Thursday, May 28, 2020

कुछ कविताएं डायरी के पन्नों से


कहीं भी या कहीं भी नहीं

कभी हम भी थी हरी-भरी पत्तियां
अपने भीतर के
बंसत से पुलकित, हरित।
अब हम हैं
सूखी हुई
झरी हुई पत्तियां
पतझड़ के स्मृति-चिह्न
उस निर्णायक झोंके की
प्रतीक्षा में जो,
उड़ाकर ले जाएगा
कहीं भी या कहीं भी नहीं।
.........

भ्रम

दिखते नहीं
साये
सुनाई देती है
महज आवाजें उनकी
........


अहसास

जानते हो
मेरे घर की
दीवारें करती है
याद तुमको
जिनके सहारे खड़े होकर
तुमने गढ़ा था
कुछ सच-कुछ झूठ
धड़कता है दिल
हर उस चीज का
जिन्हें छुआ था तुमने
मेज, कुर्सी, कटोरी, चम्मच
और जाने क्या-क्या
उन पर जमे अवसाद के
हर कण को
आज भी
इंतजार है तुम्हारी आहट का
ये सब जानते है
तुम नहीं आओगे
पर तुम्हारे होने का
अहसास ही
है अब इनके
और मेरे
जीवित होने का कारण
........

समर्पण

प्रिय!
आज तुम्हें सुनना ही होगा
मेरे अंतर्मन की उस ख़ामोषी को
जो मेरे भीतर कहीं
कुकुरमुर्तो की मानिंद
लपेटती जा रही है
और कर रही मेरी ष्वास को अवरूद्ध

सुन सको तो
उस आवाज को सुनो
जिसे सुनकर भी
तुम कर देते हो अनसुना
अपने अंहकार, अपने स्वार्थवष
अपने पुरूषत्व के दंभ में
क्या तुम नहीं जानते कि
मेरे स्वप्न, मेरी महत्वाकांक्षाएं
मेरा समर्पण
हर सीमा-रेखा लंाध
हो चुके तुम में समाहित
सुन सको तो मेरी खामोष
चीत्कार को सुनो

जानते हो बहुत सी
ठंडी रातों में तुम्हारे सामीप्य की अनुभूति से
स्वंय में उस आग को बनाये रखा
जो तुम्हारे होने पर
तुम्हें सुनाते रहे
एक देह के ऋतु स्ंास्मरण
जिसमें तुम भीगते रहे
तृप्त होने तक

फिर भी
तुम मेरे उस मौन इच्छा को
नहीं पढ़ सके
जो तुम में होकर
समाहित हो जाना चाहती थी
तुम्हारे भीतर बसे उस रचना संसार में
जहां मैं थी ही नहीं...!
......


तस्वीर

डाली से
सूख कर
गिरे पीले पत्ते
मेरी ही
तस्वीर का दूसरा पहलू है

.......

सुरक्षा

उनके पास
छतें है
मजबूत दीवारें हैं
सुरक्षा के आधार भी
फिर भी
असुरक्षित हैं
कारण
वे
आस्तीन में पाले हुए है
सांपो को




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