Friday, September 18, 2015

बधाई! तो इस बार भी डेंगू की ही जीत हुई

महज सात साल का था अविनाश। अभी तो उसे पूरी जिंदगी जीनी थी। उसके मां बाप ने उसे लेकर ढेरों सपने सजाए थे, जिसे एक ही रात की काली स्याही से धो डाला गया। मूलचंद, मेडसिटी, साकेत मैक्स और फिर आईरीन, एक के बाद एक अस्पताल के चक्कर काटते मां-बाप की बेचारगी की कल्पना आप कर सकते है जिनके लाल की सांसें उनकी गोद में उखड़ रही हो और कोई अस्पताल उसे लेने को तैयार न होे। अपने इकलौते बेटे की मौत के सदमें ने अविनाश के मां बाप को कुछ ऐसा तोड़ा कि उन्होंने अपनी ही जिंदगी को समाप्त कर देना उचित समझा। इस दर्दनाक सत्य को सुनने और सिस्टम की कमियों को समझने के बाद हमारे अस्पतालों की व्यवस्था में कोई बड़ा भारी परिवर्तन आ गया हो या जाएगा, ऐसा कतई नहीं है। हां, इस सत्य ने जहां डाक्टरों की चरम संवेदनहीनता का नमूना पेश किया वहीं सरकारी व्यवस्था की बखिया को एक बार फिर से उधेड़ दिया।
इस साल जब से डेंगू का अटैक शुरू हुआ है तब से मेरे जानने वाले कुछ लोगों की पूछताछ ने मुझे निरूत्तर कर दिया। उनकी जिज्ञासा महज इतना जानने में थी कि अगर किसी अस्पताल में मेरा कोई खास परिचय हो तो उनके डेंगू पीड़ित संबंधी को अस्पताल में बेड मिल जाए या फिर थोड़ी खास तव्वोजोह दे दी जाए। ये वाकई हैरानी की ही बात है कि सामान्य सी प्रक्रिया के लिए भी कहना-कहलाना ’सिस्टम’ से ’डील’ करने की एक कड़ी बनती जा रही है। इस सत्य से हम सब दो चार हो रहे है है। अविनाश की मौत नहीं होती, अगर उसके पिता किसी नामी गिरामी शख्सियत से नाता रखते होते। लेकिन क्या सिर्फ एक यही वजह है कि अस्पतालों में बेड नहीं दिए जाते क्योंकि वे किसी खास के लिए आरक्षित होते है या फिर खास के कहने पर ही दिए जाते है। अगर ये सत्य है तो यह भी एक बड़ा सच है कि बढ़ती बीमारों की तादाद और बिस्तरों की होती कमी से भी ’सिस्टम’ का हाल बेहाल है।  
जिस देश में बीमारों की तादाद बीमारियों से कहीं अधिक है वहां अस्पतालों की कमी का रोना जारी रहना स्वाभाविक सी बात है। जितने बेड होते है उससे कहीं ज्यादा तो मरीज अस्पताल का रूख करते है। निम्नतर आय वाले हो या कहें मध्य आय वर्ग का आदमी उसके लिए सरकारी अस्पताल का ही एकमात्र सहारा होता है। और जब इस तरह की बीमारी फैलती है तो यही वर्ग सबसे ज्यादा इसके शिकार भी होते है। डेंगू फैलने वाली बीमारी है और इसका शिकार हर वह शख्स जो लापरवाही का शिकार है। अब फिर चाहे इसके लिए वह स्वंय दोषी हो या फिर उसके आसपास का वातावरण या वह व्यवस्था, जिसमें रहने को वह मजबूर है।
डेंगू का आतंक देश में 1996 से बदस्तूर जारी है। भारत के अलावा लैटिन अमेरिकी देश जैसे अर्जेंटीना, मक्सिको, चिली और एशियाई देश जैसे पाकिस्तान भी इसकी गिरफ्त में हैं। अध्ययन के अनुसार डेंगू एक ऐसे मच्छर के काटने पर होता है जिसकी लार में डेंगू के वायरस मौजूद होते हैं। इंसान के जिस्म में पहुंचा डेंगू वायरस सबसे पहले त्वचा में मौजूद प्रतिरोधी कोशिकाओं यानी इम्यून सेल्स को संक्रमित करना आरंभ करता है। इसके बाद वायरस शरीर के लिम्फैटिक सिस्टम में प्रवेश कर जाता है। फिर ये खून की नलिकाओं से होकर मरीज के पूरे शरीर में फैल जाता है इसे वेरेमिया कहते हैं। इस दौरान तेज बुखार आता है, जिसे डेंगू हेमोरैजिक (ीमउवततींहपब, फीवर कहते हैं। इसमें खून की नलियों से रिसाव शुरू हो जाता है और उससे प्लाज्मा की लीकेज शुरू हो जाती है। अगर मच्छर किसी डेंगू के मरीज को काटता है तो उसके खून में मौजूद वायरस अपने साथ लेकर दूसरे स्वस्थ लोगों में फैलाने का काम करता है।
इस जानलेवा बीमारी के बारीकियों को जानते हुए भी इसके प्रति बरती जाती लापरवाही यकीनन अफसोसजनक है। जिस हिसाब से साल दर साल डेंगू के मरीजों की तादाद बढ़ रही है उस हिसाब से अस्पतालों की व्यवस्था में बदलाव या कहें इजाफा नहीं हो पा रहा। सरकारी अस्पतालों में अगर एक बेड पर 3-3 मरीजों को भर्ती किया जा रहा हैं तो प्राइवेट का पूरा हिसाब किताब आपकी हैसियत पर टिका है। अपनी-अपनी चलाते इन अस्पतालों पर सरकारी दबाब तब बनना शुरू होता है जब पानी सिर से ऊपर गुजरने लगता है।
डेंगू की आहट ऐसा नहीं है कि सरकारों को सुनाई नहीं देती लेकिन जब तक कुछ अमानवीय नहीं घट जाता वो भी नहीं जागती। हर बात के लिए हो हल्ला करना तो जैसे आज की जरूरत बनता जा रहा है। जिन जनसुविधा से जुड़ी चीजों के लिए विकसित देशों में सबके लिए सुलभ सुचारू व्यवस्था है, उन चीजों के लिए जुगाड़ के तरीके ढूढ़ने पड़ते है। इस मसले पर दरअसल दोष किसी एक के सिर मढ़ना उचित नहीं। कुछ स्वंय हम तो कुछ इस ’सिस्टम’ को चलाने वाले इसकी जिम्मेदारी लेने से भागते हैं। स्वच्छता का पाठ तो पढ़ना-पढ़ाना चाहते हैं पर उसे लागू नहीं करना चाहते। जानते हुए है कि किन वजहों से ये बीमारियां पनप रही है सफाई को तवज्जो नहीं देना चाहते। जानते है बिना सख्त अनुशासन के ये काम नहीं हो सकता फिर भी कठोर होने से बचते है। महज जबानी जमाखर्च कर अपनी जिम्मेदारी निभा लेना चाहते है।
अनपढ़ गरीब आदमी को डेंगू होता है तो इसका दोष इनकी गंदगी में रहने की आदत को दे दिया जाता है। किसी हैसियत वाले को डेंगू होता है तो इसका दोष सिस्टम की लापरवाही पर मढ़ दिया जाता है। इस दो तरह की सोच में मौत गरीब के ही हिस्से में आती है। पर उन्हें इस गंदगी में रहने को मजबूर करता कौन है? हमारी व्यवस्था ही कुछ ऐसी बनी है कि उनके इलाकों में सफाई जरूरी नहीं समझी जाती। अनपढ़ गरीब आदमी भी सफाई पसंद होता है या साफ वातावरण में रहना चाहता है। अगर ऐसा न होता तो तो जो आदमी सड़क पर थूकता चलता है वह आलीशान माॅल या फिर मेट्रो स्टेशनों में क्यों गंदगी फैलाने से बाज आता है। वजह साफ है। वहां के नियम, चमक-दमक और चकाचैंध ऐसा करने से उन्हें रोकती है। गंदगी को भी किसी नजरिए से देखने की जिम्मेदारी अगर किसी की है तो वह है सिर्फ और सिर्फ नगर निगम या उन्हें चलाने वाले सिस्टम की है। जो स्वंय तो ढंग से काम नहीं करते और न ही सख्त नियमों का पालन करवाते है। इन्हें ख्याल है तो सिर्फ उन इलाकों का जिनमें वीवीआई पी रहते हैं। आखिर क्यों केवल इन्हीं इलाकों को साफ रखने में सारी सेना लगा दी जाती है, जबकि स्लम एरियाज में कोई कूड़ा उठाने तक नहीं जाता। दरअसल नगर निगमों का काम भी इलाके और व्यक्ति की पहुंच के हिसाब से आरंभ और खत्म होता है।
गरीब होना गुनाह है, ये गलत नहीं कहा जाता। संभवतः यही कारण है कि सस्ते या मुफ्त इलाज के चक्कर में गरीबों को मौत को गले लगाना पड़ता है। अस्पताल की सुविधाएं भी उन्हें ही सहज उपलब्ध है जिनके पास पैसा है, या वे वीआईपी श्रेणी में आते हैं या फिर उनके करीबी है। तभी तो अस्पताल अथाॅरिटीज किसी बेफिजूल इंसान का वेंटिलेटर निकाल कर उसे लगाने में देर नहीं करती जो स्वंय उसके लिए बहुत महत्वपूर्ण हो। अस्पतालों में अगर आप कभी जनरल वार्ड की तरफ या इमरजेंसी की तरफ भूले से चले जाएं तो मैले कुचैले कपड़ों में लिपटे लोग आपको डाक्टर भी नहीं, उनके असिस्टेंट या ट्रेनी डाक्टर से करबद्ध याचना करते मिल जाएंगे। उनकी बेबस आंखें कभी अपनी मरीज को तो कभी उस धरती के देवता को याचना से निहारती मिलती हैं जो उसकी ओर देख भी नहीं रहा।
बीमारी हो, आपदा हो या फिर आए दिन की समस्याएं इस देश के जिम्मेदार अपनी जिम्मेदारी से भागते फिरते है। अपना ठीकरा दूसरे के सिर फोड़ देना, दूसरे का तीसरे, तीसरे का चैथे के सिर मढ़ देना आम कवायद है। ये भी क्या कम मजाक की बात है कि डेंगू का भी राजनीतिकरण कर दिया जाए। अंसवेदनशीलता का आलम यह है कि सोच सिर्फ “मैं“ तक सीमित होती जा रही है। अगर व्यवस्था मेरे लिए अनुकूल है तो सब ठीक है। यही वजह है कि डाक्टर हो या अस्पताल किसी नोटिस या किसी धमकी से नहीं डरते, चूंकि वे भी अच्छी तरह से जानते है कि नोटिस पकड़ाने वालों को भी उनकी आवश्यकता पड़ती रहती है। मामले को “एडजस्ट“ कर लेने की कूवत सख़्त क़ानून को भी काग़जों तक ही सीमित कर देती है।







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