Thursday, November 7, 2024

चीन के साथ सीमा गश्त समझौते की रिपोर्ट 'सलामी-स्लाइसिंग' न निकले

 भारत की असल चिंता का विषय भरोसा और चीन की अस्पष्ट नीति है?



रूस द्वारा आयोजित कजान ब्रिक्स शिखर सम्मेलन 2024 ने तस्वीर का एक नया रूख पेश किया, जो आज तक चले आ रहे कयासों से पूरी तरह से अलहदा नजर आ रहा है। कज़ान में दोनों नेताओं के एक खुशनुमा माहौल में औपचारिक हाथ मिलाने से जो संकेत जो मिला, उसे देख कर लग रहा है कि भारत और चीन अपने संबंधों के अगले चरण में आगे बढ़ने के लिए तैयार हैं।

भारत और चीन अपनी साझा हिमालयी सीमा पर गश्त करने के लिए एक समझौते पर आखिकार पहुँच ही गए हैं। सीमा समझौता पर मनमुटाव दूर करने की बात दोनों पक्षों के राजनयिक और सैन्य वार्ताकारों के बीच हफ्तों की गहन बातचीत के बाद तय हुआ। दोनों पक्ष सीमा को लेकर प्रासंगिक मामले पर एक समाधान पर पहुँच गए हैं, जिसे चीन अनुकूल मान रहा है और भारत भी आगे बढ़कर इसका स्वागत कर रहा है। इस समझौते की रूपरेखा बनने से पूर्व भी शी और मोदी 2023 में जोहान्सबर्ग में हुए ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान भी एक बैठक कर चुके है, जहां इन नेताओं ने “स्पष्ट और गहन विचारों का आदान-प्रदान” भी किया, लेकिन यह उस वक्त साफ नजर आ रहा था कि दोनों पक्ष एक मत नहीं थे। इसीलिए उस समय जारी किए गए आधिकारिक बयानों ने उक्त बैठक की अलग-अलग व्याख्याएँ नजर आई थी। लेकिन रूस द्वारा आयोजित कजान ब्रिक्स शिखर सम्मेलन 2024 ने तस्वीर का एक नया रूख पेश किया, जो आज तक चले आ रहे कयासों से पूरी तरह से अलहदा नजर आ रहा है। कज़ान में दोनों नेताओं के एक खुशनुमा माहौल में औपचारिक हाथ मिलाने से जो संकेत जो मिला, उसे देख कर लग रहा है कि भारत और चीन अपने संबंधों के अगले चरण में आगे बढ़ने के लिए तैयार हैं।

जाहिर है, भारत और चीन के बीच किसी भी तरह की नरमी का माहौल बन जाने पर वैश्विक भूराजनीति भी प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकेगी। भारत पश्चिम और दक्षिण पूर्व एशिया का केन्द्र बिंदु है। चीन के विरूद्ध अमेरिका की दिलचस्पी का केन्द्र भारत है तो पश्चिम विरोधी रूस भी चीन की दोस्ती निभाने में भारत के महत्व को नहीं भूलता। अमेरिका जहां बीजिंग के प्रति संतुलन का भाव बनाये रखने के लिए भारत की ओर देखता है वही दक्षिण एशियाई देश भारत की भूराजनीति पर दिलचस्पी बनाये रखते है।  चीन, ब्रिक्स में ‘ग्लोबल साउथ’ के लिए एकजुटता के माध्यम से अपनी ताकत को बढ़ाकर साउथ ईस्ट एशिया में खुद को देखने की इच्छा रखता है। उसकी ये मंशा चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता के इस बयान में साफ हो जाती है, जो कहते है कि चीन अन्य पक्षों के साथ मिलकर ब्रिक्स सहयोग के स्थिर एवं सतत विकास के वास्ते प्रयास करने तथा ‘ग्लोबल साउथ’ के लिए एकजुटता के माध्यम से शक्ति प्राप्त करने और संयुक्त रूप से विश्व शांति एवं विकास को बढ़ावा के लिए एक नए युग के द्वार खोलने के लिए तैयार है। ‘ग्लोबल साउथ’ शब्द का उपयोग आर्थिक रूप से कम विकसित देशों या विकासशील देशों को संदर्भित करने के लिए आम तौर पर किया जाता रहा है। इन देशों में खासकर एशिया, अफ्रीका और लातिन अमेरिका जैसे देश आते हैं।

व्यवहारिक तौर से सलामी-स्लाइसिंग रणनीति का आदी रहा चीन

ऐतिहासिक रूप से, चीन को ‘सलामी-स्लाइसिंग’ रणनीति के तहत काम करने के लिए जाना जाता है, जो समझौते तो सहयोग की नीति के रूप में करता है, लेकिन अपने दावों को क्रमिक रूप से ही आगे बढ़ाता है। यह अस्पष्टता नये समझौतों संदेह का कारण बनती है और सवाल खड़ा करती है कि क्या नवीनतम समझौता शांति की दिशा में एक वास्तविक कदम होगा या ये एक बार फिर भारत को महज संतुष्ट करने करने का एक सामरिक कदम भर है। दरअसल अभी तक चीन अक्सर अपने बयानों को लेकर कम पारदर्शी रहा है, जो बीजिंग के वास्तविक इरादों पर सवाल उठाता है। इसलिए सोचने वाले तो ये भी सोच रहे कि बढ़ते तनाव के बीच कहीं ये एक अस्थायी शांति की नुमाइश न हो। संदेह का आलम ये है कि भारतीय इसे चीन द्वारा, सीमा पर अपनी स्थिति को मजबूत करने और आगे के बुनियादी ढांचे का निर्माण करने हेतु, समय खरीदना मान रहे है। इस तरह के विश्वास की कमी भारतीय क्षेत्रों में दीर्घकालिक स्थिरता प्राप्त करने में एक बुनियादी बाधा बनी हुई है। आम राय को सुना जाये तो सभी भारत को कूटनीतिक प्रगति पर नजर बनाये रखने के साथ-साथ सतर्क और चौकस रहने की भी हिदायत करती है।

भूराजनैतिक संबंधों में प्रगति की इस घोषणा के बावजूद भारत के लिए चिंता का विषय पूर्व के समझौते है जिनके मामले मे चीन अक्सर कम पारदर्शी नजर आया है और यह बात बीजिंग के वास्तविक इरादों पर सवाल उठाने से भारत और भारतीयों की सोच को रोक नहीं पा रही। हालांकि अपने नरम मिजाज के चलते नई दिल्ली इन संबंधों को कुछ और वक्त देने से पीछे भी नहीं हटना चाहती। गश्त व्यवस्था पर भारत और चीन के बीच हुए समझौते को सावधानी से अपनाने की जरूरत है। जमीनी हकीकत से इसकी पहली परीक्षा होगी। अगर यह समझौता जमीनी तौर पर भी खरा उतरता है, तो नि-संदेह ये निरंतर कूटनीतिक प्रयासों की सफलता और आगे के सैन्य टकरावों से बचने में साझा हित को दर्शा सकता है।मैकेनाइज्ड फोर्सेज के पूर्व महानिदेशक लेफ्टिनेंट जनरल एबी शिवाने अपने एक लेख में इसी संदेहास्पद स्थिति पर सलाह देते हुए कहते है कि बावजूद इसके कि भारतीय रक्षा बल चीनी लोगों की किसी भी गलतफहमियों को रोकने और देश की क्षेत्रीय अखंडता सुनिश्चित करने के लिए पूरी तरह तैयार रहता हैं, फिर भी चीनी गिरगिट संस्कृति को देखते हुए भारत के लिए यह समझदारी होगी कि वह किसी भी तरह की लापरवाही अपने पड़़ोसी को लेकर न बरते।

गौर करने वाली है कि यह मौजूदा समझौता केवल देपसांग और डेमचोक के लिए है।  समझौते में कुछेक बातें पूरी तरह से साफ नहीं है जैसे विघटन प्रक्रिया में शामिल सैनिकों की संख्या बल का तय होना और न ही फिलहाल यह साफ है कि कितने प्रतिशत सैनिकों को हटाया जाना है। सूत्रों के अनुसार यह एक गतिशील प्रक्रिया है, अभी से इस पर निश्चित तौर से कुछ नहीं कहा जा सकता। दरअसल पूर्व के समझौतों के कागजी किस्से से ज्यादा हर कोई ़जमीनी तौर पर दिखाई देने वाली गतिविधियों पर भरोसा करना चाहता है। जैसा कि सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी का कहना है कि दोनों सेनाओं की पहली प्राथमिकता बफर ज़ोन में “घुसपैठ न करके” एक-दूसरे में “विश्वास बहाल करना” होगा, “अप्रैल 2020 की यथास्थिति पर वापस जाना” और फिर एलएसी के “विघटन, डी-एस्केलेशन, सामान्य प्रबंधन” पर विचार करना होगा। गश्त करने से आपको इस तरह का लाभ मिलता है और जैसे-जैसे हम विश्वास बहाल करेंगे, अन्य चरण भी आगे बढ़ेंगे।”

भारत चीन के बीच सीमा-गश्त समझौता विशेषज्ञों की राय में

आपको अगर याद हो तो इस साल की शुरुआत में जारी आर्थिक सर्वेक्षण 2023-24 में निर्यात को बढ़ावा देने और चीन के साथ बढ़ते द्विपक्षीय व्यापार घाटे को संबोधित करने के लिए चीन से अधिक एफडीआई प्रवाह का मामला दृष्टिगोचर हुआ था। इस गश्त समझौते से व्यापार संबंधों में सुधार की बहुत संभावना नहीं दिखाई देती। इसके लिए लंबे समय तक के नीति संशोधन की आवश्यकता होगी, लेकिन बावजूद इस बात पर यकीनी तौर पर कहा जा सकता है कि इस समझौते से ऐसी संभावना के लिए द्वार खुलेंगे जो भविष्य में वैश्विक दृष्टिकोण से दोनों देशों के लिए लाभकारी साबित हो सकते है, बशर्ते मंशा ईमानदार हो।

इस संदर्भ में भारत चीन मामलों के जानकार और कलिंगा इंस्टिट्यूट में इंडो-पैसिफ़िक स्टडीज़ के फ़ाउंडर और चेयरमैन प्रोफ़ेसर चिंतामणि महापात्र के विचारों पर गौर करे तो वे इसे एक अच्छी शुरुआत मानते है। उनके अनुसार पिछले कुछ महीनों में कूटनीतिक और सैन्य स्तर पर जो वार्ताएं हुई हैं, ये उसका ही नतीजा है कि तनाव कम करने पर एक समझौते की बात सामने आई। लेकिन वे यह भी मानते है कि सिर्फ एक समझौते से दोनों देशों के बीच सारे तनाव काफूर हो जाएंगे ऐसा तो नहीं हो सकता। मगर रिश्तों के सामान्य होने की प्रक्रिया में यह एक पहला कदम माना जा सकता है। उनके नजरिए से अभी समझौता ‘डिसएंगेजमेंट’ हुआ है, जिसका मतलब है कि कुछ इलाक़े में ये हो चुका है और कुछ इलाक़ों में ये होना बाकी है।

ब्रुकिंग्स इंस्टीट्यूट में सीनियर फ़ेलो तनवी मदान ने सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म एक्स पर लिखते है कि 2017 में डोकलाम संकट भी ब्रिक्स शिखर सम्मेलन से पहले हल हो गया था और उस वक्त भी इसने पीएम मोदी के चीन दौरे का रास्ता बनाया था। उस समय भी भारत-चीन कुछ भूराजनीतिक समस्याओं का सामना कर रहा था। तक्षशिला इंस्टीट्यूट के डायरेक्टर नितिन पाई भी एक्स पर लिखते है कि भारत चीन सीमा पर शांति लाने के लिए कुछ समझौता हुआ है। लेकिन अभी से जश्न न मनाएं, क्योंकि बीजिंग की नीतियों में ऐसा कुछ नहीं दिखता जिससे पता चले कि उसके आक्रामक रुख़ में बदलाव आ गया है। उनके अनुसार विदेश सचिव विक्रम मिस्री के बयान में सिर्फ इतना ही कहा है कि डिसएंगेजमेंट पर समझौता हुआ है। उसमें ये साफ़ नहीं है कि विवाद के बाकी बिंदुओं पर इस समझौते का क्या असर पड़ेगा। हालांकि विदेश मंत्री जयशंकर ने देपसांग का ज़िक्र करते हुए कहा कि अन्य इलाक़ों में भी पेट्रोलिंग होगी। प्रोफ़ेसर चिंतामणि महापात्र का कहना है कि ऐसा लगता है कि जो ताज़ा एलान हुआ है उसमें कई मुद्दों पर सहमति बनी है। उनके अनुसार, यह भारत-चीन के साथ प्रशांत क्षेत्र के लिए भी बहुत अच्छी ख़बर है।

वैश्विक नजरिए से समझौते की टाइमिंग भी गौरतलब है

पीएम मोदी और शी जिनपिंग के बीच, अगस्त 2023 में दक्षिण अफ्रीका के जोहानिसबर्ग में हुई ब्रिक्स की बैठक के दौरान हुई बातचीत से पहले 2022 में जी20 देशों के सम्मेलन में भी दोनों नेता पहुंचे थे लेकिन उस वक्त उनके बीच द्विपक्षीय वार्ता का अवसर नहीं बन सका। तेजी से परिवर्तित होती विश्व भू राजनीति में हाल के बरसों में चीन और पश्चिमी देशों के बीच संबंध उतने सहज नहीं रहे हैं। शिव नादर यूनिवर्सिटी में एसोसिएट प्रोफेसर और चीनी मामलों के विशेषज्ञ प्रोफ़ेसर जबिन टी जैकब बीबीसी हिंदी को दिये गयो एक साक्षात्कार में कहते है कि, भारत के साथ संबंधों को सामान्य बनाने की पहल के पीछे कुछ हद तक चीन की परिस्थितियां भी ज़िम्मेदार हैं। चीन का अमेरिका के साथ संबंध बहुत ख़राब दौर में है और अगले महीने अमेरिका में चुनाव भी हैं। उनका मानना है कि चीन ये मान चुका है कि अमेरिका का अगला राष्ट्रपति चाहे जो भी हो, उसके साथ रिश्तों पर कुछ भी फर्क नहीं पड़ने वाला है। यूक्रेन जंग के दौरान रूस के साथ असीमित सहयोग के समझौते से भी चीन और पश्चिमी देशों में टकराव बढ़ रहा है। देखा जाए तो चीन इस समय अंतरारष्ट्रीय स्तर पर मुश्किल में है और घरेलू स्तर पर भी उसकी आर्थिक प्रगति धीमी बनी हुई है। ऐसे में चीन को अपनी विदेश नीति में थोड़ी बहुत फेरबदल करने की ज़रूरत के साथ-साथ थोड़ा लचीला रुख़ दिखाना भी ज़रूरी है।

इस समझौतें की टाइमिंग भी गौरतलब है। विशेषज्ञों का मानना है इस समझौते की घोषणा अचानक ही नहीं की गई। दोनों देशों के बीच अधिकारी स्तर पर पहले कई वार्ताओं के दौर चले। आपसी समझ बैठने के बाद इसकी घोषणा के लिए परफेक्ट टाइमिग का इंतजार किया जा रहा था। ब्रिक्स सम्मेलन इसके लिए मुफीद मौका था। एक तो सम्मेलन रूस में था, फिर रूसी राष्टपति ब्लादीमीर पुतिन का भारत के प्रति नरम रूख सर्वविदित है। चीनी नेता से उनकी दोस्ती भी जगजाहिर है। कहीं न कहीं अपने दोनों दोस्तों के प्रति सद्भाव की भावना ही रूसी राष्टपति को नेपथ्य में अपनी अग्रणी भूमिका निभाने को बाध्य की हो तो कोई आश्चर्य की बात नहीं।

ब्रिक्स देशों के शिखर सम्मेलन के उद्घाटन से एक दिन पहले की गई इस घोषणा ने आपसी संबंधों में जमी बर्फ को थोड़ा सा पिघलने में मदद की। भारतीय व्यापार लॉबी का दबाव ने भी भारत सरकार को चीन के साथ समझौता करने के लिए मजबूर करने में अग्रणी निर्णायक भूमिका निभाई। इसकी वजह से भारतीय कंपनियाँ का चीनी विनिर्माण आपूर्ति श्रृंखलाओं और प्रौद्योगिकी पर बहुत अधिक निर्भर होना हैं।

निष्कर्ष

इस समझौते से सरकी घंुध की चादर अगर सही मंशा के साथ हटती चली जायेगी तो निकट भविष्य में दोनों देश आर्थिक ही नहीं विश्व परिदृश्य में उन्नति के शिखर पर साथ-साथ आगे बढ़ते जायेगें। फिलहाल अभी ये बात स्पष्ट नहीं की गई है कि वास्तविक नियंत्रण रेखा पर गश्त किस तरह से की जाएगी। दोनों देशों के बीच 2,100 मील की सीमा है, जो 1962 में भारत और चीन के बीच युद्ध के बाद खींची गई थी।

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https://orcasia.org/article/911/cana-ka-satha-sama-gashata-samajhata-ka-raparata-salma-salisaga-na-nakal



Friday, September 20, 2024

भारत के लेह सड़क निर्माण पर चीन की बढ़ती बैचेनी और ऐतराज

 पहला ऑल-वेदर रोड कनेक्शन भारत के लिए बेहद उपयोगी



चीन ने पहले ही वास्तविक नियंत्रण रेखा के करीब सभी मौसम वाली सड़क नेटवर्क विकसित कर चुका है लेकिन भारत के लद्दाख क्षेत्र की राजधानी लेह तक जाने वाली एक नई सड़क के निर्माण पर उसे आपत्ति है। अपनी-अपनी सीमाओं की सुरक्षा के लिए किए जा रहे निर्माण कार्य पर चीन की इस तरह की दोहरी सोच आपसी संबंधों को संदेहास्पद स्थिति से उबरने नहीं देती।

 चीनी मीडिया हाउस पेपर’ का कहना है कि भारतीय सेना ने युद्ध संचालन का समर्थन करने के लिए लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) के पास दो सबसे अधिक ऊंचाई वाली टैंक रखरखाव सुविधाएं स्थापित की हैं। लेख में यहां तक कहा गया है कि विकास के चार महीने बाद, भारत ने रक्षा मंत्रालय के तहत सीमा सड़क संगठन (BRO) के साथ आगे कदम बढ़ाते हुए चीन-भारतीय सीमा पर गहन अवसंरचना विकास की घोषणा की है। दरअसल चीनी मीडिया का विशेष ध्यान भारत में लद्दाख क्षेत्र की राजधानी लेह तक जाने वाली एक नई सड़क के निर्माण पर था। लेख के अनुसार, अगस्त 2020 में, ग्लोबल टाइम्स ने बताया था कि भारत गुप्त सैन्य और टैंक आंदोलनों को सक्षम करने के लिए मनाली से लेह तक एक नई सड़क का निर्माण कर रहा है, जिससे यात्रा का समय 3 से 4 घंटे कम हो जाएगा और पाकिस्तानी सेना द्वारा लक्षित रास्तों से बचा जा सकेगा।

जबकि चीन पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर पीओके में सियाचिन के पास कंक्रीट निर्मित सड़क निर्माण शुरू कर चुका है। यह सड़क अवैध रूप से कब्जाए गए कश्मीर में बनाई जा रही है. जो दुनिया के सबसे ऊंचे युद्धस्थल सियाचिन के नॉर्थ में बन रही है। सैटेलाइट की ताजा तस्वीरों से इस बात का खुलासा हुआ है। पीओके में किए जा रहे इस सड़क निर्माण का खुलासा उस वक्त हुआ जब यूरोपियन स्पेस एजेंसी की ओर से सैटेलाइट तस्वीरें जारी की गईं। इन तस्वीरों में साफ नजर रहा है कि चीन की ओर से आघिल पास के पास सड़क का निर्माण शुरू कर दिया गया है।

पहला ऑल-वेदर रोड कनेक्शन भारत के लिए है महत्वपूर्ण

चीन के इस बयान से इतर चीन और भारत के बीच वास्तविक नियंत्रण रेखा के करीब रणनीतिक रूप से स्थित लेह की ओर जाने वाली इस सड़क के पूरा होने पर भारत को देश को अन्य हिस्सों से जुड़ने वाला अपना पहला ऑल-वेदर रोड कनेक्शन प्राप्त हो जायेगा। सुरंग के 2025 तक पूरा होने की संभावना है। क्षेत्र में सभी मौसम वाली सड़कों की अनुपस्थिति में रसद बनाए रखना, विशेष रूप से लद्दाख की कठोर सर्दियों के दौरान, हमेशा सुरक्षा रणनीतिकारों के लिए चिंता का विषय रहा है। वर्तमान में, सुरक्षा बल सीमाओं पर सतर्कता बनाए रखने के लिए महीनों पहले से ही राशन और गोला-बारूद का स्टॉक कर लेते हैं। निम्मू-पदम-दारचा सड़क हिमाचल प्रदेश के मनाली से सिर्फ 298 किमी दूर है। यह तीसरी धुरी है और वर्तमान में चालू मनाली-लेह सड़क (428 किमी) और श्रीनगर-लेह सड़क (439 किमी) की तुलना में सबसे छोटा मार्ग है।

तारीफ की बात है कि इसी वर्ष 27 मार्च को हासिल की गई बीआरओ सीमा सड़क संगठन की सफलता ने चीन और पाकिस्तान की नज़रों से दूर, सबसे सुरक्षित आयुध डिपो के लिए दूर-दराज की ज़ांस्कर घाटी को खोलने का मार्ग प्रशस्त किया है। कारगिल में ज़ांस्कर रेंज, एक अनूठी स्वदेशी संस्कृति का घर, ज़ांस्कर घाटी को लेह की सिंधु घाटी से अलग करती है। यह भी सत्य है कि एक बार जब पश्चिमी लद्दाख की ज़ांस्कर घाटी में शिंकुला सुरंग खुल जाएगी, तो पाकिस्तान और चीन से घिरे उत्तरी और पूर्वी क्षेत्रों के करीब से गुजरने वाले मौजूदा मार्गों की तुलना में लद्दाख में सैनिकों का जमावड़ा बहुत तेज और कम उजागर होगा।

क्या है भारत चीन के बीच की जमीनी हकीकत

भारत और चीन के बीच मौजूदा सीमा विवाद के बीज तभी बो दिए गए थे जब 1950-51 में पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना ने तिब्बत पर कब्जा कर लिया था। इसी के बाद 1959 में तिब्बती विद्रोह हुआ था। ऐतिहासिक रूप से देखा जाये तो 1911 में ही किंग राजवंश के पतन के बाद ब्रिटिश भारत के विदेश सचिव हेनरी मैकमोहन ने तिब्बत और ब्रिटिश उत्तर पूर्व भारत के बीच सीमा खींच दी थी, जो मुख्य रूप से वाटरशेड के सिद्धांत पर आधारित थी। आसान शब्दों में कहें तो वाटरशेड सिद्धांत, जलग्रहण क्षेत्र भूमि का वह क्षेत्र है जो किसी विशेष झील, नदी या अन्य जल निकाय में जाता है। जलग्रहण क्षेत्रों को भौगोलिक विशेषताओं द्वारा सीमांकित किया जाता है। ये प्राकृतिक सीमाएँ आमतौर पर कटक, पहाड़ियों या पहाड़ों द्वारा परिभाषित की जाती हैं जो एक जलग्रहण क्षेत्र को दूसरे से अलग करती हैं। एक कटक के एक तरफ की बारिश एक जलग्रहण क्षेत्र में बहेगी, जबकि कटक के दूसरी तरफ की बारिश एक अलग जलग्रहण क्षेत्र में बहेगी। इसी सि़द्धांत के तहत ब्रिटेन, तिब्बत और चीन के प्रतिनिधियों ने 27 अप्रैल 1914 को शिमला में त्रिपक्षीय सम्मेलन में ब्रिटिश भारत और तिब्बत के बीच सीमाओं पर हस्ताक्षर किए थे। जैसा कि उल्लेख मिलता है मैकमोहन रेखा पर चीन की प्रतिक्रिया और भारत-चीन सीमा पर इसके आवेदन को साम्राज्यवादी विरासत के आधार पर सीधे खारिज ही कर दिया गया था। इसमें यह बात भी कह दी गई कि तिब्बत कभी भी एक संप्रभु राज्य नहीं था। तिब्बत पर अपना हक जताते चीन ने पूरे अरुणाचल प्रदेश पर ही अपना दावा पेश करना आरंभ कर दिया।

इधर भारत ने भी अक्साई चिन पर अपना दावा बनाए रखा, जिस पर चीन ने 1950 के दशक के अंत से 1962 के बीच धीरे-धीरे कब्जा किया। 1957 में भारत को एहसास हुआ कि चीन ने झिंजियांग के काशगर को तिब्बत के ल्हासा से जोड़ने वाली एक रणनीतिक सड़क भी बनाई है, जिसे अब एनएच जी219 कहा जाता है, जिसका 179 किलोमीटर हिस्सा भारतीय क्षेत्र अक्साई चिन से होकर गुजरता है। यही कारण है कि 3488 किलोमीटर लंबी सीमा (एलएसी) तीन अलग-अलग क्षेत्रों के साथ आज भी विवादित बनी हुई है। पश्चिमी (पूर्वी लद्दाख), मध्य (हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड), और पूर्वी (सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश) सीमा समझौता वार्ता (2000-2002) की श्रृंखला के दौरान, चीनी प्रतिनिधिमंडल ने केवल मध्य क्षेत्र के मानचित्रों का आदान-प्रदान किया, जो सबसे कम विवादास्पद रहा, लेकिन अन्य दो क्षेत्रों के मानचित्रों की तुलना करने से इंकार कर दिया। एलएसी पर तनाव मुख्य रूप से दो पहलुओं से प्रभावित होता रहा। एक एलएसी को मानचित्रों पर चित्रित किया जाना है और ही जमीन पर सीमांकन किया जाना और दूसरे, सीमा के करीब बुनियादी ढांचे का विकास और निर्माण गतिविधियांे को बढ़ावा दिया जाना। भारत के विपरीत, चीन ने दो दशक पहले ही अपने बुनियादी ढांचे का निर्माण शुरू कर दिया था, जैसा कि पूरे तिब्बती पठार में सड़कों, रेलवे, हवाई ठिकानों, संचार सुविधाओं, ऑक्सीजन स्टेशनों, भंडारण सुविधाओं, सैन्य चौकियों का निर्माण जिसे प्रशिक्षण सुविधाओं के रूप में दिखाया जाता रहा। जबकि यह तैयारी तिब्बती सैन्य कमान, को लैस करने और सहायता करने के लिए बनाई गई। यह स्थान भारत केंद्रित पश्चिमी थिएटर कमान के अंतर्गत आता है ताकि वह उच्च ऊंचाई पर काम करने के लिए तैयार हो सके। इसे देखते हुए, पूर्वी लद्दाख के सामने पीएलए के निर्माण को पूर्व नियोजित योजना का ही हिस्सा कहा जाए तो गलत नहीं होगा।

भारत के सड़क निर्माण पर चीन की आपत्ति कोई नई बात नहीं

चीन का सड़क नेटवर्क हमेशा से ही एक सैन्य संपत्ति के इस्तेमाल के लिए ही रहा जबकि भारत सड़क निर्माण कार्य अपने अन्यत्र स्थानों की दूरी कम करने के लिए करता आया है। फिर भी वास्तविक नियंत्रण रेखा के करीब दोनों पक्षों द्वारा सड़क निर्माण और बुनियादी ढांचे की गतिविधि को दोनों ही देशों द्वारा संदेह की दृष्टि से देखा जाता रहा है। इस समय लद्दाख में मौजूदा तनातनी की एक वजह भारत का सड़क निर्माण भी है। 1950 के दशक में पूर्वी लद्दाख के कुछ हिस्सों पर चीन का कब्जा हो जाने के बाद, वह तिब्बत से पूर्वी तुर्किस्तान तक सड़क बना रहा था। इस सड़क निर्माण पर सबसे पहले कुछ भारतीय वैज्ञानिकों का ध्यान गया, जो अक्साई चिन (श्वेत रेगिस्तान) नामक एंडोर्फिक बेसिन झील से विभिन्न लवणों की व्यवहार्यता पर प्रयोग कर रहे थे। यह झील कभी सूखने वाली झील के लिए भी जानी जाती है। यहां उन्हें चीनी सेना की मौजूदगी की जानकारी मिली जिसकी सूचना दिल्ली तक भी चली गई लेकिन पूछताछ में चीन ने इस निर्माण पर इंकार कर दिया, यह कहकर कि, वह यह निर्माण खगोलीय अनुसंधान के लिए कर रहा है तो भारत को इसकी चिंता करने की कोई जरूरत नहीं है। चीन की घुसपैठ और अपने राजनीतिक उद्देश्यों के लिए किसी भी हद तक जा सकता है। उपर से मित्रता का दिखावा कर वह अपने क्षेत्र अपनी सीमाओं की सुरक्षा अैार उसके विस्तार के लिए लगातार काम करता आया है।

सीमाओं की सुरक्षा के साथ भीतरी जरूरतों पर भारत का जोर

लद्दाख आज दो मोर्चों पर असुरक्षा की चुनौती का सामना कर रहा है। पूर्वी लद्दाख में चीनी सेना से सैन्य खतरे के अलावा, अन्यत्र कारणों से इस क्षेत्र में हर दिन असुरक्षा की स्थिति बनी रहती है, जो स्थानीय लोगों की जरूरतों पर हावी हो जाती है। नई दिल्ली के साथ अनिर्णायक बैठकों के बाद विरोध प्रदर्शनों के अंतहीन चक्र और पूर्वी लद्दाख में भारत-चीन सीमा विवाद के अनसुलझे होने के कारण पश्चिमी हिमालय के इस क्षेत्र का भविष्य अधर में लटका हुआ है। फिर भी कहना होगा केंद्र शासित प्रदेश बनने के बाद से लद्दाख ने अविश्वसनीय विकास देखा है, खासकर बुनियादी ढांचे के मामले में। सीमा तनाव के बीच कनेक्टिविटी पर बहुत ज़ोर दिया जाना इस बात का प्रमाण है कि केंद्र सरकार द्वारा संचालित बड़ी परियोजनाओं की गति लददाख की सीमाओं की सुरक्षा और विकास दोनों को ध्यान में रखकर बढ़ रही है। लद्दाख में 750.21 किलोमीटर सड़कें बनाई या अपग्रेड की गई हैं और 29 नए पुल और 30 नए हेलीपैड बनाए गए हैं, साथ ही सभी मौसम में चालू रहने वाली ज़ोजी-ला सुरंग, कारगिल-ज़ांस्कर रोड और निम्मो-पदुम-डार्च रोड जैसी परियोजनाएँ चल रही हैं। इसके अलावा, 2023 में सभी मौसम में चालू रहने वाली बिलासपुर-मनाली-लेह रेलवे लाइन के लिए सर्वेक्षण पूरा हो गया है, जो 40 स्टेशनों के साथ 498 किलोमीटर तक फैलेगी, इस परियोजना का अनुमानित बजट 990 बिलियन भारतीय रुपये (लगभग 12 बिलियन डॉलर) है।

निष्कर्ष

लेह लदाख सड़क भारत के लिए अहम तो चीन की परेशानी का कारण बन रही, लेकिन दो दशकों की योजना के बाद, लेह को मनाली से जोड़ने वाली लद्दाख की तीसरी धुरी, इस नव-निर्मित केंद्र शासित प्रदेश को साल भर संपर्क प्रदान करेगी, जो भारत के वाशिंदो के लिए तो लाभकारी होगी ही, सीमाओं पर सुरक्षा सख्ती बढ़ाने के हित में भी रहेगी। हमें पूर्वी लद्दाख की गलवान घाटी में 15 जून 2020 को भारत-चीन के सैनिकों में खूनी संघर्ष को भूलना नहीं है और फिर चीनियों के बढ़ते कदमों को रोकने के लिए भी जरूरी है कि भारत भी दिखाने के और खाने के दांत का फर्क को समझ अपनी नीतियों योजनाओं को बढ़ावा दें।


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