Saturday, October 3, 2015

कश्मीर का राग अलापना छोड़ दें आप मियां नवाज शरीफ साहब!

वाल्डोर्फ एस्टोरिया होटल में एक संवाददाता सम्मेलन के दौरान जब प्रधानमंत्री मियां नवाज शरीफ ने पाकिस्तान के आंतरिक मामलों में भारतीय हस्तक्षेप और भारत द्वारा पाकिस्तान की धरती पर आतंकवाद भड़काने संबंधी फाइल को जल्द ही कि उस संयुक्त राष्ट्र के महासचिव को सौंप दिए जाने की बात जब कही तब मैंने अपनी याददाश्त के साथ जोर आजमाईश कर ये याद करने की कोशिश की कि भारत ने कब और कौन सा ऐसा आतंकवादी हमला पाकिस्तान की जमीन पर कियाकी फाइल पाकिस्तान तैयार किए बैठा हैै? इस फाइल की जानकारी देने के बाद उनका ये कहना तो और भी चैंकाने वाला था कि पाकिस्तान शांतिपूर्ण पड़ोसी के संबंधों के लिए उत्सुक है, जबकि उनके ’अशांतिपूर्ण’ रवैये का गवाह अमेरिका, संयुक्त राष्ट्र से लेकर उनका हमजोली चीन भी है।
पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ जब 2014 में नरेन्द्र मोदी के शपथग्रहण समारोह में भारत आए तो उनके व्यवहार से एकबारगी ऐसा लगा कि हो न हो ये दो कद्दावर नेता इस बार किसी नतीजे पर जरूर पहुंचेगे।। उपहारों के आदान-प्रदान ने दोनों देशों के बीच फैले तनाव भरे माहौल को नरम भी किया लेकिन जल्द ही इस बात का यकीन भी दिला दिया कि ये तो महज औपचारिकताएं थी जो निभाई जा रही थीं, अन्यथा परिस्थितियां वैसी ही है जैसी थी। धीरे-धीरे पाकिस्तानी प्रधानमंत्री के बदलते सुरों ने इस बात का भी यकीन दिला दिया कि कठपुतली सरकार चला रहे नवाज शरीफ सेना के दबदबे के आगे लाचार है। इसी दबाव के चलते पाकिस्तानी प्रधानमंत्री अन्तर्राष्ट्रीय मंचों पर अक्सर कश्मीर राग अलापते मिल जाएंगें। बरसों से अलापे जा रहे इस राग का आज भी कोई सुनने वाला नहीं ये जानते हुए भी पाकिस्तान पड़ोसी मसलों को विश्व मंचों पर रखने से बाज नहीं आता। सोच का फ्रर्क देखिये जहां भारत का प्रधानमंत्री ऐसे मंचों का उपयोग आतंकवाद के खिलाफ एक होकर लड़ने के लिए करता है और अपने समय का पूरा सदुपयोग कर देश हित के लिए लोगों से मिलता है तो वहीं पाकिस्तान का प्रधानमंत्री अपना रोना रोकर स्थानीय पाकिस्तानी रेस्ट्रोरेन्टों का मजा लेने चला जाता है। ऐसा लगता है जैसे इस तरह के मंच का उपयोग वे मात्र ’उन’ घरेलू लोगों को संतुष्ट करने के लिए करते है जो गाहे बगाहे इस मसले पर उनकी नीयत पर शक करने लगते है। इसलिए इस बार के यूएन समिट में इस मुद्दे को उठाते हुए उन्होंने न केवल कश्मीर की मांग को दोबारा उठाया वरन् ’शांतिदूत’ का नकाब ओढ़ दोनों मुल्कों में शांति के लिए चार सूत्र भी बता दिए, जिसके जबाव में भारत की विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने उन्हें चार की जगह सिर्फ एक सूत्र पर ही ध्यान देने को कहा और वह यह है कि आतंकवाद छोड़िए और बैठकर बातचीत कीजिए।
कश्मीर और उससे जुड़े ढेरों तथ्यों के बीच एक बात सौ फीसद सही है कि न भारत उसको अपना अभिन्न अंग मानना छोड़ेगा और ना पाकिस्तान इस बात को मानने को तैयार होगा कि कश्मीर भारत का है। यूं कह लें कि कश्मीर का मामला दिमाग से नहीं सीधे दिल से जुड़ा हुआ है। और दिल पर किसकी हुकुमत चली है। दरअसल कुछ मसले ऐसे होते है जिन पर देशों के सियासतदार भी फैसला करने से डरते है। इसके उदाहरण भी मिल जाते हंै। कुछ दिनों पहले मैंने सोशल मीडिया की एक साइट पर पढ़ा था कि सरदार वल्लभभाई पटेल कश्मीर को पाकिस्तान को दे देना चाहते थे, जबकि पंडित जवाहरलाल नेहरू कश्मीरी होने के नाते कश्मीर को भारत के साथ रखना चाहते थे। यह बात पत्रकार कुलदीप नैय्यर की जीवनी से उद्धृत कर पोस्ट की गई थी। अब साठ-सत्तर साल पहले की इन बातों को पूरी प्रामाणिकता के साथ खंगालना आसान काम नहीं है। कुछ लोग महाराजा हरीसिंह को दोष देते है जिन्होंने भारत के साथ विलय के दस्तावेजों पर सहर्ष हस्ताक्षर कर दिए थे। आपको जानकर हैरानी होगी कि जिस कश्मीर को लेकर इतनी हाय तौबा मची है वह आठ-नौ सौ साल पहले एक हिंदू बहुल भूभाग था। इस धरती के पूर्वज (शैव धर्म के अनुयायी) हिंदू थे। बाद में हुए धर्मांतरण ने घाटी में हिंदुओं को अल्पसंख्यक बना दिया, जबकि असल में कश्मीर में हिंदू बहुसंख्यक थे। अब हिंदू बहुसंख्यक हो या मुस्लिम अल्पसंख्यक, सियासत के खेल में, रचे गए कुचक्र में आज कश्मीर दोनों देशों के बीच जातीय दुश्मनी का सबसे बड़ा कारण बन गया है।
एक विदेशी अखबार के संपादकीय में मैंने पढ़ा था कि उन्होंने शरीफ को व्यवहारिक पक्षों को समझकर कश्मीर समस्या के हल के लिए आगे बढ़ने की नसीहत दी थी और ये तक कहा कि उसकी इस कोशिश में साथ देने को भारत सदैव तैयार दिखेगा। दुनिया में कितने उदाहरण ऐसे मिल जाएंगें, जहाँ वर्षो से चली आ रही व्यापक समस्याओं का समाधान बातचीत से ही निकला। लेकिन पाकिस्तान में सत्ता परिवर्तन के बावजूद उम्मीद की कोई किरण कभी नजर नहीं आई। जिस तरह से पाकिस्तान सीजफायर का उल्लधंन करता है वह किसी सभ्य पड़ोसी का सभ्य व्यवहार नहीं कहा जा सकता। सदा से भारत पर किए जाते पाकिस्तान समर्थित आतंकवादियों के हमलों की अनदेखी करना और भारत की ओर से पेश किए जाते सबूतों को मानने से इंकार करना पाकिस्तान की हठधर्मिता का सबसे बड़ा सबूत है। 27 जुलाई को सेना की वर्दी में कपड़े पहने बंदूकधारियों ने पाकिस्तान के साथ सीमा के पास एक भारतीय पुलिस स्टेशन पर हमला किया और जिसमें कम से कम नौ लोग मारे गए थे। इस तरह की बेजा हरकतों को रोकने के बजाय पाकिस्तानी प्रधानमंत्री भारत पर ही उल्टा आतंकवाद फैलाने का ठीकरा फोड़ रहे है।
बेहतर होगा पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इस बात पर गौर फरमाएं कि सिर्फ कश्मीर मुद्दे को उछालते रहने से न तो उनका भला होने वाला है और न ही पाकिस्तान को ही कुछ मिलने वाला है। अफसोस होता है इस बात पर कि ब्रिटिश औपनिवेशिक साम्राज्य के विभाजन में बने पाकिस्तान को 60 से अधिक वर्ष हो रहे है किंतु आज भी कश्मीर विवाद को लेकर उसका अड़ियल रुख नहीं बदलता। इस मुद्दे पर कई मर्तबा निर्णायक समझौते की स्थिति आते-आते रह गई और इसकी वजह अधिकाशतः पाकिस्तान के भीतर राज करते लोग रहे है। फिर भी इस मामले में बातचीत का पहल का रास्ता भारत ने खुला रहा जबकि पाकिस्तान इस मुद्दे के समाधान की दिशा में किसी सकारात्मक पहल की तरफ बढ़ने से बाज आता रहता है। आज स्थ्तिि ये है कि उसकी कथनी और करनी की पोल दुनिया के सामने खुली पड़ी है और इसका सबसे बड़ा उदाहरण लादेन है। लादेन को पाकिस्तान में सेना की मदद से महफूज रहने की उसकी करतूत ने अमरीका की नजरों में उसका भरोसा खत्म कर दिया। संयुक्त अरब अमीरात, जो कि पाकिस्तान का प्रबल समर्थक रहा है, ने गत दिनों भारत के प्रधानमंत्री के संयुक्त अरब अमीरात के दौरे के अवसर पर भविष्य में भारत के साथ घनिष्ठ संबंधों को तवोज्जोह देने के अपने मंसूबों को तब जाहिर कर दिया जब एक संयुक्त बयान के जरिए भारत और अमीरात ने आतंकवाद का औचित्य साबित करने के लिए धर्म के प्रयोग की निंदा की और आतंकवाद का मिलकर मुकाबला करने में आपस में पूर्ण सहयोग का वादा किया। एक के बाद एक झटके खता पाकिस्तान अब अपने लिए नये रहनुमाओं को खोजता फिर रहा है। संयुक्त राष्ट्रसंघ के मंच से उनकी पीड़ा को कितनों ने सुना इस बात से हम आप सब वाकिफ है। चीन से उसकी करीबी जगजाहिर है अब अमेरिका के घोर विरोधी रूस को भी वह अपना बना लेने की कवायद में जुटा है। 
पाकिस्तान हो या उसके सिपहसलाहकार भारत की तरक्की उन्हें फांस की तरह चुभती है। ब्रिटिशराज के खात्मे के साथ एक ही वक्त में फिर से विकास का रास्ता पकड़ने में पाकिस्तान कहीं पीछे छूट गया और भारत आगे बढ़ गया। इसलिए किसी तरह भारत में अस्थिरता बनाए रखना ही उसने अपना मकसद बना लिया है। वरना ऐसा क्या है कि दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक जुड़ाव में बेइंतहाई जुड़ाव होने के बाद भी सियासतदारों के दिल इतने तल्ख़ है। इस मुत्तालिक़ फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ साहब का एक शेर याद आ रहा है- 

इक तर्ज़-ए-तग़ाफ़ुल है सो वो उनको मुबारक़
इक अर्ज़-ए-तमन्ना है सो हम करते रहेगें     (तग़ाफ़ुल-बेपरवाही)





2 comments:

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  2. खुशनसीब हो तुम जो शेरों का शिकार करते हो
    हमें तो रोज कुत्तों का करना पड़ता है

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