ज़माना सख़्त कम-आज़ार है बजाने-’असद’
वगर्ना हम तो तवक़्क़ो ज़ियादा रखते है
दायम पड़ा हुआ तेरे दर पर नहीं हूॅं मैं
ख़ाक ऐसी ज़िन्दगी पे कि पत्थर नहीं हूॅं मैं
क्यों गर्दिशे-मुदाम से घबरा न जाए दिल
इन्सान हॅूं, पियाला-ओ-साग़र नहीं हूॅं मैं
यारब! ज़माना मुझको मिटाता है किसलिए
लोहे-जहां पे हर्फे़-मुकर्रर नहीं हूॅं मैं
बिला शक.....ये कहना अतिश्योक्ति न होगी कि उर्दू अदब मिर्जा ’ग़ालिब’ यानी मिर्जा असदुल्लाह खॉं ’ग़ालिब’ की शायरी के बगैर अधूरा है। हालांकि ’ग़ालिब’ के बारे में अक्सर कहा जाता है कि उनके यहां स्पष्ट दर्शन नहीं मिलता तो कुछ ये भी फरमाते है कि गालिब एक दार्शनिक कवि थे। उनके विरोधियों का कहना है कि गालिब के यहां कोई व्यवस्थित चिन्तन नहीं मिलता। हां, व्यवस्थित चिंतन के प्रति विद्रोह जरूर मिलता है जबकि उनके चाहने वालों का मानना है कि ’ग़ालिब’ की चेतना इतनी विस्तृत थी कि उसने प्रत्येक व्यवस्था के बंधन को तोड़ दिया। दरअसल ’ग़ालिब’ किसी भी प्रकार की व्यवस्था के खिलाफ थे। उनका व्यक्तिवाद सबसे बढ़-चढ़ के था। उनकी चेतना इतनी प्रखर थी कि उनके इस तोड़-फोड़ में भी निर्माण की झलक मिलती है। उनका हर बात पर नई बात पैदा कर देना, हर बात को एक नई तर्ज पर कह देना यहां तक कि नियमों की उपेक्षा कर देना उनकी रचनात्मकता को खुला आकाश देता है। उनका आजाद रौ मतलब स्वाधीन प्रकृति का हाल ये था कि धार्मिक कर्मकांड को तिलांजलि दे रखी थी। रोजा, नमाज आदि से कोई सरोकार न था। उनके हृदय में शिया-सुन्नी, हिन्दू-मुसलमान किसी भी प्रकार का भेदभाव नहीं था। राजनीति में उन्हें किसी से विरोध न था। वे बहादुरशाह जफर और वाजिद अली शाह के साथ ही अंग्रेज हाकिमों की प्रशंसा में कसीदे करते थे। कहने वाले ये भी कहते है कि उनके इस मिजाज़ को अवसरवादिता का नाम देना गलत होगा। दरअसल उनका मानसिक संसार सबसे अलहदा था, जहां किसी प्रकार के सामाजिक सिद्धांत लागू नहीं होते। वे न किसी के साथ थे, न किसी के विरूद्ध। अपनी इस मंनोरंजक स्थिति को उन्होंने इस शेर के जरिए बयां कर दिया-
बाजीचए अत्फ़ाल है दुनियां मेरे आगे
होता है शबो-रोज तमाशा मेरे आगे
ईमां मुझो रोके है तो खैंचे है मुझो क्रुफ
काबा मेरे पीछे है कलीसा मेरे आगे
उनके इसी अन्तर्द्वन्द्व के चलते उनके आलोचकों को ’ग़ालिब’ से शिकायत रहती थी जो मानवीय जीवन और अनुभव को स्याह-सफेद में बांटकर देखने के आदी रहे। ईमान और कुफ्र, शिकस्त और हसरते-तामीर के इसी अन्तर्द्वन्द्व के चलते ’ग़ालिब’ में गहरी वेदना देखने को मिलती है, वहीं ऐसी विनोदप्रियता भी नजर आती है, जो वेदना में घुलकर आत्म-व्यंग्य में परिवर्तित हो जाती है। यही आत्म-व्यंग्य ग़ालिब की ख़ुसूसियत है जो उन्हें औरों से अलग करता है। गहरी पीड़ा को भी हंसकर टाल जाना, ये तो ग़ालिब का ही व्यक्गित हुनर हो सकता है-
गा़लिब वज़ीफ़ाख़्वार हो दो शाह को दुआ
वो दिन गये कि कहते थे नौकर नहीं हूॅ मैं
यही मिर्जा नालिश ठोके जाने पर अदालत में बड़े मुत्तमईन होकर फरमाते है-
कर्ज़ की पीते थे मै लेकिन समझते थे कि हॉं
रंग लायेगी हमारी फ़ाक़ामस्ती एक दिन
’ग़ालिब’ की शायरी की सबसे खूबसूरत बात जो मुझे नजर आई वह ये कि उनकी शायरी किसी एक रंग या किसी एक एहसास से बंधी नहीं, हर मौजू पर उनका शेर मौजूद है। बात हुस्नों ईश्क की हो, या बेवफाई की, या फिर दुनियावी मुश्किलात की...उनका कोई न कोई शेर जिंदगी के किसी भी मौके पर नज़र किया जा सकता है। वे अकेले शायर है जो आम से आम आदमी की जबान पर आज भी पूरे तसव्वुर के साथ ज़िंदा है। जैसे-
वो आयें घर में हमारे, खुदा की कुदरत है
कभी हम उनको, कभी अपने घर को देखते हैं
हरेक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है
तुम्हीं कहो कि ये अन्दाज़े-गुफ़्तगू क्या है
इश्क़ पर जोर नहीं, है ये वो आतश ’ग़ालिब’
कि लगाये न लगे और बुझाये न बने
तुम जानो तुमको ग़ैर से जो रस्मो-राह हो
मुझको भे पूछते रहो तो क्या गुनाह है
’ग़ालिब’ की यही बात निराली है कि उनके द्वारा लिखे गये शेर तब भी वास्तविकता लिये हुए थे तो आज की परिस्थितियों में भी उनकी हकीकत आइने के माफ़िक साफ है। मीर तक़ी ’मीर’ ने जब पहली बार ग़ालिब को सुना तो उन्होंने कहा कि अगर इस लड़के को कोई काबिल उस्ताद मिल गया और उसने इसे सीधे रास्ते पर डाल दिया, तो लाजवाब शायर बनेगा, वरना मोहमल (अर्थहीन) बकने लगेगा। मीर का कहना सौ फीसद सही निकला। ग़ालिब लाजबाव निकले। अचरज की बात है कि 180000 से ज्यादा ग़ज़ल लिख चुके मीर केवल 1500 शेरों के मालिक ’गालिब’ की तुलना में कम जाने जाते हैं। बकौल शीन काफ़ निज़ाम-ग़ालिब अहसास को इस्तेआरा (रूपक) और ख़ुदकलामी (आत्मसंवाद) को मुकालमा (वार्तालाप) बना देते है। वो मौजमद से ज्यादा इम्कानी (संभावित) मानी के शाइर हैं। रिवाइत (परंपरा) में जिद्दत (नवीनता) और जिद्दत में रिवायत देखने वाली नज़र के सबब मिर्जा ग़ालिब हमाअस्र (सर्वकालीन) शाइर हैं। डा0 अब्दुर्रहमान बिजर्नरी ने तो दीवाने-ग़ालिब को मुक़द्दस वेद के बराबर ही रख दिया।
ग़ालिब की शायरी का एक बड़ा हिस्सा फ़ारसी में है। वंश परपरा के नजरिए से ईरानी गालिब ने, अब्दुस्समद नामक व्यक्ति से फ़ारसी भाषा और उनके मुहावरों आदि की शिक्षा प्राप्त की थी। छोटी सी उम्र से कविता लिखने के शौक़ीन मिर्जा पहले फ़ारसी में ही लिखा करते थे। हिन्दुस्तान से फारसी की विदाई ने उन्हें उर्दू में लिखने को मजबूर कर दिया और जल्द ही फ़ारसी के तख़ल्लुस ’असद’ से वे ’गालिब’ हो गये। उर्दू में उन्होंने बहुत कम लिखा है, लेकिन जितना लिखा है वह ही आने वाले कई जमानों तक लोगों को सोचने पर मजबूर करने के लिए काफी है। मिर्जा गालिब के फ़ारसी के 6600 शेर और उर्दू के 1100 शेर वाला संग्रह ’दीवान’ कहलाता है। दीवान का सीधा सा अर्थ है शेरों का संग्रह-
’ग़ालिब’ के इसी दीवान से कुछ बानग़ी पेश है-
हम को मालूम है जन्नत की हकीकत लेकिन
दिल के खुश रखने को ’गालिब’ ये खयाल अच्छा है
न था कुछ तो खुदा था कुछ न होता तो खुदा होता
डुबोया मुझ को होने ने न होता मैं तो क्या होता
रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं काइल
जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है
बे-वजह नहीं रोता इश्क में कोई गालिब
जिसे खुद से बढ़ कर चाहो वो रूलाता जरूर है
कासिद के आते-आते खत एक और लिख रखूँ
मैं जानता हूँ जो वो लिखेंगे जवाब में
गम-ए-हस्ती का असद किस से हो जूझ मर्ज इलाज
शमा हर रंग मैं जलती है सहर होने तक
इश्क की इंतहा देखिये
फिर उसी बेवफा पे मरते हैं
फिर वही जिन्दगी हमारी है
बेखुदी बेसबब नहीं ‘गालिब’
कुछ तो है जिस की पर्दादारी है
इश्क ने “गालिब” निकम्मा कर दिया
वरना हम भी आदमी थे काम के
उन के देखे से जो आ जाती है मुँह पर रौनक
वो समझते हैं कि बीमार का हाल अच्छा है
मोहब्बत में नहीं है फर्क जीने और मरने का
उसी को देख कर जीते हैं जिस क़ाफिर पे दम निकले
और मायूसी का आलम ये कि-
ये न थी हमारी किस्मत कि विसाल-ए-यार होता
अगर और जीते रहते यही इंतिज़ार होता
मैं नादान था जो वफा को तलाश करता रहा गालिब
यह न सोचा के एक दिन अपनी साँस भी बेवफा हो जाएगी
हमने माना के तग़ाफुल न करोगे लेकिन,
ख़ाक हो जायेंगे हम तुमको ख़बर होने तक
और पता बताने का निराला अंदाज़
बल्ली मारां की वो पेचीदा दलीलों की-सी गलियाँ
एक कुरआने सुख़न का सफ्हा खुलता है
असद उल्लाह खाँ ग़ालिब का पता मिलता है
’ग़ालिब’ जीवन के हर रंग, हर जगह मौजूद है। उनके शेरों को समझने-जानने से पहले उनके व्यक्तित्व को समझना जरूरी है। ग़ालिब को अपने उच्च वंशीय होने पर गर्व था। आत्मसम्मान उन्हें बहुत प्यारा था। इस संबंध में फिराक़ गोरखपुरी लिखित ’उर्दू भाषा और साहित्य’ में से एक किस्सा बताना चाहूंगी। 1852 ई में जब उन्हें टामसन साहब ने दिल्ली कालेज में फ़ारसी के अघ्यापन के लिए सौ रूपया महीना पर ’ग़ालिब’ को बुलाया, तो वह गये। लेकिन इस प्रतीक्षा में पालकी में ही बैठे रहे कि साहब स्वागत के लिये आयें तो जाऊं। साहब को पता लगा तो उन्होंने आकर उनसे कहा कि आप गर्वनर के दरबार में रईस की तरह आते तो हम स्वागत करते। इस समय आप नौकरी के लिए आये है, नियमानुसार हम आपका वैसा स्वागत नहीं कर सकते। तब मिर्जा ने कहा कि मैंने सरकारी नौकरी को यह समझा था कि इससे मेरा सम्मान बढे़गा लेकिन अगर पूर्व-पुरूषों का अर्जित सम्मान भी चला जाये तो नौकरी से क्या फायदा? यह कहकर वे चले आये। यह संभव है कि आज की मानसिक स्थिति में मिर्जा का यह व्यवहार विचित्र मालूम हो, किंतु इससे यह तो मालूम ही होता है कि मिर्जा अपने सम्मान के मानदंडों पर पूरे उतरते थे। उनके स्वभाव को उनके ही एक शेर से आप बेहतर समझा लेगें-
आजाद रौ हॅूं और मेरा मसलक है सुलहे-कुल
हरगिज कभी किसी से अदावत नहीं मुझे
मिर्जा मन से तो धनी थे ही उनका बाहरी व्यक्तित्व भी कम आकर्षक नहीं था। ईरानी चेहरा, गोरा-लम्बा कद, सुडौल एकहरा बदन, ऊँची नाक, कपोल की हड्डी उभरी हुई, चौड़ा माथा, घनी उठी पलकों के बीच झाँकते दीर्घ नयन, संसार की कहानी सुनने को उत्सुक लम्बे कान, अपनी सुनाने को उत्सुक, मानों बोल ही पडेंगे। सुन्दर गौर वर्ण, समस्त जिन्दादिली के साथ जीवित, इसी दुनिया के आदमी, इंसान और इंसान के गुण-दोषों से लगाये-यह थे ’मिर्जा’ व ’मीरजा ग़ालिब’। रईसजादे थे और जन्म भर अपने को वैसा ही समझते रहे। वस्त्र-विन्यास का खासा ध्यान रखते थे। जब घर पर होते, प्रायः पाजामा और अंगरखा पहिनते थे। सिर पर कामदानी की हुई मलमल की गोल टोपी लगाते थे। जाड़ों में गर्म कपड़े का कलीदार पाजामा और मिर्जई। बाहर जाते तो अक्सर चूड़ीदार या तंग मोहरी का पाजामा, कुर्ता, सदरी या चपकन और ऊपर क़ीमती लबादा होता था। आर्थिक परेशानी के दौर में भी उन्होंने अपना रईसी अंदाज न छोड़ा। जौक़ के बाद ग़ालिब ही थे जिन्हें बहादुरशाह ’जफर’ के दरबारी होने के कारण अंग्रेज हुकूमत से पेंशन मिला करती थी।
उर्दू गद्य-लेखन की नींव रखने के कारण उन्हें वर्तमान उर्दू गद्य का जन्मदाता भी कहा जाता है। इनकी रचनाओं में देश की तत्कालीन सामाजिक, राजनीतिक तथा आर्थिक स्थिति का वर्णन हुआ है। ग़ालिब अपनी फ़ारसी में लिखी रचनाओं को अधिक बेहतर मानते थे। एक फारसी शेर में वे कहते है कि मेरी उर्दू रचनाएं बेकार है, देखना है तो फ़ारसी देखो। लेकिन सच तो ये है कि गद्य हो या पद्य, उनकी ख्याति उर्दू में लिखी रचनाओं के कारण ही हुई। ग़ालिब उन बिरले कवियों में रहे जिनके आलोचको की भरमार थी, फिर भी उनकी योग्यता और विद्वत्ता की धाक के आगे बड़े-बड़े नतमस्तक थे। उनके शिष्यों में उस समय के नवाब, सामंत, सरकारी पदाधिकारी सभी शामिल थे। कुछ दिनों के लिए वे बहादुरशाह ’जफर’ के भी वे उस्ताद भी रहे। उनके अतिरिक्त बंगाल में मैसूर के राजवंश के सदस्य राजकुमार बशीरउद्दीन और खान बहादुर अब्दुल गफूर ’नस्साख’, सूरत में मीर गुलाम बाबा खाँ, लोहारू के सुपुत्र मिर्जा अलाउद्दीन और उनके भाई नवाब जियाउद्दीन मिर्जा के शिष्य थे। बड़ौदा-नरेश नवाब इब्राहीम अली खाँ अपनी गजलें संशोधन के लिए उनके पास भेजते थे। अलवर के महाराजा मिर्जा के बड़े प्रशंसकों में से एक थे। उर्दू भाषा और साहित्य के संदर्भ से ज्ञात होता है कि मिर्जा के शिष्यों में सबसे पहले ख्वाजा अलताफ़ हुसैन ’हाली’ का नाम आता है, जिन्होंने ग़ालिब की सहमति से ही उनसे अलग रास्ता अख्तियार किया और उर्दू काव्य में अमर हो गये।
ग़ालिब के निधन के पश्चात ग़ालिब के दो समकालीनों ने उनकी जीवनियाँ लिखी। मोहम्मद अल्ताफ हुसैन ’हाली’ ने ’यादगारे-ए-ग़ालिब’ (1897) और मिर्जा मोज ’हयात-ए-गालिब’ (1899)। ये जीवनियाँ हमें उनके जीवन और समय को समझने की अंतदृष्टि प्रदान करती है। ग़ालिब के उर्दू दीवान का पहला संस्करण 1841 में प्रकाशित हुआ। ’मयखाना-ए-आरजू’ शीर्षक के अंतर्गत फ़ारसी लेखन का संग्रह 1895 में प्रकाशित हुआ। उनकी फ़ारसी डायरी ’दस्तम्बू’ (1858) सिपाही विद्रोह और दिल्ली पर इसके प्रभाव का प्रामाणिक दस्तावेज है। 1868 में ’कुल्लियत-ए-नत्र-ए-फ़ारसी-ए ग़ालिब’ नाम से उनका फ़ारसी लेखन का एक और संग्रह प्रकाशित हुआ जिसमें पत्र, प्राक्कथन, टिप्पणियाँ आदि थे। एक गद्य लेखक के रूप में उनकी ख़्याति उनके पत्रों के कारण अधिक है, जो ’उद्-ए-हिंदी’ (1868) और ’उर्दू-ए-मुअल्ला’ (1869) नाम के दो संकलनों में प्रकाशित है। ग़ालिब से पहले उर्दू शायरी गुल-बुलबुल और हुस्न-औ-इश्क की चिकनी-चुपड़ी बातें हुआ करती थी। उन्हें वे ’गजल की तंग गली’ कहा करते थे। ग़ालिब के पुख्ता शेर उस गली से नहीं निकल सकते थे। यह एक कम जानी बात है कि गालिब का बस एक ही ’ब्लैक एंड व्हाइट’ फोटो है, जिसके आधार पर अनेक कलाकारों ने उनके चित्र बनाए हैं। गालिब के दौर में ’पिन-होल’ कैमरा नया-नया आया था और उस समय इस कैमरे से अवध के नवाब ’वाजिद अली शाह’ और ’ग़ालिब’ के दोस्त ’बहादुर शाह जफर’ के फोटो भी लिए गए थे। ग़ालिब का पहला और एक तरह से अंतिम फोटो दिल्ली के फोटोग्राफर रहमत अली ने उतारा था।
ग़ालिब अपनी उर्दू और फ़ारसी शायरी के लिए तो विख्यात हैं ही, साथ ही अपने मित्रों तथा आत्मीयों को लिखे अपने सैकड़ों पत्रों के लिए भी जाने जाते हैं जो अनौपचारिकता और फक्कड़पन की एक अलग ही दुनिया की रचना करते हैं। ग़ालिब ने अपने पत्रों में उस समय प्रचलित सामंतवादी युग की दिखावटी विनम्रता का त्याग करते हुए एक ऐसी सरल, दोस्ताना और संवाद की सुखद अनुभूति जगाने वाली शैली को अपनाया जो उर्दू गद्य में अब तक उपलब्ध नहीं। बाद के साहित्यकारों को गालिब की इस नयी शैली ने बहुत प्रभावित किया। ग़ालिब के पत्र भी उनकी शायरी की ही भांति खूबसूरत और लोकप्रिय थे और वे किसी ख़जाने की भांति साहित्य की दुनिया में आज भी बहुमूल्य माने जाते हैं। कुछेक पत्र देखें-
यूसुफ़ मिर्ज़ा को उनके पिता के इंतकाल पर लिखा गया पत्र
“यूसुफ़ मिर्ज़ा! त्ुझको क्योंकर लिखूं कि तेरा बाप मर गया और अगर लिखॅू तो फिर आगे क्या लिखूॅं कि अब क्या करो मगर सब्र। यह एक शेवए फ़रसूदा अब्नाए-रोजगार का है। ताज़ियत यॅूं ही किया करते है और यही कहा करते है कि सब्र किया करो। भला एक का कलेजा कट गया और लोग उसे कहते है कि तू न तड़प। भला क्यों न तड़पेगा? सलाह इसमें नहीं बतायी जाती, दुआ को दख़्ल नहीं, दवा का लगाव नहीं। पहले बेटा मरा फिर बाप। मुझसे कोई पूछे कि बे-सरो-पा किसे कहते है तो मैं कहूंगा यूसुफ़ मिर्ज़ा को। तुमहारी दादी लिखती है कि रिहाई का हुक्म हो चुका था। यह बात है तो जवां मर्द एक बार दोनों क़ैदों से छूट गया, न कै़दे-हयात रही न कै़दे-फ़िरंग।“
नवाब अलाउद्दीन खॉं के नाम लिखा पत्र
“ मियॉं ! बड़ी मुसीबत में हूं। महलसरा की दीवारें गिर गयीं, पाखना ढह गया, छतें टपक रही हैं। तुम्हारी फूफी कहती है हाय! दबी, हाय! मरी। दीवान-खाने का हाल महलसरा से बदतर है। मैं मरने से नहीं डरता, लेकिन फु़कदाने-राहत से घबरा गया हूॅं। अब्र दो घेटे बरसे तो छत आठ घंटे बरसती है। अगर कोई चाहे कि मरम्मत करे तो क्यों कर करे। मेंह खुले हो तो सब कुछ हो और फिर अस्नाए-मरम्मत में बैठा किस तरह रहूं। अगर तुमसे हो सके तो बरसात तक भाई से मुझको वह हवेली जिसमें मीर हसन रहते थे, अपनी फूफी को और कोठी में से वह बारानख़ा मए-दालानें-जे़रों जो इलाही बख़्श मरहूम का मसक़न था, मेरे रहने को दिलवा दो। बरसात गुज़र जायेगी, मरम्मत हो जायेगी। फिर साहब और मेम और बाबा लोग अपने क़दीम मसक़न में आ रहेंगे। तुम्हारे वालिद के जहां मुझ पर बहुत अहसान है, एक यह मुरव्व्त का अहसान मेरे पायाने-उम्र में और सही। “
लफ़्ज़ों की ऐसी मिठास, चुहल और नज़ाकत मिर्जा के पास ही हो सकती थी और उनकी विनोदप्रियता....उसके चर्चे भी खूब थे। ’हाली’ ने अपने खास अंदाज में ग़ालिब के इस पक्ष का बड़ा सुन्दर वर्णन किया है, जिसकी बानगी आपको निम्नलिखित प्रसंगों के माध्यम से भलीभांति हो जायेगी।
सुना है कि गदर के बाद जब मिर्जा ग़ालिब बर्न के सामने गए तो उस वक्त कुलाह-ए-पपाक (ऊंची तुर्की टोपी) उनके सर पर थी। उन्होंने मिर्जा को देख कर पूछा,
“वैल, तुम मुसलमान?”
मिर्जा ने कहा, “आधा”.
कर्नल ने कहा, “इस का क्या मतलब?”
मिर्जा ने कहा, ”शराब पीता हूँ, सूअर नहीं खाता.”
कर्नल यह सुन कर हंसाने लगा। फिर मिर्जा ने वजीरे हिन्द की चिट्ठी दिखाई जो कि मलिका-ए-मुअज्ज़मा के क़सीदे के जवाब में आई थी। कर्नल ने कहा, “तुम सरकार की फतह के बाद पहाड़ी पर क्यों न हाजिर हुए?”
मिर्जा ने कहा, ”मैं चार कहारों का अफसर था, वह चारों मुझे छोड़ कर भाग गए. मैं क्योंकर हाजिर होता?”
कर्नल ने निहायत मेहरबानी से मिर्जा और उनके तमाम साथियों को रुखसत कर दिया।
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गदर के बाद जब कि मिर्जा ग़ालिब की पेंशन बंद थी और दरबार में शरीक होने की इजाजत न हुई थी, पंडित मोती लाल मिर्जा साहब से मिलने आये। कुछ पेंशन का जिक्र चला। मिर्जा साहब ने कहा, ”तमाम उम्र में एक दिन शराब न पी हो तो क़ाफिर और एक दफ़ा नमाज पढ़ी हो तो गुनाहगार। फिर नहीं जानता कि सरकार ने किस तरह मुझे बागी मुसलामानों में शुमार किया?”
ग़ालिब यकीनन बेहद प्रतिभाशाली थे और इस कारण वह स्व-निर्मित शख्स बने। लेकिन उन्हें ’उस्ताद’ के रूप में उन्हें कोई पदवी नहीं मिली, क्योंकि वह उस स्तर तक पढ़े नहीं थे। लेकिन जिस भी मुशायरे में गये, अपने कलाम के साथ जबर्दस्त मौजूदगी का अहसास कराते थे। इन्हें उच्च कोटि के शायर होने का इंतरख्वाब हासिल था। यद्यपि मिर्जा गालिब ने प्यार, खूबसूरती और खुशियों को ही तकसीम करने का प्रयास किया। लेकिन उन्होंने सबसे बेहतरीन कार्यों को तब लिखा था, जब वह सबसे ज्यादा अवसाद में डूबे हुए थे।
सन् 1868 में 72 वर्ष की उम्र में इस महान का इंतकाल हुआ। ऐसा माना जाता है कि मृत्यु के मुहाने पर पहुंच कर वह शराब से ज्यादा ही दोस्ती कर बैठे। आर्थिक दुश्वारियों ने भी उन्हें घेर लिया था और वृद्ध अवस्था के भी अपने तक़ाजे थे। बहरहाल, ग़ालिब दुनिया को जो दे गये, वह कभी न भूलने वाली उनकी नज़्म उनके शेर है। ग़ालिब जैसे महान शायर तक किसी का पहुंचना नाममुकिन है। और ये हम नहीं कहते, खुद ग़ालिब ने बहुत पहले ही इसे लिखकर अमर कर दिया-
हैं और भी दुनिया में सुखन-वर बहुत अच्छे
कहते हैं कि ’गालिब’ का है अंदाज-ए-बयाँ और
