विश्व बैंक की रिपोर्ट ने एक बार फिर भारतीय शिक्षा के स्तर पर सवाल खड़े कर दिये है। घटिया शिक्षा का ये तमगा लेकर वह शिक्षा देने वाले निम्न और मध्यम आय वाले ऐसे 12 देशों की लिस्ट में दूसरे स्थान पर है, जहां आज भी शिक्षा का स्तर बदहाल है। मेक इन इंडिया का दावा कितना खोखला है ये इस रिर्पोट से साबित हो जाता है। कुल मिलाकर इस अध्ययन के निष्कर्ष में ये कहा गया है कि बिना लर्निग के स्कूली शिक्षा विकास के अवसर को समाप्त कर देती है। ऐसी शिक्षा बच्चों और युवाओं के साथ अन्याय है।
विश्व बैंक ने वल्र्ड डेवलेपमेन्ट रिपोर्ट 2018ः लर्निंग टू रियलाइज एजुकेशन प्रामिस नाम की यह रिपोर्ट पिछले हफ्ते ही जारी की है। रिपोर्ट के मुताबिक ग्रामीण भारत में तीसरी कक्षा के तीन चैथाई छात्र दो अंको का घटाव तक भी हल नहीं कर सकते। यहां तक कि पांचवीं के आधे छात्र भी यह नहीं कर पाते। रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2016 में ग्रामीण भारत के पांचवीं कक्षा के केवल आधे छात्र ही दूसरी कक्षा के स्तर की किताबें अच्छे से पढ़ पाते है। विश्व बैंक की इस रिपोर्ट के कितने ही संदर्भों पर नजर डाली जाए नतीजा भारत के पक्ष में सिफर ही रहेगा। शर्म की बात है कि विश्व में अपने विकास का बखान करने वाले देश के कर्णधार स्वंय इस स्याह पहलू को क्यूं नहीं देख पाते और विश्व की ये अग्रणीय संस्थाएं उसको उघेड़ कर देश के ’सो काल्ड’ विकास को सदियों पीछे धकेल देती है। विश्व बैंक द्वारा उठाई गई ये शंका र्निमूल तो नहीं कि निम्न और मध्यम आय वाले ऐसे देशों में लाखों युवा कम अवसर और कम वेतन का शिकार होते है। और इसकी वजह प्राथमिक और माध्यमिक स्कूल है जो उन्हें जीवन में सफल बनाने की शिक्षा देने में विफल हो रहे है।
रवीन्द्रनाथ टैगोर ने शिक्षा के संदर्भ में व्यक्ति की सकारात्मक स्वतंत्रता पर बल दिया है जो उसके आत्म-साक्षात्कार में सार्थक होती है। उनका विचार था कि स्वतंत्रता की मौजूदगी में ही शिक्षा को अर्थ और औचित्य मिल सकता है। तत्कालीन स्कूलों को उन्होंने ‘शिक्षा की फैक्ट्री, बनावटी, रंगहीन, दुनिया के संदर्भ से कटा हुआ और सफेद दीवालों के बीच से झांकती मृतक के आँखों की पुतली’ कहा था, जो आज के संदर्भ में भी 100 प्रतिशत सही है। संस्कृत के महान कवि श्री भर्तृहरी जी ने इसी संदर्भ में स्पष्ट रूप से कहा कि “शिक्षा विहीन साक्षात् पशुः पुच्छ विषाणहीनः।” हमारे वैदिक मन्त्रों में भी मंत्रित है “असतो मा सद्गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय, मृत्योर्मा अमृतं गमयः“. इसका अर्थ हुआ कि विद्या अथवा शिक्षा सत्य का, ज्ञान का, अमरता का कारण है। किंतु ये वैदिक मंत्र महज सिंबल के तौर पर भारत में रखे जाते है। ज्ञान और सीखने से इसका कोई ताल्लुक नहीं।
हाल ही में उत्तर प्रदेश में शिक्षा की गिरावट को शिक्षा राज्य मंत्री अनुपमा जायसवाल ने स्वीकारा और इसका ठीकरा पिछली सरकार के मत्थे मढ़ दिया। जबकि ऐसे दोषारोपण से आप समस्या से निजात नहीं पा सकते। सरकार कोई भी हो उसकी समस्या के मूल में मंशा की कमी को हम नजरअंदाज नहीं कर सकते। समस्या की जड़ को समझकर भी उसके प्रति संवेदनहीन होना अकर्मण्यता की निशानी है। जबावदेही से बचना और इसका ठीकरा उसके सिर फोड़ना तो सरकारों के लिए आम बात है। किंतु इसका असर देश के विकास को पड़ता है। दरअसल पूर्व-प्राथमिक शिक्षा की उपेक्षा और प्राथमिक शिक्षा में पहली-दूसरी क्लास की लर्निंग को कमतर आंकना भारतीय शिक्षा की सबसे बड़ी बाधा हैं। सरकारी स्कूलों में जितना अधिक ध्यान बड़ी क्लासेज को दिया जाता है उतना छोटी क्लासेज को नहीं। इन स्कूलों में बेसिक लर्निंग के अभाव के कारण बच्चों का विकास वैेसा नहीं हो पाता जैसा होना चाहिए। प्राइवेट स्कूल अगर लर्निग में ध्यान देते भी है तो उनकी फीस हरेक के वश की नहीं। इस तरह से हजारों बच्चे उस शिक्षा से मरहूम हो जाते है जिसे नींव कहा जा सकता है। सिफ कागजों की भरपाई या सरकारी योजना को इमप्लीमेंट करना ही शासन प्रशासन का काम नहीं, वह सुचारू और व्यवस्थित तरीके से चले क्या ये आवश्यक नहीं?
मैंने कुछ समय एक विश्वस्तरीय संस्थान के साथ सर्व शिक्षा अभियान के लिए काम किया। मुझे हैरानी होती थी प्राथमिक विद्यालयों के दौरे के समय उनकी स्थिति देखकर। अधिकांश स्कूलों में अध्यापक न के बराबर मिले। बच्चे आप उंगलियों मेें गिन सकते थे। स्कूल अहाते, कक्षाओं का बुरा हाल था। कम बच्चों की उपस्थिति पर हेडमास्टर का कहना था कि धान की कटाई चल रही है इसलिए बच्चे नहीं आये। बच्चों में जनरल जानकारी का अभाव था। कक्षा 1 के विद्यार्थी को 100 की गिनती तो दूर ठीक से हिन्दी वर्णमाला का ज्ञान नहीं था। और उस पर मेरे लिए हैरान होने की बात तब हुई, जब मेरे द्वारा बच्चों को उचित शिक्षा न देने की बात कहे जाने पर एक बेसिक अधिकारी ने जबाव दिया कि फटेहाल रहने वाले इन बच्चों को अगर इतना ही मिल रहा है तो बहुत है। ये असमानता किसलिए और फिर इस तरह की शिक्षा से आखिर किसका भला हो रहा है? यकीनन देश का तो कतई नहीं।
विश्व बैंकसमूह के अध्यक्ष जिम योंग किम का कहना है कि अच्छी शिक्षा युवाओं से रोजगार, बेहतर आय, अच्छे स्वास्थ्य और बिना गरीबी के जीवन का वादा करती है। संस्थानों को मजबूत करती है और सामाजिक सामंजस्य बढ़ाती हैै। किंतु हमारे देश में अच्छी शिक्षा के अधिकार में भी भेदभाव दिखाई देता है। योग्य होने पर भ्ज्ञी आपके लिए अच्छे स्कूल कालेज नहीं है अगर आप दो वक्त की रोटी भी मुश्किल से कमाते है। उनके लिए तो सुविधाओं से दूर ऐसे सरकारी स्कूल है, जहां पीने के पानी के साफ होने का भी अंदेशा होता है। लगभग 89 प्रतिशत सरकारी स्कूल ऐसे हैं, जहां शौचालय की सुविधा नहीं है। बेहतर शिक्षक का अभाव, उनकी सीमित संख्या और शिक्षा की गुणवत्ता पर सवालिया निशान गाहे-बगाहे उठते ही रहे है।
आज भी प्राथमिक शिक्षा की हालत सुधारने में सरकार के पसीने छूट रहे है। शिक्षा को लेकर बनी योजनाएं अपने पैरों पर ही नहीं खड़ी हो पा रही। उनके दौड़ने की कल्पना भी महज कागजों तक ही सीमित है। सर्व शिक्षा अभियान ने शिक्षा के महत्व से तो लोगों को जागरूक बना दिया लेकिन बेहतर लर्निंग वाले स्कूलों की कमी ने गरीब से गरीब आदमी को प्राइवेट स्कूलों की तरफ जाने को मजबूर कर दिया। सरकार कोई भी रही हो शिक्षा को बढ़ावा देने में उसका अपना योगदान रहा। शिक्षा को जन-जन तक पहंुचाने के लिए आर्थिक वजहों से कोई कमी हुई, ऐसा मानना गलत होगा, लेकिन नैतिक जिम्मेदारी का संकट तो आज भी बना हुआ हैं। जिस दिन इस जिम्मेदारी का अहसास शासन-प्रशासन और हर उस व्यक्ति को हो जाएगा जो शिक्षा का मूल्य समझता है, निश्चित तौर पर उस दिन विश्व बैंक की रिर्पोट हमारे लिए कोई मायने नहीं रखेगी। महात्मा गांधी ने कहा था अपने प्रयोजन में दृढ़ विश्वास रखने वाला एक सूक्ष्म शरीर इतिहास के रूख को बदल सकता है।
विश्व बैंक ने वल्र्ड डेवलेपमेन्ट रिपोर्ट 2018ः लर्निंग टू रियलाइज एजुकेशन प्रामिस नाम की यह रिपोर्ट पिछले हफ्ते ही जारी की है। रिपोर्ट के मुताबिक ग्रामीण भारत में तीसरी कक्षा के तीन चैथाई छात्र दो अंको का घटाव तक भी हल नहीं कर सकते। यहां तक कि पांचवीं के आधे छात्र भी यह नहीं कर पाते। रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2016 में ग्रामीण भारत के पांचवीं कक्षा के केवल आधे छात्र ही दूसरी कक्षा के स्तर की किताबें अच्छे से पढ़ पाते है। विश्व बैंक की इस रिपोर्ट के कितने ही संदर्भों पर नजर डाली जाए नतीजा भारत के पक्ष में सिफर ही रहेगा। शर्म की बात है कि विश्व में अपने विकास का बखान करने वाले देश के कर्णधार स्वंय इस स्याह पहलू को क्यूं नहीं देख पाते और विश्व की ये अग्रणीय संस्थाएं उसको उघेड़ कर देश के ’सो काल्ड’ विकास को सदियों पीछे धकेल देती है। विश्व बैंक द्वारा उठाई गई ये शंका र्निमूल तो नहीं कि निम्न और मध्यम आय वाले ऐसे देशों में लाखों युवा कम अवसर और कम वेतन का शिकार होते है। और इसकी वजह प्राथमिक और माध्यमिक स्कूल है जो उन्हें जीवन में सफल बनाने की शिक्षा देने में विफल हो रहे है।
रवीन्द्रनाथ टैगोर ने शिक्षा के संदर्भ में व्यक्ति की सकारात्मक स्वतंत्रता पर बल दिया है जो उसके आत्म-साक्षात्कार में सार्थक होती है। उनका विचार था कि स्वतंत्रता की मौजूदगी में ही शिक्षा को अर्थ और औचित्य मिल सकता है। तत्कालीन स्कूलों को उन्होंने ‘शिक्षा की फैक्ट्री, बनावटी, रंगहीन, दुनिया के संदर्भ से कटा हुआ और सफेद दीवालों के बीच से झांकती मृतक के आँखों की पुतली’ कहा था, जो आज के संदर्भ में भी 100 प्रतिशत सही है। संस्कृत के महान कवि श्री भर्तृहरी जी ने इसी संदर्भ में स्पष्ट रूप से कहा कि “शिक्षा विहीन साक्षात् पशुः पुच्छ विषाणहीनः।” हमारे वैदिक मन्त्रों में भी मंत्रित है “असतो मा सद्गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय, मृत्योर्मा अमृतं गमयः“. इसका अर्थ हुआ कि विद्या अथवा शिक्षा सत्य का, ज्ञान का, अमरता का कारण है। किंतु ये वैदिक मंत्र महज सिंबल के तौर पर भारत में रखे जाते है। ज्ञान और सीखने से इसका कोई ताल्लुक नहीं।
हाल ही में उत्तर प्रदेश में शिक्षा की गिरावट को शिक्षा राज्य मंत्री अनुपमा जायसवाल ने स्वीकारा और इसका ठीकरा पिछली सरकार के मत्थे मढ़ दिया। जबकि ऐसे दोषारोपण से आप समस्या से निजात नहीं पा सकते। सरकार कोई भी हो उसकी समस्या के मूल में मंशा की कमी को हम नजरअंदाज नहीं कर सकते। समस्या की जड़ को समझकर भी उसके प्रति संवेदनहीन होना अकर्मण्यता की निशानी है। जबावदेही से बचना और इसका ठीकरा उसके सिर फोड़ना तो सरकारों के लिए आम बात है। किंतु इसका असर देश के विकास को पड़ता है। दरअसल पूर्व-प्राथमिक शिक्षा की उपेक्षा और प्राथमिक शिक्षा में पहली-दूसरी क्लास की लर्निंग को कमतर आंकना भारतीय शिक्षा की सबसे बड़ी बाधा हैं। सरकारी स्कूलों में जितना अधिक ध्यान बड़ी क्लासेज को दिया जाता है उतना छोटी क्लासेज को नहीं। इन स्कूलों में बेसिक लर्निंग के अभाव के कारण बच्चों का विकास वैेसा नहीं हो पाता जैसा होना चाहिए। प्राइवेट स्कूल अगर लर्निग में ध्यान देते भी है तो उनकी फीस हरेक के वश की नहीं। इस तरह से हजारों बच्चे उस शिक्षा से मरहूम हो जाते है जिसे नींव कहा जा सकता है। सिफ कागजों की भरपाई या सरकारी योजना को इमप्लीमेंट करना ही शासन प्रशासन का काम नहीं, वह सुचारू और व्यवस्थित तरीके से चले क्या ये आवश्यक नहीं?
मैंने कुछ समय एक विश्वस्तरीय संस्थान के साथ सर्व शिक्षा अभियान के लिए काम किया। मुझे हैरानी होती थी प्राथमिक विद्यालयों के दौरे के समय उनकी स्थिति देखकर। अधिकांश स्कूलों में अध्यापक न के बराबर मिले। बच्चे आप उंगलियों मेें गिन सकते थे। स्कूल अहाते, कक्षाओं का बुरा हाल था। कम बच्चों की उपस्थिति पर हेडमास्टर का कहना था कि धान की कटाई चल रही है इसलिए बच्चे नहीं आये। बच्चों में जनरल जानकारी का अभाव था। कक्षा 1 के विद्यार्थी को 100 की गिनती तो दूर ठीक से हिन्दी वर्णमाला का ज्ञान नहीं था। और उस पर मेरे लिए हैरान होने की बात तब हुई, जब मेरे द्वारा बच्चों को उचित शिक्षा न देने की बात कहे जाने पर एक बेसिक अधिकारी ने जबाव दिया कि फटेहाल रहने वाले इन बच्चों को अगर इतना ही मिल रहा है तो बहुत है। ये असमानता किसलिए और फिर इस तरह की शिक्षा से आखिर किसका भला हो रहा है? यकीनन देश का तो कतई नहीं।
विश्व बैंकसमूह के अध्यक्ष जिम योंग किम का कहना है कि अच्छी शिक्षा युवाओं से रोजगार, बेहतर आय, अच्छे स्वास्थ्य और बिना गरीबी के जीवन का वादा करती है। संस्थानों को मजबूत करती है और सामाजिक सामंजस्य बढ़ाती हैै। किंतु हमारे देश में अच्छी शिक्षा के अधिकार में भी भेदभाव दिखाई देता है। योग्य होने पर भ्ज्ञी आपके लिए अच्छे स्कूल कालेज नहीं है अगर आप दो वक्त की रोटी भी मुश्किल से कमाते है। उनके लिए तो सुविधाओं से दूर ऐसे सरकारी स्कूल है, जहां पीने के पानी के साफ होने का भी अंदेशा होता है। लगभग 89 प्रतिशत सरकारी स्कूल ऐसे हैं, जहां शौचालय की सुविधा नहीं है। बेहतर शिक्षक का अभाव, उनकी सीमित संख्या और शिक्षा की गुणवत्ता पर सवालिया निशान गाहे-बगाहे उठते ही रहे है।
आज भी प्राथमिक शिक्षा की हालत सुधारने में सरकार के पसीने छूट रहे है। शिक्षा को लेकर बनी योजनाएं अपने पैरों पर ही नहीं खड़ी हो पा रही। उनके दौड़ने की कल्पना भी महज कागजों तक ही सीमित है। सर्व शिक्षा अभियान ने शिक्षा के महत्व से तो लोगों को जागरूक बना दिया लेकिन बेहतर लर्निंग वाले स्कूलों की कमी ने गरीब से गरीब आदमी को प्राइवेट स्कूलों की तरफ जाने को मजबूर कर दिया। सरकार कोई भी रही हो शिक्षा को बढ़ावा देने में उसका अपना योगदान रहा। शिक्षा को जन-जन तक पहंुचाने के लिए आर्थिक वजहों से कोई कमी हुई, ऐसा मानना गलत होगा, लेकिन नैतिक जिम्मेदारी का संकट तो आज भी बना हुआ हैं। जिस दिन इस जिम्मेदारी का अहसास शासन-प्रशासन और हर उस व्यक्ति को हो जाएगा जो शिक्षा का मूल्य समझता है, निश्चित तौर पर उस दिन विश्व बैंक की रिर्पोट हमारे लिए कोई मायने नहीं रखेगी। महात्मा गांधी ने कहा था अपने प्रयोजन में दृढ़ विश्वास रखने वाला एक सूक्ष्म शरीर इतिहास के रूख को बदल सकता है।
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