Wednesday, February 21, 2018

धर्म का मक़सद फ़क़त शोलानवाई नहीं हो सकता

एक कार्यक्रम के दौरान एक व्यक्ति ने एक पंडित से प्रश्न किया कि आप सबसे अच्छा धर्म किसे मानते है, हिंदू धर्म या इस्लाम। उन पंडित जी का जबाव था जो धर्म यह प्रमाणित करने की क्षमता रखता हो कि वह केवल मानवता के लिए प्रकाश को सृजित करने के लिए है और जो मानव के जीवन को सौभाग्य भी प्रदान करता हो। यकीनन सबसे अच्छा धर्म वह है जो इंसान को इंसान से प्रेम करना सिखाये। जहां तक हिन्दू धर्म का सवाल है जो वह दुनिया का सबसे पुराना धर्म माना गया है। जिसके पास प्राचीन ग्रन्थ ज्ञान का अथक भंडार हैं और जिसके किसी भी ग्रंथ इंसान को इंसान के खिलाफ करना नहीं सिखाया गया।

पिछले दिनों एक वीडियो सोशल मीडिया वेबसाइट यूट्यूब पर डाली गई है, जिसमें एक मुस्लिम शख्स लोगों को वेद और श्रीमद्भगवत् गीता के माध्यम से इंसानियत का संदेश देता दिख रहा है। यह शख्स इस वीडियो में बताता है कि किस तरह भगवान और अल्लाह एक ही हैं। ये तो इंसान हैं जो आपस में भेदभाव करते हैं। भगवत् गीता में पहला संदेश वाहदत-ए-खुद और दूसरा संदेश वाहदत-ए-इंसानियत का दिया गया है। वाहदत-ए-खुद का मतलब ईश्वर एक है और वाहदत-ए-इंसानियत मतलब सभी इंसान एक साथ हैं। उदाहरण पेश करते हुए मुस्लिम शख्स ने कहा कि जब आप सुबह के वक्त टहलने निकलते हैं और किसी हिन्दू भाई से पूछते हैं कि क्या हाल-चाल हैं, तो जवाब में निश्चित तौर पर वह कहेगा कि ऊपर वाले की दया है। वहीं अगर किसी मुसलमान भाई से पूछ लें कि आपके क्या हाल हैं? तो उनका जवाब होगा ऊपर वाले की मेहरबानी। इससे पता चलता है कि दोनों के यहां ऊपर वाला एक ही है। जितनी भी गड़बड़ है वह तो नीचे वालों में है। इस शख्स ने वेदों में लिखे एक श्लोक का भी उच्चारण किया, जोकि इस प्रकार है,
अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम्
उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्

अर्थात जिन लोगों का सोच छोटी होती है वही अपनों और परायों की बात करते हैं। लेकिन जिन लोगों का दिल और दिमाग ऊंचा होता है वह इस तरह रहते हैं मानो पूरा संसार ही उनका परिवार हो। इस वीडियो को यूट्यूब पेज प्दबतमकपइसम प्दकपंष्े ने पोस्ट किया है।
जब लोग कट्टरवाद के खिलाफ लड़ते हैं तो आपको नजर आता है कि एक कट्टरवादी दूसरे कट्टरवादी को समाज का मुजरिम बना रहा है। वह कट्टरवाद से कहीं ज्यादा दूसरे धर्म पर आरोप-प्रत्यारोप लगाने में अपनी उर्जा का क्षरण कर रहा है। और इन्हें आपस में लड़ता देख सभी धर्मो का इंसान यह सोचने को मजबूर हो जाता है कि यह कौन सा नया धर्म है जो समझ से परे है और जो दूसरे धर्म की खिलाफत को उकसा रहा है। जहां अपने धर्म को सही बताने के लिये दूसरों पर जुल्म किये जाते है, इल्जाम लगाये जाते है, झूठ बोले जाते है, साजिश की जाती है। नफरत से भरी धर्म की इस नई परिभाषा में अंधविश्वासी आदमी बदले की भावना से भर जाता है। यहीं से आरंभ होता है इंसानों को बाँटने का काम। हकीकत में यह सारा खेल सत्ता के लालचियों का रचा हुआ है, जिन्होंने धर्म की नयी परिभाषा के सहारे आदमी को आदमी से अलग कर दिया। ऐसे धर्म की भड़काऊ भाषा ने जज्बाती या अज्ञानी इंसान को दूसरे धर्म के इंसानों का दुश्मन बना दिया। बहुत से सांप्रदायिक दंगो में गंदी राजनीति करने वाले पार्टियों का ही काम होता है जो छदम वेश में ये काम करती है। और प्रकट में हर धर्म की हिफाजत किये जाने का ढोल बजा लाती है।
किसी से यह सवाल करना की क्या आप सच्चे हिन्दू है? क्या आप सच्चे मुसलमान या ईसाई या बौद्ध हैं उचित सवाल नहीं है? क्योंकि जो पाक है साफ है उसे किसी के धर्म से कोई लेना देना नहीं। वह तो केवल इंसानी धर्म को समझता है। उसके लिये उसका धर्म सिर्फ और सिर्फ अपने दीन की तलाश और उसको पाने से है। लेकिन दिलों में नफरत भरे हुए इंसान एक दूसरे पर ही नहीं, उसके धर्म पर भी कीचड़ उछालने को आज अपना धर्म मान बैठा है। धर्म कहता है इंसान की जान की कीमत मंदिर और मस्जिद से अधिक है। इंसान की जान गयी तो वह वापस नहीं आएगा जबकि मस्जिद और मंदिर टूटे तो फिर बन जाएंगे। साफ बात तो यह है कि जो भी हिन्दू और मुसलमान धर्म को समझता है ,उसके पवित्र उददेश्य को जानता है वह इसके नाम पर हो रही राजनीति को भी समझता है। और ऐसे इंसानों की किसी भी मजहब में कोई कमी नहीं। ऐसे ही सच्चे इंसानों की बदौलत धर्म टिका है, इंसानियत जिंदा है।
आवश्यकता इस बात की है कि इंसान अपने धर्म की तलाश करे और उसके बताये रास्ते पर जितना चल सकता है चलने की कोशिश करे। किसी भी धर्म की राजनीतिक फायदे के लिए बनाई गयी परिभाषा से अलग हट के सोचे, तब उसके आगे यह हकीकत खुल के सामने आएगी कि किसी भी धर्म का सन्देश इंसानियत के खिलाफ नहीं या कि कोई भी धर्म से नफरत के पैरोकार नहीं है। बल्कि किसी भी धर्म का एक ही संदेश है और वह यह कि अपने भीतर इंसानियत को जिंदा रखना और हर जीव से प्रेम करनां
लोकसभा में सिख गुरूद्वारा संशोधन विधेयक 2016 पर हुई चर्चा का जवाब देते हुए केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा था कि हर धर्म के लोगों को अपने धर्म को चलाने की स्वतंत्रता है। उन्होंने कहा कि किसी धर्म विशेष के लोग ही यह फैसला ले सकते हैं कि उन्हें अपने धर्म को कैसे चलाना है। ये सही है कि हर धर्म के लोगों को अपने मजहब को चलाने की पूर्ण आजादी मिलनी ही चाहिये लेकिन दूसरे के धर्म पर टीका टिप्पणी या उसको नीचा दिखाने की इजाजत कतई नहीं हनेी चाहिये। साथ ही इस बात की ताक़ीद होनी चाहिए कि कोई भी धर्म इंसानियत से बड़ा नहीं हो सकता।
साहिर लुधियानवी ने क्या खूब कहा है -

मुझे इंसानियत का दर्द भी बख़शा है कुदरत ने,
मेरा मक़सद फ़क़त शोलानवाई हो नहीं सकता।

शोलानवाई (उत्तेजित करना)