Friday, March 7, 2025

राजनैतिक भागीदारी बढ़ाये बगैर समानता की बात बेमानी होगी


एक बार फिर हम अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस मनाने जा रहे है है और हर साल की तरह इस वर्ष भी संयुक्त राष्ट्र ने अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस 2025 का विषय सभी महिलाओं और लड़कियों के लिएः अधिकार, समानता, सशक्तिकरण पर त्वरित कारवाई तय किया है। 2025 की थीम, शिक्षा, रोज़गार और नेतृत्व में महिलाओं की प्रगति को आगे बढ़ाने वाली रणनीतियों और उपकरणों को पहचानने पर केंद्रित है। यहां आपको बताते चलें कि अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस की शुरुआत 1911 में हुई थी, जो महिलाओं के अधिकारों की वकालत करने वाले श्रमिक आंदोलनों से प्रेरित था। जर्मन कार्यकर्ता क्लारा ज़ेटकिन ने इस विचार का प्रस्ताव रखा, जिसके कारण अमेरिका और यूरोप में पहली बार इसे मनाया गया। संयुक्त राष्ट्र ने आधिकारिक तौर पर जब इसे 8 मार्च को 1975 में अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के रूप में मान्यता दी, तो निःसंदेह इसका वैश्विक महत्व कालांतर में मजबूत होता चला गया।

हालांकि विश्व आर्थिक मंच की 2024 की वार्षिक वैश्विक लैंगिक अंतर रिपोर्ट को देखें तो वैश्विक लैंगिक अंतर में मामूली सुधार हुआ है और वर्तमान प्रगति के अनुसार इसे पाटने में अभी भी और पाँच पीढ़ियाँ लगेंगी। इसकी वजह राजनीतिक भागीदारी में उनकी उपस्थिति का कम होना। यह वह क्षेत्र है जिसमें उनकी भूमिका बढ़ने का सभी क्षेत्रों में प्रभाव सबसे अधिक पड़ने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता। अफसोस की बात है कि यही वह जगह है जहाँ अंतर सबसे अधिक दिखाई देता है। वैश्विक स्तर पर महिलाओं के लिए शीर्ष-स्तरीय पद अभी भी काफी हद तक दुर्गम बने हुए हैं। हालांकि वैश्विक श्रम-बल भागीदारी में समानता ठीक हो रही है, महामारी के दौरान 62.3ः के निम्नतम स्तर से बढ़कर 65.7ः तक बढ़ोत्तरी नजर आई है।

वैश्विक लैंगिक अंतर सूचकांक चार प्रमुख आयामों में देशों का आकलन करता है जिसमें आर्थिक भागीदारी, शैक्षिक उपलब्धि, स्वास्थ्य रक्षा और राजनीतिक भागीदारी। जिसमें आर्थिक भागीदारी में भारत 142वें स्थान पर है, जो श्रम बल भागीदारी, वेतन समानता और वरिष्ठ पदों पर प्रतिनिधित्व में महत्वपूर्ण असमानताओं को दर्शाता है। शैक्षिक उपलब्धि में 112वें स्थान पर स्थित, भारत ने प्राथमिक, माध्यमिक और तृतीयक शिक्षा में महिलाओं के लिए उच्च नामांकन दर हासिल की है। हालाँकि, पुरुषों और महिलाओं के बीच 17.2 प्रतिशत अंकों का साक्षरता अंतर बना हुआ है। वैश्विक लैंगिक अंतर पर विश्व आर्थिक मंच की नवीनतम रिपोर्ट लैंगिक समानता की दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति को उजागर करती है, जबकि निरंतर चुनौतियों को भी रेखांकित करती है जो पूर्ण समानता में अभी बाधा डाल रही हैं। स्वास्थ्य और जीवन रक्षा में भी भारत 142वें स्थान पर है, जो महिलाओं के लिए स्वास्थ्य सेवा तक पहुँच और परिणामों में चल रही चुनौतियों को और सरकार विफलताओं को दर्शाता है। राजनीतिक सशक्तिकरण में भारत की 65वें स्थान तक पहंुच को हम सुधार के रूप देख सकते है। फिर भी अभी मंत्रिस्तरीय पदों (6.9ः) और संसद (17.2ः) में महिलाओं का प्रतिनिधित्व की कमी इस मुद्दे पर गंभीर चितन की मांग करती है। 

इसमें कोई दो राय नहीं कि महिलाएं दुनिया की आधी आबादी का प्रतिनिधित्व करती हैं बावजूद इसके लैंगिक असमानता हर जगह बनी हुई है। सामाजिक प्रगति को बढ़ने से रोकने में यह स्थिति सबसे बड़ी बाधा है। श्रम बाजार में महिलाएँ अभी भी वैश्विक स्तर पर पुरुषों की तुलना में 23 प्रतिशत कम कमा रही हैं। ऊपर से यौन हिंसा और शोषण, अवैतनिक देखभाल और घरेलू काम का असमान विभाजन और सार्वजनिक कार्यालय में भेदभाव उसके लिए अभी भी सभी बड़ी बाधा बनी हुई हैं। असमानता के ये सभी क्षेत्र महामारी के बाद से और भी बढ़ गए हैं। यौन हिंसा की रिपोर्ट में उछाल आया है। मौजूदा हालातो पर गौर करे तो बाल विवाह को समाप्त करने में अभी अनुमानित सालों लग जायेगें, ऐसा लगता है। रिपोर्ट के अनूसार तो कानूनी सुरक्षा में अंतराल को बंद करने और भेदभावपूर्ण कानूनों को हटाने में 286 साल, कार्यस्थल में सत्ता और नेतृत्व के पदों पर महिलाओं को समान रूप से प्रतिनिधित्व मिलने में 140 साल लगेंगे और राष्ट्रीय संसदों में समान प्रतिनिधित्व हासिल करने में अभी और 47 साल लग जायेगें। यकीनी तौर पर यह कोई प्रशंसनीय स्थिति नहीं है। दरअसल लैंगिक समानता एक सर्वव्यापी उद्देश्य है और इसे राष्ट्रीय नीतियों, बजट और संस्थानों का मुख्य केंद्र बनाना चाहिए।

दुनिया भर के किसी भी मुल्क को ले लें, आज भी लगभग आधी विवाहित महिलाओं के पास अपने यौन और प्रजनन स्वास्थ्य और अधिकारों के बारे में निर्णय लेने की शक्ति नहीं है। सुनने में यह अजीब लग सकता है लेकिन यह कटु सत्य है कि 15-49 वर्ष की आयु के बीच की 35 प्रतिशत महिलाओं ने शारीरिक या यौन अंतरंग साथी हिंसा या गैर-साथी यौन हिंसा का अनुभव किया है। अफ्रीका और मध्य पूर्व के 30 देशों में 15-19 वर्ष की आयु की 3 में से 1 लड़की ने महिला जननांग विकृति/काटने के किसी न किसी रूप का अनुभव किया है। यह एक हानिकारक आम प्रथा है, जिसमें लंबे समय तक रक्तस्राव, संक्रमण (एचआईवी सहित), प्रसव संबंधी जटिलताएं, बांझपन और मृत्यु का जोखिम आम बात है। इस सबंध में देखे तो आइसलैंड, स्वीडन, फ़िनलैंड और नॉर्वे जैसे स्कैंडिनेवियाई देशों ने लैंगिक अंतर को कम करने में अच्छी प्रगति की है। मध्य पूर्व, दक्षिण एशिया और अफ्रीका में महत्वपूर्ण आर्थिक और सामाजिक असमानताएँ अन्य देशों की तुलना में कहीं अधिक गहरी हैं।

संकीर्ण मानसिकता से उबरती भारतीय महिलाएं

भारत की महिलाएँ एक महत्वपूर्ण परिवर्तन से गुज़र रही हैं, पारंपरिक अपेक्षाओं से मुक्त होकर नए रास्ते बना रही हैं। यह परिवर्तन मुझे विभिन्न कारकों से नजर आ रहा है जैसे शिक्षा और आर्थिक सशक्तीकरण के रूप में। शिक्षा और नौकरी के अवसरों तक पहुँच में वृद्धि ने महिलाओं को वित्तीय स्वतंत्रता प्राप्त करने, पितृसत्तात्मक मानदंडों को चुनौती देने और आत्म-सम्मान की भावना को विकसित करने में सक्षम बनाया है। इसका मतलब यह निकलता है कि स्त्री अब अपनी योग्यता का समझ रही है और महत्वाकांक्षा को मारने के बजाय उसको ‘अचीव’ करना सीख रही है। दूसरे सामाजिक और सांस्कृतिक बदलाव के नजरिए में- सोशल मीडिया, शहरीकरण और वैश्विक दृष्टिकोणों के संपर्क में आने से समाज में अधिक उदार और खुले विचारों का निर्माण हुआ है, जिससे महिलाओं को खुद को अभिव्यक्त करने और अपनी आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए प्रोत्साहन मिला है। तीसरे महिला आंदोलन और सक्रियता में उसकी बढ़ती भागीदारी भी उसे एक नई स्त्री के रूप में रख रही। हालांकि इस रूप में कई महिलाएं ऐतिहासिक उदाहरणों के रूप में हमारे ऑखों में कौंध जाती है लेकिन उनकी संख्या सीमित है। आज नारीवादी आंदोलनों, गैर-सरकारी संगठनों (एनजीओ) और वकालत समूहों के विकास के तले अधिकतर महिलाएं अपनी आवाज़ उठाने, अन्याय को चुनौती देने और समान अधिकारों की मांग करने के लिए एक नया मंच खड़ी कर रही है। चौथे सरकारी पहल और नीतियॉं जैसे ‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ योजना’, ‘महिला आरक्षण विधेयक’ और अन्य पहलों ने लैंगिक समानता को बढ़ावा देकर महिलाओं को सशक्त बनाने में मदद की और कन्या भ्रूण हत्या और घरेलू हिंसा जैसे मुद्दों का को बहुत हद तक उसके घृणित रूप से उबारने में सहयोग किया है।

एक तरह से हम कह सकते है कि आज की भारतीय महिलाएँ विभिन्न तरीकों से अपनी भूमिकाएँ और व्यक्तित्व को पुनः परिभाषित कर रही हैं। वह गैर-पारंपरिक करियर जैसे उद्यमिता, खेल और सेना जैसे क्षेत्रों में प्रवेश कर रही हैं रूढ़ियों को तोड़ उन सीमाओं को लांघ रही हैं जहां मात्र अब तक पुरूषों का वर्चस्व रहा। अपनी स्वतंत्रता को सर्वाेपरि रख वह सामाजिक अपेक्षाओं के अनुरूप होने के बजाय शिक्षा, विवाह, करियर और जीवनशैली के बारे में अपने स्वयं के विकल्प चुन रही हैं। यही नहीं आज की स्त्री खुद को रचनात्मक रूप से अभिव्यक्त करना सीख गई है। वह कला, साहित्य, संगीत और अन्य रचनात्मक गतिविधियों के माध्यम से अपनी आवाज़ ढूँढ रही हैं, पारंपरिक मानदंडों को चुनौती दे अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन कर रही हैं। इन सबसे बड़ी बात वह परिवर्तन-निर्माता बन कर उभर रही। महिलाएँ संवैधानिक नेतृत्व की भूमिकाएँ निभा रही हैं जिसकी मदद से वह सामाजिक परिवर्तन ला रही हैं और महिलाओं के अधिकारों की वकालत कर रही हैं और दूसरों को भी ऐसा करने के लिए प्रेरित कर रही हैं। वह चाहे भारत देश की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू हो या प्रदेश की गर्वनर आनंदीबेन हो या फिर हाल में दिल्ली की नवनिर्वाचित मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता।

अपने व्यक्तित्व को पुनः परिभाषित कर रही आज की भारतीय स्त्री सीमाओं को लांघ रही हैं और एक अधिक समावेशी, समतावादी समाज का निर्माण कर रही हैं। 2019 में चंद्रयान-2 का पूर्ण नेतृत्व भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन की दो महिला वैज्ञानिकों द्वारा किया जाना अपने आप में एक मिसाल है। वह स्थिति और भी क्रांतिकारी बन पड़ी जब सर्वाेच्च न्यायालय ने 2020 में सेना कमांडर के रूप में सेवा करने वाली महिलाओं पर सरकार की स्थिति को उलट दिया था। पहली बार 1992 में सशस्त्र बलों में महिलाओं को शामिल किया जाना। उनका लड़ाकू पायलट, लोको पायलट, परिवहन चालक, डॉक्टर, इंजीनियर, सिग्नलर्स, फैक्टरी संचालक आदि सहित कई पुरूष वर्चस्व वाले पदों पर काम करना लंबे समय से चली आ रही परंपरा को चुनौती थी। ये ऐसे उदाहरण हैं जहाँ भारतीय महिलाओं ने खुद को साबित किया है।

भारत में महिला सशक्तीकरण और समानता के दृष्टिकोण से यहां उतार-चढ़ाव दोनों नजर आते हैं। यहां लैंगिक असमानता को समाप्त करने के उद्देश्य से घरेलू नीतियाँ बनाकर, विभिन्न सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि की महिलाओं का समर्थन कर और कई परियोजनाओं पर राज्य सरकारों, स्थानीय गैर-सरकारी संगठनों और निजी निगमों द्वारा काम करने के प्रयासों के बावजूद वह फर्क नहीं नजर आ रहा, जो होना चाहिए। लैंगिक समानता के वैश्विक सर्वेक्षणों में भारत की रैंकिंग में पिछले कुछ वर्षों में सुधार दिखता है पर उसकी रफ्तार बेहद धीमी ही नजर आ रही जबकि भारत में महिलाएँ राजनीति, व्यवसाय, चिकित्सा, खेल और कृषि सहित सभी क्षेत्रों में उभर कर सामने आ रही हैं।