नीतीश कुमार बिहार के विकास को लेकर ’आत्मविश्वास’ से लबरेज नजर आ रहे है तभी तो उन्होंने एक चैनल के कार्यक्रम के दौरान बिहार के विकास पर लंबा तर्क दे डाला ये पूछते हुए कि कौन कहता है बिहार में विकास नहीं हो रहा?े इस तरह के आत्मविश्वास का प्रदर्शन करना अच्छी बात है और तब तो और अधिक अच्छी बात है जबकि आप किसी राज्य या देश के मुखिया हों। आपने काम किया है तो उसे जग जाहिर करने का भी आपको पूरा हक है। लेकिन नीतीष जी का आत्मविश्वास मुझे उनका ’ओवर कांफिडेंस’ ज्यादा लग रहा था। जबकि बिहार की वस्तुस्थिति हम सब के सामने है। अपने किए के कसीदे पढ़ना या फिर न दिखने वाले विकास को बढ़-चढ़ कर बताना राजनीति का एक आजमाया हुआ ’फंडा’ तो हो सकता है पर सच्चाई नहीं। सच तो ये है कि जमीनी हकीकत कुछ भी हो ये सत्तासीन लोग, क्या दिखा लेते है या क्या समझा लेते हैं इसी पर इनकी सारी काबिलियत टिकी है। जहां तक मतदाता का सवाल है उसे लुभाने के लिए दो काम भी कर दिये या फिर कुछ और वादे कर दिए तो हो गया इनका काम और फिर बिहार के विकास को लेकर बिहार की जनता उतनी परेशान नहीं दिखती जितने चितिंत विपक्षी नजर आ रहे हैै।
इसीलिए मुख्यमंत्री नीतीश कुमार आजकल ’बढ़ चला बिहार’ के साथ अपने कार्यकाल की उपलब्धियां गिनाकर मतदाताओं के बहाने विपक्षियों को जबाव देने में लगे है जैसे कि बिहार में शिक्षा की अनेक योजनाएं शुरू की गईं, लड़कियों को स्कूल भेजने के लिए साइकिल योजना आरंभ की गई, स्कूलों में लड़कों व लड़कियों की संख्या लगभग बराबर हो चुकी है, स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी हालात बदल गए हैं, मानव विकास पर ध्यान दिया जा रहा है, शिशु मृत्यु व मातृ मृत्यु दर घट गए, पोलियो का उन्मूलन हुआ, टीकाकरण में हम राष्ट्रीय औसत से भी आगे निकल गए हैं वगैरह वगैरह। चुनाव से पहले विकास के दावे करना और विपक्षियों द्वारा लगाए आरोप का उन्हीं की जुबान में जबाव देना कोई नई बात नहीं है। अपना बखान करते हुए अपनी जीत दर्ज करने के लिए कुछ और वादे करना भी पुराना चुनावी हथकंडा है जिसे नीतीश कुमार भी आजमा रहे है। तभी तो कल्याणपुर में सीएम नीतीश कुमार अपनी चुनावी जनसभा को संबोधित करते हुए कह रहे है कि वे हर जिले में हर युवा को दो भाषा हिंदी व अंगरेजी सिखाने का प्रबंध करेंगे, ताकि उसे रोजगार में दिक्कत नहीं हो। वे दावा कर रहे है कि उनका शासन फिर से आने से युवाओं के जीवन में नया उजाला आयेगा। हर जिले में कौशल विकास केंद्र खोलेंगे और वहां रजिस्ट्रेशन होगा, ताकि हमारे युवा स्वरोजगार कर सकें।
युवाओं को रिझाने के पीछे नीतीश की मंशा भले ही विपक्षियों के हथियारों को कमजोर करने की हो लेकिन वे उस हकीकत से कतई अनजान नहीं हो सकते जिसे ’बेरोजगारी’ कहते है और जो बिहार के युवा का सबसे बड़ा मसला है। इस मुत्तालिक श्रम मंत्रालय के आंकड़ों पर एक नजर डालें तो पता चलता है कि अगर देश में 15 से 17 वर्ष के 17 प्रतिषत बेरोजगार है तो अकेले बिहार में इस उम्र के 31 प्रतिशत बेरोजगार हैं। 18-31 वर्ष के बेरोजगारों की संख्या यदि देष में 13 प्रतिशत है तो बिहार में इनकी संख्या 17 प्रतिशत है। मसलन बिहार के लगभग 10.4 करोड़ युवाओं में से 48 प्रतिशत के आगे बेरोजगारी की समस्या मुह बाएं खड़ी है। श्रम मंत्रालय के अनुसार विभिन्न पेषों में यहां अगर किसी रोजगार में युवाओं की दिलचस्पी है तो वह खेती है। इसलिए सबसे अधिक रोजगार के अवसर कृषि में (45.2 प्रतिशत) है, बाकी व्यवसायों जैसे कंस्ट्रक्शन (20.1 प्रतिषत), व्यापार (11.8 प्रतिषत), मैन्यूफैक्चरिंग (10.60 प्रतिषत) और शिक्षा (8.4 प्रतिषत) भर ही रोजगार हैं।
इन आकड़ों को देखने के बाद आप या तो बिहार में विकास का दावा कर रहे नीतीश पर गलतबयानी का आरोप लगा सकते है या फिर उन आंकडों को गलत कह सकते हैं जिनके द्वारा बिहार की असलियत दिखाने की कोशिश की गई है। कुछ और आंकड़े है जो बिहार की जमीनी हकीकत दिखा रहे है। एनुवेल सर्वे आॅफ इंडस्ट्रीज की 2013 की रिर्पोट के हवाले से किए गए सर्वेक्षण के अनुसार बिहार में कुल 3345 उद्योग है जो देष भर का मात्र 1.5 फीसद भर है। शिक्षा के नजरिए से नीतीश राज की साक्षरता दर अफ्रीकी देशों जैसे मलावी, कांगो और सूडान से भी बुरी है। वर्ष 2011 की जनगणना के मुताबिक भारत में सबसे कम साक्षरता दर बिहार की है। इस जनगणना के मुताबिक बिहार के 64 फीसदी लोग यानी 10 करोड़ 40 लाख लोग निरक्षर हैं। गरीब राज्यों में बिहार में शिक्षा की स्थिति वाकई चिंताजनक है। यूडीआईएसई (सेकेंड्री) के अनुसार 2013-14 में हाईस्कूल में दाखिला लेने वाले बच्चों का प्रतिशत 60 प्रतिशत रहा जिसमें 2012-13 के मुकाबले महज 15 प्रतिशत बढ़ा।
नीतीश बिहार को ’जंगलराज 2’ कहने पर घोर आपत्ति करते है। वे इसके बजाय बिहार में हो रहे विकास पर ध्यान देने को कहते है। लेकिन गंभीर अपराध के मामले बिहार में इतने है कि विकास नजर ही नहीं आता। इस मामले में बिहार का दर्जा उत्तर प्रदेश के बाद आता है और इस हकीकत से वे नावाकिफ तो नहीं हो सकते। नेषनल क्राइम रिकार्ड्स ब्यूरो के 2013 के आंकड़ों के हिसाब से 30213 मामले गंभीर अपराध के नाम पर दर्ज है। इसी वर्ष में 3441 मामले सिर्फ हत्या के ही दर्ज हुए है। 2013 में ही महिलाओं के खिलाफ हुए अपराध में ही 13609 मामले दर्ज हुए है।
इन सर्वे रिर्पोट्स में षिुषु मृत्यु दर और प्रसव के समय होने वाली महिलाओं की मृत्यु दर में आती कमी की रिर्पोट ही जरूर बिहार के मुख्यमंत्री को मुस्कुराने की वजह दे सकती है अन्यथा आर्थिक दृष्टि से पिछड़ रहे बिहार की हालत कतई अच्छी नहीं कही जा सकती। आर्थिक सर्वेक्षण के आंकड़ों के अनुसार अगर देश में प्रति व्यक्ति आय 80,388 है तो बिहार में ये प्रति व्यक्ति 31,229 है। यानी देश के मुकाबले सूबे की प्रति व्यक्ति आय 40 फीसदी से भी कम है। छत्तीसगढ़, झारख्ंाड के बाद गरीबी में बिहार का नंबर तीसरा है। इंडियास्पेंड की रिसर्च को अगर ठीक से खंगाला जाए तो ऐसे कई और कई मुद्दे है जो बिहार की वस्तुस्थिति को सामने रखते है और नीतीश राज की पोल खोलते हैं। बिहार की हर नब्ज से वाकिफ नीतीश कुमार मतदाताओं और विपक्षियों के आगे तो बिहार में होते बदलाव और विकास की बात करते है वहीं दूसरी ओर केंद्र से बिहार को विशेष राज्य का दर्जे दिए जाने की मांग को लेकर बिहार बंद, अनशन आदि भी करते हैं। इस संबंध में भाजपा से शिकायत भी कर चुके हैं कि कांग्रेस के साथ सीमांध्र को विशेष दर्जा दिलाते वक्त भाजपा ने बिहार को क्यों याद नहीं रहा?
इन आंकड़ों पर नजर डालने के बाद तो नीतीश कुमार के ’अति आत्मविश्वास’ पर अफसोस ही होता है। आपके किए कार्यों का गुणगान दूसरे करें तो एक बात है लेकिन आप ही जब उनका बढ़ चढ़ कर बखान करने लगे वह भी तब जबकि जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां करती हो। अफसोस होता है ये देखकर कि सत्ता में बने रहने की चाह ने नीतीश कुमार को भी नहीं बख्शा। ये वही नीतीश कुमार है जो लालू राज का खात्मा कर जब सत्ता में आए तो बिहार ही नहीं देश में हर किसी ने उनका दिल से स्वागत किया था। उस वक्त हर किसी को लगा था कि बिहार की किस्मत अब बदल जाएगी। बिहार की किस्मत तो नहीं बदली हां नीतीश कुमार के विचारों में जरूर भारी बदलाव आ गया, जिसके नमूने वे कई मर्तबा पेश कर चुके हैं। फिर भी इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि आंकड़ों की नजर से अगर लालूराज के आंकड़ों को देखें तो मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के कार्यकाल में बिहार में विकास दर कुछ सुधरा है। लेकिन विकास दर में सुधार के बावजूद बिहार कई मामलों में अब भी अन्य राज्यों की तुलना में सबसे निचले पायदान पर ही नजर आता है।
बिहार में विधानसभा की कुल 243 सीटें हैं जो 38 जिलों में फैली हुई हैं। कुल क्षेत्रफल 94,163 वर्ग किलोमीटर और 2011 की जनगणना के मुताबिक कुल आबादी 10.38 करोड़, जो संख्या के हिसाब से उसे देश का तीसरा सबसे बड़ा राज्य बनाती है। आबादी में फिलीपिंस की आबादी के बराबर के बिहार को नीतीश कुमार के राजकाज संभालने के बाद कुछ गति अवष्य मिली, लेकिन बेरोजगारी और गरीबी के मामले में देखा जाए तो राज्य अब भी पिछड़ा है। यहीं कारण है कि विपक्षी जब-जब वार करता है तब-तब बिहार के अति पिछड़े होने पर ही चोट करता है। ’बढ़ चला बिहार’ की हकीकत को वहां रहने वाले लोगों से बेहतर कौन समझ सकता है।
हालांकि बिहार के चुनाव की एक अदद सच्चाई यह भी है कि यहां विकास के नाम पर नहीं जाति के नाम पर वोट अधिक पड़ते है। असाक्षरता का इस तरह का आलम भी कभी कभी इन नेताओं के लिए वरदान साबित हो जाता है। सोशल मीडिया पर आजकल एक चुटकुला खूब चल रहा है कि बिहारी वर्णमाला को इस हिसाब से देखते है। उनके लिए ’सी’ (कास्ट) पहले आता है और ’डी’ (डेवलेपमेन्ट) बाद में। हमेषा की तरह इस बार भी बिहार चुनाव में तीन ’सी’ (केन्डीडेेट, कास्ट और कांसिटयून्सी ) ही मुख्य फैक्टर है। अब विरोधी भले ही विकास-विकास चिल्लाता रहे, मतदाताओं की ऐसी सोच के चलते नीतीश इस मामले में राहत की सांस तो ले ही सकते है।
इसीलिए मुख्यमंत्री नीतीश कुमार आजकल ’बढ़ चला बिहार’ के साथ अपने कार्यकाल की उपलब्धियां गिनाकर मतदाताओं के बहाने विपक्षियों को जबाव देने में लगे है जैसे कि बिहार में शिक्षा की अनेक योजनाएं शुरू की गईं, लड़कियों को स्कूल भेजने के लिए साइकिल योजना आरंभ की गई, स्कूलों में लड़कों व लड़कियों की संख्या लगभग बराबर हो चुकी है, स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी हालात बदल गए हैं, मानव विकास पर ध्यान दिया जा रहा है, शिशु मृत्यु व मातृ मृत्यु दर घट गए, पोलियो का उन्मूलन हुआ, टीकाकरण में हम राष्ट्रीय औसत से भी आगे निकल गए हैं वगैरह वगैरह। चुनाव से पहले विकास के दावे करना और विपक्षियों द्वारा लगाए आरोप का उन्हीं की जुबान में जबाव देना कोई नई बात नहीं है। अपना बखान करते हुए अपनी जीत दर्ज करने के लिए कुछ और वादे करना भी पुराना चुनावी हथकंडा है जिसे नीतीश कुमार भी आजमा रहे है। तभी तो कल्याणपुर में सीएम नीतीश कुमार अपनी चुनावी जनसभा को संबोधित करते हुए कह रहे है कि वे हर जिले में हर युवा को दो भाषा हिंदी व अंगरेजी सिखाने का प्रबंध करेंगे, ताकि उसे रोजगार में दिक्कत नहीं हो। वे दावा कर रहे है कि उनका शासन फिर से आने से युवाओं के जीवन में नया उजाला आयेगा। हर जिले में कौशल विकास केंद्र खोलेंगे और वहां रजिस्ट्रेशन होगा, ताकि हमारे युवा स्वरोजगार कर सकें।
युवाओं को रिझाने के पीछे नीतीश की मंशा भले ही विपक्षियों के हथियारों को कमजोर करने की हो लेकिन वे उस हकीकत से कतई अनजान नहीं हो सकते जिसे ’बेरोजगारी’ कहते है और जो बिहार के युवा का सबसे बड़ा मसला है। इस मुत्तालिक श्रम मंत्रालय के आंकड़ों पर एक नजर डालें तो पता चलता है कि अगर देश में 15 से 17 वर्ष के 17 प्रतिषत बेरोजगार है तो अकेले बिहार में इस उम्र के 31 प्रतिशत बेरोजगार हैं। 18-31 वर्ष के बेरोजगारों की संख्या यदि देष में 13 प्रतिशत है तो बिहार में इनकी संख्या 17 प्रतिशत है। मसलन बिहार के लगभग 10.4 करोड़ युवाओं में से 48 प्रतिशत के आगे बेरोजगारी की समस्या मुह बाएं खड़ी है। श्रम मंत्रालय के अनुसार विभिन्न पेषों में यहां अगर किसी रोजगार में युवाओं की दिलचस्पी है तो वह खेती है। इसलिए सबसे अधिक रोजगार के अवसर कृषि में (45.2 प्रतिशत) है, बाकी व्यवसायों जैसे कंस्ट्रक्शन (20.1 प्रतिषत), व्यापार (11.8 प्रतिषत), मैन्यूफैक्चरिंग (10.60 प्रतिषत) और शिक्षा (8.4 प्रतिषत) भर ही रोजगार हैं।
इन आकड़ों को देखने के बाद आप या तो बिहार में विकास का दावा कर रहे नीतीश पर गलतबयानी का आरोप लगा सकते है या फिर उन आंकडों को गलत कह सकते हैं जिनके द्वारा बिहार की असलियत दिखाने की कोशिश की गई है। कुछ और आंकड़े है जो बिहार की जमीनी हकीकत दिखा रहे है। एनुवेल सर्वे आॅफ इंडस्ट्रीज की 2013 की रिर्पोट के हवाले से किए गए सर्वेक्षण के अनुसार बिहार में कुल 3345 उद्योग है जो देष भर का मात्र 1.5 फीसद भर है। शिक्षा के नजरिए से नीतीश राज की साक्षरता दर अफ्रीकी देशों जैसे मलावी, कांगो और सूडान से भी बुरी है। वर्ष 2011 की जनगणना के मुताबिक भारत में सबसे कम साक्षरता दर बिहार की है। इस जनगणना के मुताबिक बिहार के 64 फीसदी लोग यानी 10 करोड़ 40 लाख लोग निरक्षर हैं। गरीब राज्यों में बिहार में शिक्षा की स्थिति वाकई चिंताजनक है। यूडीआईएसई (सेकेंड्री) के अनुसार 2013-14 में हाईस्कूल में दाखिला लेने वाले बच्चों का प्रतिशत 60 प्रतिशत रहा जिसमें 2012-13 के मुकाबले महज 15 प्रतिशत बढ़ा।
नीतीश बिहार को ’जंगलराज 2’ कहने पर घोर आपत्ति करते है। वे इसके बजाय बिहार में हो रहे विकास पर ध्यान देने को कहते है। लेकिन गंभीर अपराध के मामले बिहार में इतने है कि विकास नजर ही नहीं आता। इस मामले में बिहार का दर्जा उत्तर प्रदेश के बाद आता है और इस हकीकत से वे नावाकिफ तो नहीं हो सकते। नेषनल क्राइम रिकार्ड्स ब्यूरो के 2013 के आंकड़ों के हिसाब से 30213 मामले गंभीर अपराध के नाम पर दर्ज है। इसी वर्ष में 3441 मामले सिर्फ हत्या के ही दर्ज हुए है। 2013 में ही महिलाओं के खिलाफ हुए अपराध में ही 13609 मामले दर्ज हुए है।
इन सर्वे रिर्पोट्स में षिुषु मृत्यु दर और प्रसव के समय होने वाली महिलाओं की मृत्यु दर में आती कमी की रिर्पोट ही जरूर बिहार के मुख्यमंत्री को मुस्कुराने की वजह दे सकती है अन्यथा आर्थिक दृष्टि से पिछड़ रहे बिहार की हालत कतई अच्छी नहीं कही जा सकती। आर्थिक सर्वेक्षण के आंकड़ों के अनुसार अगर देश में प्रति व्यक्ति आय 80,388 है तो बिहार में ये प्रति व्यक्ति 31,229 है। यानी देश के मुकाबले सूबे की प्रति व्यक्ति आय 40 फीसदी से भी कम है। छत्तीसगढ़, झारख्ंाड के बाद गरीबी में बिहार का नंबर तीसरा है। इंडियास्पेंड की रिसर्च को अगर ठीक से खंगाला जाए तो ऐसे कई और कई मुद्दे है जो बिहार की वस्तुस्थिति को सामने रखते है और नीतीश राज की पोल खोलते हैं। बिहार की हर नब्ज से वाकिफ नीतीश कुमार मतदाताओं और विपक्षियों के आगे तो बिहार में होते बदलाव और विकास की बात करते है वहीं दूसरी ओर केंद्र से बिहार को विशेष राज्य का दर्जे दिए जाने की मांग को लेकर बिहार बंद, अनशन आदि भी करते हैं। इस संबंध में भाजपा से शिकायत भी कर चुके हैं कि कांग्रेस के साथ सीमांध्र को विशेष दर्जा दिलाते वक्त भाजपा ने बिहार को क्यों याद नहीं रहा?
इन आंकड़ों पर नजर डालने के बाद तो नीतीश कुमार के ’अति आत्मविश्वास’ पर अफसोस ही होता है। आपके किए कार्यों का गुणगान दूसरे करें तो एक बात है लेकिन आप ही जब उनका बढ़ चढ़ कर बखान करने लगे वह भी तब जबकि जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां करती हो। अफसोस होता है ये देखकर कि सत्ता में बने रहने की चाह ने नीतीश कुमार को भी नहीं बख्शा। ये वही नीतीश कुमार है जो लालू राज का खात्मा कर जब सत्ता में आए तो बिहार ही नहीं देश में हर किसी ने उनका दिल से स्वागत किया था। उस वक्त हर किसी को लगा था कि बिहार की किस्मत अब बदल जाएगी। बिहार की किस्मत तो नहीं बदली हां नीतीश कुमार के विचारों में जरूर भारी बदलाव आ गया, जिसके नमूने वे कई मर्तबा पेश कर चुके हैं। फिर भी इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि आंकड़ों की नजर से अगर लालूराज के आंकड़ों को देखें तो मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के कार्यकाल में बिहार में विकास दर कुछ सुधरा है। लेकिन विकास दर में सुधार के बावजूद बिहार कई मामलों में अब भी अन्य राज्यों की तुलना में सबसे निचले पायदान पर ही नजर आता है।
बिहार में विधानसभा की कुल 243 सीटें हैं जो 38 जिलों में फैली हुई हैं। कुल क्षेत्रफल 94,163 वर्ग किलोमीटर और 2011 की जनगणना के मुताबिक कुल आबादी 10.38 करोड़, जो संख्या के हिसाब से उसे देश का तीसरा सबसे बड़ा राज्य बनाती है। आबादी में फिलीपिंस की आबादी के बराबर के बिहार को नीतीश कुमार के राजकाज संभालने के बाद कुछ गति अवष्य मिली, लेकिन बेरोजगारी और गरीबी के मामले में देखा जाए तो राज्य अब भी पिछड़ा है। यहीं कारण है कि विपक्षी जब-जब वार करता है तब-तब बिहार के अति पिछड़े होने पर ही चोट करता है। ’बढ़ चला बिहार’ की हकीकत को वहां रहने वाले लोगों से बेहतर कौन समझ सकता है।
हालांकि बिहार के चुनाव की एक अदद सच्चाई यह भी है कि यहां विकास के नाम पर नहीं जाति के नाम पर वोट अधिक पड़ते है। असाक्षरता का इस तरह का आलम भी कभी कभी इन नेताओं के लिए वरदान साबित हो जाता है। सोशल मीडिया पर आजकल एक चुटकुला खूब चल रहा है कि बिहारी वर्णमाला को इस हिसाब से देखते है। उनके लिए ’सी’ (कास्ट) पहले आता है और ’डी’ (डेवलेपमेन्ट) बाद में। हमेषा की तरह इस बार भी बिहार चुनाव में तीन ’सी’ (केन्डीडेेट, कास्ट और कांसिटयून्सी ) ही मुख्य फैक्टर है। अब विरोधी भले ही विकास-विकास चिल्लाता रहे, मतदाताओं की ऐसी सोच के चलते नीतीश इस मामले में राहत की सांस तो ले ही सकते है।
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