Tuesday, December 22, 2020

न मिले भीक तो लाखों का गुजारा ही न हो



कुछ दिनों पूर्व केंद्र सरकार ने नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे के छठे राउंड के आंकड़े जारी किए हैं. इससे पता चला कि पिछले चार-पांच साल में बच्चों के पोषण में कोई प्रोग्रेस नहीं हुआ है. 

हंगर इंडेक्स ने साल 2020 के सर्वे में भारत की स्थिति पाकिस्तान, नेपाल और बांग्लादेश जैसे देशों से भी खराब होने की रिपोर्ट के लगभग दो महीने बाद ही जारी हंगर वॉच और नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे के नतीजे भी भारत में भूख और कुपोषण की समस्या का भयावह रूप पेष कर रहे हैं. जाने-माने अर्थशास्त्री और सामाजिक कार्यकर्ता ज्यां द्रेज के अनुसार भूख और कुपोषण भारत की घरेलू समस्याओं के बीच सबसे बड़ी चिंता होनी चाहिए. अब यह है या नहीं यह बिल्कुल दूसरी बात है, लेकिन यह होना जरूर चाहिए था. 

अल्पपोषण, बाल दुबलापन, बाल ठिगनापन और बाल मृत्यु दर के आधार पर तैयार की जाने वाली ये रिपोर्ट बताती है कि भारत की 14 प्रतिशत आबादी अल्पपोषित (अपर्याप्त कैलोरी लेने की मात्रा) 34.7 प्रतिशत बच्चों की स्टंटिंग दर (5 वर्ष से कम उम्र के बच्चों में उम्र की तुलना में कम हाइट वाली) दर्ज की गई और ‘बाल मृत्यु’  दर 3.7 प्रतिशत है. जबकि ‘वेस्टिंग’ दर (5 वर्ष से कम उम्र के बच्चों में हाइट की तुलना में कम वजन) 17.3 प्रतिशत ही है.

इन आंकडों की हकी़कत जानने के लिए बहुत दूर जाने की जरूरत नहीं होती. आपके आसपास फैली ग़रीबी की फटी चादर नित प्रति आपको नज़र आती ही होगी. उस पर कोरोना काल इस पर कहर बन के बरस गया. जाँ निसार अख़्तर का शेर है-

शर्म आती है कि उस शहर में हम हैं कि जहाँ 
न मिले भीक तो लाखों का गुजारा ही न हो 

हर साल रिफ्रेस किए जाने वाले इन आंकड़ों का असर सुधार की दिशा में दिखता हो मुझे नहीं लगता. जमीनी तौर पर तो नहीं ही दिखता. मेरा तो विचार है कि हर बात पर हंगामा बरपा करने वाले भूख-कुपोषण को मुद्दा बनायें. राजनीति करने वाले या मीडिया तंत्र भूखमरी जैसी विह्द स्थिति पर भी बहसबाजी कर अपनी रोटी सेंक सकते है या टीआरपी बढ़ा सकते है. आंदोलन कारी चक्का जाम कर अपने हित साध सकते है. यकीनन उनका फायदा तो है ही इसमें कुछ हद तक इस हो-हंगामें का फायदा भूखमरी का शिकार हो रही उस ग़रीब को भी मिल जाएगा जिसको जमीन से न उठने देने की कसमें इस देश का तंत्र सदियों से कर रहा.   


Wednesday, December 16, 2020

सही बात रखना भी जब मौत का सामान ले आये...!

 रोहुल्लाह जाम

डाॅन अखबार द्वारा पाकिस्तान में पत्रकारों पर हो रहे क़ातिलाना हमले पर ये टिप्पणी क़ाबिले गौर है है कि एक लोकतांत्रिक व्यवस्था वाला मुल्क होकर भी वह अपने मीडियाकर्मियों की हिफाजत नहीं कर पा रहा. ‘इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ जर्नलिस्ट’ ने वैश्विक पत्रकारिता पर हाल में एक श्वेत-पत्र जारी किया है, जिसके मुताबिक, पत्रकारिता के लिहाज से दुनिया के पांच सबसे खतरनाक मुल्कों में एक नाम पाकिस्तान का भी है. 

श्वेत-पत्र कहता है कि साल 1990 से आज तक यहां 138 खबरनवीसों को मौत के घाट उतारा जा चुका है. यह आंकड़ा इस मुल्क में प्रेस की आजादी की गंभीर स्थिति का अंदाजा करा देता है. यह श्वेत-पत्र उसी वर्ष में जारी हुआ है, जब ‘फ्रीडम नेटवर्क’ ने एक साल के भीतर पाकिस्तान में पत्रकारों के खिलाफ,कत्ल, मारपीट, पाबंदी, धमकी व कानूनी वाद के 91 मामले दर्ज किए हैं. हालांकि इन दिनों पत्रकारों के कत्ल की वारदातें कम हुई हैं, मगर उन्हें डराने-धमकाने, मुकदमे में फंसाने और दंडित करने की घटनाएं पहले से काफी अधिक बढ़ गई है. 

अखबार लिखता है जिन हालात में पाकिस्तान के भीतर पत्रकारों को आज काम करना पड़ रहा है, वे बेहद चिंताजनक हैं और यहां आलोचना व आजाद ख्याली के लिए जगह सिमटती जा रही है। पत्रकारों को खुलेआम सोशल मीडिया पर धमकाया जाने लगा है और अक्सर जिस आईडी से धमकी आती है, वह सरकार से वाबस्ता होती है. इस साल अनेक पत्रकारों को देशद्रोह के मामले में सलाखों के पीछे धकेल दिया गया, जबकि कइयों को उठा लिया गया और काफी हंगामे व अवाम के दबाव के बाद ही उनकी रिहाई मुमकिन हो सकी. यही नहीं, पत्रकारों के कत्ल या उन पर हुए हमलों से जुड़े मुकदमों में कुछ नहीं होता. 

जियो टीवी के एंकर हामिद मीर पर 2014 में ही कातिलाना हमला हुआ था, वह आज भी इंसाफ का इंतजार कर रहे हैं. हामिद की गिनती पाकिस्तान के उन चंद पत्रकारों में होती है जिन्हें आतंकवाद और सुरक्षा मामलों का विशेषज्ञ तो माना ही जाता है, उन्हें जोखिमपूर्ण पत्रकारिता के लिए भी जाना जाता है. कभी ओसामा बिन लादेन का साक्षात्कार कर चुके हामिद अरसे से तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान जैसे अनगिनत आतंकी संगठनों के निशाने पर हैं और उन्हें अनेक बार धमकियां भी मिल चुकी है. पत्रकार व विश्लेषक रजा रूमी भी ऐसे ही हमलों के शिकार हो चुके है. .

‘इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ जर्नलिस्ट’ के  श्वेत-पत्र के हवाले से कहें तो केवल पाकिस्तान ही नहीं बल्कि हर वह देष में जहां पत्रकारों ने राजनीतिक हलकों के गोपनीय या कह सकते है छद्म मामलों को उजागर करने का प्रयत्न किया तो उनका हश्र बुरा ही हुआ. पाकिस्तान के सलीम शहजाद हो या भारत की गौरी लंकेश, सऊदी अरब के पत्रकार जमाल खशोगी हो या ईरान के मशहूर पत्रकार रोहुल्लाह जाम, इन सभी की हत्या इनकी लिखी-कही गई खबरों में विरोधी रुझान का होना था. वरिष्ठ पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या ने पूरे देश को हिला कर रख दिया और लगभग पूरे साल यह मामला सुर्खियों में छाया रहा. 

भारत के तमिलनाडु राज्य में राजधानी चेन्नई से सटे कांचीपुरम जिले के कुंद्राथूर में 27 वर्षीय टेलीविजन पत्रकार इसरावेल मोसेस पर कुछ लोगों ने उनके घर के बाहर हंसुओं से हमला कर मार डाला. मीडिया में आई खबरों के अनुसार मोसेस ने अपनी कई रिपोर्टों में कुंद्राथुर इलाके में गांजे की अवैध बिक्री और सरकारी जमीन की अवैध बिक्री का विषय उठाया था.दूसरी तरफ भोपाल की राजधानी के बाहरी इलाके के जंगलों में पत्रकार सय्यद आदिल वहाब की लाश मिली है.35 वर्षीय वहाब एक स्थानीय टीवी समाचार के लिए काम करते थे.

अकल्पनीय है किंतु सत्य है कि भारत में ही 2014 से 2020 के बीच 12 पत्रकार गिरफ्तार किए गए हैं और 27 पत्रकार मारे गए. गिरफ्तारी का ताजा-तरीन उदाहरण रिपब्लिक भारत के सीईओ अर्नब गोस्वामी है. 

आईपीआई के मुताबिक, 1997 से लेकर 2020 के बीच इन 23 साल में विष्व भर में 1928 पत्रकारों की हत्या हुई है. इसमें अकेले भारत में 1997 से 2020 के बीच कुल 74 पत्रकारों की हत्या हुई है. इंटरनेशनल न्यूज सेफ्टी इंस्टीट्यूट (आईएनएसआई) की रिपोर्ट में कहा गया कि 2013 में रिपोर्टिग के दौरान दुनिया भर में 134 पत्रकार और मीडिया को सहायता देने वाले कर्मी मारे गए. उनके अनुसार खैबर पख्तूनख्वा, बलूचिस्तान और कबायली इलाके तो पत्रकारों के लिए कत्लगाह से कम नहीं.

इस तरह के हमले लोकतंत्र के चैथे स्तंभ को लहूलुहान तो कर ही रहे पत्रकारों की सुरक्षा को लेकर सवाल भी उठा रहे है. पत्रकार अगर पत्रकारिता की वचनद्धता निभाता है तो उसे मौत और धमकियों का ईनाम मिलता है. किसी देष को ब्लेकमेल करने के लिए पत्रकार का अपहरण कर ब्लैकमेल करना या उन्हें मारकर देष को उसकी औक़ात बताना आतंकवादियों का खेल होता है. लेकिन अपने ही देष में असुरक्षित महसूस करते पत्रकार शायद इन्हीं कारणों से सत्ताधारियों के हाथ का खिलौना बनने को मजबूर है और उसी की जुबान बोलने को राजी भी. कहना अतिष्योक्ति नहीं होगा कि जो तैयार नहीं होते उन्हें देख ही लिया जाता है...!!!! 


Sunday, December 13, 2020

स्मृतियों का बक्सा!



मैंने स्मृतियों के बक्से में
संजो कर रखा है बहुत सी यादों को,
छुपा रखा है जिसमें,
शहनाई की उस सुमधुर आवाज को... 
जिनकी स्वर लहरियों के बीच, 
तुम दोनों एक बंधन में बंधे थे।

तुम्हारी गृहस्थी की उस 
पोटली को भी रखा है बड़े संभाल,
जब तुम दोनों, अपने में मगन,
प्रेम और समर्पण भरे रंगों की बाल्टी से... 
रंग रहे थे 
अपना घर-संसार।

सहेज के रखा है उन उल्लास के 
पलों को भी, 
जो पहली किलकारी के साथ... 
हम सब के चेहरों पर, 
उजास होकर फैल गई थी।

रखे है वे सारे पल भी संभाल के,
जब-जब तुमने एक-दूसरे को... 
संभाला-संवारा-निखारा, 
और गढ़ दिया अपने दांपत्य जीवन का, 
सुखद-सुरीला संगीत।

दूर होते जा रहे अपनों के सबंधो के बीच, 
तुम्हारे बीच के सम्बन्धों की
गहराई और समझ के हर पल की, 
पुड़ियां है मेरे
इस बक्से में बंद। 

लेकिन सुनो! 
अभी रखनी है मुझे 
कुछ और...तुमसे जुड़ी सुखद स्मृतियां, 
जीवन की सांझ होने तक या फिर
मेरे चिरनिद्रा में चले जाने तक।

Thursday, December 10, 2020

तो चलो आओ खेंले लोकतंत्र-लोकतंत्र खेल, चित् मेरा तो पट् तेरा



किसान आंदोलन के बीच नीति आयोग के सीईओ अमिताभ कांत, द्वारा किए गए एक ट्वीट ने थोड़ी देर के लिए ही सही पर बखेड़ा तो खड़ा कर दिया जिसके बाद उन्हें ये ड्लिीट करना पड़ा. दरअसल उनका ये कहना कि, भारत में लोकतंत्र कुछ ज्यादा ही है...और यहां ’कड़े’ सुधार को लागू करना बहुत मुश्किल है, कईयों को रास न आया.

इस ट्वीट या लिखने वाले से मेरे इस लेख का कोई सरोकार नहीं बल्कि मैं इसके बहाने ’लोकतंत्र’ में हम क्या खोते जा रहे हैं, इस पर एक नजर डालना चाह रही. लेकिन इससे पहले एक नजर एक रिपोर्ट पर भी डालना चाहूंगी जो कहती है कि क्या भारत में लोकतंत्र कमजोर पड़ रहा.

स्वीडन स्थित संस्था ’वी- डेम इंस्टीट्यूट’ की ’2020 की लोकतंत्र रिपोर्ट’ में यह संकेत दिया जाना चिंताजनक हैं कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देशों में से एक कहे जाने वाले भारत में लोकतंत्र कमजोर पड़ रहा है. हालांकि यह रिपोर्ट भारत पर ही है, ऐसा नहीं है. 179 देशों देशों का इसमें जिक्र हैं, जिसमें भारत को 90वाँ स्थान दिया गया है और डेनमार्क को पहला. ’उदार लोकतंत्र सूचकांक’ रिपोर्ट को तैयार करने वाली संस्था वी- डेम इंस्टीट्यूट स्वीडन के गोटेनबर्ग विश्वविद्यालय से जुड़ी है, जिस के अधिकारी कहते हैं कि भारत में लोकतंत्र की बिगड़ती स्थिति की उन्हें चिंता है.

इस रिपोर्ट के अनुसार भारत में मीडिया, सिविल सोसाइटी और मोदी सरकार में विपक्ष के विरोध की जगह कम होती जा रही है, जिसके कारण लोकतंत्र के रूप में भारत अपना स्थान खोने की कगार पर है. भारत का पड़ोसी देश श्रीलंका 70वें स्थान पर है जबकि नेपाल 72वें नंबर पर है. इस सूची में भारत से नीचे पाकिस्तान 126वें नंबर पर है और बांग्लादेश 154वें स्थान पर.

बाबा साहब अम्बेडकर ने लोकतंत्र की व्याख्या करते हुए उसे एक ऐसी जीवन पद्धति कहा जिसमें स्वतंत्रता, समता और बंधुता समाज-जीवन के मूल सिद्धांत होते हैं. जबकि जॉर्ज बर्नार्ड शॉ का लोकतंत्र के बारे में कहना था-लोकतंत्र, अपनी महंगी और समय बर्बाद करने वाली खूबियों के साथ सिर्फ भ्रमित करने का एक तरीका भर है जिससे जनता को विश्वास दिलाया जाता है कि वह ही शासक है जबकि वास्तविक सत्ता कुछ गिने-चुने लोगों के हाथ में ही होती है.

वर्तमान परिस्थितियों पर गौर करें तो उपरोक्त दोनों कथनों में से जार्ज बर्नार्ड शाॅ का कथन कहीं अधिक खरा उतरता है. इन कुछ गिने-चुने लोगों के कारण ही वास्तव में आज लोकतंत्र खतरे में नज़र आ रहा है. महज अपने वोट बैंक की राजनीति करने के लिए देष के भीतर जाति-भाषा की दीवार खड़ी कर दिए जाने से हर नागरिक स्वार्थ सिद्धि में रत नजर आता है. हम भारतीय न रहकर बंगाली-पंजाबी-तमिल-तेलगू-मराठी या जाने और क्या-क्या हो गये. लोकतंत्र की लाठी संभालने वालों के लिए यही काफी नहीं हुआ तो कईक जातियों को उनकी पहचान से रूबरू करा उनका हितैषी बनने का नाटक करने लगा. जाहिर है फिर तो हर पार्टी को ये वोट बैंक का  खेल भा गया और यहीं से शुरू हो गया ’आओ लोकतंत्र-लोकतंत्र खेलें’ का असल खेल .

अगर आप गौर करें तो गत कुछ सालों से आपको नाराजगी, को्रध, नफरत, अधैर्यता और नकारात्मकता भीड़ की शक्ल में बदलती नज़र आती होगी. ध्यान दें तो भारत में औसतन हर दूसरे आदमी को आप तनावग्रस्त और सरकार, परिस्थितियों को कोसता नजर आता है. अच्छा होता हुआ उसे कुछ भी नजर नहीं आता जबकि वातावरण में घोली रही जहरीली बातें उसके जेहन को घुन की तरह पीस रही है. हम जब भी आपस में मिलते है या किसी मुद्दे पर सोषल मीडिया पर बात करते है विचार में भिन्नता दिखते ही बातचीत तेजी से आक्रामक व्यवहार में तब्दील होने लगती है. स्वस्थ माहौल और स्वस्थ परंपरा से बनाये जाने वाले समाज की परिभाषा वाला लोकतंत्र आज क्रब में दफन हो चुके इतिहास की परतों से खुरेंच-खुरेंच कर निर्मित किया जा रहा. देखा जाए तो हम अब आगे देखने के बजाए पीछे देख कर चल रहे है.

भारत के जाने-माने चिंतक प्रताप भानु मेहता ने अपने एक लेख (मार्च 2019) में कहा था, मुझे ऐसा लग रहा है कि हमारे लोकतंत्र के साथ कुछ ऐसा हो रहा है जो लोकतांत्रिक आत्मा को खत्म कर रहा है. हम गुस्से से उबलते दिल, छोटे दिमाग और संकीर्ण आत्मा वाले राष्ट्र के तौर पर निर्मित होते जा रहे हैं. कुछ मायने में लोकतंत्र आजादी, उत्सव का नाम है, ऐसी व्यवस्था में लोग कहां जाएंगे इसे जानना महत्वपूर्ण होता है न कि पीछे कहां से आएं हैं.

सरकार और नागरिकों के बीच अहम भूमिका निभाने वाला सबसे जरूरी स्ंतभ ’मीडिया’ अपनी जिम्मेदारियों से भाग रहा. सरकुलेषन, सरकारी विज्ञापनों, टीआरपी या कह सकते है भारी फंडिंग के मोह में वह तथ्यों को तोड़-मरोड़ के पेष कर रहा है. रिया चक्रवर्ती के मामले में मैंने ऐसे मूर्ख लोगों को भी देखा जो मसाले की तरह परोसे जा रही खबरों को एकता कपूर के सीरियलों की भंाति पूरी निष्ठा से देख ही नही रहे थी बल्कि उस पर यकीन कर विचार-मंथन भी कर रहे थे.

जहां तक विपक्ष की भूमिका का सवाल है वह भी संदिग्ध ही रहती है. नकारात्मकता फैलाने के अलावा वह किसी अहम नतीजे पर पहंुच नहीं पाता. यहां आकर भी वजहें व्यक्तिगत स्वार्थ की क्षतिपूर्ति करने मे मषगूल होती है. और सोषल मीडिया की जहां तक बात है किसी भी चिंगारी को आग में तब्दील करने में इसका कोई सानी नहीं. नोटों के जरिए खरीद-फरोख्त कर अपनी राजनीति चाल कामयाब करना किसी भी पार्टी के लिए आज बेहद आसान हो गया है.

संभवतः यही कारण है कि सकारात्मकता के लक्षणों से दूर होता ’लोकतंत्र’ नागरिक के लिए भी अपनी बात रखने का महज एक हथियार भर रह गया है. इसलिए वह जब चाहे तब भी़ड़, आंदोलन, हड़ताल, आगजनी, दंगे की शक्ल अख़्तियार करने लगा है. फिलहाल तो शुक्र इस बात का है कि देष की सीमाओं-सुरक्षा से जुड़ी समस्याओं और फैसलों पर सवाल नहीं खड़े किए जाते और सब ऐसे मामुलात में एक छतरी के नीचे खड़े नजर आते है वरना तो दूसरे मुल्कों के बीच हमारे लोकतंत्र की धज्जियां उड़ने में देर नहीं लगती.

Wednesday, December 9, 2020

बात सच कहिए मगर यूं कि हकीक़़त न लगे


नए कृषि कानूनों के खिलाफ चल रहे किसान आंदोलन में 8 तारीख को हुए भारत बंद के असर पर मीडिया के संपादकीय भी अपने हितों से परे देखने को नहीं मिले. देखा जाए तो ये कोई हैरान कर देने वाली बात भी नहीं है. लेकिन मैं इन सबसे अलग अपनी मुखतलिफ सी बात रखना चाहूंगी.

अगर आप गौर करें तो नई किसान नीति हुक्मरानों के द्व़ारा उस तबके को खुश करने की ताबीर है जिनके सहारे पार्टियां इफ़रात में चुनावी दंगल के मैदान पर खर्च करती है. सो ऐसे में हित उनका साधा जाता है जिनसे फायदे पहुचांने के वायदे पहले किये जा चुके है और अब वक्त है उन्हें पूरा करने का. इसमें किसान हित को जहां तक और जितना बेहतर दिखाया जाना है, दिखाया जा रहा. यूं भी अक्सर हंगामा बरपा करने वाले कब सत्ता के फैसलों पर खुष हुए हंै.

सो वे सत्ता पक्ष के इस दावे को कि ये पूरी तरह से भारत के गरीब-लाचार किसान को नुकसान से बचाने के लिए है, फिजूल की बात कह रहे. और जो आंदोलन के झंडे लेकर खडे है वे या तो पूंजीपति किसान है या उनके इषारों पर चलने वाले. इनकी संख्या मुठठी भर है. लेकिन मैं यहां इस आंदोलन की भीड़ में उस 86 प्रतिशत छोटे और मंझोले किसान को नदारद देख रही जिसकी इस कानून से यकीनन रही-सही कमर भी टूट जाएगी. ये वह किसान है जिसके पास 5 एकड़ से भी कम की जमीन है और जो हर बार फसल बोने से पहले कर्ज लेता है और फसल होने के बाद उसे चुकता करता है. 

तो मेरा ये कहना है कि सरकार भले ही लाख दावा कर ले, यह भी एक अमिट सच्चाई है कि यह कानून लागू होने के बाद कृषि-जगत बाजार मुक्त हो सकेगा? जिस 86 प्रतिषत किसान के सामने बीज तक खरीदने की दिक्कत पेष आती है वह कैसे अपने अनाज का भंडारण या उसे सुरक्षित कर सकेगा? सुरक्षा कर भी ले तो कैसे आॅनलाइन अपनी फसल को बेच सकेगा. जाहिर है यहीं पर ही कारपोरेट जगत की इन्ट्री होगी. जो इस किसान की फसल की मार्केट्रिग और सेल करने का दावा पेश करेगा. आप यूं कह सकते है किसान की फसल बाजार तक पहुंचाने का काम आगे से आढ़तियों द्वारा न होकर काॅरपोरेट दुनिया के बिचैलिए द्वारा होगा.

हंगामा काट रहा अमीर किसान इस बात को समझ रहा, क्योंकि अब तक वहीं इस काम को भी अंजाम दे रहा था. उसे इस कानून के लागू होने से अपना धंधा सिमट जाने का भय है. और इधर इन सब हंगामे से दूर छोटा-मंझोला किसान इस खेल को समझ नहीं पा रहा है या यूं भी कह सकते है कि उसको पता है कि उसे तो हर हाल में किसी एक की कठपुतली बनना ही है. उस पर तो इस कानून के लागू होने से फर्क बस इतना पड़ना है कि काॅरपोरेट कंपनियों को उस के हालातों से कोई वास्ता नही होगा जबकि आढ़तियों के साथ थोड़ा देश-काल-समाज का लिहाज चलता है. और चूकि उसे तो अपनी छोटी-मोटी फसल को हर हाल में बेचना ही है तो राम हो या रहीम क्या फर्क पड़ता है.

अफसोस की बात है कि कृषि प्रधान देष की पहचान वाले देश में आज स्थिति ये हो रही है कि किसान की आने वाली नस्ल खेती से बेज़ार तबियत की हो रही. खेतिहर मजदूरो की तो जान पर बन आ रही. गत वर्षों में किसानों द्वारा की जा रही आत्महत्या इसका उदाहरण है. खेती-किसानी में बढ़ती बेरोजगारी के कारण मंझोले किसान के हालात बदतर ही हुए है. न जाने हमारे नीति निर्घारक ग्रामीण भारत के बुनियादी ढांचे पर काम क्यों नहीं करते. अगर देष के ग्रामीण इलाकों के विकास को ध्यान में रखकर समग्र योजनाओं पर काम किया जाता तो निश्चित तौर पर कृषि में सुधार तो होता ही, रोजगार के रास्ते भी वहां खुलते. यही नहीं ग्रामीण इलाकों को मजबूत करने से गैर कृषि क्षेत्र की आवष्यकताएं भी पूरी होंती.

दुख तो इस बात का है कि नीतियां बनाने वाले गांव-किसान के विकास की बात तो करते है लेकिन उसे धरातल में उतारने से बाज आते है.दिल्ली-मुबई-बगलौर-कलकत्ता में बैठेे मल्टीमिलियन्स के इशारे पर चलने वाली सत्ता को किसान या देष के किसी भी गरीब की याद चुनावी मौसम में ही आती है. अपनी बातों में सपनों को हक़ीक़त में बदलने की बात करने वालेे सत्ता के नुमांइदे अक्सर भूल जाते है कि भारत मूलतः ग्रामीण देष है जहां की आबादी सीमित संसाधनों के साथ किसी तरह गुजर-बसर करने को आज भी बेबस है, क्योंकि जो हकी़क़त दिखाने की कोषिष की जाती है दरअसल वो तो कुछ और ही निकलता है.

फुज़ैल ज़ाफरी का एक शेर याद आ रहा-

ज़हर मीठा हो तो पीने में मजा आता है,
बात सच कहिए मगर यूं कि हकीक़़त न लगे