Saturday, October 14, 2017

भुखमरी के ’विकास’ को रोकना होगा


भारत के ’विकास’ की एक और झलक देखने को मिली जबकि ’अंतरराष्ट्रीय खाद्य नीति अनुसंधान संस्थान’ ने भुखमरी पर अपनी हालिया रिर्पोट जारी की। आपको जानकर हैरानी होगी कि वैश्विक भुखमरी सूचकांक 2017 में 119 देशों की सूची में भारत 100वें स्थान पर पहुंच गया है। ग्लोबल हंगर इंडेक्स (जीएचआई) में भारत का स्कोर 31.4 है जो कि गंभीर श्रेणी में आता है। वैश्विक भुमखरी सूचकांक 100 आधार बिंदुओं के पैमाने पर तैयार किया जाता है जिसमें शून्य सबसे अच्छा स्कोर तथा 100 सबसे खराब स्कोर माना जाता है। इस रिर्पोट के मुताबिक भारत इस सूची में अपने कई पड़ोसी देशों से पीछे है। चीन 29वीं, नेपाल 72वीं, म्यांमार 77वीं, श्रीलंका 84वीं और बांग्लादेश 88वीं रैंकिंग में है। इस सूची में पाकिस्तान 108वीं और अफगानिस्तान 107वें नंबर पर है।
भूख को मापने का एक अंतर्राष्ट्रीय मानक है, ’बाडी मास इंडेक्स’ यानी बीएमआई। एक सामान्य बीएमआई के लिए अंतरराष्ट्रीय स्वीकार्य सीमा 18.5 है। 17 से 18.4 की बीएमआई वाले को कुपोषित कहा जाता है और 16.0 से 16.9 के बीच वाले को गंभीर रूप से कुपोषित कहा जाता है। इसी तरह 16 से कम बीएमआई वाले को भुखमरी का शिकार कहा जाता है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक देश में 35.6 फीसदी महिलाओं और 34.2 फीसदी पुरुषों का बीएमआई 18.5 से कम है।
2016 के वैश्विक सूचकांक में भारत का स्थान 97वां था जबकि वर्ष 2015 में 117 देशों में यह स्थान 80 वां था। यकीनन सूचकांक की लेटेस्ट स्थिति बेहद ‘गंभीर’ है। कुपोषण, बाल मृत्यु दर, लंबाई और वजन की चार कसौटियों पर किये जाने वाले इस सर्वे में भारत की जमीनी विकास की पोल खुल जाती है। एक तरह से यह विकास के चेहरे पर एक तमाचा है जो कहता है कि अब बस भी करो विकास-विकास का राग अलापना। आंखे खोलो और देखो दुनिया में दूसरे सबसे बड़े खाद्यान्न उत्पादन देश का हाल, जहां कुपोषित लोगों की दूसरी बड़ी आबादी है। इस बदतर स्थिति के कारण ही आज भारत दक्षिण एशिया सूचकांक में दक्षिणी सहारा देशों के करीब पहंुच गया है। वैश्विक प्रतिबंध झेलते उत्तर कोरिया और तीन दशक से युद्ध और आतंकवाद से ग्रसित देश इराक से भी गई बीती स्थिति होना चुल्लू भर पानी में डूब मरने की बात है।
वर्ष 2016 के आंकड़ों पर नजर डाले तो भारत का स्कोर ‘अल्पपोषण’ में 15.2, ‘लंबाई के अनुपात में कम वजन वाले बच्चों में’ 15.1 ‘आयु के अनुपात में कम लंबाई वाले बच्चों में’ 38.7 तथा बाल मृत्यु दर में 4.8 रहा। कहने को गत वर्ष की तरह इस वर्ष भी भारत की स्थिति पाकिस्तान (106वां स्थान) से बेहतर दिख रही है। लेकिन भारत से आर्थिक रूप से कमजोर देश जैसे नेपाल (72वें स्थान), श्रीलंका (84वें स्थान) तथा बांग्लादेश( 88वां स्थान) से खराब है। बांग्लादेश गत वर्ष 90वें स्थान में था। दुनिया भर में भुखमरी का शिकार होने वाले कुल लोगों का एक-चैथाई भारत में ही रहता है। दरअसल, तेजी से विकसित हो रही अर्थव्यवस्था के बावजूद हर साल भुखमरी के शिकार लोगों की संख्या बढ़ रही है। यकीनन इस समस्या से निपटने में सरकारी सोच और नीतियां ही सबसे बड़ी बाधक हैं। आंकड़ों के हवाले से यह तस्वीर और भी साफ हो जाती है। इस रिर्पोट को जारी करने वाले वाशिंगटन स्थित अंतरराष्ट्रीय खाद्य नीति अनुसंधान संस्थान का कहना है कि भारत में एक फीसदी आबादी का 50 प्रतिशत संपत्ति पर कब्जा है, साथ ही जीडीपी की ऊंची दर, जिसे हम अपनी आर्थिक प्रगति के उदाहरण के तौर पर पेश करते हुए गौरवान्वित होते है, स्वास्थ्य और पोषण की गारंटी नहीं हो सकती। क्या ये टिप्पणी हमारे विकास के दिखावे की राजनीति की ओर इशारा नहीं करती?
विश्व में खाद्य असुरक्षा की स्थिति, 2014 शीर्षक एक रिपोर्ट में कहा गया था कि भारत में 19.07 करोड़ लोग कुपोषण के शिकार हैंै। इसी रिपोर्ट के मुताबिक, देश में रोजाना 19 करोड़ लोग भूखे सोने पर मजबूर हैं। ये किसी भी प्रगतिशील राष्ट्र के लिए शर्मनाक स्थिति है। भारतीय आबादी के सापेक्ष भूख की मौजूदगी करीब साढ़े 14 फीसदी की है। पांच साल से कम उम्र के 38 प्रतिशत बच्चे सही पोषण के अभाव में जीने को विवश है जिसका असर मानसिक और शारीरिक विकास, पढ़ाई-लिखाई और बौद्धिक क्षमता पर पड़ता है। रिपोर्ट की भाषा में ऐसे बच्चों को ‘स्टन्टेड’ कहा गया है। रिपोर्ट बताती है कि युवा उम्र की 51 फीसदी महिलाएं एनीमिया से पीड़ित हैं यानी उनमें खून की कमी है.
भारत में खाद्य वितरण प्रणाली में भारी दोष है। भ्रष्टाचार, लाल फीताशाही के कारण वांछित काम नहीं हो पा रहे। मिड-डे मील स्कीम, गर्भवती और स्तनपान कराने वाली महिलाओं के स्वास्थ्य की देखभाल के लिये योजनाओं के प्रावधान में पारदर्शिता की कमी होने से बिचैलिये खूब फायदा उठा रहे है। सार्वजनिक वितरण प्रणाली के बारे में कौन नहीं जानता कि लगभग 50 प्रतिशत खाद्य साम्रगी भ्रष्टाचार के कारण उपलब्ध नहीं हो पाती। ऊंची कीमतों में बिचैलिए इसे वहां पहंुचा देते है जहां से उन्हें भारी मुनाफा होता है। पोषण से भरपूर और बेहतर क्वालिटी के खाद्यान्न बाहरी देशों को भेज देना या फिर परिवहन और भंडारण व्यवस्था की खामियों के चलते खाद्य चीजों का नष्ट हो जाना भी खाद्याान्न संकट की वजह बन जाती है। इसी मारामारी या कमी के चलते योजनाएं निचले स्तर तक नहीं पहुंच पातीं। देश की सार्वजनिक वितरण प्रणाली की खामियों और उसमें व्याप्त भ्रष्टाचार ने इसीलिये लोगों को अकाल मौत मरने को मजबूर है। नतीजा यह है कि सस्ता सामान खरीदने के फेर में, जो कि मिलावटी है, बीमारियां ही घर ले आयी जाती है। लेकिन योजनाओं की मलाई चटोर जाने वाले इन बातों से कोई सरोकार नहीं रखते।
दुर्भाग्य है देश का जहां अन्न भारी मात्रा में होने के बावजूद दो हिस्सों में बंॅट जाता है। अति उत्तम ओर सामान्य। अति उत्तम है तो उसके ऊंचे दाम भी है, जिसे वही खरीद सकता है जो उसका मूल्य चुका सकता है। और सामान्य है तो उसके मिलावटी होने में कोई संदेह नहीं रह जाता। और ये बेहद सस्ता कहा जाने वाला अन्न ही गरीब से गरीबतर आदमी लेता है। इससे बेहतर उदाहरण क्या होगा कि सरकारी राशन की दुकान में मिलने वाला अनाज कोई भी उच्च तबके वाला या अमीर नहीं खरीदता। और शहर दर शहर घूमते घूमते पिछड़े इलाकों तक पहुंचने तक इसमें मिलावट का स्तर भी बढ़ जाता है। अफसोस व्यवस्था के जालों में फंसे गरीब आदमी का मूल्य सिर्फ और सिर्फ एक वोट भर तक ही है। न जाने कितनी सरकारें आई और गई लेकिन गरीबी, भूखमरी और कुपोषण का इलाज आज तक न हो पाया। एक ओर जहां चीन के साथ आर्थिक विकास की दौड़ लगाये जाने की बेसब्र चाहत जोर मारती है, वहीं दूसरी ओर इन मुद्दों में होते ’विकास’ की गति से आंखें मूंद ली जाती है।
आखिर कब तक? भारत को गरीबी, भूखमरी के तमगे से बाहर निकलना होगा। सरकार को हर साल जारी होती इन रिर्पोटस पर अपनी चेतना को जगाना ही होगा। विकास की परिभाषा बदलनी होगी। जीवन की बेहद जरूरी चीजों पर जमीनी तौर पर कामयाबी हासिल करनी होगी। सरकारी योजनाएं पर पूरी मंशा से काम कराना होगा। और इसके लिए नियम-कानून की भी सख्ती जरूरी है। क्योंकि सुनिश्चित क्रियान्वयन के लिए दंड का विधान भी होना आवश्क हो। खाने के वितरण की हर राज्य में जिला स्तर पर और भी यथासंभव निचले स्तरों पर मॉनीटरिंग की व्यवस्था होगी तभी समाज को बदहाली और कुपोषण से छुटकारा दिलाया जा सकेगा। बेसिक जरूरतों को पूरा करने का लक्ष्य प्रथम हो तभी उस विकास की राह पकड़ी जाये जिसका होने न होने से फर्क नहीं पड़ता। अंधाधुंध शहरीकरण और निर्माण की जगह हरेक की शिक्षा का इंतजाम हो जिससे उन्हें सरकारी योजनाओं की पूर्ण जानकारी हो।


 

Saturday, October 7, 2017

पैरामीटर ’उनके’ और ’उनके’ आर्थिक आंकडे


गालिब का एक शेर याद आ रहा है
यारब, वो न समझे है न समझेगें मेरी बात
दे और दिल उनको, जो न दे मुझको ज़बां और

कुछ ऐसा ही महसूस हुआ जब कंपनी सेक्रेटरीज को दिए गये उद्बोधन में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने एक बार फिर विपक्षियों को अपने तर्कों से मात देने की अच्छी कोशिश कर दी। तीन साल के लेखे-जोखे के साथ उन्होंने पिछली सरकार की वर्किंग को, इस सरकार के कामकाज, से दोयम दर्जे का साबित कर दिया। कुल मिलाकर आंकड़ों से सजी इस स्वर्ण जयंती समारोह में ये साबित हो गया कि देश का विकास पेपर पर कहीें ज्यादा बेहतर और पुख्ता ढंग से किया जा सकता है। और फिर जब सूत्रधार की प्रस्तुति, कागजों में दौड़ते विकास को साक्षात सामने खड़ा कर देने की कूवत रखती हो तो शंका की गुंजाइश तो रह ही नहीं जाती। गत दिनों अर्थशास्त्रियों के अटैक से आहत प्रधानमंत्री भी इस समारोह में अपनी पूरी तैयारी के साथ नजर आये। इलेक्टानिक स्लाइड पर मजबूत आर्थिक आंकड़े पेश कर उन्होंने भले ही विपक्षियों को नाक भौं सिकोड़ने का एक मौका और दिया हो। पर हमेशा की तरह उन्होंने इस बार भी जनता को तो भरोसा दिला ही दिया कि देश सही दिशा में चल रहा है। और फिर विज्ञान भवन में मोदी के इस ’अर्थशास्त्र’ की संस्तुति करने वालों की कमी तो थी नहीं।
भारतीय कंपनी सचिव संस्थान (आईसीएसआई) के स्वर्ण जयंती समारोह में मोदी गरजे-बरसे। उन्होंने विपक्ष पर तंज कसा तो सामने बैठे लोगों से चुटकी भी ली। बड़े बड़े अर्थशास्त्रिों जैसे मनमोहन सिंह, यशवंत सिन्हा, पी चिंदबरम पर भी उन्होनें निशाना साधा। अपने किए कार्यों के बखान में उन्हें पिछली सरकार के हर कर्म में खोट नजर आया। लेकिन उनकी स्पीच सुनते हुए मुझे ऐसा लगा कि वे जो कह रहे है वह अभी सच्चाई से कोसों दूर है। हां कुछ बातें ऐसी भी है जो बेहतरी की ओर इशारा कर रही है। लेकिन यकीनन अभी भारत की स्थिति ऐसी भी नहीं हुई जैसा कि प्रधानमंत्री समझाना चाह रहे है। इसके लिए कुछेक बातों पर नजर डालनी होगी।
हाल ही में जारी फिच रेटिंग्स पर नजर डाले तो भारत की जीडीपी वृद्धि दर के अनुमान को 7.4 प्रतिशत से घटाकर 6.9 प्रतिशत कर दिया है। चालू वित्त वर्ष 2017-18 की अप्रैल-जून तिमाही में आर्थिक वृद्धि में गिरावट के बाद फिच रेटिंग्स ने यह अनुमान घटाया है। हालांकि, साख रेटिंग एजेंसी ने कहा कि वित्त वर्ष की दूसरी छमाही से आर्थिक गतिविधियों में तेजी की उम्मीद है। वर्ष 2016 के नवंबर में नोटबंदी और इस साल जुलाई में माल एवं सेवा कर (जीएसटी) के प्रभाव समेत अन्य कारणों से आर्थिक गतिविधियां प्रभावित हुई हैं। फिच रेटिंग्स ने अपने ताजा वैश्विक आर्थिक परिदृश्य में कहा है, बैंकों की बढ़ी हुई गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों (एनपीए) के कारण भी ऋण वृद्धि और व्यापार निवेश के लिये परिदृश्य कमजोर बना हुआ है।
लगातार गिरती इसी जीडीपी और चरमरा रही अर्थव्यवस्था के कारण मोदी सरकार की मुश्किलें बढ़ रही हैं। विपक्ष तो उन्हें इस मुद्दे पर उन्हें घेर ही रहा है, लेकिन परेशानी तब बढ़ी जब अपनों ने भी आवाज उठानी शुरू कर दी है। हद तो तब हो गई जब बीजेपी के बड़े नेता और पूर्व वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा ने अपने राष्ट्रधर्म का मान रखते हुए देश की गिरती अर्थव्यस्था के लिए वित्त मंत्री अरुण जेटली पर निशाना साधा। यशवंत सिन्हा के इस बैखौफ अंदाज को आम जनता की स्वीकृति मिली तो भाजपा के दिग्गज नेता मीडिया को जबाव देने से कतराने लगे।
नोटबंदी के बाद आर्थिक वृद्धि के मामले पर भारतीय रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने भी कहा था कि सरकार को दुनिया में सबसे तेजी से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था को लेकर अपना सीना तब तक नहीं ठोकना चाहिये जब तक कि लगातार दस साल तक मजबूती जीडीपी वृद्धि हासिल नहीं कर ली जाती है। राजन ने एक इंटरव्यू के दौरान कहा था कि भारत संस्कृति और इतिहास जैसे मुद्दों पर तो दुनिया में बढ़चढ़कर अपनी बात कह सकता है, लेकिन वृद्धि के मोर्चे पर उसे ऐसा तभी ऐसा करना चाहिए जब वह दस साल तक 8 से 10 प्रतिशत की उच्च आर्थिक वृद्धि दर हासिल कर लेता है।
देश की आर्थिक बदहाली पर बोलने वालों में अरूण शौरी भी है जिनका मानना है कि यशवंत सिन्हा, पी चिदंबरम और अन्य अर्थशायत्री तथ्यों के आधार पर अपनी बात रख रहे है। क्या ले तथनहीं माना जाएगा कि पुराने हिसाब किताब से आर्थिक विकास दर 3.7 फीसदी पर आकर सिमट गई है। औद्योगिक उत्पादन 2015-16 के 9 फीसदी से लुढ़ककर 1.7 पर पहुंच गया है। खतरे के इन संकेतों के बावजूर स्थिति सुधरने का नाम नहीं ले रही और ये ढाई लोगों की सरकार किसी की नहीं सुनती। और इस सच को हम आप सब जानते है कि आलोचना स्वीकार्य तभी हो सकती है जब आप उसे ग्रहण कर उसके कारणों पर दृष्टि डालें। लेकिन प्रधानमंत्री आलोचना को नम्रता से स्वीकार तो करते है किंतु उसके साथ वैचारिक संधि तो दूर की बात सुनना भी संभवतः नहीं चाहते। वे अपने ही पैरामीटर पर चलना चाहते है और मानते है कि जो कुछ किया गया वह सही है। जनता की बात जहां तक है वह हमेशा से ’कनफ्यूज्ड’ है। यशवंत सिन्हा बोले तो वह कहेगी सही बात की है बंदे ने, प्रधानमंत्री कहे तो वह उसको भी नकार नहीं सकती। शायद इसी वजह से रघुराम राजन ने भारत को ’अंधों में काना राजा’ कहा था।
देश की ग्रोथ का अंदाजा रोजगार की जबरदस्त मांग को देखकर अपने आप हो जाता है। राहुल गांधी द्वारा बार बार युवाओं की बेरोजगारी और स्टार्ट अप योजना का मजाक उड़ाए जाने पर प्रधानमंत्री जी ने इसी कार्यक्रम मे बताया कि 4 करोड़ 80 लाख पीएफ खाते खुले है। मुद्रा योजना के तहत 9 करोड़ खाता धारकों को 4 लाख करोड़ का कर्ज दिया गया है जिनमें 2 लाख 65 करोड़ ऐसे है जिन्हें पहली बार कर्ज मिला। अगर ये सत्य है तो फिर आप,
वित्तीय सेवा प्रदाता एमबिट कैपिटल की रिर्पोट पर, क्या कहेगे जो कहती है कि भविष्य में भारत में बेरोजगारी और आय असामनता का मेल सामाजिक तनाव का कारण बन सकता है। फ्रांसीसी अर्थशास्त्री के नवीनतम निष्कर्षों में बताया गया है कि वर्ष 1980 से आय असामनता चरणबद्ध तरीके से बढ़ रही है। एमबिट का कहना है कि देश की कुल आबादी के 50 प्रतिशत निम्न आय स्तर वाले की राष्ट्रीय आय में हिस्सेदारी केवल 11 प्रतिशत है, जबकि शीर्ष 10 प्रतिशत की हिस्सेदारी 29 प्रतिशत है। इनकी प्रति व्यक्ति आय 1,850 डॉलर है, जबकि निचले तबके के 66 करोड़ लोगों या देश की 50 प्रतिशत आबादी की प्रति व्यक्ति आय 400 डॉलर से कम है, जो कि हैरान करने वाला है।
यह आंकड़ा मेडागास्कर के नागरिकों के प्रति व्यक्ति आंकड़ों के समान है और यहां तक कि अफगानिस्तान के नागरिकों की प्रति व्यक्ति आय से भी कम है, जो कि 561 डॉलर है। वहीं, दूसरी ओर देश के शीर्ष एक प्रतिशत आबादी 1.30 करोड़ की प्रति व्यक्ति आय 53,700 डॉलर है जो कि डेनमार्क की प्रति व्यक्ति आय से तुलना योग्य और सिंगापुर की प्रति व्यक्ति आय 52,961 डॉलर से ज्यादा है। रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि बेरोजगारी और असमानता के मेल के कारण अपराधों में तेजी जैसे सामाजिक तनाव में वृद्धि हो सकती है।
अनुभव है कि बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में जहां प्रति व्यक्ति आय, राष्ट्रीय औसत की तुलना में कम है और असमानता अधिक है, वहां अन्य राज्यों की तुलना में अपराध की दर ज्यादा है। जो साक्ष्य है उसे हम क्या आइना दिखाते है।
हालांकि वैश्विक वित्तीय सेवा कंपनी मॉर्गन स्टेनली के एक शोध नोट पर अगर गौर करें तो प्रधानमंत्री के पैरामीटर पर संदेह नहीं किया जा सकता और ये हमारे लिये खुश होने की वजह है। इस शोध के अनुसार डिजिटलीकरण से जीडीपी वृद्धि को 0.5 से 0.75 प्रतिशत की बढ़त मिलेगी और अनुमान है कि 2026-27 तक भारत की अर्थव्यवस्था 6,000 अरब डॉलर की हो जाएगी। विशेषज्ञों का मानना है कि सुधारों की वजह से पिछला साल भारत की जीडीपी वृद्धि के लिए व्यवधान वाला रहा है लेकिन मध्यम अवधि में देश की वृद्धि संभावनाएं बेहतर हैं। कंपनी ने अपने नोट में कहा कि हमारे अनुमान के मुताबिक आने वाले दशक में भारत की सालाना जीडीपी वृद्धि दर 7.1 फीसदी से 11.2 फीसदी के बीच रहेगी। इसी प्रकार 2026-27 तक भारत में 120 अरब डॉलर सकल प्रत्यक्ष विदेशी निवेश आने की उम्मीद है।

Monday, October 2, 2017

संकट नैतिक जिम्मेदारी का

विश्व बैंक की रिपोर्ट ने एक बार फिर भारतीय शिक्षा के स्तर पर सवाल खड़े कर दिये है। घटिया शिक्षा का ये तमगा लेकर वह शिक्षा देने वाले निम्न और मध्यम आय वाले ऐसे 12 देशों की लिस्ट में दूसरे स्थान पर है, जहां आज भी शिक्षा का स्तर बदहाल है। मेक इन इंडिया का दावा कितना खोखला है ये इस रिर्पोट से साबित हो जाता है। कुल मिलाकर इस अध्ययन के निष्कर्ष में ये कहा गया है कि बिना लर्निग के स्कूली शिक्षा विकास के अवसर को समाप्त कर देती है। ऐसी शिक्षा बच्चों और युवाओं के साथ अन्याय है।
विश्व बैंक ने वल्र्ड डेवलेपमेन्ट रिपोर्ट 2018ः लर्निंग टू रियलाइज एजुकेशन प्रामिस नाम की यह रिपोर्ट पिछले हफ्ते ही जारी की है। रिपोर्ट के मुताबिक ग्रामीण भारत में तीसरी कक्षा के तीन चैथाई छात्र दो अंको का घटाव तक भी हल नहीं कर सकते। यहां तक कि पांचवीं के आधे छात्र भी यह नहीं कर पाते। रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2016 में ग्रामीण भारत के पांचवीं कक्षा के केवल आधे छात्र ही दूसरी कक्षा के स्तर की किताबें अच्छे से पढ़ पाते है। विश्व बैंक की इस रिपोर्ट के कितने ही संदर्भों पर नजर डाली जाए नतीजा भारत के पक्ष में सिफर ही रहेगा। शर्म की बात है कि विश्व में अपने विकास का बखान करने वाले देश के कर्णधार स्वंय इस स्याह पहलू को क्यूं नहीं देख पाते और विश्व की ये अग्रणीय संस्थाएं उसको उघेड़ कर देश के ’सो काल्ड’ विकास को सदियों पीछे धकेल देती है। विश्व बैंक द्वारा उठाई गई ये शंका र्निमूल तो नहीं कि निम्न और मध्यम आय वाले ऐसे देशों में लाखों युवा कम अवसर और कम वेतन का शिकार होते है। और इसकी वजह प्राथमिक और माध्यमिक स्कूल है जो उन्हें जीवन में सफल बनाने की शिक्षा देने में विफल हो रहे है।
रवीन्द्रनाथ टैगोर ने शिक्षा के संदर्भ में व्यक्ति की सकारात्मक स्वतंत्रता पर बल दिया है जो उसके आत्म-साक्षात्कार में सार्थक होती है। उनका विचार था कि स्वतंत्रता की मौजूदगी में ही शिक्षा को अर्थ और औचित्य मिल सकता है। तत्कालीन स्कूलों को उन्होंने ‘शिक्षा की फैक्ट्री, बनावटी, रंगहीन, दुनिया के संदर्भ से कटा हुआ और सफेद दीवालों के बीच से झांकती मृतक के आँखों की पुतली’ कहा था, जो आज के संदर्भ में भी 100 प्रतिशत सही है। संस्कृत के महान कवि श्री भर्तृहरी जी ने इसी संदर्भ में स्पष्ट रूप से कहा कि “शिक्षा विहीन साक्षात् पशुः पुच्छ विषाणहीनः।” हमारे वैदिक मन्त्रों में भी मंत्रित है “असतो मा सद्गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय, मृत्योर्मा अमृतं गमयः“. इसका अर्थ हुआ कि विद्या अथवा शिक्षा सत्य का, ज्ञान का, अमरता का कारण है। किंतु ये वैदिक मंत्र महज सिंबल के तौर पर भारत में रखे जाते है। ज्ञान और सीखने से इसका कोई ताल्लुक नहीं।
हाल ही में उत्तर प्रदेश में शिक्षा की गिरावट को शिक्षा राज्य मंत्री अनुपमा जायसवाल ने स्वीकारा और इसका ठीकरा पिछली सरकार के मत्थे मढ़ दिया। जबकि ऐसे दोषारोपण से आप समस्या से निजात नहीं पा सकते। सरकार कोई भी हो उसकी समस्या के मूल में मंशा की कमी को हम नजरअंदाज नहीं कर सकते। समस्या की जड़ को समझकर भी उसके प्रति संवेदनहीन होना अकर्मण्यता की निशानी है। जबावदेही से बचना और इसका ठीकरा उसके सिर फोड़ना तो सरकारों के लिए आम बात है। किंतु इसका असर देश के विकास को पड़ता है। दरअसल पूर्व-प्राथमिक शिक्षा की उपेक्षा और प्राथमिक शिक्षा में पहली-दूसरी क्लास की लर्निंग को कमतर आंकना भारतीय शिक्षा की सबसे बड़ी बाधा हैं। सरकारी स्कूलों में जितना अधिक ध्यान बड़ी क्लासेज को दिया जाता है उतना छोटी क्लासेज को नहीं। इन स्कूलों में बेसिक लर्निंग के अभाव के कारण बच्चों का विकास वैेसा नहीं हो पाता जैसा होना चाहिए। प्राइवेट स्कूल अगर लर्निग में ध्यान देते भी है तो उनकी फीस हरेक के वश की नहीं। इस तरह से हजारों बच्चे उस शिक्षा से मरहूम हो जाते है जिसे नींव कहा जा सकता है। सिफ कागजों की भरपाई या सरकारी योजना को इमप्लीमेंट करना ही शासन प्रशासन का काम नहीं, वह सुचारू और व्यवस्थित तरीके से चले क्या ये आवश्यक नहीं?
मैंने कुछ समय एक विश्वस्तरीय संस्थान के साथ सर्व शिक्षा अभियान के लिए काम किया। मुझे हैरानी होती थी प्राथमिक विद्यालयों के दौरे के समय उनकी स्थिति देखकर। अधिकांश स्कूलों में अध्यापक न के बराबर मिले। बच्चे आप उंगलियों मेें गिन सकते थे। स्कूल अहाते, कक्षाओं का बुरा हाल था। कम बच्चों की उपस्थिति पर हेडमास्टर का कहना था कि धान की कटाई चल रही है इसलिए बच्चे नहीं आये। बच्चों में जनरल जानकारी का अभाव था। कक्षा 1 के विद्यार्थी को 100 की गिनती तो दूर ठीक से हिन्दी वर्णमाला का ज्ञान नहीं था। और उस पर मेरे लिए हैरान होने की बात तब हुई, जब मेरे द्वारा बच्चों को उचित शिक्षा न देने की बात कहे जाने पर एक बेसिक अधिकारी ने जबाव दिया कि फटेहाल रहने वाले इन बच्चों को अगर इतना ही मिल रहा है तो बहुत है। ये असमानता किसलिए और फिर इस तरह की शिक्षा से आखिर किसका भला हो रहा है? यकीनन देश का तो कतई नहीं।
विश्व बैंकसमूह के अध्यक्ष जिम योंग किम का कहना है कि अच्छी शिक्षा युवाओं से रोजगार, बेहतर आय, अच्छे स्वास्थ्य और बिना गरीबी के जीवन का वादा करती है। संस्थानों को मजबूत करती है और सामाजिक सामंजस्य बढ़ाती हैै। किंतु हमारे देश में अच्छी शिक्षा के अधिकार में भी भेदभाव दिखाई देता है। योग्य होने पर भ्ज्ञी आपके लिए अच्छे स्कूल कालेज नहीं है अगर आप दो वक्त की रोटी भी मुश्किल से कमाते है। उनके लिए तो सुविधाओं से दूर ऐसे सरकारी स्कूल है, जहां पीने के पानी के साफ होने का भी अंदेशा होता है। लगभग 89 प्रतिशत सरकारी स्कूल ऐसे हैं, जहां शौचालय की सुविधा नहीं है। बेहतर शिक्षक का अभाव, उनकी सीमित संख्या और शिक्षा की गुणवत्ता पर सवालिया निशान गाहे-बगाहे उठते ही रहे है।
आज भी प्राथमिक शिक्षा की हालत सुधारने में सरकार के पसीने छूट रहे है। शिक्षा को लेकर बनी योजनाएं अपने पैरों पर ही नहीं खड़ी हो पा रही। उनके दौड़ने की कल्पना भी महज कागजों तक ही सीमित है। सर्व शिक्षा अभियान ने शिक्षा के महत्व से तो लोगों को जागरूक बना दिया लेकिन बेहतर लर्निंग वाले स्कूलों की कमी ने गरीब से गरीब आदमी को प्राइवेट स्कूलों की तरफ जाने को मजबूर कर दिया। सरकार कोई भी रही हो शिक्षा को बढ़ावा देने में उसका अपना योगदान रहा। शिक्षा को जन-जन तक पहंुचाने के लिए आर्थिक वजहों से कोई कमी हुई, ऐसा मानना गलत होगा, लेकिन नैतिक जिम्मेदारी का संकट तो आज भी बना हुआ हैं। जिस दिन इस जिम्मेदारी का अहसास शासन-प्रशासन और हर उस व्यक्ति को हो जाएगा जो शिक्षा का मूल्य समझता है, निश्चित तौर पर उस दिन विश्व बैंक की रिर्पोट हमारे लिए कोई मायने नहीं रखेगी। महात्मा गांधी ने कहा था अपने प्रयोजन में दृढ़ विश्वास रखने वाला एक सूक्ष्म शरीर इतिहास के रूख को बदल सकता है।

Thursday, September 21, 2017

अधकच्ची नींव पर विकास की बुलेट

हमारे एक पारिवारिक मित्र ने अपने गांव में इंटरमीडियट विद्यालय बड़े शौक से बनवाया। विद्यार्थी आना शुरू हुए तो उन्हें डिग्री कालेज की इच्छा जाग उठी। दौड़-भाग, जोड़-तोड़ कर उन्होंने उसकी मान्यता भी करा ही ली। अपनी इस सफलता से वे बेहद प्रसन्न थे। किंतु आज जब एक अर्से बाद उनसे मुलाकात हुई तो परिस्थितियां बदली हुई थी। स्कूल कालेज के ठीक से ना चल पाने की शिकायत पलायन और अविकसित वातावरण के रूप में सामने आयी।
देखा जाए तो उनकी महत्वाकांक्षा ने भारत, उसके गांव और उनकी मनस्थिति का सर्वे ही नहीं किया। भारत में गांव का मतलब गरीबी, पिछड़ापन, शौचालय, सड़क, बिजली, पानी को अभाव और रूढ़िग्रस्त समाज से होता है। एक ऐसे समाज से होता है जहां का हर आदमी किसी भी तरह के अभाव में रहना सीख जाता है। ऐसा समाज जो अपनी स्थिति से उबरना भी नहीं चाहता। अपने कुएं के मेंढक कह सकते है आप इन्हें। और इनकी इस स्थिति का लाभ बखूबी उठाना जानता है पूंजीपति वर्ग या फिर सत्ता के गलियारे में बैठा हर वह शख्स जिसे अपनी महत्वाकांक्षा को फलीभूत करने के लिए ऐसे ही लोगों की जरूरत है। भारतीय गांव की दुर्दशा का मूल कारण सरकारी नीति या पलायन करते लोग ही नहीं। वे भी है जो किसी भी परिस्थिति में काम चल जाएगा की सोच अपनाते है।
ऐसा नहीं है कि हमारे गांव व्यवसाय रहित है। यहां आपको छोटे-मोटे काम करने वाले लोग मिलेगे जो अधिकांशत जुगाड़ से काम करते है। दूघ का व्यवसाय करने वाले मिलेगें जो नई तौर तरीकों से सर्वथा अनभिज्ञ होगें। किसान है। धनी किसान की संख्या गिनती में है, पर उनके पास सभी तरह के संसाधन है। और जो बेहद गरीबी और कर्ज में आकंठ डूबा किसान है, उनकी संख्या की गिनती नहीं। वह आज भी पुराने ढर्रे से काम कर रहा है, टकटकी बांधे आसमान को घूरता है या सरकार की किसी दया का इंतजार करता है। नई टेक्नोलॉजी से सर्वथा अनजान। अनजान इसलिए भी है कि जिनके पास बीज खरीदने के लिए भी पैसा नहीं वे टेक्नोलॉजी से कैसे नाता जोड़ सकेगें। उस गरीब किसान को तो जैसे तैसे साल भर का अनाज उगाना है, जिससे उसका घर परिवार को भर पेट भोजन मिल सके। भारत में अधिकांश किसानों के लिए किसानी व्यापार नहीं अपने परिवार के पेट भ्रने का साधन मात्र है। आश्चर्य है कि कृषि प्रधान देश में आज भी कृषि ऐसा उद्योग नहीं बन पाया जिस पर पूंजी निवेश करने को लोग आगे आये। विकास का ठेका उठाने वाले भी ऐसी स्थिति का फायदा उठाकर 20 की रफतार में काम करते हैं।
यही रफतार अब नई पीढ़ी को बेसब्र कर रही है। वह तो 4- 5 जी की स्पीड में दौड़ना चाहता है। उसे रहने को स्मार्ट सिटी की चाट लग रही है तो वहां उपलब्ध मंनोरंजन के साधन भी लुभा रहे है। नौकरी करने उसे शहर आना ही है, तो वह उस गांव की ओर क्यों रूख करना चाहेगा जहां वह डिजिटल दुनिया से उस कालखंड में पहुंच जाता है जहां अभी भी एक बल्ब या फिर लालटेन के सहारे अपना काम करना पड़ता है। अगर आप आज के किसी नौजवान से पूछेगें कि वह क्यूं अपने गांव का विद्यालय या कालेज छोड़ कर शहर में पढ़ने चला आया तो उसका जबाव होगा गांव भी कोई रहने की जगह है। अच्छे कालेज नहीं है...टीचर प्रोफसर भी ऐसे ही है। मनोरंजन का सर्वथा अभाव, बार क्लब कॉफी हाउस माल कुछ भी तो नहीं है। सीखने समझने का कोई उचित माध्यम नहीं। ना कोचिंग सेंटर ना स्किल डेवलेपमेन्ट के साधन।..... और ये कड़वा सत्य है कि सरकारों का ध्यान भी पूरा शहरों के ही विकास पर टिका रहता है। गांवों की सुध तो माननीयों को तब आती है जब पंचवर्षीय समारोह के आयोजन का समय आता है। भारी निधि होने के बावजूद अपने इलाके के विकास के लिए कितने लोग काम करते है। इसलिये सालों बीत जाने के बाद भी हमारे गांवें का विकास शहरों की तुलना में 25 प्रतिशत भी नहीं हो सका। यूरोप जापान चाइना जैसा देश भी है जहां गांव और शहर में अंतर नजर ही नहीं आता।
इसी भारी अंतर के कारण आज गांव के गांव शहर उठ के आने लगे है। चार जमात पढ़लिख जाने के बाद नई पीढ़ी को गांव में रहना अपने पिछड़ेपन की निशानी लगने लगता है। कुछ ऐसे शिक्षित लोग जो अब गांव को रहने की जगह नहीं मानते, कभी-कभार गांव में चक्कर लगा लेते है। जब आते है, दो-एक लोगों को और शहर आकर काम करने का न्यौता दे आते है। ये अवहेलना गांव को और भी पीछे धकेल रही है। ये बात बेहद तकलीफ देती है कि आजादी के वर्षो बाद भी गांव की स्थिति जस की तस बनी हुई है। गांव के मध्य से निकलते कुछ हाईवे जरूर विकास की कहानी बयां करते है लेकिन उसके साथ अगर उच्च शिक्षण संस्थानों, उद्योगों और जन सुविधा का ध्यान रखा जाता तो क्या गांव की तस्वीर नहीं बदलती? लेकिन हालात इससे इतर है। लोअर अपर मिडिल स्कूल जिनकी पहचान का आलम ये है कि सीलन भरी टूटी दरकी दीवारें, कीचड़ पानी से या फिर जानवरों से भरे खेल के मैदान, कुछ जगह तो कक्षाएं पेड़ के नीचे टाट बिछा कर भी चलती अपनी कहानी कहने लगती है। मिड डे मिल में मिलने वाले भोजन से ही ये बात साफ हो जाती है कि इस देश में गरीब लाजार होना कितना जानलेवा भी हो सकता है। कहने का मतलब ये है कि जितना पिछड़ा गांव होगा उतना अव्यवस्था का वहां बोलबाला होगा।
सच तो ये है कि गांव के स्कूल हो, अस्पताल हो, सड़कें हो, सबकी व्यवस्था करने वाले भी उसके पिछड़ेपन के रेशियों को ध्यान में रखकर काम करते है। इसीलिए भी शहरों की चकाचौंध के आगे गांव फीके पड़ जाते है। भारत की आजादी के 67 साल बाद भी हमारे गांव किसी विकसित गांव की बानगी नहीं बयां करते। इसके पीछे एक कारण है भारतीय संस्कारों में आता परिवर्तन। आज गांव का आदमी जहां डाक्टर, इंजीनियर या विधायक सांसद बना तो उसका पहला काम होता है शहर में अपना स्थायी निवास बनाना। अपनी गृहस्थी का हर ताना बाना शहरों के इर्द-गिर्द बुनना आरंभ कर देता है। गांव से उसका नाता महज मां बाप या जमीन जायदाद भर से रह जाता है। नई संस्कृति का बोध होते ही एक दो पीढ़ी के अंतराल बाद गांव यूं भी मन मस्तिष्क से विलीन हो ही जाते है। लक्ष्मी मित्तल जैसे अनेक धनपति भी अपने गांव को बिसरा बैठे तो आम आदमी तो यूं भी स्वंय के विकास को महत्व देता है।
और एक बात कहूंगी कि नागरिक के अलावा दोष सरकारी नीति का भी है। उसकी ढुलमुल नीति दिन-ब-दिन बढ़ते जा रहे शहरों के बोझ को कम करने के बजाय उसमें बढ़ोत्तरी ही कर रही है। राजधानियों को स्मार्ट सिटी बनाने के चक्कर में गांव को उजाड़ने में कोई कोर कसर नहीं छोडी जा़ रही। नीति तो ऐसी होनी चाहिए कि शहरों का कल्चर भी न बिगड़े और गांव भी विकसित हो जाए। नियम ऐसा बने कि प्रोफेशनल कोर्स की डिग्री लेने के बाद हर युवा का 3 साल तक गांव में रहकर उसके विकास पर काम करना अनिवार्य हो।, उच्च चिकित्सा संस्थान शहर में ही ना खोले जाए। उच्च स्तरीय कालेज कोचिंग सेंटर के अतिरिक्त कौशल विकास के भी उचित प्रबंध हो। लोकल कलाओं को जीवंता मिले। ऐसी व्यवस्था बने कि किसी को भी नौकरी के लिए शहरों की ओर ना भागना पड़े। जो जनसुविधा शहर में उपलब्ध है वो गांव को भी मिले। सड़क बिजली पानी सब चकाचक।
लेकिन ये सब करने के लिए गरीबी अमीरी की सोच से उठना जरूरी है और उस राजनैतिक सोच से भी जो स्वार्थ नक्कारेपन से भरी है। विकास की परिभाषा को जहां बुलेट ट्रेन के तौर पर देखा जाता है बजाय हर पेट को रोटी कपड़ा और मकान के, आत्महत्या करते उस किसान से जो कर्ज के बोझ में दबा अपनी मेहनत का पूरा फल भी नहीं ले पाता या फिर बेरोजगारी के कुचक्र में फंसे उस युवा से जो चोरी डकैती करने को मजबूर होता है, तो ऐसे देश को बेसिक विकास के लिए सदियों का इंतजार करना होगा। हां उससे पहले बुलेट ट्रेन का सपना तो पूरा हो ही जाएगा।
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