Sunday, September 27, 2015

बिहार की राजनीति ’विकास’ पर नहीं ’जाति’ के दम पर चलती है

नीतीश कुमार बिहार के विकास को लेकर ’आत्मविश्वास’ से लबरेज नजर आ रहे है तभी तो उन्होंने एक चैनल के कार्यक्रम के दौरान बिहार के विकास पर लंबा तर्क दे डाला ये पूछते हुए कि कौन कहता है बिहार में विकास नहीं हो रहा?े इस तरह के आत्मविश्वास का प्रदर्शन करना अच्छी बात है और तब तो और अधिक अच्छी बात है जबकि आप किसी राज्य या देश के मुखिया हों। आपने काम किया है तो उसे जग जाहिर करने का भी आपको पूरा हक है। लेकिन नीतीष जी का आत्मविश्वास मुझे उनका ’ओवर कांफिडेंस’ ज्यादा लग रहा था। जबकि बिहार की वस्तुस्थिति हम सब के सामने है। अपने किए के कसीदे पढ़ना या फिर न दिखने वाले विकास को बढ़-चढ़ कर बताना राजनीति का एक आजमाया हुआ ’फंडा’ तो हो सकता है पर सच्चाई नहीं। सच तो ये है कि जमीनी हकीकत कुछ भी हो ये सत्तासीन लोग, क्या दिखा लेते है या क्या समझा लेते हैं इसी पर इनकी सारी काबिलियत टिकी है। जहां तक मतदाता का सवाल है उसे लुभाने के लिए दो काम भी कर दिये या फिर कुछ और वादे कर दिए तो हो गया इनका काम और फिर बिहार के विकास को लेकर बिहार की जनता उतनी परेशान नहीं दिखती जितने चितिंत विपक्षी नजर आ रहे हैै।
इसीलिए मुख्यमंत्री नीतीश कुमार आजकल ’बढ़ चला बिहार’ के साथ अपने कार्यकाल की उपलब्धियां गिनाकर मतदाताओं के बहाने विपक्षियों को जबाव देने में लगे है जैसे कि बिहार में शिक्षा की अनेक योजनाएं शुरू की गईं, लड़कियों को स्कूल भेजने के लिए साइकिल योजना आरंभ की गई, स्कूलों में लड़कों व लड़कियों की संख्या लगभग बराबर हो चुकी है, स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी हालात बदल गए हैं, मानव विकास पर ध्यान दिया जा रहा है, शिशु मृत्यु व मातृ मृत्यु दर घट गए, पोलियो का उन्मूलन हुआ, टीकाकरण में हम राष्ट्रीय औसत से भी आगे निकल गए हैं वगैरह वगैरह। चुनाव से पहले विकास के दावे करना और विपक्षियों द्वारा लगाए आरोप का उन्हीं की जुबान में जबाव देना कोई नई बात नहीं है। अपना बखान करते हुए अपनी जीत दर्ज करने के लिए कुछ और वादे करना भी पुराना चुनावी हथकंडा है जिसे नीतीश कुमार भी आजमा रहे है। तभी तो कल्याणपुर में सीएम नीतीश कुमार अपनी चुनावी जनसभा को संबोधित करते हुए कह रहे है कि वे हर जिले में हर युवा को दो भाषा हिंदी व अंगरेजी सिखाने का प्रबंध करेंगे, ताकि उसे रोजगार में दिक्कत नहीं हो। वे दावा कर रहे है कि उनका शासन फिर से आने से युवाओं के जीवन में नया उजाला आयेगा। हर जिले में कौशल विकास केंद्र खोलेंगे और वहां रजिस्ट्रेशन होगा, ताकि हमारे युवा स्वरोजगार कर सकें।
युवाओं को रिझाने के पीछे नीतीश की मंशा भले ही विपक्षियों के हथियारों को कमजोर करने की हो लेकिन वे उस हकीकत से कतई अनजान नहीं हो सकते जिसे ’बेरोजगारी’ कहते है और जो बिहार के युवा का सबसे बड़ा मसला है। इस मुत्तालिक श्रम मंत्रालय के आंकड़ों पर एक नजर डालें तो पता चलता है कि अगर देश में 15 से 17 वर्ष के 17 प्रतिषत बेरोजगार है तो अकेले बिहार में इस उम्र के 31 प्रतिशत बेरोजगार हैं। 18-31 वर्ष के बेरोजगारों की संख्या यदि देष में 13 प्रतिशत है तो बिहार में इनकी संख्या 17 प्रतिशत है। मसलन बिहार के लगभग 10.4 करोड़ युवाओं में से 48 प्रतिशत के आगे बेरोजगारी की समस्या मुह बाएं खड़ी है। श्रम मंत्रालय के अनुसार विभिन्न पेषों में यहां अगर किसी रोजगार में युवाओं की दिलचस्पी है तो वह खेती है। इसलिए सबसे अधिक रोजगार के अवसर कृषि में (45.2 प्रतिशत) है, बाकी व्यवसायों जैसे कंस्ट्रक्शन (20.1 प्रतिषत), व्यापार (11.8 प्रतिषत), मैन्यूफैक्चरिंग (10.60 प्रतिषत) और शिक्षा (8.4 प्रतिषत) भर ही रोजगार हैं।
इन आकड़ों को देखने के बाद आप या तो बिहार में विकास का दावा कर रहे नीतीश पर गलतबयानी का आरोप लगा सकते है या फिर उन आंकडों को गलत कह सकते हैं जिनके द्वारा बिहार की असलियत दिखाने की कोशिश की गई है। कुछ और आंकड़े है जो बिहार की जमीनी हकीकत दिखा रहे है। एनुवेल सर्वे आॅफ इंडस्ट्रीज की 2013 की रिर्पोट के हवाले से किए गए सर्वेक्षण के अनुसार बिहार में कुल 3345 उद्योग है जो देष भर का मात्र 1.5 फीसद भर है। शिक्षा के नजरिए से नीतीश राज की साक्षरता दर अफ्रीकी देशों जैसे मलावी, कांगो और सूडान से भी बुरी है। वर्ष 2011 की जनगणना के मुताबिक भारत में सबसे कम साक्षरता दर बिहार की है। इस जनगणना के मुताबिक बिहार के 64 फीसदी लोग यानी 10 करोड़ 40 लाख लोग निरक्षर हैं। गरीब राज्यों में बिहार में शिक्षा की स्थिति वाकई चिंताजनक है। यूडीआईएसई (सेकेंड्री) के अनुसार 2013-14 में हाईस्कूल में दाखिला लेने वाले बच्चों का प्रतिशत 60 प्रतिशत रहा जिसमें 2012-13 के मुकाबले महज 15 प्रतिशत बढ़ा।
नीतीश बिहार को ’जंगलराज 2’ कहने पर घोर आपत्ति करते है। वे इसके बजाय बिहार में हो रहे विकास पर ध्यान देने को कहते है। लेकिन गंभीर अपराध के मामले बिहार में इतने है कि विकास नजर ही नहीं आता। इस मामले में बिहार का दर्जा उत्तर प्रदेश के बाद आता है और इस हकीकत से वे नावाकिफ तो नहीं हो सकते। नेषनल क्राइम रिकार्ड्स ब्यूरो के 2013 के आंकड़ों के हिसाब से 30213 मामले गंभीर अपराध के नाम पर दर्ज है। इसी वर्ष में 3441 मामले सिर्फ हत्या के ही दर्ज हुए है। 2013 में ही महिलाओं के खिलाफ हुए अपराध में ही 13609 मामले दर्ज हुए है।
इन सर्वे रिर्पोट्स में षिुषु मृत्यु दर और प्रसव के समय होने वाली महिलाओं की मृत्यु दर में आती कमी की रिर्पोट ही जरूर बिहार के मुख्यमंत्री को मुस्कुराने की वजह दे सकती है अन्यथा आर्थिक दृष्टि से पिछड़ रहे बिहार की हालत कतई अच्छी नहीं कही जा सकती। आर्थिक सर्वेक्षण के आंकड़ों के अनुसार अगर देश में प्रति व्यक्ति आय 80,388 है तो बिहार में ये प्रति व्यक्ति 31,229 है। यानी देश के मुकाबले सूबे की प्रति व्यक्ति आय 40 फीसदी से भी कम है। छत्तीसगढ़, झारख्ंाड के बाद  गरीबी में बिहार का नंबर तीसरा है। इंडियास्पेंड की रिसर्च को अगर ठीक से खंगाला जाए तो ऐसे कई और कई मुद्दे है जो बिहार की वस्तुस्थिति को सामने रखते है और नीतीश राज की पोल खोलते हैं। बिहार की हर नब्ज से वाकिफ नीतीश कुमार मतदाताओं और विपक्षियों के आगे तो बिहार में होते बदलाव और विकास की बात करते है वहीं दूसरी ओर केंद्र से बिहार को विशेष राज्य का दर्जे दिए जाने की मांग को लेकर बिहार बंद, अनशन आदि भी करते हैं। इस संबंध में भाजपा से शिकायत भी कर चुके हैं कि कांग्रेस के साथ सीमांध्र को विशेष दर्जा दिलाते वक्त भाजपा ने बिहार को क्यों याद नहीं रहा?
इन आंकड़ों पर नजर डालने के बाद तो नीतीश कुमार के ’अति आत्मविश्वास’ पर अफसोस ही होता है। आपके किए कार्यों का गुणगान दूसरे करें तो एक बात है लेकिन आप ही जब उनका बढ़ चढ़ कर बखान करने लगे वह भी तब जबकि जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां करती हो। अफसोस होता है ये देखकर कि सत्ता में बने रहने की चाह ने नीतीश कुमार को भी नहीं बख्शा। ये वही नीतीश कुमार है जो लालू राज का खात्मा कर जब सत्ता में आए तो बिहार ही नहीं देश में हर किसी ने उनका दिल से स्वागत किया था। उस वक्त हर किसी को लगा था कि बिहार की किस्मत अब बदल जाएगी। बिहार की किस्मत तो नहीं बदली हां नीतीश कुमार के विचारों में जरूर भारी बदलाव आ गया, जिसके नमूने वे कई मर्तबा पेश कर चुके हैं। फिर भी इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि आंकड़ों की नजर से अगर लालूराज के आंकड़ों को देखें तो मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के कार्यकाल में बिहार में विकास दर कुछ सुधरा है। लेकिन विकास दर में सुधार के बावजूद बिहार कई मामलों में अब भी अन्य राज्यों की तुलना में सबसे निचले पायदान पर ही नजर आता है।
बिहार में विधानसभा की कुल 243 सीटें हैं जो 38 जिलों में फैली हुई हैं। कुल क्षेत्रफल 94,163 वर्ग किलोमीटर और 2011 की जनगणना के मुताबिक कुल आबादी 10.38 करोड़, जो संख्या के हिसाब से उसे देश का तीसरा सबसे बड़ा राज्य बनाती है। आबादी में फिलीपिंस की आबादी के बराबर के बिहार को नीतीश कुमार के राजकाज संभालने के बाद कुछ गति अवष्य मिली, लेकिन बेरोजगारी और गरीबी के मामले में देखा जाए तो राज्य अब भी पिछड़ा है। यहीं कारण है कि विपक्षी जब-जब वार करता है तब-तब बिहार के अति पिछड़े होने पर ही चोट करता है। ’बढ़ चला बिहार’ की हकीकत को वहां रहने वाले लोगों से बेहतर कौन समझ सकता है।
हालांकि बिहार के चुनाव की एक अदद सच्चाई यह भी है कि यहां विकास के नाम पर नहीं जाति के नाम पर वोट अधिक पड़ते है। असाक्षरता का इस तरह का आलम भी कभी कभी इन नेताओं के लिए वरदान साबित हो जाता है। सोशल मीडिया पर आजकल एक चुटकुला खूब चल रहा है कि बिहारी वर्णमाला को इस हिसाब से देखते है। उनके लिए ’सी’ (कास्ट) पहले आता है और ’डी’ (डेवलेपमेन्ट) बाद में। हमेषा की तरह इस बार भी बिहार चुनाव में तीन ’सी’ (केन्डीडेेट, कास्ट और कांसिटयून्सी ) ही मुख्य फैक्टर है। अब विरोधी भले ही विकास-विकास चिल्लाता रहे, मतदाताओं की ऐसी सोच के चलते नीतीश इस मामले में राहत की सांस तो ले ही सकते है।


Friday, September 18, 2015

बधाई! तो इस बार भी डेंगू की ही जीत हुई

महज सात साल का था अविनाश। अभी तो उसे पूरी जिंदगी जीनी थी। उसके मां बाप ने उसे लेकर ढेरों सपने सजाए थे, जिसे एक ही रात की काली स्याही से धो डाला गया। मूलचंद, मेडसिटी, साकेत मैक्स और फिर आईरीन, एक के बाद एक अस्पताल के चक्कर काटते मां-बाप की बेचारगी की कल्पना आप कर सकते है जिनके लाल की सांसें उनकी गोद में उखड़ रही हो और कोई अस्पताल उसे लेने को तैयार न होे। अपने इकलौते बेटे की मौत के सदमें ने अविनाश के मां बाप को कुछ ऐसा तोड़ा कि उन्होंने अपनी ही जिंदगी को समाप्त कर देना उचित समझा। इस दर्दनाक सत्य को सुनने और सिस्टम की कमियों को समझने के बाद हमारे अस्पतालों की व्यवस्था में कोई बड़ा भारी परिवर्तन आ गया हो या जाएगा, ऐसा कतई नहीं है। हां, इस सत्य ने जहां डाक्टरों की चरम संवेदनहीनता का नमूना पेश किया वहीं सरकारी व्यवस्था की बखिया को एक बार फिर से उधेड़ दिया।
इस साल जब से डेंगू का अटैक शुरू हुआ है तब से मेरे जानने वाले कुछ लोगों की पूछताछ ने मुझे निरूत्तर कर दिया। उनकी जिज्ञासा महज इतना जानने में थी कि अगर किसी अस्पताल में मेरा कोई खास परिचय हो तो उनके डेंगू पीड़ित संबंधी को अस्पताल में बेड मिल जाए या फिर थोड़ी खास तव्वोजोह दे दी जाए। ये वाकई हैरानी की ही बात है कि सामान्य सी प्रक्रिया के लिए भी कहना-कहलाना ’सिस्टम’ से ’डील’ करने की एक कड़ी बनती जा रही है। इस सत्य से हम सब दो चार हो रहे है है। अविनाश की मौत नहीं होती, अगर उसके पिता किसी नामी गिरामी शख्सियत से नाता रखते होते। लेकिन क्या सिर्फ एक यही वजह है कि अस्पतालों में बेड नहीं दिए जाते क्योंकि वे किसी खास के लिए आरक्षित होते है या फिर खास के कहने पर ही दिए जाते है। अगर ये सत्य है तो यह भी एक बड़ा सच है कि बढ़ती बीमारों की तादाद और बिस्तरों की होती कमी से भी ’सिस्टम’ का हाल बेहाल है।  
जिस देश में बीमारों की तादाद बीमारियों से कहीं अधिक है वहां अस्पतालों की कमी का रोना जारी रहना स्वाभाविक सी बात है। जितने बेड होते है उससे कहीं ज्यादा तो मरीज अस्पताल का रूख करते है। निम्नतर आय वाले हो या कहें मध्य आय वर्ग का आदमी उसके लिए सरकारी अस्पताल का ही एकमात्र सहारा होता है। और जब इस तरह की बीमारी फैलती है तो यही वर्ग सबसे ज्यादा इसके शिकार भी होते है। डेंगू फैलने वाली बीमारी है और इसका शिकार हर वह शख्स जो लापरवाही का शिकार है। अब फिर चाहे इसके लिए वह स्वंय दोषी हो या फिर उसके आसपास का वातावरण या वह व्यवस्था, जिसमें रहने को वह मजबूर है।
डेंगू का आतंक देश में 1996 से बदस्तूर जारी है। भारत के अलावा लैटिन अमेरिकी देश जैसे अर्जेंटीना, मक्सिको, चिली और एशियाई देश जैसे पाकिस्तान भी इसकी गिरफ्त में हैं। अध्ययन के अनुसार डेंगू एक ऐसे मच्छर के काटने पर होता है जिसकी लार में डेंगू के वायरस मौजूद होते हैं। इंसान के जिस्म में पहुंचा डेंगू वायरस सबसे पहले त्वचा में मौजूद प्रतिरोधी कोशिकाओं यानी इम्यून सेल्स को संक्रमित करना आरंभ करता है। इसके बाद वायरस शरीर के लिम्फैटिक सिस्टम में प्रवेश कर जाता है। फिर ये खून की नलिकाओं से होकर मरीज के पूरे शरीर में फैल जाता है इसे वेरेमिया कहते हैं। इस दौरान तेज बुखार आता है, जिसे डेंगू हेमोरैजिक (ीमउवततींहपब, फीवर कहते हैं। इसमें खून की नलियों से रिसाव शुरू हो जाता है और उससे प्लाज्मा की लीकेज शुरू हो जाती है। अगर मच्छर किसी डेंगू के मरीज को काटता है तो उसके खून में मौजूद वायरस अपने साथ लेकर दूसरे स्वस्थ लोगों में फैलाने का काम करता है।
इस जानलेवा बीमारी के बारीकियों को जानते हुए भी इसके प्रति बरती जाती लापरवाही यकीनन अफसोसजनक है। जिस हिसाब से साल दर साल डेंगू के मरीजों की तादाद बढ़ रही है उस हिसाब से अस्पतालों की व्यवस्था में बदलाव या कहें इजाफा नहीं हो पा रहा। सरकारी अस्पतालों में अगर एक बेड पर 3-3 मरीजों को भर्ती किया जा रहा हैं तो प्राइवेट का पूरा हिसाब किताब आपकी हैसियत पर टिका है। अपनी-अपनी चलाते इन अस्पतालों पर सरकारी दबाब तब बनना शुरू होता है जब पानी सिर से ऊपर गुजरने लगता है।
डेंगू की आहट ऐसा नहीं है कि सरकारों को सुनाई नहीं देती लेकिन जब तक कुछ अमानवीय नहीं घट जाता वो भी नहीं जागती। हर बात के लिए हो हल्ला करना तो जैसे आज की जरूरत बनता जा रहा है। जिन जनसुविधा से जुड़ी चीजों के लिए विकसित देशों में सबके लिए सुलभ सुचारू व्यवस्था है, उन चीजों के लिए जुगाड़ के तरीके ढूढ़ने पड़ते है। इस मसले पर दरअसल दोष किसी एक के सिर मढ़ना उचित नहीं। कुछ स्वंय हम तो कुछ इस ’सिस्टम’ को चलाने वाले इसकी जिम्मेदारी लेने से भागते हैं। स्वच्छता का पाठ तो पढ़ना-पढ़ाना चाहते हैं पर उसे लागू नहीं करना चाहते। जानते हुए है कि किन वजहों से ये बीमारियां पनप रही है सफाई को तवज्जो नहीं देना चाहते। जानते है बिना सख्त अनुशासन के ये काम नहीं हो सकता फिर भी कठोर होने से बचते है। महज जबानी जमाखर्च कर अपनी जिम्मेदारी निभा लेना चाहते है।
अनपढ़ गरीब आदमी को डेंगू होता है तो इसका दोष इनकी गंदगी में रहने की आदत को दे दिया जाता है। किसी हैसियत वाले को डेंगू होता है तो इसका दोष सिस्टम की लापरवाही पर मढ़ दिया जाता है। इस दो तरह की सोच में मौत गरीब के ही हिस्से में आती है। पर उन्हें इस गंदगी में रहने को मजबूर करता कौन है? हमारी व्यवस्था ही कुछ ऐसी बनी है कि उनके इलाकों में सफाई जरूरी नहीं समझी जाती। अनपढ़ गरीब आदमी भी सफाई पसंद होता है या साफ वातावरण में रहना चाहता है। अगर ऐसा न होता तो तो जो आदमी सड़क पर थूकता चलता है वह आलीशान माॅल या फिर मेट्रो स्टेशनों में क्यों गंदगी फैलाने से बाज आता है। वजह साफ है। वहां के नियम, चमक-दमक और चकाचैंध ऐसा करने से उन्हें रोकती है। गंदगी को भी किसी नजरिए से देखने की जिम्मेदारी अगर किसी की है तो वह है सिर्फ और सिर्फ नगर निगम या उन्हें चलाने वाले सिस्टम की है। जो स्वंय तो ढंग से काम नहीं करते और न ही सख्त नियमों का पालन करवाते है। इन्हें ख्याल है तो सिर्फ उन इलाकों का जिनमें वीवीआई पी रहते हैं। आखिर क्यों केवल इन्हीं इलाकों को साफ रखने में सारी सेना लगा दी जाती है, जबकि स्लम एरियाज में कोई कूड़ा उठाने तक नहीं जाता। दरअसल नगर निगमों का काम भी इलाके और व्यक्ति की पहुंच के हिसाब से आरंभ और खत्म होता है।
गरीब होना गुनाह है, ये गलत नहीं कहा जाता। संभवतः यही कारण है कि सस्ते या मुफ्त इलाज के चक्कर में गरीबों को मौत को गले लगाना पड़ता है। अस्पताल की सुविधाएं भी उन्हें ही सहज उपलब्ध है जिनके पास पैसा है, या वे वीआईपी श्रेणी में आते हैं या फिर उनके करीबी है। तभी तो अस्पताल अथाॅरिटीज किसी बेफिजूल इंसान का वेंटिलेटर निकाल कर उसे लगाने में देर नहीं करती जो स्वंय उसके लिए बहुत महत्वपूर्ण हो। अस्पतालों में अगर आप कभी जनरल वार्ड की तरफ या इमरजेंसी की तरफ भूले से चले जाएं तो मैले कुचैले कपड़ों में लिपटे लोग आपको डाक्टर भी नहीं, उनके असिस्टेंट या ट्रेनी डाक्टर से करबद्ध याचना करते मिल जाएंगे। उनकी बेबस आंखें कभी अपनी मरीज को तो कभी उस धरती के देवता को याचना से निहारती मिलती हैं जो उसकी ओर देख भी नहीं रहा।
बीमारी हो, आपदा हो या फिर आए दिन की समस्याएं इस देश के जिम्मेदार अपनी जिम्मेदारी से भागते फिरते है। अपना ठीकरा दूसरे के सिर फोड़ देना, दूसरे का तीसरे, तीसरे का चैथे के सिर मढ़ देना आम कवायद है। ये भी क्या कम मजाक की बात है कि डेंगू का भी राजनीतिकरण कर दिया जाए। अंसवेदनशीलता का आलम यह है कि सोच सिर्फ “मैं“ तक सीमित होती जा रही है। अगर व्यवस्था मेरे लिए अनुकूल है तो सब ठीक है। यही वजह है कि डाक्टर हो या अस्पताल किसी नोटिस या किसी धमकी से नहीं डरते, चूंकि वे भी अच्छी तरह से जानते है कि नोटिस पकड़ाने वालों को भी उनकी आवश्यकता पड़ती रहती है। मामले को “एडजस्ट“ कर लेने की कूवत सख़्त क़ानून को भी काग़जों तक ही सीमित कर देती है।







Monday, September 14, 2015

’सत्ता’ के क़ाहिलपन ने किया भारत की ’आदर्श’ शिक्षा का नाश

’भारत में अंग्रेजी राज’ (प्रकाशक-ओंकार प्रेस, इलाहाबाद) के तीसरे संस्करण (1938) के छतीसवें अध्याय को पढ़कर, इस बात पर मुझे घोर आश्चर्य हुआ कि भारत किसी समय उच्च सार्वजनिक शिक्षा प्रणाली का केन्द्र ही नहीं रहा अपितु शिक्षण के नजरिए से दूसरे देशों के लिए ’आदर्श’ भी माना गया। इस पुस्तक के अनुसार देश में अंग्रेजी शासन से पहले भारत में शिक्षा हर नागरिक का पहला अधिकार थी। किंतु अंग्रेजी राज के दौरान नरेशों की अकण्र्यमता का लाभ उठाकर बाहरी ताकतों ने देश में शिक्षा के अधिकार को जिस तरह से कुछ लोगों तक सीमित कर दिया, पढ़ने लिखने वाले हिन्दुस्तानियों को रोजी रोटी के लिए मोहताज कर दिया, हिन्दी भाषा की जगह अंग्रेजी भाषा और साहित्य को महत्व दिया, उसका असर आज भी नजर आता है। जो देश कभी उच्च शिक्षा के लिए मानक माना जाता था और अपनी शिक्षा प्रणाली के सहारे विश्व भर में विख्यात था, आज उसी देश के नागरिक गरीबी, काहिलता, रूढ़िवादिता और बेबसी का दामन पकड़े शिक्षा के प्रति बेरूखापन अपनाए हुए है। अंधविश्वास और दकियानूसी परंपराएं उन्हें अक्षरज्ञान का महत्व समझाने में बाधा डाल रही हैं।
सच तो ये है कि तमाम सरकारी प्रयासों के बावजूद शिक्षा को लेकर अभी भी जो बेरूखापन है, इसका बीज बहुत पहले ही अंग्रेज बो कर चले गए। कहने को हम गुलामी से मुक्त हो चुके है लेकिन क्या वाकई ऐसा है? जिस शिक्षा को अंग्रेजों ने अपने स्वार्थ सिद्धि के लिए, हिन्दुस्तानियों से दूर रखने में अपना हित समझा, वैसे ही आज के सरपरस्त भी अपने स्वार्थ से लबरेज, हालात सुधारने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाना चाहते। अंग्रेजों को इस देश से गए सदियां बीत चुकी लेकिन उनके हाथों किए गए शिक्षा के सर्वनाश से हम अभी तक उबर नहीं पा रहे। प्राचीन भारतीय शिक्षा के उच्चतर से निम्नतर और फिर उसके सर्वनाश के इसी मूल का जिक्र इस छत्तीसवें अघ्याय में है।
आज से सवा सौ साल पहले तक यूरोप के किसी भी देश में शिक्षा का प्रचार-प्रसार भारत जितना न था और न ही आबादी के हिसाब से पढ़े लिखों का प्रतिशत भारत से ही अधिक था। इतिहासकार ही नहीं उस वक्त के अंग्रेज प्रशासनिक अधिकारी भी भारतीय शिक्षा की उच्च व्यवस्था के गवाह रहे हंै। प्राचीन समय में या यूं कहें देश में ईस्ट इंडिया कंपनी के आने से पहले भारत के जनसामान्य को मुख्यतः चार प्रकार की संस्थाओं के योगदान से शिक्षित करने का प्रावधान था। एक तरफ असंख्य ब्राहमण आचार्य अपने अपने घरों पर अपने शिष्यों को शिक्षा देते थे तो दूसरी ओर अनेक मुख्य नगरों में उच्च संस्कृत साहित्य की शिक्षा के लिए विद्यापीठ कायम थीं। उर्दू और फारसी की शिक्षा के लिए जगह जगह मक़तब और मदरसे थे, जिनमें हिन्दू मुस्लिम बालक शिक्षा ग्रहण करते थे। इसके अतिरिक्त देश के प्रत्येक छोटे से छोटे ग्राम में भी गांव के समस्त बालकों की शिक्षा के लिए कम से कम एक पाठशाला अवश्य होती थी। उस वक्त ग्राम के समस्त बच्चों की शिक्षा की व्यवस्था करना प्रत्येक ग्राम पंचायत अपना परम कत्र्तव्य मानती थी। ये व्यवस्था तब तक चलती रही जब तक कि ईस्ट इंडिया ने आकर ग्राम पंचायतों को नष्ट नहीं कर दिया। इस संदर्भ में इतिहासकार लडलो ने ब्रिटिश भारत के इतिहास में लिखा है,“ प्रत्येक ऐसे हिन्दू गांव में, जिसका कि पुराना संगठन अभी तक कायम है, मुझे विश्वास है कि आम तौर पर सब बच्चे यहां लिखना पढ़ना और हिसाब करना जानते हंै। किन्तु जहां कहीं कि हमने ग्राम पंचायत का नाश किया है, जैसे बंगाल में, वहां ग्राम पंचायत के साथ साथ गांव की पाठशाला भी लुप्त हो गई है।“
प्राचीन भारत के ग्रामवासियों की शिक्षा के सम्बन्ध में 1823 की कंपनी की एक सरकारी रिपोर्ट में लिखे बयान को देखकर आप उस वक्त की शिक्षा के उत्कृष्ट स्तर का अंदाजा लगा सकते है। इसमें लिखा है कि -“शिक्षा की दृष्टि से संसार के किसी भी अन्य देश में किसानों की व्यवस्था इतनी ऊंची नहीं है जितनी ब्रिटिश भारत के अनेक भागों में।“ यही कारण है कि 19वीं सदी के आरंभ में डा0 एड्रूबेल नामक एक अंग्रेज शिक्षा प्रेमी ने इंगलिस्तान वापस जाकर अपने देश के बच्चों को भारतीय शिक्षा प्रणाली के अनुसार पढ़ाना शुरू किया। 3 जून सन् 1814 को कंपनी के निदेशकों ने बंगाल के गर्वनर के नाम जो पत्र लिखा वह भारतीय शिक्षा की उत्कृष्टता का साक्ष्य है। इसमें लिखा था-“ शिक्षा का जो तरीका बहुत पुराने समय से भारत में वहां के आचार्यों के अधीन है उसकी सबसे बड़ी प्रशंसा यही है कि डा0 बेल, जो कि मद्रास में पादरी रह चुके है, वही तरीका इस देश में प्रचलित कर रहे है। अब हमारी राष्ट्रीय संस्थाओं में इसी तरह के अनुसार शिक्षा दी जा रही है, क्योंकि हमें विश्वास है कि इससे भाषा को सिखाना बहुत सरल और सीखना सुगम हो जाता है। उन्होंने यह भी लिखा कि हिन्दुओं की इस अत्यन्त प्राचीन और लाभदायक शिक्षण संस्था को सल्तनतों के उलट फेर भी कोई हानि नहीं पहुंचा सके।“ ये भारत की उस उच्च शिक्षा के कलमबद्ध साक्ष्य है जिन्हें अपनी आंखों से उस वक्त के इतिहासकारों और अधिकारियों ने देखा और उसका अनुसरण किया।
आज की पश्चिमी शिक्षा प्रणाली में जिसे “म्यूचुअल ट्यूशन“ कहा जाता है यह पश्चिम ने भारत से ही सीखा। इस संन्दर्भ में बेलारी जिले के कलेक्टर ए0 डी0 कैम्पबेल की सन् 1823 की एक रिपोर्ट पर भी गौर करना जरूरी है। वो लिखते है-“ जिस व्यवस्था के अनुसार भारत की पाठशालाओं में बच्चों को लिखना सिखाया जाता है और जिस ढंग से ऊंचे दर्जो के विद्यार्थी नीचे दर्जो के विद्यार्थियों को शिक्षा देते है और साथ-साथ अपना ज्ञान भी पक्का करते हैं, वह समस्त प्रणाली निःसंदेह प्रशंसनीय है और इंगलिस्तान में उसका जो अनुकरण किया गया है उसके सर्वथा योग्य है।“
भारत की इस प्राचीन सार्वजनिक शिक्षा प्रणाली का नाश 19वीं में आरंभ हुआ जबकि ईस्ट इंडिया कंपनी ने देश में अपने पैर जमाने शुरू कर दिए। एक ओर जहां कंपनी की लूट से भारतीय उद्योग धंधो का नाश होने लगा और देश की दरिद्रता में इजाफा होने लगा था। नन्हें नन्हें बच्चे इस दरिद्रता से बचने के लिए पाठशाला जाना छोड़ माता-पिता का मेहनत मजदूरी कर हाथ बंटाने लगे। वहीं दूसरी ओर प्राचीन ग्राम पंचायतों को समाप्त कर दिए जाने से ग्राम पाठशालाओं का भी अंत होने लगा था।
बेलारी जिले के अंग्रेज कलेक्टर ए0 डी0 कैम्पबेल जो अपने से पूर्व और अपने समय की शिक्षा की दशा के गवाह रहे, लिखते है-इस जिले की लगभग 10 लाख आबादी में से इस समय 7 हजार बच्चे भी शिक्षा नहीं पा रहे है, जिससे पूरी तरह जाहिर है कि शिक्षा में निर्धनता के कारण कितनी अवनति हुई है। बहुत से ग्रामों में, जहां पहले पाठशालाएं मौजूद थीं, वहां अब कोई पाठशाला नहीं है और बहुत से अन्य ग्रामों में जहां पहले बड़ी बड़ी पाठशालाएं थीं वहां अब केवल धनाढ्य लोगों के थोड़े से बालक शिक्षा पाते हैं। दूसरे लोगों के बालक निर्धनता के कारण पाठशाला नहीं जा सकते। कैम्पबेल आगे लिखते है कि जिले में अब घटते घटते 533 संस्थाएं रह गई हैं और मुझे यह कहते लज्जा आती है कि इनमें से किसी एक को भी अब सरकार की ओर से किसी तरह की सहायता राशि नहीं दी जाती। प्राचीन व्यवस्था के तहत शिक्षा व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने के लिए हिन्दुू मुस्लिम राजा शिक्षण संस्थाओं को आर्थिक सहायता या जागीरें भेंट किया करते  थे। जिस पर बाद में कंपनी ने रोक लगा दी थी।
जे सी मार्शमैन के एक बयान के अनुसार 1792 में जब ईस्ट इंडिया कंपनी के लिए नया चारटर एक्ट पास होने का समय आया तो पार्लियामेंट के एक सदस्य विलबरफोर्स ने नये कानून में एक धारा ऐसी जोड़नी चाही जिसका अभिप्राय भारतवासियों के लिए शिक्षा के प्रबंध से था। इसके विरोध में पार्लियामेंट के सदस्यों के साथ साथ कंपनी के हिस्सेदारों ने इतना हंगामा काटा कि विलबरफोर्स को अपनी तजबीज वापस लेनी पड़ी। नए अंग्रेज शासक भी हिन्दुस्तानियों की शिक्षा के विरोध में खड़े हो गए थे। ये शासक भारतीयों की शिक्षा को अपने लिए हितकर में नहीं मानते थे। कुल मिलाकर कर इस विरोध का मकसद, भारतवासियों को सदा जात-पात, मत-मतान्तरों के भेद में फंसाना, आपस में एक दूसरे से लड़ाना, उन्हें अशिक्षित रखना था और अंग्रेजी राज की सलामती की चाह रखना सर्वोपरि था।
इस सोच से थोड़ा सा अलग हटकार लार्ड मैकाले का उद्येश्य अंग्रेजी भाषा, साहित्य, विज्ञान को ’हिंदुस्तानी हाई सोसाइटी’ तक पहुंचाना था। मैकाले ऐसे हिन्दुस्तानियों को शिक्षा देना चाहते थे जो रंग और रक्त की दृष्टि से भले ही भारतीय हो किंतु जो अपनी रूचि, भाषा, भाव और विचार में अंग्रेज हों और अंग्रेज सत्ता चलाने के लिए जिनका उपयोग, एक यंत्र की माफिक किया जा सकें। इस तरह से लार्ड मैकाले के इस प्रयोग ने अंग्रेजी पढे़ लिखों भारतीयों की एक ऐसी अलग जाति बना दी जिन्हें अपने देशवासियों के साथ या तो जरा सी भी सहानुभूति नहीं थी और यदि थी भी तो वह भी बहुत कम। देशी भाषाओं को पनपने से रोकने में भी र्लार्ड मैकाले और तत्कालीन गर्वनर जनरल विलियम बेंटिग ने कोई कसर न छोड़ी। यही वजह है कि आज भी देश में हिंदी को जिस सम्मान का अधिकारी होना चाहिए उसे मैकाले की तर्ज में दी गई शिक्षा के आगे अपना वर्चस्व ढूंढना पड़ रहा है। क्या ये वास्तविकता नहीं है कि आज भी मैकाले इस देश में चंद अंग्रेजीदां लोगों के जरिए अपनी ही सत्ता चला रहा है?
भारतीय प्राचीन शिक्षा को बनाए रखने में भी उस वक्त के राजा जहां अपने काहिलपन और अपने स्वार्थ की वजह से अंग्रेजों के आगे घुटने टेकते रहे, आज वैसे ही सत्ता और उसके अन्तर्गत चल रही व्यवस्था का काहिलपन भारतीय शिक्षा को वह मुकाम नहीं दे पा रहा जो कभी उसका हुआ करता था। कंपनी ने भारतीय समाज की जिस कमजोर नस को उस वक्त दबाकर राज किया था आज का शासित वर्ग भी जनता की उसी नस को दबाए हुए है। गरीबी, अंधविश्वास, रूढिवादी परंपरा, जातपात, भेदभाव को हवा देकर जिन अंग्रेजों ने राज किया और देश के विकास में रोड़ा अटका दिया, वहीं आज का सत्ताधारी इन कारणों के बने रहने में ही अपना हित साधने में लगा है। अंग्रेज चले गए, नीति निर्माता भी बदल गए पर नीतियां वही रही और हम कहते है कि हम आजाद हो गए?

Friday, September 4, 2015

’पेज 3’ कल्चर और स्याह-सफ़ेद जिंदगी के कड़ुवे सच

अधिक दिन नहीं हुए इस बात को गुजरे जबकि ’अरूषी हत्याकांड’ से हम सब भौंचक रह गये थे। तब ये यकीन करना मुश्किल हो रहा था कि कोई मां बाप कैसे अपनी ही औलाद को कत्ल कर सकते है। इस मर्डर के कारणों ने पिछले कई हाई प्रोफाइल हत्याओं को बहुत का पीछे छोड़ दिया। पत्नी, प्रेमिका या पति की बेवफाई या फिर किसी अन्य कारण से हुए मर्डर में ’अरूषी हत्याकांड’ माता पिता के निष्कपट संबंधों पर भी एक प्रश्नचिह्नलगा गया। फिर भी अरूषी की हत्या एक सोची समझी साजिश नहीं कही जा सकती थी। लेकिन शीना की हत्या पूर्व नियोजित थी। हैरान कर देने वाली बात यह है कि जिस समय नुपुर तलवार और उनके पति डा0 तलवार पर अपनी ही बेटी की हत्या का केस में मुजरिम साबित हो रहे थे, उसी समय एक मां अपनी ही बेटी की हत्या को अंजाम देने की तैयारी कर रही थी।
शीना बोरा, यह नाम है उस बदकिस्मत लड़की का, जिसे बचपन में ही उसके माता-पिता ने त्याग दिया और उसके जीवन का अंत अपनी ही मां इंद्राणी मुखर्जी के हाथों हो गया। जिस तरह अरूषी हत्याकांड की परत दर परत चैंका रही थी वैसे ही शीना बोरा हत्याकांड के जितने खुलासे हो रहे हैं, वह ना सिर्फ चैंकाने वाले हैं, बल्कि यह सवाल भी खड़े कर रहे हैं कि कोई मां अपनी बेटी के साथ ऐसा कैसे कर सकती है। शीना की जिंदगी कितनी भयावह थी इसका अंदाजा उसकी डायरी पढ़ने से होता है। उसकी डायरी के कुछ अंश ही उसकी निजी जिंदगी और हाई प्रोफाइल स्टेटस रखने वाली मां इंद्राणी मुखर्जी के बीच के संबंधों को उजागर करते है, जो आइएनएक्स मीडिया की पूर्व सीइओ रह चुकी हैं।
दरअसल, शीना हो या इंद्राणी या फिर अरूषी, ये जिन संस्कारों से पल कर...बल्कि ’पल कर’ कहना गलत होगा, जिस तरह के माहौल से गुजर कर आते है उसका अंजाम कुछ ऐसा ही होता है। जहां अधिकांशत अपने संस्कारों की बलि चढ़ाकर महानगरों की हाई प्रोफाइल सोसाइटी या फिर हाई प्रोफाइल पदों तक पहंुचने का सफर महत्वाकांक्षाओं की सीढ़ी चढ़कर ही पूरा किया जाता है, इसकी परवाह किए बगैर कि उसके लिए क्या देना होगा और कैसे देना होगा।जब आप पैसा, स्टेट्स की अंधी दौड़ में शामिल हो जाते है तो वह किसी भी कीमत पर चाहिए ही होती है। इसके लिए परपंरा संस्कार की गठरी लपेट के बैठना ’आर्थोडाक्स’ सोच जैसा लगता है। ऐसे महत्वाकांक्षी लोगों की सोच तो ये होती है कि अगर आपमें हुनर है, काम के तरीके आते है और आपमें आकर्षण भी है, तो फिर उस लाइन में मत खड़े हों जिसमें पहले से ही कई खड़े अपना भाग्य आजमा रहे है। बेहतर है थोड़ा से अलग हटकर, अपनी मर्जी और किसी का सहारा लेकर उस स्टेटस तक पहुंचे। ये स्टेट्स और पावर के भूखे उस वक्त नींद से जागते है जब इनको अपने किए, अपने बनाए पर पछतावा होता है।
शीना बोरा की हत्या हाई सोसाइटी के लोगों द्वारा किया गया कोई पहला कांड नहींहै। इससे पहले भी कई ऐसी हत्याएं र्हुउ है जिनमें मामले हाई प्रोफाइल लोगो से जुड़े थे। 1999 में दिल्ली के एक नाइट क्लब में मॉडल जेसिका लाल की हत्या का मुख्य आरोपी मनु शर्मा एक राजनैतिक परिवार से ताल्लुक रखता था। मनु शर्मा को 2006 में उम्रकैद की सजा सुनाई जा चुकी है। नोएडा (उत्तर प्रदेश) में 2008 में 14 वर्षीय आरुषि तलवार और उसके नौकर हेमराज की घर में रहस्यमय तरीके से हत्या हुई और यह केस कई सालों तक सुर्खियों में रहा। टीवी एग्जीक्यूटिव नीरज ग्रोवर की 2008 में कन्नड़एक्ट्रेस मारिया सुसाइराज और उसके प्रेमी जेरॉम मैथ्यू ने बेरहमी से हत्या की थी। इस दिल दहला देने वाले क्राइम में मर्डर के बाद शव को कई टुकड़ों में काटा भी गया था। इस सनसनीखेज हत्याकांड के आरोपियों को सजा मिल चुकी है। हिट एंड रन केस का नाम आते ही दो केस दिमाग में आते हैं, जिसमें पहला है अभिनेता सलमान खान और दूसरा दिल्ली के बिजनेसमैन संजीव नंदा का है। साल 1999 में दिल्ली के लोधी रोड इलाके में रहने वाले बिजनेसमैन फैमिली के संजीव नंदा ने सात लोगों को अपनी कार से कुचल दिया था। अंकुर अरोड़ा मर्डर केस, भंवरी देवी मर्डर केस, नानावती मर्डर केस सभी हाई सोसाइटीज से जुड़े थे। इन हत्याओं की पृष्ठभूमि ने उस सोसाइटी के चेहरे से नकाब उतार दिया जिसे हम उच्च संभ्रात समाज के नाम से जानते है।
हालांकि ये हम सभी जानते है कि कोई भी इंसान दुर्गुणों या बुरे कर्मों के साथ पैदा नहीं होता। उसके बचपन से लेकर युवावस्था तक परिस्थितियां कैसी है और कैसे वह उससे बच के या उसमें ढल कर आता है, इस बात पर बहुत कुछ तय होता है। इंद्राणी भी कुछ इसी तरह के माहौल से दो चार होकर ’टाॅप कुर्सी’ तक पहंुची। महत्वाकांक्षाओं की तेज जद में उसने हर उस संबंध को बेमानी समझा जिसमें उसके लिए कुछ नहीं था और ये उसे उसके पिछले अनुभवों ने ही सिखाया। अपने परिवार में जब हम घर के बड़ों को त्याग, सहनशीलता के साथ व्यवहार करते देखते हैं तो कहीं न कहीं हम भी उन संस्कारों का अनुकरण करने को बाध्य होते है। यहीं बाध्यता हमें इंसान बनाती है और संबंधों का मान रखना सिखाती है। ऐसे संस्कार सीखने से नहीं, अहसास से आते है। लेकिन आज के समाज में पैसा, जायदाद, स्वार्थ में फंसे ऐसे कई परिवारों की संख्या बढ़ रही है जिनके लिए इन संस्कारों का कोई मतलब नहीं।ये समस्या बिंदास और खुले विचारों वाली इंद्राणी की ही नहीं उसके जैसे कईयों कीहैं जो तेजी से उस मुकाम तक पहुंचने के लिए अपने जमीर की भी परवाह नहीं करते तो संबधों को कैसे समझेगें। अफसोस तो इस बात का है कि इनकी बढ़ती तादाद जाने अनजाने में हमारे समाज-परिवार को संस्कारहीन और दिखावटी बनाने में सहयोग कर रही है।
आपको मधुर भंडारकर की फिल्म ’पेज थ्री’ अगर याद हो तो आपको उसमें दिखाई गई हाई सोसाइटीज और उनके दोहरे चरित्र भी याद होंगे। इससे बिल्कुल भी अलग नहीं है ये समाज, जो खुलकर ’लाइफ’ का मजा लेता है, किसी भी तरह के बंदिश को नहीं मानता औरशराब- शबाब के बीच अपने व्यवसायिक हितों की क्षतिपूर्ति करता है। एक तरह से कहा जाए तो अपनी मर्जी के हर वो काम करता है जो उसे हर तरह का सुख दे और किसी भी तरह के तनाव से दूर रखें। दूसरों के प्रति पत्थर सी भावनाएं रखने वाले इन लोगों पर जब भावनात्मक प्रहार होता है तो ये बिलबिला उठते हैं। डा0 तलवार हो या इंद्राणी जब अपने पर पड़ी तो जान लेने पर उतारू हो गएं। डा0 तलवार जिस तरह की ’लाइफ’ जीते रहेे उससे उन्होंने अपने ही घर को जलते देखा तो सहन नहीं कर सके। मुझे तो इन पढ़े लिखे समझदार कहे जाने वाले लोगों से बेहतर गांव के वो अनपढ़ गंवार लगते है जो अपने घर को पारंपरिक संस्कारों के साथ चलाते है और एक सभ्य समाज का निर्माण करते हैं।
शीना की हत्या की चाहे कोई भी वजह रही हो, हमें एक सभ्य समाज पर पड़ते इसके असर पर जरूर गौर करना चाहिए। समय कभी पलट कर नहीं आता इसलिए इसके और भयावह होने का ही खतरा अधिक रहता है। हाई सोसाइटीज की उस बनावटी दुनिया में खुद की असलियत छुपाती इंद्राणी आज अपने अतीत के पन्नों के साथ खुली किताब की मानिंद अखबारों और चैनलों में सनसनीखेज खबर के तौर पर परोसी जा रही है। इस हाई प्रोफाइल ड्रामे पर चैनल ही नहीं बालीवुड भी कमाई करने को तैयार है। अरूषी हत्याकांड पर दो दो डायरेक्टर फिल्म बना चुके है एक निर्देशक मनीष गुप्ता तो दूसरी मेघना गुलजार।फिर महेश भट्ट क्यों पीछे रहे उन्होंने शीना हत्याकांड को लेकर मिलती जुलती अपनी फिल्म की स्क्रिप्ट की घोषणा कर दी है। महेश भट्ट हो या फिर रामगोपाल वर्मा, ये सब भी उसी सोसाइटी से आते है जिसमे दूसरों के लिए कोई इमोशन नहीं। भले ही किसी की जान गई हो या कोई अपनी जिंदगी की दुर्गति पर रो रहा हो, इनके लिए वह महज एक स्टोरी प्लाॅट से अधिक कुछ नहीं। ’पेज 3’ कल्चर और स्याह-सफ़ेद जिं़दगी के कड़ुवे सच जब सामने आते है तो हर किसी को उसमें दिलचस्पी होने लगती है। सेक्स, रोमांस और कानपरेन्सी ही कहानी को रोचक बनाती है और फिर वह हाई सोसाइटी से हो तो क्या कहने!