसक और वहशियाना बरताव होता हो, वहां एक बेहतर समाज की कल्पना करना नामुमकिन भी है। बाहर भी वही है तो मासूम बचपन हो या व्यस्क महिला की सुरक्षा कौन करे।
महज चार दिन के भीतर हरियाणा में बलात्कार की तीन घटनाओं ने लोगों को स्तब्ध कर दिया। पानीपत, जींद और फरीदाबाद में हुई इन घ्टनाओं में दो लड़कियां नाबालिग थी। इससे पहले रोहतक, हिसार में हुई घटनाएं महिला सुरक्षा की पोल खोल देते है। हरियाणा हो या उत्तर प्रदेश, दिल्ली या कोई फिर और स्टेट हो, हर जगह औरत और बच्चों की सुरक्षा दांव पर लगी है। परिवार हो, पड़ोस हो, प्ले-स्कूल हो, ट्यूशन हो या फिर क्रेच...उनकी सुरक्षा को लेकर माता-पिता संदेह के घेरे में है। हाल ही में भारत सरकार द्वारा कराए गए एक सर्वे में पाया गया कि देश के आधे से भी अधिक बच्चे कभी ना कभी यौन दुर्व्यवहार का शिकार हुए हैं। इसमें ज्यादा चिंता की बात यह है कि इनमें से केवल 3 फीसदी मामलों में ही शिकायत दर्ज की जाती है। शिकायत न दर्ज होना मामले को दबा देता है और इससे अपराध में बढ़ोत्तरी ही होती देखी गई है। यौन शोषण कंे मामले में अक्सर चुप्पी साधना ही विकल्प समझा जाता है। अब इसकी वजह धमकी है या समाज का डर, परिस्थिति पर निर्भर करता है।
बहुत ही मासूम और निर्दोष होता है बचपन। उसे किसी पर शक-संदेह करना नहीं आता। एक टाॅफी के नाम पर वह आपका हो जाता है। उसकी मासूम मुस्कुराहट किसी के मन के मैल को पढ़ना नहीं जानती। मजहब, जात-पात, ऊंच-नीच, अमीरी-गरीबी से परे बचपन को राजनीति करनी नहीं आती। हर शक्ल में अपना जैसा चेहरा ढूंढने वाले ऐसे पाक साफ बचपन को कुचलने वाला आदमी किसी वहशी दंरिदे से कम नहीं। अफसोस कि ऐसे दंरिदे आज कहां किस रूप में बैठे है, कहना मुश्किल है। पानीपत की हालिया घटना है जिसमें मुंहबोले नाना-मामा ने लोहड़ी देने के बहाने उसके साथ दुराचार किया और फिर उसे जान से भी मार दिया। नोएडा के एक मदरसे में 8 साल की बच्ची के साथ दुष्कर्म की कोशिश की गई। शर्म की बात है कि हम जिस समाज में रहते है वहां की असलियत दरअसल कुछ और है।
सच तो ये है कि हम जैसे माता-पिता ये उनके साथ हुआ है की सोच या फिर अपने बच्चे से ज्यादा रिश्तेदार या पड़ोसी की बात पर यकीन कर जाने की सोच पर व्यवहार करते है। तो ये सोच गलत है। इसलिए एक बात पूरी तरह से दिल में बैठा ले कि ये उसका बच्चा था, उसके साथ हुआ और हमारे बच्चे या बच्ची के साथ ऐसा कुछ नहीं हो सकता, सोचना ही गलत है। ये बच्चा आपका भी हो सकता है कि सोच ही इस तरह के कुकर्म को होने से रोक सकती है। दूसरी ये सोच कि बच्चे को नुकसान कोई दुश्मन या कोई पराया पुरुष या महिला ही पहुंचा सकती है, निहायत बेतुकी सोच है। क्योंकि इस तरह की कई घटनाओं से यह पूरी तरह स्पष्ट हो चुका है कि बच्चों को शिकार बनाने वालों में 92 प्रतिशत जिम्मेदार रिश्तेदार या दूर पास के जानने वाले होते हैं। एक तो बच्चे बेरोक टोक इनके पास आते-जाते है। दूसरे इन्हें मालूम होता है कि माता-पिता जल्दी बच्चे की बात पर यकीन नहीं करेगे। इस तरह की सोच भी ऐसे मामलों को बढ़ावा ही देती है। कोई माने या ना माने, कहे या न कहे, 95 प्रतिशत लोगों का बचपन कभी न कभी किसी न किसी बहाने से यौन शोषण का शिकार बना है। इनमें से अघिकांशतः कुछ डर से तो कुछ शर्म से अपनी तकलीफ का बयान उम्र भर नहीं कर पाते, तो कहीं मां-बाप की अनदेखी या व्यस्तता उन्हें उनके करीब जाने से रोकती है। और ये बात स्वंय माता-पिता से बेहतर कोई नही जानता।
एक नजर सरकार के ’बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ अभियान की ओर भी डालते है। जिस तेजी से इसका प्रचार-प्रसार किया जा रहा है, क्या वाकई में उस तेजी से बेटियां बचाई भी जा रही है। आये दिन की इन घटनाओं से लगता तो नहीं। सरकार समझें कि बेटी बचेंगीं तो ही पढ़ेगी। अगर बेटी बचाने से मकसद सिर्फ भ्रूण हत्या को रोकने से है, तो जो जिंदा है, असुरक्षित माहौल में जीने को मजबूर है, उनका क्या? भय का आलम ये है कि अगर किसी मां का बच्चा थोड़ी देर के लिए भी आॅंख से ओझल होता है तो अनहोनी की आशंका से उसका दिल काॅंप उठता है। फिर बलात्कार जैसी घटनाएं तो पूरे परिवार की मनःस्थिति को बिगाड़ देती है। बेटे से ज्यादा जवान होती बेटी की सुरक्षा की चिंता मां-बाप को खाती है। लेकिन जब बचपन ही खतरे में पड़ जाये तो कहां जाये। बेटी बचाओ के अन्तर्गत भ्रूण रक्षा से आगे, े अस्तित्व रक्षा का भी संकल्प होना जरूरी है। सुरक्षा के लिए ऐप बना देने से या मोबाइल पर एक नंबर शुरू कर देने से सुरक्षा का दावा नहीं किया जा सकता। फिर बलात्कार जैसे जघन्य अपराध तो व्यक्ति की मनोदशा पर निर्भर करते है। उसमें लड़का है कि लड़की, ये मायने नहीं रखता। ऐसे में महज मनोवैज्ञानिक कारणों के निदान की तलाश जरूरी है। हालांकि एक सच ये भी है कि हर बात का ठीकरा सरकार पर भी नहीं फोड़ सकते। लेकिन सरकार स्कूल, क्रेच या ट्रेनिंग सेंटर को तो सख्त नियम-कानून के अंदर लाये जा सकते है।
मुझे याद है दिल्ली में हुए निर्भया रेप कांड के बाद भारत में महिलाओं की सुरक्षा एक बड़ा मुद्दा बन गया। यहां तक कि 2014 के आम चुनाव में भाजपा ने इसे चुनावी मुद्दा भी बना दिया। उस वक्त अपनी चुनावी सभाओं में मोदी ने ’एक्ट नहीं एक्शन’ और ’गुड गवर्नेंस’ का नारा भी दे दिया था। भाजपा जीत कर आ गई लेकिन महिलाओं की सुरक्षा का मुद्दा जस का तस रहा। उसके बाद की जो स्थिति है वह आंकड़ो में सामने है। 2015 में देश भर में बलात्कार के 34,000 से ज्यादा मामले सामने आए। 2016 में यह संख्या बढ़कर 34,600 के पार चली गई। ये संख्या तब है जबकि कईक मामले घर की चारदीवारी में ही दफन हो जाते है। समाज-शर्म की बेड़ियां थानों तक पहंुचने की हिम्मत नहीं दिखा पाती। जीडीपी ग्रोथ के मुकाबले यहां स्थिति में होता इजाफा देश की शर्मनाक स्थिति को दर्शाता है। ’एक्ट नहीं, एक्शन चाहिए’ कहने वाले मोदी अब प्रधानमंत्री है। उनके सामने हजारों मसले हैै, लेकिन क्या महिलाओं की सुरक्षा का मसला किसी भी अन्य समस्या की तुलना में कम है। इस बिगड़ती मनोदशा का जिम्मेदार जो भी हो, उस पर लगाम लगाया जाना जरूरी है। जरा सोचिये उस मासूम बचपन की जो ऐसे हादसों में जान की बाजी तो जीत जाते है लेकिन मन की कुंठा से जीवन भर मुक्त नहीं हो पाते। आखिर क्यों? तो इसका जबाब है एक अनाम कवि की ये पक्तियां
बचपन से हर शख्स याद करना सिखाता रहा,
भूलते कैसे है ? बताया नही किसी ने.....

Thursday, January 11, 2018

लघु कथा/ मोती

घर के दरवाजे पर बंधे चार बड़े-बड़े तंदरूस्त, अपने साथियों को देखकर वह समझ गया था कि इस घर के मालिक उनसे बहुत प्यार करते है। और फिर कई दिन की ’रेकी’ करने के बाद ही, यह सोचकर वह भी निश्चिन्त हो पाया था कि यही घर उसके लिए भी ’परफेक्ट घर’ बन सकता है। दिन भर इधर-उधर मारे-मारे फिरने, दूसरों की गालियां खाने से तो अच्छा है  िकवह भी इस घर में अपने इन साथियों के साथ रहे।

लेकिन घर में दाखिला कैसे लिया जाये, यह उसे समझ नहीं आ रहा था। दो तीन दिन घर के चारों ओर चक्कर लगाने के बावजूद उस पर किसी की नजर ही नहीं पड़ रही थी। नजर पड़े भी तो कैसे? उसका न तो कोई डील-डौल है और न ही देखने में शक्ल प्यारी। गली कूचे में कोई देखता तो उसे दुत्कार ही देता। पर अब उसे इसकी परवाह नहीं करनी चाहिए। उसे तो बस इस घर में कैसे आसरा पाया जाये, यही सोचना है।

और उस दिन उसे घर की स्वामिनी जिसे सब ’मनीषा’ पुकार रहे थे, उसे नजर आ गई। कैसा तो प्यार झलक रहा था उनकी आॅंख से। उसने तय कर लिया कि वह इस गृहस्वामिनी को अपना बना के रहेगा। फिर क्या था उसने अपनी इस नई मालकिन पर नजर रखनी शुरू कर दी। एक दिन सुबह-सुबह जब वह अपने उसके साथियों को टहलाने घर से निकली, वह भी उनके पीछे-पीछे कुछ दूरी बनाकर चलने लगा। उनके पीछे चलते हुए वह सोच रहा था कि ऐसा क्या करे कि मालकिन की नजर उस पर पड़ जाये।

घर को लौटते समय वह उनके बिल्कुल करीब पहुंचने की कोशिश करने लगा। जाहिर है उसके साथियों को उसका ये व्यवहार अच्छा नहीं लगा। लेकिन वह उनके पास आता गया। तभी उनमें से एक ने उस पर झपटा मारा, लेकिन मालकिन ने उसे अपनी तरफ खींच लिया। और इसी समय उनकी नजर उस पर पड़ गई। उसने भी तुरंत एक्शन दिया और अपनी दुम जोर-जोर से हिलाकर खुशी का इजहार करने लगा। वह भी मुस्कुरा दी। बस फिर क्या था? उसे तो जैसे बोटी दिख गई। वह भी उनके पीछे-पीछे चल पड़ा।

घर के गेट पर पहुंच कर वह रूक गया और उसके वे चारों बिरादर भीतर जाकर दालान में बैठ गये। मालकिन भीतर चली गई। वह गेट पर खड़ा रहा। भीतर जाना चाहता था लेकिन उन खुूंखार साथियों के कारण उसकी हिम्मत नहीं हो रही थी। तभी उसने देखा घर की मालकिन उनका खाना लेकर आई। उन्होंने बारी-बारी से सबको सहलाते हुए खाना दिया। और ये क्या....वह तो अब उसकी ओर आ रही है। गेट के बाहर आकर उन्होंने उसका खाना रख दिया और उसे देखते हुए मुस्कुराते हुए फिर घर के अंदर चली गई। वह उन्हें जाते देखता रहा, मगर खाने को मुंह तक नहीं लगाया। उसे ये बात बहुत बुरी लगी कि उन्होंने उसको पुचकारा तक नहीं।

कुछ देर बाद उसने देखा वह बाहर आई और बैठकर उसके साथियों के साथ खेलने लगी। उनकी नजर उस पर भी पड़ी। उसको खाना न खाते हुए देखकर शायद उन्हें अपनी गलती का अहसास हुआ। वह उठी और उसके पास आकर उसे सहलाने लगी। जैसे ही उन्होंने प्यार से पुचकारते हुए उसे ’मोती’ पुकारा, उसे तो जैसे अपनी दुनिया मिल गई। फिर वह उसे गेट के भीतर ले गई और अपने हाथ से खाना खिलाने लगी। उसके साथी गुर्रा रहे थे। लेकिन उसे अब उनकी परवाह नहीं थी। वह जो अब मालकिन की शरण में था।

उस दिन के बाद से उसकी घर के गेट के भीतर इंट्री को कोई नहीं रोक सका। मालकिन भी जब सबको खाना देती तो उसके पास आकर उसे भी खाना देती और हां, उसको पुचकारना और उस पर हाथ फेरना नहीं भूलती। मोती खा पीकर दिन भर इधर-उधर घूमता रहता। धीरे-धीरे उसकी उन चारों से भी दोस्ती हो गई। कभी-कभी वह उनके काम भी कर देता। घर की हिफाजत करना अब उसकी भी जिम्मेदारी थी। सब बहुत अच्छा चल रहा था कि...

एक दिन पड़ोस के गुप्ता जी मालिक से मोती की शिकायत करने पहुंच गये। उनको नाराजगी थी कि मोती रोज अपनी ’शिट’ उनके गेट पर कर जाता है। बात सही थी। मोती उनसे बहुत चिढ़ता था। उन्होंने कई बार मोती को आवारा कह कर झिड़का भी था। लेकिन अभी तो वह उसके मालिक-मालकिन पर नाराज हो रहे है। उसे गुस्सा तो बहुत आ रहा है, लेकिन वह क्या करे? उसने देखा उसकी मालकिन उसकी ओर देख-देखकर कुछ बोल रही है। बाद में मोती को उन्होंनेअऐसा न करने के लिए बहुत समझाया। मोती ने उनकी बात रखी भी।

लेकिन कुछ दन बाद शर्मा अंकल मोती की शिकायत लेकर आ गये। उसके कुछ दिन बाद महेश अंकल, सुनीता आंटी मालिक से बहस करने पहुंच गये। मोती देख रहा था मालिक परेशान हो रहे थे, लेकिन वह मालकिन की वजह से कुछ कर नहीं पा रहे थे। सब मालिक पर उसे वहां से भगा देने का दबाव बना रहे थे। उस दिन अचानक ’डाॅग-कैचर’ का नाम सुनकर मोती के कान भी खड़े हो गये थे। उस वक्त तो वह वहां से भाग लिया। लेकिन मालकिन की एक आवाज पर वह फिर चला आया और उनका दुलार पाकर सब भूल गया। आखिर मालकिन की मोहब्बत में वह कालोनी छोड़ कर दूसरी जगह भी तो नहीं जा सकता।

और फिर एक दिन उसने ’डाॅग-कैचर’ गाड़ी को देखा। उनसे छुप कर वह भाग निकला। उसके बाद तो कई दिन तक ये लुक्का-छुपी का खेल चलता रहा, पर वह उनके हाथ नहीं लग सका। लेकिन एक दिन वह हो गया, जिसकी मोती को भी उम्मीद नहीं थी। उसे ’डाॅग-कैचर’ वालों ने पकड़ लिया। अपने पकड़े जाने का उसे दुख नहीं था। उसे तो इस बात का सदमा था कि उसे पकड़वाने में मदद करने वाला कोई और नहीं उसकी मालकिन थी। कितने प्यार से उन्होंने रोज की तरह उस दिन भी, उसे आवाज देकर बुलाया और खाना दिया। साथ बैठी रही और पुचकारती भी रही। ठीक उसी समय ’डाॅग-कैचर’ वालों ने उसे पकड़ लिया। वह खूब चिल्लाया, गुर्राया। न उन लोगों ने छोड़ा, न मालकिन ने उनसे उसे छोड़ने को कहा। बस चुपचाप उसे जाते देखती रही। लेकिन गाड़ी में बंद होते-होते मोती ने देखा कि वह अपनी आंख के आंसू पोंछ रही थी और ऊपर वाले शर्मा जी अपनी खिड़की से झांकते हुए मुस्कुरा रहे थे।