Monday, August 2, 2021

लघु कथा/ मकड़ी और मैं

कुछ अजीब सी ही बात लगेगी आपको।....लेकिन है बिलकुल सच। कुछ दिन पहले एक मकड़ी से मेरी दोस्ती हो गई। वह कुछ बोलती नहीं...बेजुबान जो है। लेकिन समझती सब है, ये साबित होगया। अब आप पूछेगें, “वो कैसे?“ ....तो यही बताने के लिए तो ये कहानी लिखने बैठ गई। 

मकड़ी के जालों ने मुझे हमेशा आकर्षित किया। खंडहरों में बेहद डरावने और घरों में द्ररिद्रता की निशानी समझे जाने वाले इन जालों में मुझे हमेशा आर्ट नज़र आया। बेहद ख़ूबसूरती से बुना हुआ जाल... मकड़ी के दिमाग़ की दाद देने पर मजबूर कर देता है। इसीलिए मुझे अगर कहीं जाल दिखता तो मैं उससे तोड़ने का प्रयास नहीं करती। लेकिन उस दिन अपने बाथरूम के ठीक नल के बगल में ऊपर से नीचे की ओर आते जाले को देखकर पता नहीं क्यों में बिगड़ गई....

उसकी इस हिमाक़त पर मेरी नाराज़गी जायज़ भी थी। आफ्टर ऑल कुछ जगहों का इन प्राणियों को लिहाज होना चाहिए। जहां देखो मुॅंह उठाये अपनी इमारत खड़ी करने लगते है। इनकी ऐसी की तैसी...कहकर मैने उसके जाल पर जोर से एक मग पानी का फेंक दिया। जाल टूट गया था और मकड़ी पानी के साथ बह गई होगी, ये सोचकर मैंने प्राप्त हो चुकी अपनी प्राइवेसी का भरपूर आनंद उठाया। हालांकि मन कसक भी रहा था ये सोच कर कि किसी का घर तोड़ दिया। लेकिन अपने इस अपराध बोध को मैंने खुश्बूदार बॉडी वाश के झाग में उड़ा दिया। अब मन शांत और प्रसन्न था...।

सभी कर्मों से निपट बाथरूम के सामान को समेट जैसे ही बाल्टी को किनारे लगाने लगी...देखा वही मकड़ी बाल्टी से चिपकी पड़ी थी। पानी की तेज मार से भी उसने अपने बचाव का रास्ता पा लिया था। ठीक ही कहते है... ‘जाको राखै साइंयां मारे सकै न कोई।‘ चलो मेरे मन का भी बोझ उतरा। लेकिन अब क्या? ये फिर अपनी नींव रखनी शुरू कर देगी। अब मेरा इसे मारने का भी मन नहीं। कौन सुबह-सुबह अपने हाथ ख़ून से रंगने चाहेगा। तो क्या किया जाए? कुछ देर सोचने के बाद मैंने तय किया इससे बात करनी होगी...यहां अपना स्ट्रक्चर खड़ा करने से पहले इसको मेरी भी कुछ कंडीशन माननी होगी।

हॉं...यही उचित होगा...। यह तय कर मैंने उससे कहा...“देखो मिस! मुझे तुम्हारे यहां रहने से कोई एतराज़ नहीं है। आखिरकार तुम्हें भी उसी ने बनाया जिसने मुझे। तुमको भी जीने का अधिकार है।...तो तुम यहां इत्मीनान से अपना महल खड़ा कर सकती हो। बस एक शर्त है...एक छोटे से दायरे तक उसे रखो, जहां मर्जी आये... उधर की ओर कंस्ट्रक्शन मत करने लगो। तुम छोटी सी हो...आखिर तुमको अपने लिए कितनी जगह चाहिए। तो बेहतर होगा एक कोने में अपना छोटा सा जाल बुन लो। इस पर मुझे भी कोई एतराज़ नहीं होगा। लेकिन कहीं तुमने ज्यादा जगह पर कब्जा किया तो मुझसे बुरा कोई न होगा। समझी...बस एक ही बार कहूंगी। मैं भी अकेली ही रहती हूं इस घर में...अच्छा है तुम्हारा साथ होगा। बस अपनी हद में रहना...।“

ये कहकर मैं अपने बाथरूम से बाहर आ गई। 

और अगले दिन क्या देखती हूं...आप यकीन नहीं करेगें। उसने उसी जगह पर अपना छोटा सा निर्माण कर लिया था। मैंने भी उसको उसके काम पर दाद देकर कहा...“गुड! बस कंडीशन याद रखना। इससे ज्यादा फैलाव करोगी तो अवैध कब्ज़ा मानकर तुम्हारा स्ट्रक्चर ढहा दूंगी।...वैसे एक बात है, ये तो तुमने साबित कर दिया कि तुम लोग भी बात सुनते हो। हम ही इंसान तुमको कीड़े-मकोड़े समझ दुत्कारते है।“ 

उसके कई दिन तक मैंने देखा...वह मेरे आदेशानुसार सीमित दायरे में ही अपना काम करती रही। ...और मैं सुबह उसे देखकर उसी तरह खुश होती जैसे कोई अनुशासित मेहमान को देखकर होता है। उससे कुछ चर्चा होती। जो किसी से नहीं कह सकती उससे कहती। मेरा जी भी हल्का हो जाता। अब लगता है लोग पैट क्यों पालना पसंद करते है? मुझे भी इसका अहसास होने लगा था। 

लेकिन आज...क्या देखती हूं। न जाला, न मकड़ी। ऐसा लग रहा था वहां कभी कुछ था ही नहीं। मैंने कहीं सुना था मकड़ी शिफ़्ट होने से पहले अपने बनाए जाले को स्वंय ही निगल जाती है। हैरान हूं...? और हम इंसान जिस स्थान को छोड़ते है वहॉं अपनी गंदगी छोड़ के जाते है। सोचने की बात है एक मकड़ी भी मेरे ज्ञान चक्षु खोल गई...।