Tuesday, December 22, 2020

न मिले भीक तो लाखों का गुजारा ही न हो



कुछ दिनों पूर्व केंद्र सरकार ने नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे के छठे राउंड के आंकड़े जारी किए हैं. इससे पता चला कि पिछले चार-पांच साल में बच्चों के पोषण में कोई प्रोग्रेस नहीं हुआ है. 

हंगर इंडेक्स ने साल 2020 के सर्वे में भारत की स्थिति पाकिस्तान, नेपाल और बांग्लादेश जैसे देशों से भी खराब होने की रिपोर्ट के लगभग दो महीने बाद ही जारी हंगर वॉच और नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे के नतीजे भी भारत में भूख और कुपोषण की समस्या का भयावह रूप पेष कर रहे हैं. जाने-माने अर्थशास्त्री और सामाजिक कार्यकर्ता ज्यां द्रेज के अनुसार भूख और कुपोषण भारत की घरेलू समस्याओं के बीच सबसे बड़ी चिंता होनी चाहिए. अब यह है या नहीं यह बिल्कुल दूसरी बात है, लेकिन यह होना जरूर चाहिए था. 

अल्पपोषण, बाल दुबलापन, बाल ठिगनापन और बाल मृत्यु दर के आधार पर तैयार की जाने वाली ये रिपोर्ट बताती है कि भारत की 14 प्रतिशत आबादी अल्पपोषित (अपर्याप्त कैलोरी लेने की मात्रा) 34.7 प्रतिशत बच्चों की स्टंटिंग दर (5 वर्ष से कम उम्र के बच्चों में उम्र की तुलना में कम हाइट वाली) दर्ज की गई और ‘बाल मृत्यु’  दर 3.7 प्रतिशत है. जबकि ‘वेस्टिंग’ दर (5 वर्ष से कम उम्र के बच्चों में हाइट की तुलना में कम वजन) 17.3 प्रतिशत ही है.

इन आंकडों की हकी़कत जानने के लिए बहुत दूर जाने की जरूरत नहीं होती. आपके आसपास फैली ग़रीबी की फटी चादर नित प्रति आपको नज़र आती ही होगी. उस पर कोरोना काल इस पर कहर बन के बरस गया. जाँ निसार अख़्तर का शेर है-

शर्म आती है कि उस शहर में हम हैं कि जहाँ 
न मिले भीक तो लाखों का गुजारा ही न हो 

हर साल रिफ्रेस किए जाने वाले इन आंकड़ों का असर सुधार की दिशा में दिखता हो मुझे नहीं लगता. जमीनी तौर पर तो नहीं ही दिखता. मेरा तो विचार है कि हर बात पर हंगामा बरपा करने वाले भूख-कुपोषण को मुद्दा बनायें. राजनीति करने वाले या मीडिया तंत्र भूखमरी जैसी विह्द स्थिति पर भी बहसबाजी कर अपनी रोटी सेंक सकते है या टीआरपी बढ़ा सकते है. आंदोलन कारी चक्का जाम कर अपने हित साध सकते है. यकीनन उनका फायदा तो है ही इसमें कुछ हद तक इस हो-हंगामें का फायदा भूखमरी का शिकार हो रही उस ग़रीब को भी मिल जाएगा जिसको जमीन से न उठने देने की कसमें इस देश का तंत्र सदियों से कर रहा.   


Wednesday, December 16, 2020

सही बात रखना भी जब मौत का सामान ले आये...!

 रोहुल्लाह जाम

डाॅन अखबार द्वारा पाकिस्तान में पत्रकारों पर हो रहे क़ातिलाना हमले पर ये टिप्पणी क़ाबिले गौर है है कि एक लोकतांत्रिक व्यवस्था वाला मुल्क होकर भी वह अपने मीडियाकर्मियों की हिफाजत नहीं कर पा रहा. ‘इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ जर्नलिस्ट’ ने वैश्विक पत्रकारिता पर हाल में एक श्वेत-पत्र जारी किया है, जिसके मुताबिक, पत्रकारिता के लिहाज से दुनिया के पांच सबसे खतरनाक मुल्कों में एक नाम पाकिस्तान का भी है. 

श्वेत-पत्र कहता है कि साल 1990 से आज तक यहां 138 खबरनवीसों को मौत के घाट उतारा जा चुका है. यह आंकड़ा इस मुल्क में प्रेस की आजादी की गंभीर स्थिति का अंदाजा करा देता है. यह श्वेत-पत्र उसी वर्ष में जारी हुआ है, जब ‘फ्रीडम नेटवर्क’ ने एक साल के भीतर पाकिस्तान में पत्रकारों के खिलाफ,कत्ल, मारपीट, पाबंदी, धमकी व कानूनी वाद के 91 मामले दर्ज किए हैं. हालांकि इन दिनों पत्रकारों के कत्ल की वारदातें कम हुई हैं, मगर उन्हें डराने-धमकाने, मुकदमे में फंसाने और दंडित करने की घटनाएं पहले से काफी अधिक बढ़ गई है. 

अखबार लिखता है जिन हालात में पाकिस्तान के भीतर पत्रकारों को आज काम करना पड़ रहा है, वे बेहद चिंताजनक हैं और यहां आलोचना व आजाद ख्याली के लिए जगह सिमटती जा रही है। पत्रकारों को खुलेआम सोशल मीडिया पर धमकाया जाने लगा है और अक्सर जिस आईडी से धमकी आती है, वह सरकार से वाबस्ता होती है. इस साल अनेक पत्रकारों को देशद्रोह के मामले में सलाखों के पीछे धकेल दिया गया, जबकि कइयों को उठा लिया गया और काफी हंगामे व अवाम के दबाव के बाद ही उनकी रिहाई मुमकिन हो सकी. यही नहीं, पत्रकारों के कत्ल या उन पर हुए हमलों से जुड़े मुकदमों में कुछ नहीं होता. 

जियो टीवी के एंकर हामिद मीर पर 2014 में ही कातिलाना हमला हुआ था, वह आज भी इंसाफ का इंतजार कर रहे हैं. हामिद की गिनती पाकिस्तान के उन चंद पत्रकारों में होती है जिन्हें आतंकवाद और सुरक्षा मामलों का विशेषज्ञ तो माना ही जाता है, उन्हें जोखिमपूर्ण पत्रकारिता के लिए भी जाना जाता है. कभी ओसामा बिन लादेन का साक्षात्कार कर चुके हामिद अरसे से तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान जैसे अनगिनत आतंकी संगठनों के निशाने पर हैं और उन्हें अनेक बार धमकियां भी मिल चुकी है. पत्रकार व विश्लेषक रजा रूमी भी ऐसे ही हमलों के शिकार हो चुके है. .

‘इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ जर्नलिस्ट’ के  श्वेत-पत्र के हवाले से कहें तो केवल पाकिस्तान ही नहीं बल्कि हर वह देष में जहां पत्रकारों ने राजनीतिक हलकों के गोपनीय या कह सकते है छद्म मामलों को उजागर करने का प्रयत्न किया तो उनका हश्र बुरा ही हुआ. पाकिस्तान के सलीम शहजाद हो या भारत की गौरी लंकेश, सऊदी अरब के पत्रकार जमाल खशोगी हो या ईरान के मशहूर पत्रकार रोहुल्लाह जाम, इन सभी की हत्या इनकी लिखी-कही गई खबरों में विरोधी रुझान का होना था. वरिष्ठ पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या ने पूरे देश को हिला कर रख दिया और लगभग पूरे साल यह मामला सुर्खियों में छाया रहा. 

भारत के तमिलनाडु राज्य में राजधानी चेन्नई से सटे कांचीपुरम जिले के कुंद्राथूर में 27 वर्षीय टेलीविजन पत्रकार इसरावेल मोसेस पर कुछ लोगों ने उनके घर के बाहर हंसुओं से हमला कर मार डाला. मीडिया में आई खबरों के अनुसार मोसेस ने अपनी कई रिपोर्टों में कुंद्राथुर इलाके में गांजे की अवैध बिक्री और सरकारी जमीन की अवैध बिक्री का विषय उठाया था.दूसरी तरफ भोपाल की राजधानी के बाहरी इलाके के जंगलों में पत्रकार सय्यद आदिल वहाब की लाश मिली है.35 वर्षीय वहाब एक स्थानीय टीवी समाचार के लिए काम करते थे.

अकल्पनीय है किंतु सत्य है कि भारत में ही 2014 से 2020 के बीच 12 पत्रकार गिरफ्तार किए गए हैं और 27 पत्रकार मारे गए. गिरफ्तारी का ताजा-तरीन उदाहरण रिपब्लिक भारत के सीईओ अर्नब गोस्वामी है. 

आईपीआई के मुताबिक, 1997 से लेकर 2020 के बीच इन 23 साल में विष्व भर में 1928 पत्रकारों की हत्या हुई है. इसमें अकेले भारत में 1997 से 2020 के बीच कुल 74 पत्रकारों की हत्या हुई है. इंटरनेशनल न्यूज सेफ्टी इंस्टीट्यूट (आईएनएसआई) की रिपोर्ट में कहा गया कि 2013 में रिपोर्टिग के दौरान दुनिया भर में 134 पत्रकार और मीडिया को सहायता देने वाले कर्मी मारे गए. उनके अनुसार खैबर पख्तूनख्वा, बलूचिस्तान और कबायली इलाके तो पत्रकारों के लिए कत्लगाह से कम नहीं.

इस तरह के हमले लोकतंत्र के चैथे स्तंभ को लहूलुहान तो कर ही रहे पत्रकारों की सुरक्षा को लेकर सवाल भी उठा रहे है. पत्रकार अगर पत्रकारिता की वचनद्धता निभाता है तो उसे मौत और धमकियों का ईनाम मिलता है. किसी देष को ब्लेकमेल करने के लिए पत्रकार का अपहरण कर ब्लैकमेल करना या उन्हें मारकर देष को उसकी औक़ात बताना आतंकवादियों का खेल होता है. लेकिन अपने ही देष में असुरक्षित महसूस करते पत्रकार शायद इन्हीं कारणों से सत्ताधारियों के हाथ का खिलौना बनने को मजबूर है और उसी की जुबान बोलने को राजी भी. कहना अतिष्योक्ति नहीं होगा कि जो तैयार नहीं होते उन्हें देख ही लिया जाता है...!!!! 


Sunday, December 13, 2020

स्मृतियों का बक्सा!



मैंने स्मृतियों के बक्से में
संजो कर रखा है बहुत सी यादों को,
छुपा रखा है जिसमें,
शहनाई की उस सुमधुर आवाज को... 
जिनकी स्वर लहरियों के बीच, 
तुम दोनों एक बंधन में बंधे थे।

तुम्हारी गृहस्थी की उस 
पोटली को भी रखा है बड़े संभाल,
जब तुम दोनों, अपने में मगन,
प्रेम और समर्पण भरे रंगों की बाल्टी से... 
रंग रहे थे 
अपना घर-संसार।

सहेज के रखा है उन उल्लास के 
पलों को भी, 
जो पहली किलकारी के साथ... 
हम सब के चेहरों पर, 
उजास होकर फैल गई थी।

रखे है वे सारे पल भी संभाल के,
जब-जब तुमने एक-दूसरे को... 
संभाला-संवारा-निखारा, 
और गढ़ दिया अपने दांपत्य जीवन का, 
सुखद-सुरीला संगीत।

दूर होते जा रहे अपनों के सबंधो के बीच, 
तुम्हारे बीच के सम्बन्धों की
गहराई और समझ के हर पल की, 
पुड़ियां है मेरे
इस बक्से में बंद। 

लेकिन सुनो! 
अभी रखनी है मुझे 
कुछ और...तुमसे जुड़ी सुखद स्मृतियां, 
जीवन की सांझ होने तक या फिर
मेरे चिरनिद्रा में चले जाने तक।

Thursday, December 10, 2020

तो चलो आओ खेंले लोकतंत्र-लोकतंत्र खेल, चित् मेरा तो पट् तेरा



किसान आंदोलन के बीच नीति आयोग के सीईओ अमिताभ कांत, द्वारा किए गए एक ट्वीट ने थोड़ी देर के लिए ही सही पर बखेड़ा तो खड़ा कर दिया जिसके बाद उन्हें ये ड्लिीट करना पड़ा. दरअसल उनका ये कहना कि, भारत में लोकतंत्र कुछ ज्यादा ही है...और यहां ’कड़े’ सुधार को लागू करना बहुत मुश्किल है, कईयों को रास न आया.

इस ट्वीट या लिखने वाले से मेरे इस लेख का कोई सरोकार नहीं बल्कि मैं इसके बहाने ’लोकतंत्र’ में हम क्या खोते जा रहे हैं, इस पर एक नजर डालना चाह रही. लेकिन इससे पहले एक नजर एक रिपोर्ट पर भी डालना चाहूंगी जो कहती है कि क्या भारत में लोकतंत्र कमजोर पड़ रहा.

स्वीडन स्थित संस्था ’वी- डेम इंस्टीट्यूट’ की ’2020 की लोकतंत्र रिपोर्ट’ में यह संकेत दिया जाना चिंताजनक हैं कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देशों में से एक कहे जाने वाले भारत में लोकतंत्र कमजोर पड़ रहा है. हालांकि यह रिपोर्ट भारत पर ही है, ऐसा नहीं है. 179 देशों देशों का इसमें जिक्र हैं, जिसमें भारत को 90वाँ स्थान दिया गया है और डेनमार्क को पहला. ’उदार लोकतंत्र सूचकांक’ रिपोर्ट को तैयार करने वाली संस्था वी- डेम इंस्टीट्यूट स्वीडन के गोटेनबर्ग विश्वविद्यालय से जुड़ी है, जिस के अधिकारी कहते हैं कि भारत में लोकतंत्र की बिगड़ती स्थिति की उन्हें चिंता है.

इस रिपोर्ट के अनुसार भारत में मीडिया, सिविल सोसाइटी और मोदी सरकार में विपक्ष के विरोध की जगह कम होती जा रही है, जिसके कारण लोकतंत्र के रूप में भारत अपना स्थान खोने की कगार पर है. भारत का पड़ोसी देश श्रीलंका 70वें स्थान पर है जबकि नेपाल 72वें नंबर पर है. इस सूची में भारत से नीचे पाकिस्तान 126वें नंबर पर है और बांग्लादेश 154वें स्थान पर.

बाबा साहब अम्बेडकर ने लोकतंत्र की व्याख्या करते हुए उसे एक ऐसी जीवन पद्धति कहा जिसमें स्वतंत्रता, समता और बंधुता समाज-जीवन के मूल सिद्धांत होते हैं. जबकि जॉर्ज बर्नार्ड शॉ का लोकतंत्र के बारे में कहना था-लोकतंत्र, अपनी महंगी और समय बर्बाद करने वाली खूबियों के साथ सिर्फ भ्रमित करने का एक तरीका भर है जिससे जनता को विश्वास दिलाया जाता है कि वह ही शासक है जबकि वास्तविक सत्ता कुछ गिने-चुने लोगों के हाथ में ही होती है.

वर्तमान परिस्थितियों पर गौर करें तो उपरोक्त दोनों कथनों में से जार्ज बर्नार्ड शाॅ का कथन कहीं अधिक खरा उतरता है. इन कुछ गिने-चुने लोगों के कारण ही वास्तव में आज लोकतंत्र खतरे में नज़र आ रहा है. महज अपने वोट बैंक की राजनीति करने के लिए देष के भीतर जाति-भाषा की दीवार खड़ी कर दिए जाने से हर नागरिक स्वार्थ सिद्धि में रत नजर आता है. हम भारतीय न रहकर बंगाली-पंजाबी-तमिल-तेलगू-मराठी या जाने और क्या-क्या हो गये. लोकतंत्र की लाठी संभालने वालों के लिए यही काफी नहीं हुआ तो कईक जातियों को उनकी पहचान से रूबरू करा उनका हितैषी बनने का नाटक करने लगा. जाहिर है फिर तो हर पार्टी को ये वोट बैंक का  खेल भा गया और यहीं से शुरू हो गया ’आओ लोकतंत्र-लोकतंत्र खेलें’ का असल खेल .

अगर आप गौर करें तो गत कुछ सालों से आपको नाराजगी, को्रध, नफरत, अधैर्यता और नकारात्मकता भीड़ की शक्ल में बदलती नज़र आती होगी. ध्यान दें तो भारत में औसतन हर दूसरे आदमी को आप तनावग्रस्त और सरकार, परिस्थितियों को कोसता नजर आता है. अच्छा होता हुआ उसे कुछ भी नजर नहीं आता जबकि वातावरण में घोली रही जहरीली बातें उसके जेहन को घुन की तरह पीस रही है. हम जब भी आपस में मिलते है या किसी मुद्दे पर सोषल मीडिया पर बात करते है विचार में भिन्नता दिखते ही बातचीत तेजी से आक्रामक व्यवहार में तब्दील होने लगती है. स्वस्थ माहौल और स्वस्थ परंपरा से बनाये जाने वाले समाज की परिभाषा वाला लोकतंत्र आज क्रब में दफन हो चुके इतिहास की परतों से खुरेंच-खुरेंच कर निर्मित किया जा रहा. देखा जाए तो हम अब आगे देखने के बजाए पीछे देख कर चल रहे है.

भारत के जाने-माने चिंतक प्रताप भानु मेहता ने अपने एक लेख (मार्च 2019) में कहा था, मुझे ऐसा लग रहा है कि हमारे लोकतंत्र के साथ कुछ ऐसा हो रहा है जो लोकतांत्रिक आत्मा को खत्म कर रहा है. हम गुस्से से उबलते दिल, छोटे दिमाग और संकीर्ण आत्मा वाले राष्ट्र के तौर पर निर्मित होते जा रहे हैं. कुछ मायने में लोकतंत्र आजादी, उत्सव का नाम है, ऐसी व्यवस्था में लोग कहां जाएंगे इसे जानना महत्वपूर्ण होता है न कि पीछे कहां से आएं हैं.

सरकार और नागरिकों के बीच अहम भूमिका निभाने वाला सबसे जरूरी स्ंतभ ’मीडिया’ अपनी जिम्मेदारियों से भाग रहा. सरकुलेषन, सरकारी विज्ञापनों, टीआरपी या कह सकते है भारी फंडिंग के मोह में वह तथ्यों को तोड़-मरोड़ के पेष कर रहा है. रिया चक्रवर्ती के मामले में मैंने ऐसे मूर्ख लोगों को भी देखा जो मसाले की तरह परोसे जा रही खबरों को एकता कपूर के सीरियलों की भंाति पूरी निष्ठा से देख ही नही रहे थी बल्कि उस पर यकीन कर विचार-मंथन भी कर रहे थे.

जहां तक विपक्ष की भूमिका का सवाल है वह भी संदिग्ध ही रहती है. नकारात्मकता फैलाने के अलावा वह किसी अहम नतीजे पर पहंुच नहीं पाता. यहां आकर भी वजहें व्यक्तिगत स्वार्थ की क्षतिपूर्ति करने मे मषगूल होती है. और सोषल मीडिया की जहां तक बात है किसी भी चिंगारी को आग में तब्दील करने में इसका कोई सानी नहीं. नोटों के जरिए खरीद-फरोख्त कर अपनी राजनीति चाल कामयाब करना किसी भी पार्टी के लिए आज बेहद आसान हो गया है.

संभवतः यही कारण है कि सकारात्मकता के लक्षणों से दूर होता ’लोकतंत्र’ नागरिक के लिए भी अपनी बात रखने का महज एक हथियार भर रह गया है. इसलिए वह जब चाहे तब भी़ड़, आंदोलन, हड़ताल, आगजनी, दंगे की शक्ल अख़्तियार करने लगा है. फिलहाल तो शुक्र इस बात का है कि देष की सीमाओं-सुरक्षा से जुड़ी समस्याओं और फैसलों पर सवाल नहीं खड़े किए जाते और सब ऐसे मामुलात में एक छतरी के नीचे खड़े नजर आते है वरना तो दूसरे मुल्कों के बीच हमारे लोकतंत्र की धज्जियां उड़ने में देर नहीं लगती.

Wednesday, December 9, 2020

बात सच कहिए मगर यूं कि हकीक़़त न लगे


नए कृषि कानूनों के खिलाफ चल रहे किसान आंदोलन में 8 तारीख को हुए भारत बंद के असर पर मीडिया के संपादकीय भी अपने हितों से परे देखने को नहीं मिले. देखा जाए तो ये कोई हैरान कर देने वाली बात भी नहीं है. लेकिन मैं इन सबसे अलग अपनी मुखतलिफ सी बात रखना चाहूंगी.

अगर आप गौर करें तो नई किसान नीति हुक्मरानों के द्व़ारा उस तबके को खुश करने की ताबीर है जिनके सहारे पार्टियां इफ़रात में चुनावी दंगल के मैदान पर खर्च करती है. सो ऐसे में हित उनका साधा जाता है जिनसे फायदे पहुचांने के वायदे पहले किये जा चुके है और अब वक्त है उन्हें पूरा करने का. इसमें किसान हित को जहां तक और जितना बेहतर दिखाया जाना है, दिखाया जा रहा. यूं भी अक्सर हंगामा बरपा करने वाले कब सत्ता के फैसलों पर खुष हुए हंै.

सो वे सत्ता पक्ष के इस दावे को कि ये पूरी तरह से भारत के गरीब-लाचार किसान को नुकसान से बचाने के लिए है, फिजूल की बात कह रहे. और जो आंदोलन के झंडे लेकर खडे है वे या तो पूंजीपति किसान है या उनके इषारों पर चलने वाले. इनकी संख्या मुठठी भर है. लेकिन मैं यहां इस आंदोलन की भीड़ में उस 86 प्रतिशत छोटे और मंझोले किसान को नदारद देख रही जिसकी इस कानून से यकीनन रही-सही कमर भी टूट जाएगी. ये वह किसान है जिसके पास 5 एकड़ से भी कम की जमीन है और जो हर बार फसल बोने से पहले कर्ज लेता है और फसल होने के बाद उसे चुकता करता है. 

तो मेरा ये कहना है कि सरकार भले ही लाख दावा कर ले, यह भी एक अमिट सच्चाई है कि यह कानून लागू होने के बाद कृषि-जगत बाजार मुक्त हो सकेगा? जिस 86 प्रतिषत किसान के सामने बीज तक खरीदने की दिक्कत पेष आती है वह कैसे अपने अनाज का भंडारण या उसे सुरक्षित कर सकेगा? सुरक्षा कर भी ले तो कैसे आॅनलाइन अपनी फसल को बेच सकेगा. जाहिर है यहीं पर ही कारपोरेट जगत की इन्ट्री होगी. जो इस किसान की फसल की मार्केट्रिग और सेल करने का दावा पेश करेगा. आप यूं कह सकते है किसान की फसल बाजार तक पहुंचाने का काम आगे से आढ़तियों द्वारा न होकर काॅरपोरेट दुनिया के बिचैलिए द्वारा होगा.

हंगामा काट रहा अमीर किसान इस बात को समझ रहा, क्योंकि अब तक वहीं इस काम को भी अंजाम दे रहा था. उसे इस कानून के लागू होने से अपना धंधा सिमट जाने का भय है. और इधर इन सब हंगामे से दूर छोटा-मंझोला किसान इस खेल को समझ नहीं पा रहा है या यूं भी कह सकते है कि उसको पता है कि उसे तो हर हाल में किसी एक की कठपुतली बनना ही है. उस पर तो इस कानून के लागू होने से फर्क बस इतना पड़ना है कि काॅरपोरेट कंपनियों को उस के हालातों से कोई वास्ता नही होगा जबकि आढ़तियों के साथ थोड़ा देश-काल-समाज का लिहाज चलता है. और चूकि उसे तो अपनी छोटी-मोटी फसल को हर हाल में बेचना ही है तो राम हो या रहीम क्या फर्क पड़ता है.

अफसोस की बात है कि कृषि प्रधान देष की पहचान वाले देश में आज स्थिति ये हो रही है कि किसान की आने वाली नस्ल खेती से बेज़ार तबियत की हो रही. खेतिहर मजदूरो की तो जान पर बन आ रही. गत वर्षों में किसानों द्वारा की जा रही आत्महत्या इसका उदाहरण है. खेती-किसानी में बढ़ती बेरोजगारी के कारण मंझोले किसान के हालात बदतर ही हुए है. न जाने हमारे नीति निर्घारक ग्रामीण भारत के बुनियादी ढांचे पर काम क्यों नहीं करते. अगर देष के ग्रामीण इलाकों के विकास को ध्यान में रखकर समग्र योजनाओं पर काम किया जाता तो निश्चित तौर पर कृषि में सुधार तो होता ही, रोजगार के रास्ते भी वहां खुलते. यही नहीं ग्रामीण इलाकों को मजबूत करने से गैर कृषि क्षेत्र की आवष्यकताएं भी पूरी होंती.

दुख तो इस बात का है कि नीतियां बनाने वाले गांव-किसान के विकास की बात तो करते है लेकिन उसे धरातल में उतारने से बाज आते है.दिल्ली-मुबई-बगलौर-कलकत्ता में बैठेे मल्टीमिलियन्स के इशारे पर चलने वाली सत्ता को किसान या देष के किसी भी गरीब की याद चुनावी मौसम में ही आती है. अपनी बातों में सपनों को हक़ीक़त में बदलने की बात करने वालेे सत्ता के नुमांइदे अक्सर भूल जाते है कि भारत मूलतः ग्रामीण देष है जहां की आबादी सीमित संसाधनों के साथ किसी तरह गुजर-बसर करने को आज भी बेबस है, क्योंकि जो हकी़क़त दिखाने की कोषिष की जाती है दरअसल वो तो कुछ और ही निकलता है.

फुज़ैल ज़ाफरी का एक शेर याद आ रहा-

ज़हर मीठा हो तो पीने में मजा आता है,
बात सच कहिए मगर यूं कि हकीक़़त न लगे

Wednesday, July 15, 2020

कोरोना के साथ-साथ अब 'भुखमरी' भी है निगलने को तैयार


संयुक्त राष्ट्र की चेतावनी पर गौर करें तो कोरोना वायरस महामारी के चलते इस साल करीब 13 करोड़ अतिरिक्त लोग भुखमरी का निवाला बनने जा रहे है. संयुक्त राष्ट्र की इसी सप्ताह आई ताजा रिपोर्ट में यह जानकारी दी गई है. रिपोर्ट में कहा गया है कि कोरोना वायरस महामारी के कारण भूखमरी के हालात पहले से और ज्यादा खराब हो रहे हैं. रिपोर्ट कहती है कि करीब नौ में से एक व्यक्ति को भूखा रहना पड़ रहा है.

इस रिपोर्ट को यूएन की पांच एजेंसियां- खाद्य और कृषि संगठन, अंतरराष्ट्रीय कृषि विकास कोष, संयुक्त राष्ट्र बाल कोष, विश्व खाद्य कार्यक्रम और विश्व स्वास्थ्य संगठन ने मिलकर तैयार किया है. रिपोर्ट कहती है कि बीते पांच सालों में भुखमरी और कुपोषण के अलग-अलग रूपों के शिकार लोगों की संख्या में तेजी से बढ़ोतरी हुई है और कोरोना वायरस महामारी के कारण समस्या और गंभीर रूप धारण कर सकती है. रिपोर्ट में अनुमान जताया गया है कि इस साल महामारी के कारण लगाई पाबंदियां और आर्थिक मंदी से आठ करोड़ से 13 करोड़ लोग भुखमरी का सामना कर सकते हैं.

यूएन की ताजा रिपोर्ट के अनुसार साल 2019 में 69 करोड़ लोग भुखमरी का शिकार थे और 2018 की तुलना में इस संख्या में एक करोड़ लोगों की बढ़ोतरी हुई. छह साल में यह संख्या छह करोड़ बढ़ी है. दशकों तक लगातार गिरावट के बाद साल 2014 से भुखमरी के आंकड़ों में धीरे-धीरे बढ़ोत्तरी होनी शुरू हुई जो कि अब तक जारी है.
एशिया में सबसे बड़ी संख्या में लोग कुपोषित हैं जिनकी संख्या करीब 38 करोड़ है. इसके बाद लातिन अमेरिका और कैरिबयाई क्षेत्र का नंबर आता है. रिपोर्ट के लेखकों का कहना है कि भुखमरी से लड़ाई महामारी के पहले रुक गई थी. लेकिन अब भोजन के उत्पादन, वितरण और खपत से जुड़ी गतिविधियों और प्रक्रियाओं की कमियांे और निर्बलताओं के कारण ये और ज्यादा गहरी हुई जा रही हैं.



यूएन की एजेंसियों का कहना है कि करीब तीन अरब लोगों के पास सेहतमंद आहार सुनिश्चित करने के साधन नहीं है. रिपोर्ट कहती है कि इस दिशा में अधिक से अधिक कार्य करने की जरूरत है. सभी लोगों की पहुंच ना केवल भोजन तक होनी चाहिए बल्कि पौष्टिक खाद्य पदार्थों तक भी होनी चाहिए जो एक स्वस्थ आहार बनाते हैं. रिपोर्ट में निष्कर्ष निकाला गया कि कोरोना वायरस महामारी के परिणामस्वरूप खाद्य वितरण प्रणाली बाधित हुई, आजीविका को नुकसान हुआ और विदेशों में काम करने वाले अपने घर पैसे भेज नहीं पाए जिस वजह से गरीब परिवारों को स्वस्थ आहार तक पहुंच बनाने में मुश्किल पैदा हुई.

और इस बात से दुनिया के छोटे-बड़े तमाम देश प्रभावित हैं. वायरस के कारण ज्यादातर देशों में लॉकडाउन लगा दिए जाने से इंडस्ट्री, बिजनेस और एग्रीकल्चर पर भी बहुत बुरा असर पड़ा है.आर्थिक गतिविधियां ठप पड़ी हैं. ये संकट कब तक बना रहेगा, इसके बारे में निश्चित रूप से कोई कुछ नहीं कह सकता. लेकिन यह जरूर कहा जा सकता है कि कोरोना की मार सबसे अधिक गरीब देशों पर पड़ने वाली है और भारत भी इससे अछूता नहीं रहने वाला.

भारत में सरकार द्वारा की गई कई लुभावनी घोषणाएं तो ऐसी लगी जैसे आपको सामान्य जरूरतों का टोटका तो कम से कम नहीं होने वाला. लेकिन तंत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार के आगे आपकी जरूरतो की ऐसी की तैसी हो जाती है. ज्यादा पीछे जाने की बात नहीं, अभी कुछ दिन पहले लॉकडाउन के चलते सबसे कमजोर वर्ग के सामने खाने की समस्या पैदा हो गई थी. ये वर्ग अपनी पेट भरने की जरूरत से जूझ रहा था. खाना दिया जा रहा...राशन बंट रहा है जैसी खबरों के बीच रोते बिलखते लोगों की पुकार भी आ रही थी. इस बीच आर्थिक तंगी और भुखमरी के कारण कई लोगों ने आत्महत्या भी कर ली. लॉकडाउन के दौरान दो वक्त के भरपेट खाने को तरसते लोगों के हालात को देखते हुए सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च (सीपीआर) ने तो एक रिपोर्ट भी जारी की थी कि सरकार की कोशिशों के बावजूद भी व्यवस्थागत कमियों के कारण लोगों तक खाने-पीने के सामान की आपूर्ति ठीक से नहीं हो पा रही है.

सीएसडीएस के सर्वे के मुताबिक, भारत में 50 फीसदी लोगों को आमदनी के मुकाबले अपनी पारिवारिक और घरेलू खर्चों को पूरा करने में कई तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ता है. लॉकडाउन होने के बाद से कईयों की कमाई पूरी तरह खत्म हो गई और देश की एक बड़ी आबादी अचानक से गरीबी रेखा के नीचे पहुंच गई. जाती नौकरियों की वजह से घरों में बजट बिगड़ने से हालात बेकाबू हो रहे है. सरकार द्वारा मजदूरों के लिए राशन गैस की सुविधा ने जहां हालात को संभालने की कोशिश की वहीं सिस्टम के छेद ने उसे हर हाथ तक पहुंचने से भी रोका है. फिर भी हम कह सकते है कि भुखमरी के जैसे हालात अफ्रीकन देशों में देखने को मिलते है वैसे हालात भारत में नहीं है.

भारत एक ऐसा देश है जो बीते कई दशकों से अनाज के मामले में सरप्लस में चल रहा है. इसके मायने ये हैं कि सरकारी गोदामों में इतना अनाज भरा हुआ है कि एक लंबे समय तक खाद्दान्न आपूर्ति की जा सकती है. अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज ने भी अंग्रेजी अखबार इंडियन एक्सप्रेस में खाने-पीने के सामान में कमी नहीं होने की बात कही थी. उनके मुताबिक भारत के गोदामों में इस समय साढ़े सात करोड़ टन अनाज है. इतना अनाज पहले कभी नहीं रहा. यह बफर स्टॉक के नियमों से तीन गुना अधिक है. रबी की फसल कटने के बाद यह स्टॉक और बढ़ जाएगा. सरकार कृषि मंडियों में पैदा हुए व्यवधान को समझते हुए और अधिक मात्रा में अनाज खरीदेगी. राष्ट्रीय आपदा के समय इस भंडार के एक हिस्से का इस्तेमाल करना ही समझदारी होगी.

लेकिन असल समस्या तो खाने के सामान की वितरण व्यवस्था को लेकर थी, है या यूं कहें आगे भी रहेगी.... क्योकि भारत सरकार जिन राशन की दुकानों के जरिए गरीबों तक राशन पहुंचाने की कोशिश कर रही है, वो तंत्र ही भ्रष्टाचार और खामियों से भरा पड़ा है. एक सर्वे में सामने आया है कि देश की राजधानी दिल्ली में सिर्फ 30 फीसदी राशन की दुकानें ही राशन दे रही हैं. फिर अन्य राज्यों के बारे में क्या कहा जाए. संभवत यही वजह है कि कई दिहाड़ी मजदूर कोरोना से उतने भयभीत नहीं लगते जितना र्वे आिर्थक तंगी और भुखमरी से भयभीत है.

Sunday, June 14, 2020

कोई ये कैसे बताये जिन्दगी दरस्त-ए-गम थी और कुछ नहीं




सुशांत सिंह राजपूत की 2 फिल्मों को मैंने कईक बार देखा- श्काय पो छेश् और श्एमएस धोनीश्. एक में जिद्दी अहमक क्रिकेट ट्रेनर और दूसरे में जुनूनी क्रिकेटर. दोनों को देखकर मुझे हमेशा से यही लगा कि ये स्टारों वाली अदाओं से अलग कलाकार को अगर कोई सही परख रखने वाला जौहरी मतलब निर्देशक मिल जाए तो ये कई स्टार्स की छुट्टी कर देगा... लेकिन हाय रे दुर्भाग्य!...

जिन्दगी जब मौत को गले लगाती है तो श्हैश् और श्थाश् के बीच का अंतर पलक झपकते हीे नाप देती है. आप भौचक से खड़े उस पल को समझने की कोशिश में कईक प्रश्नों के चक्रव्यूह में फंसे उनके जवाब की तलाश में अगले-बगले झांकते फिरते हो. 34 साल का छोटा सा जीवन फंदे में झूलते हुए एक बड़ा सा शून्य छोड़ जाता है ये सोचने को मजबूर करते हुए कि ऐसा क्या था कि उसे यही करना उचित लगा और अचानक ही मौत जीवन पर भारी पड़ गई... जरा सोचिए किस कदर मानसिक तनाव की स्थिति में सुशांत सिंह राजपूत उस वक्त रहा होगा?

इस उम्र मे किसी भी स्वस्थ परिपक्व जीवन जीते आदमी की मौत पर श्रेस्ट इन पीस लिखनाश् भी किसी ज्यादती से कम नहीं लगता. यकीनन कोरोना से हो रही मौतों के सदमे के बीच ये मौत ब्लॉक ब्लास्टर फिल्में देने वाली श्मायानगरीश् का श्कुरूपश् चेहरा दिखाती है. अभी तक आत्महत्या की वजह का पता नहीं लगा है. हालांकि, उसका कहना है कि अभिनेता बीते छह महीने से श्डिप्रेशनश् से गुजर रहे थे. कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में यह भी कहा गया है कि सुशांत डिप्रेशन को कम करने के लिए श्री श्री रविशंकर के ‘आर्ट ऑफ लिविंग’ की मदद ले रहे थे.अब जितने मुंह उतनी बातें... कौन बताए आखिर उनको यही राह चुनना क्यों श्रेयकर लगा. संभवतः पत्थर दिल इस नगरी में सुशान्त सिंह राजपूत भावनाओं से भरा दिल लेकर जी रहे थे. स्टार तो बन रहे थे पर श्स्टाडमश् वाले अंदाज  खुद पर नहीं चढ़ा पा रहे थे. तभी तो दूसरों का जीवन अजाब बनाने के बजाय खुद का जीवन ले बैठे. अपने बालीवुड श्सीनियर्सश्  ऐसी श्दीक्षाश् लेने में वे पीछे रह गए.

निश्चित तौर पर सुशांत कोई श्खानश् या श्रणवीरश् टाइप बड़े स्टारडम वाले हीरो नहीं रहे, लेकिन वो राजकुमार राव और आयुष्मान खुराना श्रेणी में बेहतरीन कलाकार थे. बॉलीवुड इंडस्ट्री में जहां श्स्टारपुत्रोंश् का नित नया परिचय मिल रहा था ऐसे में सुशांत जैसे सामान्य टी वी कलाकार का बिना किसी श्गॉडफादरश् के अपने अभिनय के बूते यहां तक पहंुच जाना वाकई प्रशंसनीय रहा.

उज्ज्वल भविष्य था उनका पर होनी को कौन टाल सका. कौन जाने किस तकलीफ से उनको दो चार होना पड़ा. रंग रोगन से लिपि पोती श्बालीवुडी दुनियाश् में वैसे भी सच कौन जीता है. झूठ का श्मास्कश् पहने हर कोई खुद को बेहद श्खुशश् और श्जिंदादिलश् दिखाता है.  यहां बनावटी व्यवहार, बनावटी दोस्तों के बीच हर आदमी श्तन्हाश् होता है. इंडस्ट्री की श्कब्रेंश् खोदी जाए तो एक नहीं अनेकों तन्हा किस्से श्खाक-ए-सुपुर्दश्  मिल जाएंगे. फातेह वास्ती के लफ्जों में कहूं तो किस किस का जिक्र कीजिए किस किस को रोइए... यहां की रौनके महफिल के पीछे छुपे काले स्याह चेहरे अंधेरे बंद कमरों में सिसकते देखे जा सकते है जिनका अंजाम यूं ही सामने आता है. अड़ताल्लीस घंटे बीतते ना बीतते वक्त इस वाकये, नाम को भी भूला देगा और फिर चंद दिनों, महीनों या कहे साल बाद फिर ऐसे ही कोई नाम अवसाद ख् फिल्म इंडस्ट्री में काॅमन पाए जाने वाली बीमारी , के नाम पर मौत की आगोश में सुकून पाने चला जाएगा, दूसरों के लिए एक प्रश्नवाचक चिह्न छोड़कर.

और अंत में तुम्हारे लिए सिर्फ इतना ही सुशान्त सिंह राजपूत -

जिन्दगी दरस्त-ए-गम थी और कुछ नहीं,
ये मेरा  [ तेरा ] ही हौंसला है की दरम्यां से गुजर गया.

Thursday, May 28, 2020

कुछ कविताएं डायरी के पन्नों से


कहीं भी या कहीं भी नहीं

कभी हम भी थी हरी-भरी पत्तियां
अपने भीतर के
बंसत से पुलकित, हरित।
अब हम हैं
सूखी हुई
झरी हुई पत्तियां
पतझड़ के स्मृति-चिह्न
उस निर्णायक झोंके की
प्रतीक्षा में जो,
उड़ाकर ले जाएगा
कहीं भी या कहीं भी नहीं।
.........

भ्रम

दिखते नहीं
साये
सुनाई देती है
महज आवाजें उनकी
........


अहसास

जानते हो
मेरे घर की
दीवारें करती है
याद तुमको
जिनके सहारे खड़े होकर
तुमने गढ़ा था
कुछ सच-कुछ झूठ
धड़कता है दिल
हर उस चीज का
जिन्हें छुआ था तुमने
मेज, कुर्सी, कटोरी, चम्मच
और जाने क्या-क्या
उन पर जमे अवसाद के
हर कण को
आज भी
इंतजार है तुम्हारी आहट का
ये सब जानते है
तुम नहीं आओगे
पर तुम्हारे होने का
अहसास ही
है अब इनके
और मेरे
जीवित होने का कारण
........

समर्पण

प्रिय!
आज तुम्हें सुनना ही होगा
मेरे अंतर्मन की उस ख़ामोषी को
जो मेरे भीतर कहीं
कुकुरमुर्तो की मानिंद
लपेटती जा रही है
और कर रही मेरी ष्वास को अवरूद्ध

सुन सको तो
उस आवाज को सुनो
जिसे सुनकर भी
तुम कर देते हो अनसुना
अपने अंहकार, अपने स्वार्थवष
अपने पुरूषत्व के दंभ में
क्या तुम नहीं जानते कि
मेरे स्वप्न, मेरी महत्वाकांक्षाएं
मेरा समर्पण
हर सीमा-रेखा लंाध
हो चुके तुम में समाहित
सुन सको तो मेरी खामोष
चीत्कार को सुनो

जानते हो बहुत सी
ठंडी रातों में तुम्हारे सामीप्य की अनुभूति से
स्वंय में उस आग को बनाये रखा
जो तुम्हारे होने पर
तुम्हें सुनाते रहे
एक देह के ऋतु स्ंास्मरण
जिसमें तुम भीगते रहे
तृप्त होने तक

फिर भी
तुम मेरे उस मौन इच्छा को
नहीं पढ़ सके
जो तुम में होकर
समाहित हो जाना चाहती थी
तुम्हारे भीतर बसे उस रचना संसार में
जहां मैं थी ही नहीं...!
......


तस्वीर

डाली से
सूख कर
गिरे पीले पत्ते
मेरी ही
तस्वीर का दूसरा पहलू है

.......

सुरक्षा

उनके पास
छतें है
मजबूत दीवारें हैं
सुरक्षा के आधार भी
फिर भी
असुरक्षित हैं
कारण
वे
आस्तीन में पाले हुए है
सांपो को




Friday, May 15, 2020

कोरोना काल में भारत में 2 करोड़ बच्चों का जन्म बेहद चिंता का विषय


कोरोना वायरस के बाद दुनिया वैसी नहीं नहीं रहने वाली जैसी पहले थी. जरूरी है कि अब हम वे गलतियां न करें जो हमने पूरी 20वीं शताब्दी के दौरान और 21वीं सदी में अब तक की हैं. इसका मतलब है कि हमें कुछ बुनियादी सुधार करने होंगे. तभी यह सुनिश्चित हो सकेगा कि हमें फिर कभी ऐसी महामारियों का बड़ी तादाद में प्राणों की बलि देकर मूल्य न चुकाना पड़े...

संयुक्त राष्ट्र बाल कोष यूनीसेफ का अनुमान है कि मार्च में कोविड-19 को वैश्विक महामारी घोषित किए जाने के बाद से नौ महीने के भीतर (दिसंबर) तक भारत में रिेकॉर्ड स्तर पर दो करोड़ से ज्यादा बच्चों का जन्म होने की संभावना है। यूनीसेफ ने आगाह किया है कि दुनिया भर में वैश्विक महामारी के दौरान गर्भवती महिलाएं और इस दौरान पैदा हुए बच्चे प्रभावित स्वास्थ्य सेवाओं के संकटों का सामना कर रहे हैं।

मदर्स डे से पहले यूनीसेफ ने एक आंकलन में कहा है कि दुनिया भर में कोविड-19 महामारी के साए में 11.6 करोड़ बच्चों का जन्म होगा। चीन में 1.35 करोड़, नाइजीरिया में 64 लाख, पाकिस्तान में 50 लाख और इंडोनेशिया में 40 लाख बच्चों के जन्म की संभावना है। कोरोना वायरस को 11 मार्च को वैश्विक महामारी घोषित किया गया था और बच्चों के जन्म का यह आंकलन 40 सप्ताह तक का है। भारत में 11 मार्च से 16 दिसंबर के बीच 20.1 मिलियन यानी दो करोड़ से ज्यादा बच्चों के जन्म की संभावना है।

यूनीसेफ ने इस बात की ओर भी आगाह किया है कि ऐसी स्थिति में कोविड-19 पर नियंत्रण के लिए लागू कदमों की वजह से जीवन-रक्षक स्वास्थ्य सेवाएं, जैसे बच्चे के जन्म के दौरान मिलने वाली चिकित्सा सेवा प्रभावित होगी। जाहिर है इसकी वजह से लाखों गर्भवती महिलाएं और बच्चे गंभीर खतरे का सामना कर रहे हैं। यूनीसेफ ने यह विश्लेषण संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या संभाग के विश्व जनसंख्या अनुमान 2019 के आंकड़े के आधार पर किया है।

कोरोना संक्रमण के समय जब केन्द्र सरकार नागरिकों की मूलभूत जरूरतों को पूरा करने के लिए गुणा-भाग कर आर्थिक पैकेज देकर अपनी दरियादिली पर पीठ थपथपवाना चाह रही तब भविष्स में होने वाले इस जनसंख्या विस्फोट की आहट को नहीं सुन पा रही। इसके लिये भारत को सभी संभावित माध्यमों से अपने संसाधन को और अधिक बढ़ाने की जरूरत होगी। लेकिन क्या जरूरी नहीं कि हर साल बेलगाम सी बढ़ने वाली इस बेल का भी सरकार कुछ सुनोयोजित उपाय करें। बच्चों की बढ़ती संख्या बिहार, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, मध्य प्रदेश, झारखंड और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों के ग्रामीण क्षेत्रों के लिए एक बड़ी चुनौती बने हुए है। अंधविश्वास, अज्ञानता और अषिक्षा के अलावा एक प्रमुख कारण परिवार नियोजन के बारे में लोगों के बीच जागरूकता का अभाव है। यदि नियोजन द्वारा बच्चों को जन्म दिया जाए तो यह जनसंख्या नियंत्रण का सबसे कारगर साधन हो सकता।


दरअसल इस बढ़ती जनसंख्या का सीधा गणित माता-पिता, विशेषकर माता के स्वास्थ्य और शिक्षा के स्तर पर गहराई से संबधित हैं। कोई दंपति जितना निर्धन होगा, उसमें उतने अधिक बच्चों को जन्म देने की प्रवृत्ति होगी। इस प्रवृत्ति का संबंध लोगों को उपलब्ध अवसरों, विकल्पों और सेवाओं से है। गरीब लोगों में अधिक बच्चों को जन्म देने की प्रवृत्ति पुत्र प्राप्ति के अतिरिक्त आर्थिक गतिविधियों में उनसे सहयोग की अधिक होती हैं। एक तरह से कहा जाए तो भारत में गरीब परिवारों में अधिक बच्चों का पैदा करने के पीछे मूल कारण परिवार की आर्थिक और भावनात्मक आवश्यकताओं की पूर्ति करना अधिक हैं।

ब्रिटिश अर्थशास्त्री माल्थस ने ‘प्रिंसपल ऑफ पॉपुलेशन’ में जनसंख्या वृद्धि और इसके प्रभावों की व्याख्या की है। माल्थस के अनुसार, ‘जनसंख्या दोगुनी रफ्तार (1, 2, 4, 8, 16, 32) से बढ़ती है, जबकि संसाधनों में सामान्य गति (1, 2, 3, 4, 5) से ही वृद्धि होती है। परिणामतः प्रत्येक 25 वर्ष बाद जनसंख्या दोगुनी हो जाती है। हालाँकि माल्थस के विचारों से शब्दशः सहमत नहीं हुआ जा सकता किंतु यह सत्य है कि जनसंख्या की वृद्धि दर संसाधनों की वृद्धि दर से अधिक होती है।

यूनिसेफ द्वारा जारी नई रिपोर्ट द स्टेट ऑफ द वल्र्डस चिल्ड्रन 2019 के अनुसार, दुनिया में पांच साल से कम उम्र का हर तीसरा बच्चा या दूसरे शब्दों में कहें तो 70 करोड़ बच्चे कुपोषण का शिकार है ।
बीस साल पहले जब कुपोषण की बात की जाती थी तो सबसे पहले एक दुबले पतले कमजोर बच्चे की छवि दिमाग में आती थी, जिसे खाने के लिए भरपेट भोजन नहीं मिलता था, पर आज कुपोषित होने के मायने बदल रहे हैं। आज भी करोडो बच्चे कुपोषित हैं पर तस्वीर कुछ और ही है, यदि अफ्रीका को छोड़ दें तो आज सारी दुनिया में ऐसे बच्चों की संख्या कम हो रही है जिनकी वृद्धि अपनी आयु के मुकाबले कम है, जबकि आज ऐसे कुपोषित बच्चों की संख्या बढ़ रही है जिनका वजन बढ़ गया है और जो मोटापे की समस्या से ग्रस्त हैं। दुनिया भर में करोड़ों बच्चे ऐसा भोजन करने को मजबूर हैं जो उनका पेट तो भर सकता है, पर उन्हें पोषण नहीं दे सकता। 

आंकड़ों के अनुसार 6 से 23 महीने की उम्र के 44 फीसदी बच्चों को भोजन में फल या सब्जियां नहीं मिलती जबकि 59 फीसदी बच्चों दूध, दही, अंडे, मछली और मांस आदि नहीं मिल रहा। छह महीने से कम उम्र के 5 में से केवल 2 शिशुओं को अपनी मां का दूध मिल रहा है। जबकि वैश्विक स्तर पर डिब्बा बंद दूध की बिक्री 41 फीसदी बढ़ गयी है। जो साफ संकेत है की बच्चों को जरुरी स्तनपान नहीं कराया जा रहा। ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले गरीब परिवारों के 6 से 23 महीने की उम्र के केवल 5 में से 1 बच्चे को पोषित आहार नसीब हो सका ।

वैश्विक भूख सूचकांक (ग्लोबल हंगर इंडेक्स) 2019 में भारत के लिए सबसे चिंताजनक स्थिति बच्चों की कमजोरी को लेकर जताई गई है। सूचकांक में कहा गया है कि भारत के बच्चों में कमजोरी की दर बड़ी तेजी से बढ़ रही है और यह सभी देशों से ऊपर है।
ग्लोबल हंगर इंडेक्स के अनुसार, भारत में 2010 के बाद से लगातार बच्चों में कमजोरी (वेस्टिंग) बढ़ रही है। 2010 में पांच सल तक के बच्चों में कमजोरी की दर 16.5 प्रतिशत थी, लेकिन अब 2019 में यह बढ़ कर 20.8 फीसदी हो गई है।

यूनिसेफ के मुताबिक, बच्चों का कम वजन के साथ कद में भी कमी आने को वेस्टिंग की श्रेणी में रखा गया है। यूनिसेफ का कहना है कि ऐसे बच्चों की मृत्यु होने की आशंका अधिक होती है। बच्चों के कमजोर होने का मुख्य कारण भोजन की कमी और बीमारियां है। रिपोर्ट में कहा गया है कि जिन देशों में वेस्टिंग रेट 10 प्रतिशत से अधिक है, वे बेहद गंभीर स्थिति है और उस पर तत्काल ध्यान देने की जरूरत है। ग्लोबल हंगर इंडेक्स के अनुसार, 6 से 23 माह के 90.4 फीसदी बच्चों को जितने खाने की जरूरत है, उतना नहीं मिल पा रहा है

ग्लोबल हंगर इंडेक्स में भारत का स्थान 102 पर है, जबकि इसमें केवल 117 देशों को ही शामिल किया गया है। इस रिपोर्ट में भारत में भूख का स्तर 30.3 अंक है, जो काफी गंभीर है। यहां तक कि उत्तर कोरिया, नाइजीरिया, कैमरून जैसे देश भारत से बेहतर स्थिति में हैं। पड़ोसी देश जैसे श्रीलंका (66 वां), नेपाल (73 वां), पाकिस्तान (94 वां), बांग्लादेश (88 वां) स्थान पर हैं और भारत से आगे हैं।
इंडेक्स में भारत में उच्च स्टंटिंग (बच्चों का विकास रुकना) दर के बारे में भी चिंता जताई गई है। हालांकि पिछले सालों के मुकाबले इसमें सुधार हुआ है। रिपोर्ट के मुताबिक 2010 में, भारत में पांच वर्ष से कम आयु वर्ग के बच्चों में स्टंटिंग की दर 42 प्रतिशत थी, जो 2019 में 37.9 प्रतिशत है। रिपोर्ट में कहा गया है कि सार्वजनिक स्वास्थ्य महत्व के मामले में दर भी बहुत अधिक है।

कुल मिलाकर इस पूरी बात का इतना सा फसाना है कि संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों के अनुसार 2020 के मध्य वर्ष तक भारत की अनुमानित आबादी 1,380,004,385 का ये डराने वाले फीगर कैसे भी हो नियंत्रित करने के उपायों में ताकत झोंकनी होगी। और ये किया जा सकता है बस कुछ सख्त कानून और जागरूकता अभियानों के कार्यान्वयन में तीव्रता लानी होगी।

Friday, May 1, 2020

तीन कविताएं



भरोसा

नन्ही सी उंगलियां
मासूम सी मुस्कान लिए
कस के पकड़ी थी
मेरा हाथ
चमकती आँखों में यकीन
सुरक्षित हूँ माँ!
मैं तेरी गोद में...

परिपक्व हो चली नन्ही उंगलियां
आत्मविश्वास से भर चुकी
उन आँखों की चमक
मुस्कान में ये अहसास
पकड़ रखा है,
मत घबराना माँ!
सुरक्षित है
तू इन हाथों में...।


चरित्र

देखा है तुम्हें
ऋतुओं की तरह बदलते
अंतर है तो बस इतना
ऋतुएं पलट के आएगीं
लेकिन
तुम नहीं


मौन
एक दीर्घ  श्वास
और फिर
कभी न खत्म होने वाला मौन।

निःशब्द रह गये तुम
और तुम्हारा
पश्चाताप


Tuesday, April 28, 2020

कीड़े निकालने के अलावा और इस समय कर क्या रहा विपक्ष ?




बात सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव से ही आरंभ करती हूं। पिछले तीन दिन के उनके बयानों पर प्रकाश डालना चाहूंगी। पहले आज सुबह के समाचार पत्र में उनकी टिप्पणी-कोरोना संक्रमण झेल रहे किसानों पर बेमौसम बरसात, आंधी, ओलावृष्टि की मार आ पड़ी है और सरकार के पास गेहूं व आम की फसल का ब्यौरा नहीं है। किसान के साथ छलावे की यह घटिया राजनीति भाजपा के चरित्र का ही हिस्सा है। किसानों के हितों की भाजपा सरकार को कोई परवाह नहीं।

26 अपैल को वे फरमाते है कि भाजपा सरकारें राजनीति से बाज नहीं आ रही। प्रदेश में कम्युनिटी किचन और आरआरएस के भंडारे में कोई फर्क नहीं दिखता। खाद्य साम्रगी को संघ अपनी बताकर मोदी थैली में भरकर भाजपाई परिवारों में बांट रहा है। ...भाजपा की सरकार क्या संघ का एंजेंडा बनाने के लिए चुनी गई है।

27 अप्रैल को वे राज्य कर्मचारियों के डीए और भत्ते रोकने के फैसले पर अपना बयान जारी करते है। उनके कथनानुसार ये भत्ते रोकने से अल्पवेतन भोगी कर्मचारियों की घरेलू अर्थव्यवस्था बिगड़ जाएगी। बेहतर हो कि सरकार अपनी फिजूलखर्जी पर रोक लगाये।

अब सवाल यहां ये है कि सरकार के हर फैसले के विरूद्ध खड़ा होना ही है तो तर्कसंगत ढग से क्यों नहीं खड़े होते   अचानक ही बिगड़े मौसम में किसानों का दर्द समझ में आपको विपक्ष में रहकर ही क्यों आता है जबकि सरकार-प्रशासन-अधिकारी कोरोना को थामने में उलझे पड़े है। क्या आप नहीं जानते कि हो चुके नुकसान का ब्यौरा जुटा पाना इतना भी आसान नहीं और जल्दी तो कतई नहीं। ऐसे में वही आश्वासन दिये जाते है जो मूलतः कोई भी सरकार देती है। कुछ समय बीत जाने के बाद अगर आपको इस संदर्भ में उचित कारवाई होते न दिखे तो आपका सवाल लाजिमी बनता है।

फिर संघ का एजेंडा और कम्युनिटी किचन जैसे आरोप अखिलेश जी जैसे व्यक्तित्व पर शोभा नहीं देते। सबूत और तर्क की बिना पर कुछ भी बोल देना वह भी ऐसे नाजुक समय पर उचित नहीं है। जनता आपसे भी तो सवाल कर सकती है कि आपकी पार्टी ऐसे नाजुक मौके पर क्यों नहीं कुछ ठोस काम कर रही। अखिलेश जी! जनता सब समझती है और नजर भी रखती है कि कौन-कब उसके साथ खड़ा है या क्यूं नहीं है। चंद लोगों को खुष करने के लिए बयान दे देना किसी बड़ी पार्टी के बड़े नेता के लिए रूचिकर नहीं लगता।

मैे कोई भाजपा की अंधभक्त फैन नहीं। बहुत से ऐसे मौके आये है जब मैंने भाजपा की कई नीतियों पर अपना ऐतराज भी जाहिर किया और सपा काल को जमीनी कार्यों में योगी सरकार से बेहतर माना। लेकिन मौके की नजाक़त देखकर अपनी बात को न रखना किसी भी जिम्मेदार व्यक्ति के लिए प्रशंसनीय नहीं हो सकता। उसके लिए मीडिया को ही रहने दें जो एक अर्से पहले अपनी सामाजिक जिम्मेदारियों को 'टीआरपी' की भेंट चढ़ा चुका। हमारे जिम्मेदार नेताआंे को तो ऐसे तनाव भरे माहौल में सरकार और जनता के हित में खडे़ होना चाहिए। आपने कहा कि बेहतर हो कि सरकार अपनी फिजूलखर्जी पर रोक लगाये। येे बात आप किसी और मौके पर कहते तो शायद उतनी न खटकती, लेकिन जब सरकार आने वाले समय को चुनौती मान कर हर क्षेत्र में हर संभव पैसा बचाने का उपक्रम कर रही, उस समय आपकी ओर से फिजूलखर्ची का कोई ठोस सबूत दिये बिना ये कहना वाजिब नहीं लगता। हर बात पर मीनमेख निकालना ही राजनीति नहीं या फिर महज खबरों में बने रहने के लिए कुछ भी कह देना तो जरूरी नहीं। बेवजह बातों का राजनीतिकरण करना आंख में किरकिरी पैदा करता है और मत भूलिए, जनता इसे याद रखती है। हां, राजनीतिक बिसात पर जरूर वैमनस्य को याद रख कर अपनी चालें नहीं चली जा सकती।

अब बात बसपा नेत्री की। बसपा सुप्रीमो कोरोना वायरस की जांच बढ़ाने और प्रवासी गरीब मजदूरों को भरपेट भोजन की व्यवस्था की मांग कर रही। उनके अनुसार सरकार को चाहिए कि लाॅकडाउन से प्रभावित लोगों को सरकार जल्द से जल्द अपने घर पहुंचाएं। मांग तो उनकी उचित है। संदेह भी नहीं कि इस पर सरकार और प्रशासन ने अपने पूरी ताकत झोंक रखी  है। लेकिन यहां भी जनता का बसपा सुप्रीमो से सवाल है कि इस तरह की मांग के अलावा बसपा पार्टी अपने गरीब-दलित -वंचित लोगों के लिए क्या कर रही?



मुझे माफ करियेगा अगर इस संक्रमण के भयानक दौर में किसी भी विपक्षी पार्टी के द्वारा किए गए सराहनीय प्रयासों को देखने से मैं चूक गई हूं तो। लेकिन सुबह से लेकर शाम तक समाचारों को देखते-पढ़ने में कहीं मुझे इनके किसी भी तरह के सहयोगी प्रयासों की झलक भी देखने को नहीं मिली। दर्द-तकलीफ हम सब देखते है लेकिन उसको स्वंय पर लादने से दूर भागतेे है। विपक्ष में बैठ कर ये भूल जाते है कि हम भी कभी सत्ता में थे और किस तरह से अपनी कार्यो और नीतियों को सामने रख कर अपने मुहं मियां मिटठू बनते थे। कलई तो तब खुलती जब जनता जनार्दन अपनी पसंद को मुहर लगा आपको ख़ारिज कर देती है।

चलते-चलते क्रांग्रेस और उनके दिग्गज नेताओं की भी बात कर लें। सोते-सोते जागते इनके नेताओं को भी गाहे-बगाहे ऐसे मौकों पर कुछ तड़का डाल देने का मन करने लगता है। कभी खराब पीपीई किट की आपूर्ति तो कभी कोरोना टेस्टिंग में बरती जानी वाली पारदर्शिता पर सवाल तो आम बात है। प्रियका गांधी का टवीट् पीपीई किट की खराब सप्लाई के मामले में योगी सरकार को कठघरे में खड़ा करता है। गोया खराब किट की सप्लाई का मिलना सरकार के लिए बेहद सम्मानजनक बात हो। उधर आर्थिक मामलों के प्रकांड विद्वान मनमोहन सिंह भी राष्ट्रीय तौर पर आने वाले आर्थिक आपदा की जगह सरकारी कर्मियों के भत्ते को लेकर चिंतित है जिसे सिर्फ एक साल के लिए टाला भर गया है न कि निरस्त किया गया। पार्टी नेता राहुल गांधी ट्वीट कर गुजरात में फंसे आंध्र प्रदेश के 600 मछुआरों को निकालने के लिए मदद देने की मांग कर रहे। उनका कहना है इन मछुआरों के पास पर्याप्त खाना और पानी नहीं है। हैेरानी होती है इस तरह की समस्याओं के लिए सरकार का मुंह तकने वाली पार्टियों से और उन लोगों से जो खुद बरसों सत्ता में रह चुके है और आज भी दूसरी बड़ी पार्टी होने का दावा करते है।

बड़े तो बड़े छोटे मियां सुभानअल्लाह! आगरा प्रदेष कांग्रेस के अध्यक्ष अजय कुमार लल्लू आगरा माॅडल के पंचर होने की दुहाई दे रहे। आगरा और आगरा के लोगों को लेकर बेहद चितिंत लल्लू जी, बजाय इसके कि वह खुद आगरा माॅडल को सफल बनाने में अपना हाथ आगे बढ़ाये, योगी सरकार का कोरोना मरीजों के प्रति अमानवीय चेहरा दिखाने में सक्रिय है।

कोरोना महामारी के समय जब हर आम व्यक्ति सरकार प्रषासन को सहयोग देने का भरसक प्रयास रहा है तो क्या देश की ’सो काल्ड’ बड़ी पार्टियों का फर्ज नहीं बनता कि वे भी इस आपदा के समय राजनीति छोड़कर कंधे से कंधा मिलाकर अपनी पार्टी के रसूख को मद्देनज़र रख कोरोना पीड़ितों की मदद को आगे आए। सरकार की मदद कर मिसाल कायम करें और दिखा दें कि हिन्दुस्तान ऐसा मुल्क है जहां राजनैतिक पार्टियां निजी स्वार्थ से उठकर आपदाओं का मिलकर सामना करती है। वोट बैंक से इतर ’इंसानियत’ और धर्म-मजहब से हटकर ’राष्ट्रधर्म’ को सर्वाेपरि समझ अपने कत्र्तव्य का निर्वाह करतीं हैं।

काश!!!

Friday, April 24, 2020

पहली मुलाक़ात





याद है तुम्हें...
हमारी वो पहली मुलाक़ात,
तुम दरवाजे पर खड़े थे,
अपनी मोहिनी मुस्कान लिए
और सम्मोहित सी मैं
कुछ अर्नगल बोलती,
भीतर ही भीतर गुदगुदाती
ले आई थी तुम्हें घर के भीतर,
और...फिर
क्या कहें, क्या न कहें के बीच
औपचारिकता भरी वो हमारी बातें
न जाने कब
बांधने लगी मन को मन से
हमें पता ही न चला...

सच कहूं जो तुमसे कभी न कहा
उस वक्त
उछलते-कूदते मन को मैं
बड़ी कठिनाई से थाम रही थी
तुम्हारी नजरों को
मन की थाह लेने से रोकने का असफल प्रयास कर रही थी
सच्ची-सीधी-सरल सी लगती तुम्हारी बातें
मेरे एकाकी मन को
अपनेपन का बोध करा गए
और तुम्हारी नजरों की वो बेबाकी
न जाने कब
मेरे मन के सोये हुए तार को
जगा गए कि
मुझे पता ही न चला

और फिर जब तुम जाने के लिए उठे
वो कलेजे में उठी कसक
आज भी याद है मुझे
वक्त के वहीं ठहर जाने की तड़प
और थोड़ी देर तुम्हें रोक लेने की ख़्वाहिष
सब जैसे आज भी उसी पल में थम से गये हो
फिर मिलने की औपचारिकता के बीच
एक दूसरे को भर लेने की चाहत को
हम दोनों ने ही छुआ
और जब
तुमने अपने संकोच की दीवार को तोड़
मेरे लरजते हाथों को थामा था....
उस पहली छुअन को याद कर
आज भी असीम सुख से भर जाती हूं...

सच कहती हूं
मैं उस पहली मुलाक़ात को आज भी
नहीं भूल पाती हूं





Thursday, April 16, 2020

सावधानी हटी, दुर्घटना घटी यानी संक्रमण से ‘लाॅकडाउन‘ भला


मौत का ज़हर है फिज़ाओं में, अब कहां जा के सांस ली जाए,
बस इसी सोच में हूं डूबा हुआ, ये नदी कैसे पार की जाए।

राहत इंदौरी के लिखी इन पंक्तियों में नोवल कोरोना नाम के खौफनाक वायरस की गिरफ्त में जकड़े लाचार विश्व की दषा साफ बयान होती है। पूरी दुनिया के लोग आषंकित से घरों में बंद होने को मजबूर है। अनिश्चतकाल-आपातकाल-त्रासदी-विभीषिका जैसे लफ्ज़ भी इसके आगे बौने हो रहे। वैश्विक अर्थव्यवस्था तक को ताला लग चुका है। गिरगिट की तरह रंग बदलती इस महाभंयकर महामारी से बचने का एकमात्र उपाय फिलवक्त तो घर में स्वंय को कैद कर लेना है। जरा सी लापरवाही क्या विस्फोट कर दे, ये उन देषों के हालत देखकर समझा जा सकता है जिन्होंने इसे हल्के में लिया।

हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के टीएच चैन स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ के वैज्ञानिकों को इस बात का अंदेशा है कि लापरवाही हुई तो आने वाले समय में वायरस और अधिक घातक और जानलेवा रूप धारण कर लेगा। शोधकर्ताओं के अनुसार सामाजिक दूरी का सख्ती से पालन होगा तभी वायरस को दोबारा फैलने से रोका जा सकता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि वायरस इंफ्लूएंजा के तौर पर दुनियाभर में रहे है। इस आधार पर कम से कम मौजूदा हालात को देखते हुए 20 सप्ताह यानी 140 दिन तक हर हाल में सावधानी बरतनी होगी। शोधकर्ताओं का मानना है कि कोरोना समय-समय पर रंग बदलने वाला वायरस है जो बेहद खतरनाक है। किसी में इसके लक्षण दिखते है तो कोई बिना लक्षण के ही इसकी चपेट में आ जाता है। चीन में हालात सामान्य होने के बाद अचानक से इसकी वापसी हो गई। ऐसा कहीं भी हो सकता है। ऐसे में इसे दोबारा फैलने से रोकने के लिए सावधानी ही सबसे बेहतर उपचार है।

एक अध्ययन में यह भी दावा किया गया है कि कोरोना वायरस के मरीज बीमारी के लक्षण दिखने से दो या तीन दिन पहले ही कई लोगों को संक्रमित कर सकते हैं। हांगकांग यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं के मुताबिक, अध्ययन में पाया गया कि संक्रमण के संपर्क में आने और लक्षण दिखने के बीच अवधि अगर कम है तो यह लक्षण दिखने से पहले भी संक्रमण फैला सकता है। चीन के गुवांग्झू के अस्पताल में भर्ती 94 मरीजों के वायरल शेडिंग के अस्थायी पैटर्न का आंकलन किया गया। नेचर मेडिसिन जर्नल में छपे अध्ययन के मुताबिक, लक्षण दिखने के बाद नियंत्रण उपाय करने से इस बीमारी को फैलने से काफी हद तक रोका जा सकता है। हालांकि कई कारक हैं जो इन उपायों को प्रभावित कर सकते हैं। इन मरीजों में गले के स्वैब लेने के बाद दो से तीन दिन बाद कोरोना वायरस के लक्षण दिखाई दिए। अध्ययन के मुताबिक, 414 स्वैब का परीक्षण किया गया, जिसमें पाया गया कि लक्षण की शुरूआत से पहले इन मरीजों में संक्रमण फैलाने का लोड अधिक था।



कहने का मतलब है कि जितने भी शोध इस वायरस को लेकर सामने आ रहे है उन्हें किसी भी हालत में नजरअंदाज करना उचित नहीं। चीन ने क्या किया, क्या नहीं या उसे क्या करना चाहिए था, की जगह हम अगर अब क्या करें, क्या न करें पर काम करें तो बेहतर होगा। गौर करने की बात ये है कि यह वायरस अमीर-गरीब, गोरा-काला, ऊंच-नीच, धर्म-कर्म देखकर अटैक नहीं कर रहा है। ब्रिटिष नागरिक हो या ब्रिटिष राजकुमार, न्यूयार्क जैसा वैभवषाली देष हो या दुुनिया के गरीब देष सभी इस वक्त इस आपदा से ग्रसित है। एक विशेषज्ञ ने तो बहुत पहले ही कह दिया था कि इस वायरस की चपेट में दुनिया के 80 प्रतिषत लोग आएंगें। वायरस के फैलते संकमण को देखते हुए फरवरी 2020 से कई देषों में अलर्ट जारी किए जाने लगे थे। फिर भी जानते-बुझते की जाने वाली लापरवाही को आप क्या कहेगें? धर्मान्ध और कट्टर लोग, चाहे वे किसी भी सम्प्रदाय के हो, मानवता को अपने स्वार्थवश नुकसान पहुंचाते आये है। चाहे वे भारत में तब्लीगी जमात वाले हो जिन्होंने चेतावनी के बावजूद देशी-विदेशी लोगों का जमावड़ा किया या फिर लुसियाना के धर्मगुरू टाॅम स्पेल जिन्होंने चेतावनी को मानने से इंकार कर दिया और गिरिजाघर खुला रखा, लोगों को इकट्ठा भी किया। इसराइल के हेल्थ मिनिस्टर ने भी सिनेगाॅग खोलकर लोगों को एकत्र किया। उन्होनें यहां तक कह दिया कि प्रार्थना करने से कोरोना नहीं होगा। आज खुद संक्रमित है।

यू ंतो इस वायरस की अनदेखी किए जाने को लेकर डब्ल्यूएचओ की भूमिका भी संदेह के घेरे में है। फिर भी अपने पर लगे आरोपों से खुद को बचाने में लगे डब्ल्यूएचओ की इन बातों को फिलहाल नजरअंदाज करना ठीक नहीं होगा कि लॉकडाउन से कोरोना वायरस को रोकने में क्या सफलता मिली है, इसका आंकलन करने के लिए भी दो हफ्ते का और इंतजार जरूरी है। इस आंकलन के बाद ही प्रतिबंधों को ढीला करना चाहिए और जब तक वैक्सीन नहीं बन जाती तब तक लापरवाही बरतना खतरनाक सिद्ध हो सकता है। फिलहाल तो वैक्सीन बनाने में दुनियाभर के वैज्ञानिकों को अभी तक कोई कामयाबी नहीं मिल पाई है। कुछ दावा कर रहे है उन्होंने इसमें सफलता प्राप्त करने की कगार पर है तो कुछ ये भी मानते हे कि 2021 से पहले इसकी वैक्सीन की खोज मुश्किल है।

वैज्ञानिकों का तो ये भी मानना है कि कोरोना से बुरी तरह प्रभावित देश अमेरिका को 2022 तक सोशल डिस्टेंसिंग का पालन सख्ती से करना होगा हालांकि अमेरिकन प्रेसीडेंट कर रवैया इससे उल्ट ही दिखता है। आज अमेरिका के जो हालात है वह उनकी लाॅकडाउन की घोषणा में की गई देरी का नतीजा है। पर जिद्दी और अहमक राष्ट्रपति का अपरिपक्व अंदाज आज अमेरिका को जिन हालात में ले आया वो इस शक्तिशाली देष के नेतृत्व की खिल्ली ही उड़ा रहा। इस लेख के लिखे जाने तक, अमेरिका के जॉन्स हॉप्किन्स विश्वविद्यालय के अनुसार, 24 घंटे में 2600 लोगों की मौत हुई। इसके साथ ही अमेरिका में मृतकों की की कुल संख्या 28,326 पहुंच गई है जो किसी भी देश के मुकाबले मृतकों की सबसे अधिक संख्या है। सबसे बुरे दौर से गुजर रहे अमेरिका के लिए राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का 15 अप्रैल को दिया गया ये बयान हास्यास्पद लगता है कि अमेरिका कोरोना वायरस महामारी के सबसे बुरे दौर से निकल चुका है और वह 16 अप्रैल को अर्थव्यवस्था को फिर से खोलने के लिए दिशानिर्देशों की घोषणा करेंगे। मानव हित साधने के बजाय राजनीतिक हित साधना आपकी अदूरदर्षिता का परिचय देते है ये कौन अब अमेरिकी मुखिया को बताये?

कोरोना वायरस की तुलना ‘सार्स‘ और ‘प्लेग‘ के करीब-करीब या उससे अधिक भयावह रूप में की जा रही है। हालांकि प्लेग के समय मेडिकल सुविधा इतनी प्रभावी नहीं थी जितनी की सार्स के समय तक हो चुकी थी। प्लेग की त्रासदी झेल चुकी उत्तर प्रदेश में बांदा के अतर्रा में रहने वाली 120 साल की जनिया देवी, कोरोना को प्लेग से बड़ी महामारी नहीं मानती। उन्होंने प्लेग का विकराल रूप देखा था। 1920 में देश में फैली प्लेग महामारी में उनके पति समेत 11 परिजनों की मौत हो गई थी। उन्हें आज भी याद है गांव के लोग एक शव का अंतिम संस्कार करके लौटते थे तो घर पर एक और शव मिलता था। बहुत से शवों को मिट्टी में दफनाना पड़ा था। दफन करने की नौबत इसलिए आई क्योंकि जलाने के लिए लकड़ी की कमी हो गई थी। दहशत इतनी थी कि लोग जल्द से जल्द लाश से छुटकारा पाना चाहते थे। तब इस महामारी से बचने के लिए बाकी बचे गांव के लोगों ने जंगलों में शरण ली थी। हौसले की बानगी जनिया कहती है कि ”उ जमाने मा तौ वैद्य तक नाहीं रहैं, अब तौ हर गांव में डागडर (डाक्टर) हवैं। डरने की कौनो बात नाहीं।”

प्लेग एक तरह का बैक्टीरिया था ,जो छूने से फैलता था। चूहे (रोडन) से होता था, जो मक्खियों से मनुष्य तक पहुंचता था। तेज बुखार, शरीर में तेज दर्द सहित शरीर की ग्रंथियों में सूजन आने के बाद तत्काल मृत्यु होती थी। यह महामारी हॉन्ग कॉन्ग से भारत में आई थी। 1920 में महामारी भारत में अपने चरम पर थी।

आज महामारी से जूझते विश्व के सामने आर्थिक समस्यायें मुंह बांयें खड़ी है। घर में और कई दिन बंद होने के ख्याल भी खासा मानसिक संतुलन बिगाड़ने वाला है। लेकिन हमें नहीं भूलना चाहिए कि इस वक्त लाॅकडाउन मानव सभ्यता को बचाने के लिए बेहद जरूरी है। मशहूर वास्तुविद् और जियोपैथिक रेडिएशन एक्सपर्ट अजय पोद्दार से मैं सहमत हूं कि अपने कृत्यों से मानव ने प्राकृतिक पर्यावरण को बहुत नुकसान पहुंचाया। लोग सोचते है कि एक दिन सब अपने आप ठीक हो जाएगा। आशावाद जीवन में सकारात्मकता लाता है, लेकिन कोरा आशावाद कई बार पलायनवादी भी बन जाता है। प्रकृति की व्यवस्था में जो होता है, बहुत ही सुव्यवस्थित तरीके से होता है। कुदरत के पास कोई कितु-परंतु नहीं है। एक हाथ ले, दूसरे हाथ दे जैसा न्याय है। ये वक्त जीने के लिए आशावादी होने के साथ-साथ व्यवहारिक और यथार्थवादी होने का भी है। इसलिए प्रकृति की समस्याओं से अब और अनजान बने रहना उचित नहीं।

दि न्यूयार्क टाइम्स में टिमोथा एगन के अनुसार हर संकट कोई अनजान रास्ता खोल देता है। देखते ही देखते असंभव से लगने वाली बात संभव हो जाती है। अल्पावधि की किसी तेज दौड़ में इतिहास अंधेरे की ओर ले जा सकता है या प्रबुद्ध जननीति के लिए नया दिन साबित हो सकता है। अमेरिकी इतिहास की महान घटनाएं, जैसे दास प्रथा से मुक्ति, सामाजिक सुरक्षा, साफ हवा-पानी पर अधिकार, इन सभी का जन्म हादसों से ही हुआ। अभी हमारे लिए कोरोना वायरस ही दुख का महाकाव्य है और कई महीनों तक इसकी विभीषिका जारी रहने वाली है। मगर, देखा जाए तो तमाम तकलीफों, प्रियजनों को खोने के दुख और आइसोलेशन में अकेलेपन के बीच हमारे पास एक अवसर है यह विचार करने का कि हम अपनी दुनिया फिर से कैसे रच दें।

इस लाॅकडाउन का पालन करते हुए स्वंय को-अपनों को संक्रमित होने से बचाते हुए नई दुनिया का संकल्प रचते हुए हम क्यों न उस चेतावनी को बार-बार जेहन में बनाये रखें, जो लंबी यात्रा के दौरान घुमावदार रास्तों में अक्सर हमें अलर्ट करता रहता है -सावधानी हटी दुर्घटना घटी !!! 



Wednesday, April 1, 2020

ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है!

अष्टमी है आज। सामान्य दिनों में आज के दिन बच्चे सुबह से ही नहा-धोकर नइ्र्र फ्राक लंहगा पहन हो-हल्ला शुरू कर देते थे। कई दफे तो उनकी, किस घर में कौन जाएगा, की सेंटिग देखकर मुझे हंसी आती थी। इन बच्चों की आवाज से कालोनी गुलजार रहती है और आज ये कैसी अजीब सी सुबह है। मरघट सा सन्नाटा। मां दुर्गा रक्षा करें इस दुनिया की...



आज कोरोना वायरस से संक्रमित लोगों का आकंड़ा 8 लाख पार चुका है। मरने वालों की संख्या 40000 तक पहंुच रही है। लाॅकडाउन का पालन करते लोग अपने-अपने घरों में डरे बैठे है। इस अदृष्य वायरस ने उन्हें अपनों को भी संषकित नजरों से देखने को मजबूर कर दिया है। यकीनन यह युद्ध नहीं है पर युद्ध से भयावह स्थिति है। युद्ध में आप प्रत्यक्ष विरोधियों से लड़ते हो पर यहां आप किससे लड़ रहे हो, कैसे लड़ना है जैसी परिस्थितियों से आये दिन लड़ रहे हो। दोष किसका है ये बेमानी है। ये क्यूं है ये महत्वपूर्ण है।

बढ़ती राष्ट्रवाद की भावना ने जब से जोर पकड़ा, लगभग हर देश किसी न किसी समुदाय से ख़तरा महसूस करने लगा है। स्वंय को श्रेष्ठ समझ कर व्यक्ति दूसरों के धर्म-जीवन शैली को कोसता है। और ऐसे विचारों की आग को हवा देने में, भारी वोट बैंक की चाह रखने वाले देश-दुनिया के सत्तालोलुप, सबसे आगे है। कहीं और जाने की जरूरत नहीं, अपने भारत में ही सांप्रदायिक समीकरणों की वजह से सामाजिक समीकरण बिगड़ते देखे गये। अपनी -अपनी रोटी सेंकते नेता संगठन देष-काल-क्षेत्र से परे इंसानियत मानवता का नैतिक पाठ भूल बैठे। इंसान से बड़ा धर्म को मानने वाले जाहिलों की वजह से दुनिया की आबोहवा बद से बदतर होती जा रही। निजामुद्दीन मरकज में तब्लीगी जमात की सभा इसी का एक उदाहरण है। इंसान को कौम के नाम पर देखने वाले ये भूल जाते है कि मौत आने से पहले आपका धर्म या मजहब नहीं पूछती है। इस वायरस से इन धर्म-देश के ठेकेदारों को समण्ने में क्या मुष्किल पेष आ रही कि यह देष-काल-मजहब से परे अपना जाल फैला रहा है या कहें लोगों को निगल रहा। कट्टरपंथी सत्तालोलुप नेताओं की एक-दूसरे के विचारों का नीचा दिखाने या ना मानने या यूं कहें प्रयोगों से पूरी दुनिया आहत हुई बैठी है। युद्ध के जरिए एक दूसरे को मानसिक और शारीरिक रूप से जर्जर करने वाले देशों को काष! ऐसी स्थिति में हमें अगर शांति और सद्भाव का मतलब समझ आ जाये तो ये वायरस कम से कम दुुनिया भर के जीवन और समुदायों के लिए मानवता परम धर्म की लकीर खीेंचने कामयाब हो जाएगा।

लेकिन अफसोस! ऐसी बातें हो पाना महज काल्पनिक स्वप्न से अधिक कुछ नहीं है।

हैरानी इस बात की भी होती है कि हम दूसरों का आंकलन करते समय खुद का गिरेबान झांक कर क्यूं नहीं देखते। हम क्यूं महसूस नहीं करते कि किसी भी देष या इंसान की तक़लीफ मेरे देश या मेरे कष्ट से कम या अलग कैसे हो सकती है? हम अपनी थाली तो तमाम तरह के व्यंजनों से सजी देखना चाहते है पर उसकी अनाज की जरूरत को नजरअंदाज करते है जो एक जून खाकर किसी तरह अपना जीवनयापन कर रहा है। अपने आलीशान बंगलों में बैठे इसकी कल्पना करना क्यों छोड़ देते है कि बिना छत के रहना क्या होता है? गरीब की बेसिक जरूरत किसी भी धनवान की बेसिक आवष्यकता से परे कैसे हो सकती है। साधारण से जीवन मूल्यों को हम विकास की अंधी दौड़ में शामिल होने के पीछे गंवाते जा रहे है। सच तो ये है कि मानवता का पाठ भूलकर अनजाने में ही हम दानवता का पाठ ग्रहण करते जा रहे है।

सवा अरब की जनसंख्या वाले भारत में आज भी छोटे काम करने वालों को हेय दृष्टि से देखा जाता है. चाहे वह घर में काम करने वाली बाई हो या कचरा उठाने वाला कर्मचारी या घर तक सामान पहुंचाने वाला डिलीवरी बॉय। लेकिन क्या कभी आपने इस बारे में सोचा कि जो सुबह-शाम हमारे घरों की छोटी कभी-कभी बड़ी लगने वाली परेषानियों को चुटकियों में दूर कर देते है वे ये करने से मना कर दे ंतो क्या होगा। हमारे यहां व्यवसाय का सम्मान उसके क्लास को देखकर किया जाता रहा है। 21वीं सदी में है फिर भी, आज भी ये परंपरा बदस्तूर जारी है। हम पैर से रिक्षा खींचने वाले से हद तक नीचे जाकर मोल-भाव करेगे वहीं उबर-ओला टैक्सी वाले को उतनी ही दूरी का तय पैसा बिना बहस के दे देगें। अगर आप ध्यान दें तो संकट के इस वक्त में बड़े फैसले और ‘महत्वपूर्ण’ काम करने वाले ज्यादातर लोग घरों में बंद हैं और मूलभूत काम करने वाले सड़कों पर या अन्य जरूरी काम मे लगे हैं। आप जानते हैं क्यों? क्योंकि आपकी जरूरतों को वे पूरा कर सकंे। हालांकि आपको इस वक्त कई ऐसे छोटे काम करने वालों के ना होने का भी अहसास पीड़ा दे रहा हो जो आपके दिनचर्या के बेहद जरूरी हिस्से रहे है। लेकिन क्या इस अहसास को आप तब भी याद रख सकेगे जब जीवन सामान्य गति में उतर आएगा? संभवतः नहीं।

गत दिनों मेरे एक मित्र ने कहा कि इस समय का उपयोग करंे। साफ-स्वस्थ हो चली हवा से फेफड़ों को मजबूत करें। बात सही थी। आंकड़ें को देखा जाये तो 26 मार्च, 2020 को नोएडा का एयर क्वालिटी इंडेक्स 77 का था. जबकि 2019 में इसी तारीख को यह आंकड़ा 156 यानी इसके दुगने से भी ज्यादा था. लॉकडाउन के चलते स्वस्थ जीवन का सबसे अहम पार्ट स्वच्छ ताजी हवा की गुणवत्ता अचानक बढ़ गई है. यह देखना थोड़ा खुशी देता है कि दिल्ली-एनसीआर जैसे इलाकों में भी आजकल चिड़ियों की चहचहाहट सुनाई देने लगी है.

लेकिन सवाल वही आखिर कब तक? लाॅकडाउन हटा नहीं कि लोग फिर विकास की दौड़ के नाम पर अपनी-अपनी गाड़ियां लेकर निकल पडे़गे, फैक्ट्रियां नियमों को ताक में रखकर फिर से काम करने लगेगी। अभी हम जो दूर होकर भी एक है, पल में फिर अपनी-अपनी वजहों से तलवारें खींचकर एक-दूसरे के सामने खड़े होगें, उसके चरित्र इसकीे असफलता की बयानबाजी पर उतर आयंगें। एक बार हम फिर सुबह के निकले रात घर आने भर की औपचारिता निभाने में मषगूल होगें। हम भूल जाएंगे कि इस लॉकडाउन ने हमें नियमों में रहकर जीवन जीने का, परिवार के साथ वक्त बिताने का, पुराने दोस्तों और छूट चुके रिश्तेदारों को याद करने और उनसे फोन या मैसेजिंग के जरिये संपर्क में बने रहना बताया।

क्या आपको महसूस नहीं होता कि संभवतः यूनीवर्स ने हमें ये समय आत्मचिंतन के लिए ही दे दिया हो? जरा सोच के देखें।

कुदरत के साथ हमारे द्वारा किये जाते नित नये खिलवाड़ ने हमें चेताने के लिए ये खेल खेला हो कि जब इंसान ही नहीं बचेगा, तुम्हारे अपने ही नहीं बचेगें तो किसकी सुरक्षा के नाम पर तेल, पानी, हथियारों का जमावड़ा करोगे। बेतरतीब से काटते जंगलों को किसके नाम पर कालोनियां बसाने के लिए आबाद करोगें। सोचो और संकल्प करो कि तुम दुनिया इंसानों के लिए बनाना चाहते हो ना कि अपनी बढ़ते लालच की इमारत को बुलंद करने के लिए। साफ हवा, हरियाली, साफ नदियां, समृद्ध ज्ञान, स्किल्ड प्रतियोगिता, मुस्कुराते चेहरे, खिलखिलाता बचपन, स्वस्थ शरीर, और लहलहाते खेत खलिहान-क्या इस तरह की देश की परिकल्पना करना मुष्किल है।

कोरोना वायरस लाखों की बलि लेकर अगर शक्तिषाली देषों-नेताओं को मानव जीवन के असल आवश्यक मूल्यों को समझाने में कारगर साबित होता है तो मैं भी इनमें से एक होने को तैयार हूं। हमें सदैव ये याद रखने की जरूरत है कि पंचतत्वों से हम है हमसे पंचतत्व नहीं। इसलिए इनकी रक्षा जान देकर भी करनी पड़े तो पीछे नहीं हटे क्योंकि ये सुरक्षित और समृद्ध है तो ये दुनिया, देश-सीमाएं, घर-परिवार और हमारी आने वाले पीढ़ियां सुरक्षित है।

अंत में बस इतना कहना चाहूंगी कि यह ऐसी भयावह चुनौती है जिससे हम कब उबरेगें, पता नहीं। लेकिन यकीन मानिए यही वह समय है जबकि अपनी परंपराओं के दार्षनिक और आध्यात्मिक संसाधनों को खंगालना आरंभ करना होगा और एकजुटता, भरोसा, उम्मीद, दया का प्रदर्षन करते हुए एक सुर में कहना होगा कि ये विभीषिका हम पर भारी हो सकती है पर हमें तोड़ नहीं सकती। हमें कुदरत स्वंय के पुर्नमूल्यांकन का समय दे रही है और चेता रही है कि देष-काल-सीमाओं से उठकर कर हम स्वस्थ मानसिकता के साथ स्वस्थ खुषहाल मानव जीवन के लिए काम करें। एक दूसरे की उन्नति में अपनी उन्नति का पाठ पढ़ना और पढ़ाना सीखें। अन्यथा आने वाली नस्लें जिंदा रह भी गई तो यही कहती पायी जायेगीं-

ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है...?