बिहार के नतीजों ने देष की सबसे बड़ी सियासती पार्टी को हिला कर रख दिया है। भाजपा इस बार बिहार में चमत्कार कर दिखाएगी, ये मंसूबा धरा का धरा रह गया। बिहार जीतने के बाद यूपी फतह करने का सपना बुन रहे भाजपाई तो मुंह के बल गिरे ही समाजवादी पार्टी भी समिधियाने से मिली चोट से बलबला गई है। इस चुनाव में मोदी ‘चमत्कार’ भी भाजपा को बचा नहीं सका। विकास की बात करने वाले बिहार में जातीय गणित समझने की भूल कर बैठे। जातीय ध््राुवीकरण की आंधी में बहे बड़े-बड़े दिग्गज मतदाता के मन की बात चीन्ह न सकने में असमर्थ रहे और नीतीष लालू आंधी में बिहार से बाहर हो गए। भाजपा और सपा अब भले की हार के कारणों की समीक्षा करें, आगे की लड़ाई उसके लिए आसान नहीं ये तो साबित हो गया।
बिहार के चुनावी नतीजों से एक बात तो तय है कि भाजपा को अपनी साख बचाने के लिए अब कुछ नया पैंतरा आजमा होगा। अमित शाह के संचालन में हुई इस दूसरी षिकस्त ने भाजपा को राजनैतिक चौसर में कई कदम पीछे फेंक दिया है। मोदी का जादू भी अब कमोबेस मंद पड़ रहा है, इसे मानकर भाजपा को भविष्य में होने वाले चुनावों में अपनी लाज बचाने की सोचनी होगी। दिल्ली चुनाव में भाजपा की हार के पीछे जो मुख्य बात नजर आई वह थी व्यक्तिवाद को बढ़ावा। इस व्यक्तिवाद को पार्टी के भीतर पनप रहे अहमवादी दृष्टिकोण से जोड़कर भी देखा जा सकता है। पार्टी का जो मूल भाव अर्थात ‘हम की भावना है को छोड़ ‘मैं का दृष्टिकोण ज्यादा परिपुष्ट दिखाई देता है। यदि इस चुनाव में ‘हम का भाव तथा तत्वनिष्ठा को सर्वोपरि मानकर निर्णय लिए जाते तो शायद इतने खराब परिणाम सामने नहीं आते। यह सच है कि संगठन में पार्टी अध्यक्ष और सरकार में प्रधानमंत्री सर्वोपरि होता है। लेकिन इसका अर्थ यह कदापि नहीं कि शेष सभी को दरकिनार कर दिया जाए।
भाजपा जैसी पार्टी को इस बात को कतई नहीं भूलना चाहिए कि वह एक कार्यकर्ता आधारित दल है इसलिए वह जो भी निर्णय ले वह कार्यकर्ता को केन्द्र में रखकर लें। यह इस दृष्टि से भी महत्वपूर्ण होता है कि पार्टी के वैभवशाली स्वरूप से प्रभावित होकर अन्य दलों के नेताओं को पार्टी में शामिल करने से पूर्व कार्यकर्ताओं अथवा वरिष्ठ पार्टी नेताओं के सोच को जरुर ध्यान रखा जाए। दिल्ली में किरण बेदी को पार्टी में शामिल करने से लेकर उन्हें मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किए जाने तक न तो कार्यकर्ताओं का मन टटोला गया और न ही पार्टी के वरिष्ठजनों की राय ली गई। परिणाम सामने था। ऐसा ही कुछ बिहार में हुआ। विवादित बयान देने के लिए प्रसिद्ध हो चुके भाजपा नेताओं के अगर लगाम न लगी तो कोई आष्चर्य नहीं कि 2017 के विधान सभा चुनाव में बिहार की तरह मुस्लिम भाजपा के खिलाफ सपा-बसपा किसी एक के पक्ष में लामबंद हो जाए। दिल्ली और बिहार के नतीजों के बाद अगर अब भी भाजपा मौके की नजाकत को समझने से बाज आई तो पार्टी जिस आंधी के साथ सत्ता तक पहुची उसी आंधी के साथ उड़ जाएगी। इस मामले में कांग्रेस से बड़ा सबूत उसके सामने और क्या हो सकता है।
2017 में उत्तर प्रदेष का चुनाव है जो राजनैतिक दृष्टि से बेहद अहम है जहां दो प्रमुख पार्टियों सपा बसपा के बीच खुद को स्थापित कर पाना भाजपा के लिए अब मुष्किल जान पड़ रहा है। उत्तर प्रदेष में सपा बसपा मजबूत पार्टिया है । सुगबुगाहट तो ये भी है कि भाजपा को यहां रोकने के लिए बिहार की ही तर्ज पर इस बात के लिए कोषिष की जा सकती है कि सपा बसपा आपस में संधि कर ले और कांग्रेस जो कि साइड लाइन है इन्हें अपना सहयोग कर दें। हालांकि ये मुष्किल है पर नामुमकिन नहीं। सपा बसपा का आपसी कलेष जगजाहिर है लेकिन राजनीति में कोई किसी से चिर दुष्मनी नहीं कर सकता। परिस्थितियां और राजनैतिक समीकरण जहां उचित बैठे वहीं बात बन जाती है।
उत्तर प्रदेष को वोट बैंक के नजरिए से अगर देखा जाए तो यहां मुस्लिम वोटों का धु्रवीकरण करना बहुत आसान है जबकि हिन्दू वोट ब्राहमण, दलित-महादलित, पिछड़ा के बीच रस्साकषी जैसा मामला है। यूपी में दोबारा राज करने का सपना देख रही सपा को पंचायत चुनाव के बाद बिहार के नतीजों ने स्पष्ट कर दिया है कि उत्तर प्रदेष की सत्ता इतनी भी आसान नहीं और तब तो कहीं और अधिक जब पार्टी भीतरी कलहों और प्रदेष में बढ़ते अपराध को रोक पाने में अक्षम साबित हो रही हो। मुस्लिम मतदाता जिन पर सपा को सबसे अधिक भरोया है, गाहे बगाहे असमंजस की स्थिति में उनके खिलाफ भी चला जाता है। लोकसभा चुनाव इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। सपा प्रमुख की बयान बाजियों ने उस वक्त भाजपा के पक्ष में वोटिंग करा दी और महज 5 सीटों के साथ सपा लोकसभा में अपनी आबरू बचा सकी। बिहार में ऐन वक्त पर गठबंधन से नाता तोड़ना सपा के हित में नहीं रहा। राजनैतिक हलकों में मुलायम सिंह सरीखे नेता पर अविष्वास की हवा बन गई। 146 सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़ा कर देने से जातिगत वोटिंग वाले राज्य में संदेष गलत चला गया।
अफवाह फैलाने वालों ने हवा बना दी कि मुलायम सपा उम्मीदवारों के जरिये महागठबंधन का समीकरण बिगाड़ना चाहते हैं। पिछड़ी जातियों पर इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ना ही था। मुस्लिम फिर भ्रमित हो गया ये सोचकर की कहीं लालू-नीतीश को कमजोर करने की कोशिश से बिहार में भाजपा न मजबूत हो जाए। तो वह भी एकजुट होकर उधर ही चल पड़ा जहां उसे पूरी निष्चिंतता थी। यही स्थिति अगर 2017 के चुनाव में नजर आई तो सपा का वोट बैंक माना जाने वाला यह वर्ग विकल्प के तौर पर बसपा की तरफ मुड़ जाएगा। पंचायत चुनाव में इसके संकेत सामने आ भी चुके हैं। दरअसल उत्तर प्रदेष में भी जातीय संतुलन के साथ साथ तो मजहबी संतुलन को भी साधे रखना जरूरी है। दोबारा सत्ता हासिल करने के लिए ऐसे संतुलन के अलावा यह भी बहुत जरूरी है कि आपके निष्पक्ष सुशासन और विकास के एजेंडे से जनता जनार्दन संतुष्ट हो। बिहार चुनाव के नतीजे के पीछे एक वजह नीतीश की सुशासन बाबू की छवि है जिसे विकास विकास के नाम पर तोड़ने की पुरजार कोषिष धरी की धरी रह गई।
बिहार के चुनावी नतीजों से एक बात तो तय है कि भाजपा को अपनी साख बचाने के लिए अब कुछ नया पैंतरा आजमा होगा। अमित शाह के संचालन में हुई इस दूसरी षिकस्त ने भाजपा को राजनैतिक चौसर में कई कदम पीछे फेंक दिया है। मोदी का जादू भी अब कमोबेस मंद पड़ रहा है, इसे मानकर भाजपा को भविष्य में होने वाले चुनावों में अपनी लाज बचाने की सोचनी होगी। दिल्ली चुनाव में भाजपा की हार के पीछे जो मुख्य बात नजर आई वह थी व्यक्तिवाद को बढ़ावा। इस व्यक्तिवाद को पार्टी के भीतर पनप रहे अहमवादी दृष्टिकोण से जोड़कर भी देखा जा सकता है। पार्टी का जो मूल भाव अर्थात ‘हम की भावना है को छोड़ ‘मैं का दृष्टिकोण ज्यादा परिपुष्ट दिखाई देता है। यदि इस चुनाव में ‘हम का भाव तथा तत्वनिष्ठा को सर्वोपरि मानकर निर्णय लिए जाते तो शायद इतने खराब परिणाम सामने नहीं आते। यह सच है कि संगठन में पार्टी अध्यक्ष और सरकार में प्रधानमंत्री सर्वोपरि होता है। लेकिन इसका अर्थ यह कदापि नहीं कि शेष सभी को दरकिनार कर दिया जाए।
भाजपा जैसी पार्टी को इस बात को कतई नहीं भूलना चाहिए कि वह एक कार्यकर्ता आधारित दल है इसलिए वह जो भी निर्णय ले वह कार्यकर्ता को केन्द्र में रखकर लें। यह इस दृष्टि से भी महत्वपूर्ण होता है कि पार्टी के वैभवशाली स्वरूप से प्रभावित होकर अन्य दलों के नेताओं को पार्टी में शामिल करने से पूर्व कार्यकर्ताओं अथवा वरिष्ठ पार्टी नेताओं के सोच को जरुर ध्यान रखा जाए। दिल्ली में किरण बेदी को पार्टी में शामिल करने से लेकर उन्हें मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किए जाने तक न तो कार्यकर्ताओं का मन टटोला गया और न ही पार्टी के वरिष्ठजनों की राय ली गई। परिणाम सामने था। ऐसा ही कुछ बिहार में हुआ। विवादित बयान देने के लिए प्रसिद्ध हो चुके भाजपा नेताओं के अगर लगाम न लगी तो कोई आष्चर्य नहीं कि 2017 के विधान सभा चुनाव में बिहार की तरह मुस्लिम भाजपा के खिलाफ सपा-बसपा किसी एक के पक्ष में लामबंद हो जाए। दिल्ली और बिहार के नतीजों के बाद अगर अब भी भाजपा मौके की नजाकत को समझने से बाज आई तो पार्टी जिस आंधी के साथ सत्ता तक पहुची उसी आंधी के साथ उड़ जाएगी। इस मामले में कांग्रेस से बड़ा सबूत उसके सामने और क्या हो सकता है।
2017 में उत्तर प्रदेष का चुनाव है जो राजनैतिक दृष्टि से बेहद अहम है जहां दो प्रमुख पार्टियों सपा बसपा के बीच खुद को स्थापित कर पाना भाजपा के लिए अब मुष्किल जान पड़ रहा है। उत्तर प्रदेष में सपा बसपा मजबूत पार्टिया है । सुगबुगाहट तो ये भी है कि भाजपा को यहां रोकने के लिए बिहार की ही तर्ज पर इस बात के लिए कोषिष की जा सकती है कि सपा बसपा आपस में संधि कर ले और कांग्रेस जो कि साइड लाइन है इन्हें अपना सहयोग कर दें। हालांकि ये मुष्किल है पर नामुमकिन नहीं। सपा बसपा का आपसी कलेष जगजाहिर है लेकिन राजनीति में कोई किसी से चिर दुष्मनी नहीं कर सकता। परिस्थितियां और राजनैतिक समीकरण जहां उचित बैठे वहीं बात बन जाती है।
उत्तर प्रदेष को वोट बैंक के नजरिए से अगर देखा जाए तो यहां मुस्लिम वोटों का धु्रवीकरण करना बहुत आसान है जबकि हिन्दू वोट ब्राहमण, दलित-महादलित, पिछड़ा के बीच रस्साकषी जैसा मामला है। यूपी में दोबारा राज करने का सपना देख रही सपा को पंचायत चुनाव के बाद बिहार के नतीजों ने स्पष्ट कर दिया है कि उत्तर प्रदेष की सत्ता इतनी भी आसान नहीं और तब तो कहीं और अधिक जब पार्टी भीतरी कलहों और प्रदेष में बढ़ते अपराध को रोक पाने में अक्षम साबित हो रही हो। मुस्लिम मतदाता जिन पर सपा को सबसे अधिक भरोया है, गाहे बगाहे असमंजस की स्थिति में उनके खिलाफ भी चला जाता है। लोकसभा चुनाव इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। सपा प्रमुख की बयान बाजियों ने उस वक्त भाजपा के पक्ष में वोटिंग करा दी और महज 5 सीटों के साथ सपा लोकसभा में अपनी आबरू बचा सकी। बिहार में ऐन वक्त पर गठबंधन से नाता तोड़ना सपा के हित में नहीं रहा। राजनैतिक हलकों में मुलायम सिंह सरीखे नेता पर अविष्वास की हवा बन गई। 146 सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़ा कर देने से जातिगत वोटिंग वाले राज्य में संदेष गलत चला गया।
अफवाह फैलाने वालों ने हवा बना दी कि मुलायम सपा उम्मीदवारों के जरिये महागठबंधन का समीकरण बिगाड़ना चाहते हैं। पिछड़ी जातियों पर इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ना ही था। मुस्लिम फिर भ्रमित हो गया ये सोचकर की कहीं लालू-नीतीश को कमजोर करने की कोशिश से बिहार में भाजपा न मजबूत हो जाए। तो वह भी एकजुट होकर उधर ही चल पड़ा जहां उसे पूरी निष्चिंतता थी। यही स्थिति अगर 2017 के चुनाव में नजर आई तो सपा का वोट बैंक माना जाने वाला यह वर्ग विकल्प के तौर पर बसपा की तरफ मुड़ जाएगा। पंचायत चुनाव में इसके संकेत सामने आ भी चुके हैं। दरअसल उत्तर प्रदेष में भी जातीय संतुलन के साथ साथ तो मजहबी संतुलन को भी साधे रखना जरूरी है। दोबारा सत्ता हासिल करने के लिए ऐसे संतुलन के अलावा यह भी बहुत जरूरी है कि आपके निष्पक्ष सुशासन और विकास के एजेंडे से जनता जनार्दन संतुष्ट हो। बिहार चुनाव के नतीजे के पीछे एक वजह नीतीश की सुशासन बाबू की छवि है जिसे विकास विकास के नाम पर तोड़ने की पुरजार कोषिष धरी की धरी रह गई।