Monday, August 28, 2023

बढ़ती बेरोजगारी एक बड़ी समस्या बन रहे चीन के लिए

चीन में बेरोजगारी के आंकड़ों ने एक नए रिकार्ड स्तर को छू लिया। है। अधिकारिक आंकड़े बताते हैं कि चीन में 16 से 24 साल की उम्र के लोगों की बेरोजगारी दर जुलाई में 21.3 प्रतिशत पहुंच गई है। जबकि अप्रैल महीने में ये आंकड़ा 20.4 प्रतिशत था। गत माह चीन ने इंडिकेटर की सीरीज की एक रिपोर्ट जारी की, जिसमें बताया गया कि लगातार दूसरे महीने बेरोजेगारी दर अपने रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई है। गिरते जीडीपी ग्रोथ के साथ-साथ देश में बढ़ रही बेरोजगारी से चीन इस वक्त घरेलू मसलों से बेज़ार है।

चीन के शहरों में हर 5वां शख्स बेरोजगार 

यूं तो कोरोना वायरस का कहर दुनिया भर में टूटा था लेकिन वायरस की जन्मस्थली चीन में वायरस ने लोगों की कमर ही तोड़ दी है। सख्त शून्य-सीओवीआईडी नीति, संपत्ति बाजार में गिरावट और प्रमुख प्रौद्योगिकी क्षेत्र पर नियामक कार्रवाई से जूझ रहे चीन में छोटे-बड़े कारोबारी  खुद को किसी तरह खड़ा करने की कोशिश में है। ऐसे हालात में अपनी फर्म को काबू में लाने का सबसे आसान तरीका एम्पलायर को जो नजर आता है, वह है श्रमशक्ति को कमतर कर देना। नेशनल स्टैटिस्टिक्स ब्यूरो (एनबीसी) के हिसाब से शहरी बेरोजगारी मई महीने में 5.2 प्रतिशत पर रही। मतलब चीन के शहरों में हर 5वां शख्स बेरोजगार है। आशंका यह भी है कि आने वाले दिनों में चीन में बेरोजगारी और ज्यादा बढ़ सकती है। बढ़ती बेरोजगारी लोगों के खर्चे पर असर डाल रही है, जिसका सीधा असर अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है। उपभोक्ता मांग में कमी चीनी उद्योगपतियों को उत्पाद की संख्या बढ़ाने से रोक रही। 

बेकाबू होते हालातों में  चीन में जून माह में 20 फीसदी से ज्यादा बेरोजगारी दर रिकार्ड की गई। नेशनल स्टैटिस्टिक्स ब्यूरो (एनबीसी)के अनुसार जुलाई के महीने में 16 से 24 साल की उम्र के लोगों में बेरोजगारी दर 21.3 प्रतिशत थी। एनबीसी प्रवक्ता फू लिंगहुई के अनुसार जुलाई में यह आंकड़ा और बढ़ेगा जब 12 मिलियन छात्र-छात्राएं ग्रेजुएट होकर नौकरी की तलाश में निकलेगें। फरवरी माह में ही चीन के टॉप इकोनॉमिक एक्सपर्ट्स ने चीन पर आने वाले इस संकट की चेतावनी दे दी थी लेकिन अर्थव्यवस्था में कमजोरी का संकट झेल रही चीनी सरकार इस ओर से ऑखें मूंद बैठी रही।

रोजगार के लिए बाहरी देशों को पलायन कर रहे है युवा

महामारी प्रतिबंध समाप्त होने और सीमाओं के खुल जाने के बाद विदेश जाने वाले युवा चीनी लोगों की संख्या लगातार बढ़ रही। बैंकॉक में एक निजी भाषा संस्थान ड्यूक लैंग्वेज स्कूल के मालिक रॉयस हेंग ने कहा कि हर महीने लगभग 180 चीनी लोग वीजा जानकारी और पाठ्यक्रमों के बारे में पूछताछ कर रहे हैं। हालांकि इस पर कोई सटीक डेटा उपलब्ध नहीं  है, सिवाय लोकप्रिय चीनी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ज़ियाहोंगशू के, जिस पर सैकड़ों लोगों ने थाईलैंड में स्थानांतरित होने के अपने फैसले पर चर्चा की है। एक 22 वर्षीय स्नातक की पोस्ट के अनुसार, उसे कोई नौकरी नहीं मिली और वह हर समय घर पर रहता है। उसके माता-पिता काम पर न जाने के कारण उसे  नजरअंदाज कर रहे हैं... वह अपने भविष्य को लेकर बहुत चिंतित और भ्रमित रहता है। एक अन्य बेरोजगार स्नातक ने लिखा है कि मेरी माँ यह नहीं देख रही कि मैं कितना चिंतित हूं। हर दिन  वह कहती है कि मैं केवल एक ही चीज़ जानती है कि मुझे कैसे खाना चाहिए। मैं भविष्य के बारे में नहीं सोच रही हूं। मुझ पर अयोग्य होने का आरोप लगता है...लेकिन मैं अपना सर्वश्रेष्ठ प्रयास कर रही हूं। 

युवा किस उलझन में है इसके कुछ अन्य उदाहरण यहां एजेंसी एपी के हवाले से है तो कुछ एशिया निक्काई से- शंघाई के एक कॉस्मेटिक फर्म में अकाउंटेंट के रूप में काम करने वाली झांग चुआनन ने लॉकडाउन हटते ही अपनी नौकरी खो दी। नौकरी से निकाले जाने के बाद, उन्होंने एक ऑनलाइन थाई पाठ्यक्रम के लिए 1,400 डॉलर का भुगतान कर शिक्षा वीजा प्राप्त किया और चियांग माई के सुंदर उत्तरी थाई शहर में चली गई। झांग उन युवा चीनियों में से एक है जो तीन साल तक सख्त महामारी नीतियों के तहत देश में रहने के बाद देश की प्रतिस्पर्धी कार्य संस्कृति, पारिवारिक दबाव और सीमित अवसरों से बचने के लिए विदेश जाकर काम कर लेना बेहतर समझते है।  

बाली जाने से 38 वर्षीय लिआंग को अधिक स्वतंत्रता और मध्यमवर्गीय जीवन शैली मिली। उनका कहना है कि  समुद्र तट पर लैपटॉप पर काम और दुनिया भर के प्रवासियों के साथ विचार-मंथन करके बाली में जो मिला वह उन्हें चीन में नहीं मिल सकता था। उन्होंने खुद को पहले कभी इतना रचनात्मक नहीं पाया। 2021 में उद्योग पर सरकार की कार्रवाई के बाद एक निजी ट्यूशन कंपनी में 32 वर्षीय हुआंग वानक्सिओनग की नौकरी चली गई। उनका अगला काम राइड-हेलिंग व्यवसाय के लिए प्रतिदिन 16 घंटे से अधिक ड्राइविंग करना था। लेकिन मशीन की तरह लगातार काम करने से तंग आकर उन्होंने बोहोल द्वीप में एक गोताखोर प्रशिक्षक के रूप में योग्यता प्राप्त की, लेकिन अभी भी एक गोताखोर के रूप में आजीविका कमाने की उम्मीद पर समय काट रहे है। यांग यांग अब तक लगभग 100 बायोडाटा जमा कर चुके है लेकिन अभी तक उन्हें कहीं से कोई प्रस्ताव नहीं मिला है। हांगकांग के प्रतिष्ठित चीनी विश्वविद्यालय से स्नातक होने के बावजूद, वह इस साल नौकरी की तलाश की दौड़ में भाग लेने वाले लाखों छात्रों में से एक है। एक शीर्ष विश्वविद्यालय की डिग्री के साथ, मिया ली ने भी एक चीनी टेक कंपनी में अपनी इंटर्नशिप को स्थायी नौकरी में बदलने का सपना देखा था कि उनके एम्पालयर ने कर्मचारियों को नौकरी से निकालना शुरू नहीं किया। 

टेनसेंट और अलीबाबा जैसे अग्रणी तकनीकी समूह, जो कभी नौकरी के लिए बेताब स्नातकों के लिए प्रमुख पाइपलाइन में रहा करते थे, हजारों की संख्या में कर्मचारियों की कटौती कर रहे हैं। स्थिति की भयावहता इसी से समझ आ जाती है कि नौकरीपेशा लोग भी घबराहट से इधर-उधर नौकरी देख रहे हैं क्योंकि कंपनियां न जाने कब नई कटौती की घोषणा कर दे। ग्रेजुएट्स की बढती तादाद को देखकर चीनी एक्सपर्ट्स भी परेशान हो रहे है क्योंकि 10.76 मिलियन कॉलेज स्नातक, इस वे साल सबसे खराब नौकरी बाजारों में से एक में प्रवेश करने जा रहे है। उनके अनुसार अगर बेरोजगारी का चीन में ऐसा ही हाल रहा तो देश को गंभीर स्थितियों से गुजरना पड़ सकता है।

राज्य-स्वामित्व वाली नौकरी की बढ़ती मांग

चीनी ऑनलाइन प्लेसमेंट फर्म ज़िलियन के अनुसार, काम के लिए नौकरी चाहने वालों की सरकारी स्वामित्व वाली कंपनियों पर नज़र है। संभावनाओं की बढ़ती कमी ने लगभग 45 प्रतिशत युवा वर्तमान में राज्य के स्वामित्व वाली कंपनियों में काम के लिए आवेदन कर रहे है। अतीत में यह शायद ही कभी शीर्ष विकल्प रहा हो, लेकिन अब युवा अधिक स्थिर एम्पालयर के साथ जुड़ना पसंद कर बन रहे हैं। एक अध्ययन के अनुसार यह साल नौकरी चाहने वालों के बीच स्थिरता की प्राथमिकता को दर्शा रहा है। इसे राज्य के स्वामित्व वाले उद्यमों से भी जोड़ा जा सकता है जो महामारी के प्रभाव को कम करने के लिए अधिक रोजगार के अवसर प्रदान कर रहे हैं। झिंजियांग के सुदूर पश्चिमी क्षेत्र में जमीनी स्तर पर काम शुरू करने वाले स्नातकों को 7 जुलाई को लिखे एक पत्र में, शी ने कहा कि वह चाहते हैं कि डिग्री धारक, पार्टी (चीनी कम्युनिस्ट), मातृभूमि और लोगों के लिए और अधिक योगदान दें। सिस्टम में प्रतिष्ठित नौकरियां सुरक्षा, स्थिति प्रदान कर सकती हैं और अधिक वांछनीय हुकोउ प्राप्त करने में मदद कर सकती हैं, जो स्थानीय सार्वजनिक सेवाओं तक पहुंच से जुड़ा एक आवासीय परमिट है।

इधर चीन के कम विकसित क्षेत्रों में युवाओं को रोजगार उपलब्ध कराने के लिए सरकारी योजनाओं में भी भारी वृद्धि की जा रही है। एक शोध सलाहकार, ट्रिवियम चाइना के पार्टनर एंड्रयू पोल्क का कहना है कि राज्य के स्वामित्व वाले उद्यम (एसओई) को छोटी कंपनियों के लिए तुरंत भुगतान और लागत कम करके अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार में मदद करने के निर्देश दिए गये है। पोल्क कहते है कि महामारी के बीच चीन की आपूर्ति-आधारित आर्थिक सुधार को आगे बढ़ाने में एसओई महत्वपूर्ण रही है, हालांकि मांग अब उतनी बरकरार नहीं रही है।

शेडोंग प्रांत में सिविल सेवा परीक्षा के लिए एक आवेदक जोआना यू ने कहा, स्थिरता से ज्यादा महत्वपूर्ण कुछ भी नहीं है। जियांग जेनक्सिन,  जिन्होंने इस साल स्नातक किया है, इस बात से खुश है कि वे दक्षिणी गुआंग्डोंग प्रांत में काउंटी स्तर की सरकार में काम करते हुए दो साल बिताएंगे। जियांग ने कहा, पार्टी सदस्य के रूप में, नगरपालिका समिति में काम करना लोगों की सेवा करने का एक तरीका है। लेकिन नौकरशाही जीवन उतना आरामदायक नहीं है जितना पहले हुआ करता था। वर्षों से चले आ रहे भ्रष्टाचार विरोधी अभियान के बीच स्थानीय व्यवसायों से उपहार जैसे पिछले लाभों पर रोक लगा दी गई है।

बेरोजगारी से प्रभावित होती जीवन प्रक्रिया

देखा जाये तो अर्थव्यवस्था, बेरोजगारी के साथ-साथ चीनी सरकार को आने वाले समय में जिस एक और संकट से कड़ा मुकाबला करने के लिए तैयार रहना होगा वह है युवा श्रमशक्ति की कमी का। चीन में उम्रदराज लोगों की संख्या युवाओं पर भारी पड़ रही है। तरह-तरह के प्रलोभन के बावजूद वहां शादी को लेकर नीरसता देखने को मिल रही है। गिरती जन्म दर चीन को बुजुर्गों का देश बना रही। डूबते कारोबार, जाती नौकरियों और आर्थिक मंदी के बादलों के बीच विवाह जैसी जिम्मदारी भरे बंधन में बंधने से लोग कतरा रहे। विवाह करने और कम से कम 2 बच्चे पैदा करने पर दिये जाने वाले सरकार के आकर्षक ऑफर के बावजूद चीनी नागरिक नौकरी खोने की आषंका से ग्रसित है। चीन के नागरिक मामलों के मंत्रालय की ओर से जारी आंकड़ों के मुताबिक, देश में पिछले साल सबसे कम शादियां हुईं और ये आंकड़ा 4 दशक में सबसे कम है। ’व्हार्टन’ के डीन जेफ्री मानते है कि आने वाले समय में चीन इतिहास का पहला ऐसा देश बनने जा रहा है, जो अमीर होने से पहले बूढ़ा होगा। अगले दशक में इसकी आबादी 1.5 बिलियन से कम होगी और फिर धीरे-धीरे मध्य शताब्दी तक लगभग 1.3 बिलियन लोगों तक सीमित हो जाएगी। 2050 तक चीन में ऐसे लोगों की आबादी 70 फ़ीसदी हो जाएगी, जो कामकाजी लोगों पर निर्भर रहेंगे, जो 35 फ़ीसदी है। उनका इशारा स्वास्थ्य व्यवस्था पर भी है जिस पर आने वाले समय में दबाव बढ़ेगा।

आने वाले दिनों की आहट को चीन की सरकार महसूस कर रही है। संभवतः इसीलिए चीन की कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीसी) धीरे-धीरे बाजारों को संसाधन आवंटन में निर्णायक भूमिका निभाने की अनुमति देने का प्रयास कर रही है। हालाँकि, चीन के राज्य के स्वामित्व वाले उद्यमों (एसओई) की स्थिति सामान्य आर्थिक तस्वीर की तुलना में अधिक जटिल है। चीन फॉर्च्यून ग्लोबल 500 में सूचीबद्ध 109 निगमों का घर है - लेकिन उनमें से केवल 15ः निजी स्वामित्व में हैं। चीन के एसओई अत्यधिक भारी हैं और इसलिए बाजार की मांगों का जवाब देते समय लचीलेपन की कमी है। बेरोजगारी की समस्या से निपटते हुए सरकार को इस ओर भी ध्यान देना होगा।

courtesy:

https://orcasia.org/article/391/bta-brajagara-eka-b-samasaya-bna-raha-cana-ka-le








Saturday, August 5, 2023

भारत-चीन व्यापारिक दृष्टिकोण से एक दूसरे के पूरक या प्रतिस्स्पर्धी


पिछले कुछ महीनों से चीन की अर्थव्यवस्था में कमजोरी के संकेत लगातार बढ़ते नजर आ रहे है। आंकड़ें बता रहे है कि चीन में इस समय जीडीपी ग्रोथ की गति उम्मीदों से कमतर नजर आ रही है। चीनी समाचार एजेंसी शिन्हुआ से जारी समाचार पर गौर करे तो सत्तारूढ़ कम्युनिस्ट पार्टी की शीर्ष निर्णय लेने वाली संस्था पोलित ब्यूरो भी मानती है कि वर्तमान में चीन की अर्थव्यवस्था नई कठिनाइयों और चुनौतियों का सामना कर रही है, जो मुख्य रूप से अपर्याप्त घरेलू मांग के साथ-साथ गंभीर और जटिल बाहरी समस्याओं से उत्पन्न हो रही हैं। एएफपी सर्वेक्षण में भी अनुमानित 7.1 प्रतिशत की तुलना में चीन इस समय बहुत कमजोर स्थिति में है। जबकि राष्टीय सांख्यिकी ब्यूरो का मानना है कि दुनिया की नंबर दो अर्थव्यवस्था में गिने जाने वाले चीन ने अप्रैल-जून में 6.3 प्रतिशत की दर से बढोत्तरी की है, जो पिछले तीन महीनों की तुलना में तेज है। जहां तक भारत का सवाल है आकंडे-विश्लेषणों के नजरिए से देखा जाए तो कोविड के बाद के सालों में भारत की स्थिति फिर चीन से बेहतर लगती है।  

रिकवरी को बेताब चीनी अर्थव्यवस्था

कोविड-19  के बाद के सालों में धीमी, लेकिन मजबूत व्यापारिक शुरुआत के बावजूद, देश ही नहीं विदेशों में भी कमजोर मांग के चलते चीन की अर्थव्यवस्था कमजोर हो रही है। घरेलू संपत्ति बाजार में लंबी मंदी , फिर शंघाई में दो महीने के लॉकडाउन ने मध्य चीन के बड़े क्षेत्रों में आर्थिक गतिविधियों को और भी बुरी तरह बाधित कर दिया था। महामारी की आपदा से जूझ रहे चीनी नागरिक सतर्क हो गये है। वे खर्च से ज्यादा बजत की की ओर अधिक घ्यान दे रहे । घटती जनसंख्या और उत्पादकता में धीमी चाल ने चीन को संकट में डाल दिया। सिंघुआ विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र के प्रोफेसर सून लिपिंग  के अनुसार लोग पैसे बचा रहे हैं और खर्च में कटौती कर रहे हैं, महत्वाकांक्षी उद्यमी दीर्घकालिक योजना में निवेश करने में अनिच्छुक हैं, क्योंकि वे असहज महसूस कर रहे हैं। उनका सुझााव है कि सरकार को एक ऐसा कारोबारी माहौल बनाने की जरूरत है जो लोगों को भरोसा दे सकें। हालांकि चीनी सरकार उत्पाद और उपभोक्ता को रिझाने के लिए नई-नई योजनाओं देकर उन्हे आकर्षित करने का भरसक प्रयास कर रहे है। किंतु स्थिति में फिलहाल कोई बदलाव नजर आता दिख नहीं रहा। आईएमएफ के एशिया और प्रशांत विभाग में एक वरिष्ठ अर्थशास्त्री डिएगो ए. सेर्डेइरो एवं आईएमएफ (चीन ) मिशन प्रमुख सोनाली जैन-चंद्रा चीन के लिए जारी अपनी वार्षिक रिपोर्ट में कहते है कि चीन को अर्थव्यवस्था में सुधार सुनिश्चित करने और संतुलित, हरित और समावेशी विकास को बढ़ावा देने के लिए व्यापक व्यापक आर्थिक नीतियों और संरचनात्मक सुधारों की आवश्यकता है। 

इधर पेकिंग विश्वविद्यालय के वित्त प्रोफेसर माइकल पेटिस चीन को लेकर निराशावादी विचार रखते है। उनका मानना है कि अंतरराष्ट्रीय निवेशकों को चीन को पहले की तुलना में अलग ढंग से देखने की जरूरत है। जब चीन दो अंकों की दर से बढ़ रहा था, तब अर्थव्यवस्था के गरीब हिस्से भी बढ़ रहे थे। लेकिन अब, चीन की कहानी खत्म हो गई है और यह एक सामान्य अर्थव्यवस्था से अधिक कुछ नहीं। आने वाले वक्त में इसके कुछ क्षेत्र अच्छा प्रदर्शन करेंगे, तो कुछ बहुत खराब प्रदर्शन करेंगे। 2015 में बीजिंग की ‘मेड इन चाइना 2025‘ योजना की घोषणा के बाद राष्ट्रीय औद्योगिक नीतियां तेजी से एक प्रमुख नीति और राजनीतिक मुद्दा बन गई हैं,  जबकि चीन के आर्थिक विकास मॉडल के दीर्घकालिक प्रदर्शन और स्थिरता का सटीक आकलन करने के लिए औद्योगिक नीति के प्रभाव का आकलन करना अब जरूरी हो गया है। कुछ विशेषज्ञों की राय में चीन की औद्योगिक नीति की वास्तविकता का आज तक गंभीरता से अध्ययन नहीं किया गया है। इससे इतर, आईएमएफ के हालिया विश्लेषण के अनुसार, जब चीन की विकास दर 1 प्रतिशत अंक बढ़ती है, तो अन्य देशों की वृद्धि लगभग 0.3 प्रतिशत अंक बढ़ जाती है। यह रेखांकित करता है कि कैसे घरेलू सुधार चीन की अर्थव्यवस्था को बढ़ावा दे सकते हैं और दूसरों की भी। 

अर्थव्यवस्था की दौड़ में भारत की स्थिति बेहतर

चीन की धीमी पड़ती विकास दर के बीच, भारत की ओर देखें तो वह उतना परेशान नहीं है जितना कि चीन। पश्चिम में कई आशावादी यह दावा करते नजर आते है कि भारत अगर सही तरीके से अपने क़दम उठाता रहा तो अगले कुछ सालों में वह चीन की जगह ले सकता है।  फोकस इकनामिक्स के हालिया ताजा अपडेट पर गौर करें तो भारत 2026 तक ब्रिटेन को पछाड़कर 5.0 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर की नाममात्र जीडीपी के साथ दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने के लिए तैयार है। वह यह भी दावा करता है कि 2026 तक सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि औसतन 6रू  प्रति वर्ष से अधिक रहेगी।  बीबीसी के एक आलेख में ’व्हार्टन’ स्कूल (पेंसिलवेनिया युनीवर्सिटी) के पूर्व डीन जेफ्री भारत और चीन की आर्थिक प्रतिस्पर्धा को लेकर अलग ही तर्क देते है। वे मानते है कि आने वाले सालों में भारत की स्थिति चीन के मुकाबले काफी बेहतर स्थिति में होगी। उनके इस अनुमान के पीछे के कारणों को देखें तो अधिक अनुकूल जनसांख्यिकी इसका एक महत्वपूर्ण वजह बनेगी। 2050 तक चीन में ऐसे लोगों की आबादी 70 फ़ीसदी हो जाएगी, जो कामकाजी लोगों पर निर्भर रहेंगे। जबकि 2050 तक 1.7 बिलियन लोगों की आबादी के साथ भारत जनसंख्या के मामले में दुनिया का सबसे बड़ा देश होगा. लेकिन निर्भरता के मामले में वह चीन से बहुत बेहतर स्थिति में होगा।

इसमें कोई संदेह नहीं कि भारत की अर्थव्यवस्था दुनिया की सभी बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में तेज़ी से आगे बढ़ती नजर आ रही है।  हाल ही  में प्रधानमत्री नरेंद्र मोदी ने भी अगले कुछ सालों में इसे नंबर 3 में पहुंचा देने की बात कही है। लेकिन इसके लिए आवश्यक है कि भारत अपनी बेसिक से लेकर माध्यमिक-उच्चतर तक की शिक्षा का माध्यम भारतीय भाषाओं में करें। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्द्धा के लिए एक अतिरिक्त भाषाई ज्ञान के तौर पर अंग्रेजी एक लेशन भर रहे। उसके बाद की विशिष्ट डिग्री हेतु ली जा रही उच्च शिक्षा का माध्यम भले ही अंग्रेजी हो । साथ ही देशीय उत्पादों को बढ़ावा देने हेतु बैंक ऋृण के तौर तरीकें, जो कि अभी भी बेहद जटिल है, को सुविधाजनक बनानो की जरूरत है। जिस दिन भारत ने सकल घरेलू उत्पाद के निर्माण  पर अपनी पैठ बना ली उस दिन उक्त दावे को साकार करने से उसे कोई रोक नहीं सकता।

आर्थिक दौड़ में एक दूसरे के पूरक भारत-चीन 

इसी संदर्भ में बीएफए (बोआओ फोरम फॉर एशिया) की ’एशियाई आर्थिक परिदृश्य और एकीकरण प्रगति’ शीर्षक वाली एक अध्ययन रिपोर्ट के अनुसार, कोई संदेह नहीं है कि चीन और भारत का व्यापार प्रदर्शन विकसित देशों के मानकों से प्रभावशाली रहा है। अपेक्षाकृत कम समय में, दोनों देश विश्व व्यापार में प्रमुख खिलाड़ियों के साथ-साथ उल्लेखनीय बाहरी निवेशकों के रूप में उभरे हैं। आरंभ में निम्न-प्रौद्योगिकी उत्पाद के बाद, दिग्गजों ने लगातार मध्यम और उच्च-प्रौद्योगिकी उत्पादों के साथ-साथ स्किल बेस्ड सेवाओं में तरक्की की है। दोनों की तुलना अक्सर की जाती रही है। चीन निर्माताओं के विश्व व्यापार में आगे बढ़ गया है और दुनिया के सबसे बड़े निर्यातक के रूप में अमेरिका को चुनौती देने की कगार पर है। भारत का निर्यात विस्तार मुख्य रूप से सेवाओं द्वारा संचालित किया जाता है, और यह विनिर्मित निर्यात की एक श्रृंखला में पकड़ बनाने का भरपूर प्रयास कर रहा है। वैश्विक आर्थिक मंदी की आशंका के बावजूद इनका प्रदर्शन काबिले तारीफ हैं। वाशिंगटन स्थित अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) के आंकड़ों का हवाला देते हुए रिपोर्ट यह भी कहती है कि चीन और भारत इस साल दुनिया की आधी वृद्धि में योगदान देंगे। 

इस संभावना से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि अगर दोनों अर्थव्यवस्थाएं प्रतिस्पर्धी तौर खड़ी होने के बजाय व्यापारिक साझेदारी और कूटनीतिक समझदारी के साथ काम करे तो यह एशियाई अर्थव्यवस्था को मजबूत कंधे देकर विश्व पटल पर अनूठी छाप छोड़ेगा। अगर आप ऐतिहासिक तौर पर गौर करेगे तो चीन और भारत में कई समानताएं नजर आती है। पुरातन संस्कृति-सभ्यता की धरोहरों से समृद्ध दोनों देश घनी आबादी वाले देश होने के बावजूद दो बड़ी समानांतर उन्नतिशील एशियाई अर्थव्यवस्थाओं के रूप में उभरे है। युद्ध और ग़ुलामी से आज़ाद होने के बाद लगभग शून्य से अपनी अर्थव्यवस्था से शुरुआत करने वाले ये दोनों देश आज पश्चिम के लिए चुनौती है। ये भी सत्य है कि 1990 तक दोनों देशों की अर्थव्यवस्थाएँ लगभग समान ही थीं। फिर अब ऐसा क्यो नहीं हो सकता?

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https://orcasia.org/article/371/bharata-cana-vayaparaka-thashhatakanae-sa-eka-thasara-ka-paraka-ya-paratasasaparathha