संयुक्त राष्ट्र की चेतावनी पर गौर करें तो कोरोना वायरस महामारी के चलते इस साल करीब 13 करोड़ अतिरिक्त लोग भुखमरी का निवाला बनने जा रहे है. संयुक्त राष्ट्र की इसी सप्ताह आई ताजा रिपोर्ट में यह जानकारी दी गई है. रिपोर्ट में कहा गया है कि कोरोना वायरस महामारी के कारण भूखमरी के हालात पहले से और ज्यादा खराब हो रहे हैं. रिपोर्ट कहती है कि करीब नौ में से एक व्यक्ति को भूखा रहना पड़ रहा है.
इस रिपोर्ट को यूएन की पांच एजेंसियां- खाद्य और कृषि संगठन, अंतरराष्ट्रीय कृषि विकास कोष, संयुक्त राष्ट्र बाल कोष, विश्व खाद्य कार्यक्रम और विश्व स्वास्थ्य संगठन ने मिलकर तैयार किया है. रिपोर्ट कहती है कि बीते पांच सालों में भुखमरी और कुपोषण के अलग-अलग रूपों के शिकार लोगों की संख्या में तेजी से बढ़ोतरी हुई है और कोरोना वायरस महामारी के कारण समस्या और गंभीर रूप धारण कर सकती है. रिपोर्ट में अनुमान जताया गया है कि इस साल महामारी के कारण लगाई पाबंदियां और आर्थिक मंदी से आठ करोड़ से 13 करोड़ लोग भुखमरी का सामना कर सकते हैं.
यूएन की ताजा रिपोर्ट के अनुसार साल 2019 में 69 करोड़ लोग भुखमरी का शिकार थे और 2018 की तुलना में इस संख्या में एक करोड़ लोगों की बढ़ोतरी हुई. छह साल में यह संख्या छह करोड़ बढ़ी है. दशकों तक लगातार गिरावट के बाद साल 2014 से भुखमरी के आंकड़ों में धीरे-धीरे बढ़ोत्तरी होनी शुरू हुई जो कि अब तक जारी है.
एशिया में सबसे बड़ी संख्या में लोग कुपोषित हैं जिनकी संख्या करीब 38 करोड़ है. इसके बाद लातिन अमेरिका और कैरिबयाई क्षेत्र का नंबर आता है. रिपोर्ट के लेखकों का कहना है कि भुखमरी से लड़ाई महामारी के पहले रुक गई थी. लेकिन अब भोजन के उत्पादन, वितरण और खपत से जुड़ी गतिविधियों और प्रक्रियाओं की कमियांे और निर्बलताओं के कारण ये और ज्यादा गहरी हुई जा रही हैं.
यूएन की एजेंसियों का कहना है कि करीब तीन अरब लोगों के पास सेहतमंद आहार सुनिश्चित करने के साधन नहीं है. रिपोर्ट कहती है कि इस दिशा में अधिक से अधिक कार्य करने की जरूरत है. सभी लोगों की पहुंच ना केवल भोजन तक होनी चाहिए बल्कि पौष्टिक खाद्य पदार्थों तक भी होनी चाहिए जो एक स्वस्थ आहार बनाते हैं. रिपोर्ट में निष्कर्ष निकाला गया कि कोरोना वायरस महामारी के परिणामस्वरूप खाद्य वितरण प्रणाली बाधित हुई, आजीविका को नुकसान हुआ और विदेशों में काम करने वाले अपने घर पैसे भेज नहीं पाए जिस वजह से गरीब परिवारों को स्वस्थ आहार तक पहुंच बनाने में मुश्किल पैदा हुई.
और इस बात से दुनिया के छोटे-बड़े तमाम देश प्रभावित हैं. वायरस के कारण ज्यादातर देशों में लॉकडाउन लगा दिए जाने से इंडस्ट्री, बिजनेस और एग्रीकल्चर पर भी बहुत बुरा असर पड़ा है.आर्थिक गतिविधियां ठप पड़ी हैं. ये संकट कब तक बना रहेगा, इसके बारे में निश्चित रूप से कोई कुछ नहीं कह सकता. लेकिन यह जरूर कहा जा सकता है कि कोरोना की मार सबसे अधिक गरीब देशों पर पड़ने वाली है और भारत भी इससे अछूता नहीं रहने वाला.
भारत में सरकार द्वारा की गई कई लुभावनी घोषणाएं तो ऐसी लगी जैसे आपको सामान्य जरूरतों का टोटका तो कम से कम नहीं होने वाला. लेकिन तंत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार के आगे आपकी जरूरतो की ऐसी की तैसी हो जाती है. ज्यादा पीछे जाने की बात नहीं, अभी कुछ दिन पहले लॉकडाउन के चलते सबसे कमजोर वर्ग के सामने खाने की समस्या पैदा हो गई थी. ये वर्ग अपनी पेट भरने की जरूरत से जूझ रहा था. खाना दिया जा रहा...राशन बंट रहा है जैसी खबरों के बीच रोते बिलखते लोगों की पुकार भी आ रही थी. इस बीच आर्थिक तंगी और भुखमरी के कारण कई लोगों ने आत्महत्या भी कर ली. लॉकडाउन के दौरान दो वक्त के भरपेट खाने को तरसते लोगों के हालात को देखते हुए सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च (सीपीआर) ने तो एक रिपोर्ट भी जारी की थी कि सरकार की कोशिशों के बावजूद भी व्यवस्थागत कमियों के कारण लोगों तक खाने-पीने के सामान की आपूर्ति ठीक से नहीं हो पा रही है.
सीएसडीएस के सर्वे के मुताबिक, भारत में 50 फीसदी लोगों को आमदनी के मुकाबले अपनी पारिवारिक और घरेलू खर्चों को पूरा करने में कई तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ता है. लॉकडाउन होने के बाद से कईयों की कमाई पूरी तरह खत्म हो गई और देश की एक बड़ी आबादी अचानक से गरीबी रेखा के नीचे पहुंच गई. जाती नौकरियों की वजह से घरों में बजट बिगड़ने से हालात बेकाबू हो रहे है. सरकार द्वारा मजदूरों के लिए राशन गैस की सुविधा ने जहां हालात को संभालने की कोशिश की वहीं सिस्टम के छेद ने उसे हर हाथ तक पहुंचने से भी रोका है. फिर भी हम कह सकते है कि भुखमरी के जैसे हालात अफ्रीकन देशों में देखने को मिलते है वैसे हालात भारत में नहीं है.
भारत एक ऐसा देश है जो बीते कई दशकों से अनाज के मामले में सरप्लस में चल रहा है. इसके मायने ये हैं कि सरकारी गोदामों में इतना अनाज भरा हुआ है कि एक लंबे समय तक खाद्दान्न आपूर्ति की जा सकती है. अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज ने भी अंग्रेजी अखबार इंडियन एक्सप्रेस में खाने-पीने के सामान में कमी नहीं होने की बात कही थी. उनके मुताबिक भारत के गोदामों में इस समय साढ़े सात करोड़ टन अनाज है. इतना अनाज पहले कभी नहीं रहा. यह बफर स्टॉक के नियमों से तीन गुना अधिक है. रबी की फसल कटने के बाद यह स्टॉक और बढ़ जाएगा. सरकार कृषि मंडियों में पैदा हुए व्यवधान को समझते हुए और अधिक मात्रा में अनाज खरीदेगी. राष्ट्रीय आपदा के समय इस भंडार के एक हिस्से का इस्तेमाल करना ही समझदारी होगी.
लेकिन असल समस्या तो खाने के सामान की वितरण व्यवस्था को लेकर थी, है या यूं कहें आगे भी रहेगी.... क्योकि भारत सरकार जिन राशन की दुकानों के जरिए गरीबों तक राशन पहुंचाने की कोशिश कर रही है, वो तंत्र ही भ्रष्टाचार और खामियों से भरा पड़ा है. एक सर्वे में सामने आया है कि देश की राजधानी दिल्ली में सिर्फ 30 फीसदी राशन की दुकानें ही राशन दे रही हैं. फिर अन्य राज्यों के बारे में क्या कहा जाए. संभवत यही वजह है कि कई दिहाड़ी मजदूर कोरोना से उतने भयभीत नहीं लगते जितना र्वे आिर्थक तंगी और भुखमरी से भयभीत है.
