Wednesday, May 30, 2018

एक अदद लड़के की चाह में ‘अवांछनीय’ कोटे के अधिकार की जंग जारी है

एक प्रतिष्ठित दैनिक समाचार पत्र में छपे मनीषा सिंह का लेख पढ़ रही थी कि भारतीय समाज में एक अदद लड़के की चाह में लड़कियां पैदा की जाती हैं और फिर उन्हें ‘अवांछनीय’ कोटे में डाल दिया जाता है. उन्होंने एक सवें का जिक्र करते हुए कहा कि वर्ष 2017-18 के आर्थिक सर्वे ने इस अंतर को बाकायदा दर्ज करते हुए बताया है कि दश में 2.1 करोड़ बेटियां ऐसी हैं, जिनके पैदा होने की उम्मीद उनके परिवारों ने नहीं की थी.
इस सर्वेक्षण में अवांछित बेटियों के साथ 6.3 करोड़ गायब बेटियों का आंकड़ा भी दिया गया है. यानी गर्भ में बेटी की सूचना मिलने पर देष में अब तक 6.3 करोड़ भ्रूण हत्याएं कराई गई हैं. पिछले कुछ दशकों में निकाले गए औसत के मुताबिक हर साल करीब 20 लाख ऐसी बेटियां गायब हो जाती हैं, जिनके मां-बाप उन्हें दुनिया में नहीं लाना चाहते. इन गायब या अनचाही बेटियों का असर देश के सामाजिक परिदृश्य पर इस तरह पड़ा कि उत्पादन क्षेत्र में जुड़े आर्थिक विकास में लैंगिक अनुपात बिगड़ गया है और महिला सशक्तीकरण का मुद्दा हाशिये पर चला गया है.
इन अंवाछित बेटियों की बात करते हुए मैं जनसत्ता की एक खबर का जिक्र करना चाहूंगी जिससे अपको समाज की कुत्सित सोच देखने को मिलेगी. मंदसौर जिला मुख्यालय से 35 किलोमीटर दूर बिल्लौद गांव के दो परिवार वालों को मन्नतें मांगने के बाजूद लड़का न हुआ तो उन्होंने अपनी आखिरी बेटी का नाम ही ’अनचाही’ रख दिया. इनके जन्म प्रमाणपत्र से लेकर सभी तरह के परिचय पत्र पर इनका नाम अनचाही ही लिखा है. मां-बाप का तर्क सुनेगे तो हैरानी होगी. कहते है चार लड़कियों के बाद जब फिर लड़की हुई तो सोचा ये नाम रखने से अगला लड़का ही होगा, इसलिए रख दिया. पर उसके बाद भी लड़की ही हुई जो डेढ़ साल बाद मर गई. दूसरे ने 2 लड़कियां होने के बाद मायूस होकर तीसरी का नाम अनचाही घोषित कर दिया.
इन दो अनचाही लड़कियों में से अब एक बीएससी प्रथम वर्ष की छात्रा है तो दूसरी अभी छठी कक्षा में है. सोचिए जरा उस लड़की की क्या स्थिति होती होगी जब उसे अपने नाम के अवांछित होने का अहसास होता है. ये हाल मध्यप्रदेश का है जहां शिवराज सरकार ने लाडली लक्ष्मी योजना चला रखी है. अफसोस की बात है कि सरकारों के तमाम प्रयासों के बावजूद सोच बदलने का नाम नहीं ले रही जबकि आज लड़कियां लडकों से बेहतर काम कर रही. और तो और मां-बाप का सहारा बन रही.
मनीषा सिंह आगे लिखती है कि देष के कार्य बल में महिलाओं की जो हिस्सेदारी 2005-06 में 36 फीसदी थी, वह 2015-16 में घटकर 24 प्रतिषत रह गई है. ये हालात तब हैं जब देष में ‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’ और सुकन्या समृद्धि जैसी योजनाओं के साथ सरकारी और निजी क्षेत्र में कार्य करने वाली महिलाओं को मातृत्व के लिए 26 सप्ताह का अवकाश देने और 50 से अधिक कर्मचारियों वाली फर्मो में क्रेच की सुविधा अनिवार्य की गयी है.
साफ है कि सरकारी स्तर पर महिला सशक्तीकरण की योजनाओं का तभी कुछ हासिल है, जब समाज के स्तर पर लड़कियों को अनचाहा मानने की प्रवृत्ति थमे. उन्होंने ये बात भी सही कही कि हमारे समाज में अब भी बेटियों को बोझ माना जाता है. यहां आज भी लड़के-लड़की का भेद जारी है और इस कारण गर्भ से ही बेटियों के साथ उपेक्षा व हिकारत षुरू हो जाती है. इस भेदभाव का ही परिणाम है कि 1991 में जहां राष्ट्रीय स्तर पर जन्में लड़कों के मुकाबले लड़कियों की संख्या 42 लाख कम थी, वह अंतर 2001 में बढ़कर 71 लाख पहुंच गया था. बीते करीब ड़ेढ दषक में आंकड़ों की यह खाई और गहरी हो चुकी है.
लैंगिक भेदभाव खत्म करने की दो षर्ते हैं. पहली यह कि महिलाओं को समुचित शिक्षा मिले और दूसरी उनका राजनीतिक प्रतिनिधित्व बढ़े. राजनीति में तो स्त्रियों का दखल बढ़ा है, पर महिला आरक्षण विधेयक अब भी जिस तरह लोकसभा में अटका है, उससे संदेह होता है कि हमारा समाज महिलाओं को बराबरी पर लाने का इच्छुक नहीं है. महिलाओं का राजनीतिक सशक्तिकरण अहम है, पर स्त्री शिक्षा का समुचित प्रबंध भी जरूरी है.
खाड़ी और उत्तर अफ्रीकी देशों में लंबे समय तक लैंगिक असमानता कायम रही, पर अब खाड़ी देशों ने महिलाओं को शिक्षा दिलाने में निवेश करना शुरू कर दिया है. नतीजतन संयुक्त अरब अमीरात में विश्वविद्यालय स्तर की उच्च शिक्षा में महिलाओं ने पुरूषों को पीछे छोड़ दिया है. आगे चलकर इसका असर यह होगा कि महिलाएं अच्छे रोजगारों पर अपना आधिपत्य जमाएंगी.
भारत में भी हालात बदले जा सकते हैं, पर इसकी पहल समाज के स्तर पर करनी होगी. समाज को अपनी यह मानसिकता बदलनी होगी कि जो स्त्री घर से बाहर काम करने निकली है, उसका उद्देश्य घर और समाज में पुरूषों को नीचा दिखाना नहीं, घर-समाज में बराबरी का योगदान देना है. इसी तरह घरेलू कामकाज को कुशलता से निपटाने वाली महिलाओं के आर्थिक महत्व को समझने और श्रेय देने की जरूरत है. तभी लैंगिक असमानता की हालत में सुधार आ सकता है.

Friday, May 25, 2018

जापान में कंस्ट्रक्शन उद्योग में महिला-विरोधी माहौल आज भी नहीं बदला

न्यूयार्क टाइम्स में मारी साइतो का लेख पढ़ रही थी. उससे एक बात तो साफ समझ आई कि पुरूष-महिला की बराबरी के अधिकार की समस्या भारत की ही नहीं, बल्कि हर देश की है. भारत में भी एक समय था महिलाओं को शिक्षा से वंचित रखा जाता था, मुख्यधारा से नही जुड़ने दिया जाता था और न ही कोई रोजगार करने दिया जाता था, उन्हें सिर्फ घर की चारदीवारी में कैद करके रखकर कभी मंगलसूत्र के बन्धन में तो कहीं ममता के मोह में बांधकर, कहीं पत्नी के रूप में तो कहीं मां के रूप में कैद रखा गया. यह सच है कि अब हालात पहले जैसे नही हैं महिलाएं, शिक्षित होने लगीं हैं, हर क्षेत्र में आगे बढने लगी हैं.
भारतीय संविधान ने भी महिला व पुरुष को समानता का अधिकार दिया है, साथ ही हमारी सरकारों ने भी महिलाओं के लिए अनेक योजनाएं चालू की हैं, इसके बावजूद समाज में महिला-पुरुष को लेकर अनेक तरह के भेद-भाव बना दिए गये हैं और हर जगह महिलाओं को कमतर आंकने की कोशिश की गई है. जापान की स्थिति पढ़कर तो मुझे फिर भी भारत में औरतों की हालत इतनी बुरी भी नहीं लगती.
मारी साइतो के लेख के अनुसार जापान में नौकरी करने वाली महिलाओं को महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों से दूर रखा जाता है और उन्हें वेतन व मजदूरी भी तुलनात्मक रूप से कम दी जाती है. उसमें भी कंस्ट्रक्शन उद्योग का माहौल महिला-विरोधी होने के लिए कुख्यात है.
कार्यस्थलों मे महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के लिए प्रधानमंत्री शिंजो आबे ने ‘वुमैनोमिक्स’ नाम से एक पहल की है. इसके तहत महिला कर्मचारियों को महत्व देने और आगे बढ़ाने वाली कंपनियों को प्रोत्साहित किया जाता है. इसका नतीजा ये है कि जापान में महिला कर्मचारियों की जितनी संख्या अभी है, उतनी पहले कभी नहीं थी. यही नहीं, इस देष के कार्यबल में महिला कामगारों के शामिल होने की दर अमेरिका से अधिक है. लेकिन कंस्ट्रक्शन क्षेत्र में महिलाओं की कमी पहले जैसी ही है.
एक छोटी कंस्ट्रक्शन कंपनी जैमकेन की मुख्य कार्यकारी जुनको कोमोरिता कहती है, जापान में अब भी ऐसे बहुत लोग हैं, जो कार्यस्थल में किसी महिला से निर्देश लेना पसंद नहीं करते.
साइतो बताती है इंजीनियर की नौकरी में निशिहाको इसका सबसे ताजा उदाहरण है.सुपरवाइजर की अपनी नौकरी के पहले दिन जापान की एक कंस्ट्रक्शन साइट पर माहो निशिहोका का अनुभव बहुत अच्छा नहीं था. जिन लोगां के काम पर उसे नजर रखनी थी, उन्होंने उसके निर्देषों की अनदेखी तो की है, उससे बात करने तक से इन्कार कर दिया था. उस साइट पर वह अकेली प्रषिक्षित इंजीनियर थी, इसके बावजूद एक आदमी ने उसे कंकरीट के एक पुल का निरीक्षण करने से न सिर्फ रोक दिया, बल्कि निशिहाको पर चिल्लाते हुए कहा था, औरत होकर तुम सुपरवाइजर का काम क्यों कर रही हो? निशिहाको का डरना स्वाभाविक था. नौकरी करते उन्हें बीस साल बीत चुके हैं, लेकिन माहौल में आज भी कोई फर्क नहीं आया है.
मारी साइतो अपने लेख में आगे कहती है कि यह उस देष का हाल है, जहां जन्म दर कम होने और प्रवासी कामगारों से जुड़े कानून के सख्त होने के कारण श्रमिकों की भारी कमी है. इसका खामियाजा सिर्फ कंस्ट्रक्शन उद्योग को नहीं, अर्थव्यवस्था को भी भुगतना पड़ रहा है. हालांकि निर्माण उद्योग और सरकार, दोनों अब महिलाओं को रोजगार देने के मामले में प्रयत्नषील है. मसलन, अनेक कंस्ट्रक्शन कंपनियां महिला कामगारों के लिए पोर्टेबल शौचालय और ड्रेसिंग रूम उपलब्ध करा रही हैं लेकिन पिंक टाॅयलेट्स की व्यवस्था देख पुरूष श्रमिक बिफर जाते हैं.
निशिहोका कहती हैं कि सरकार को ऐसा माहौल बनाना चाहिए, जिससे श्रमिकों के लिए काम करना आसान हो. युहो नाकामुरा एक सुपरवाइजर हैं, जिन्हें व्यस्त महीनों में आधी रात तक रूकना पड़ता है. दरअसल निर्माण क्षेत्र में महिलाओं के न आने की एक बड़ी वजह काम की लंबी अवधि भी है. एक तो उन्हें देर शाम तक रोके रखा जाता है, उस पर कई बार उन्हें सप्ताहांत में भी बुला लिया जाता है.