Tuesday, October 4, 2022

कविता/ किसकी जय-विजय



हे राम! 
मुझे क्षमा करना
आज मैंनें अपने भीतर बैठे ‘राम‘ को मार ‘रावण‘ को 
जीवित कर दिया
मन के भीतर किसी कोने में दबा के रखे उन
दस सिरों को धारण कर लिया, जो
स्वार्थ, लोलुपता, ईर्ष्या, द्वेष, अंहकार, कुटिलता,
वैमनस्य, आत्म-प्रशंसा, आडम्बर, व्यसन 
को प्रेरित करते है...
मैंने देखा राम!  
परंपराओं की थाती, तुम्हारे कर्म-संस्कार
अब मात्र पोथी-पत्रों, पवित्र स्थलों तक सीमित है 
तुम्हारी और तुम्हारी मर्यादा के नाम पर 
चली आ रही परिपाटी का निर्वहन करने के लिए 
देखा है बुराई को कागज के बने पुतलों में ही जलते 
शेष सांसारिक आचार-व्यवहार-संस्कारों में
दशानन से कर्मो को ही नित बढ़ते देखा
वही अजर, वही अमर दिखा
उसी की जय, विजय दिखी
मुझे क्षमा करना राम अपने निःष्छल से मन को मैंने 
सत्य की विजय के नाम पर मनाई जाती इस दशमी पर 
रावण के पुतले की दहकती अग्नि में छोड़ दिया, 
हर दहन के बाद भी जो राख में परवर्तित नहीं होती 
सुलगती रहती है तीन सौ चौंसठ दिन 
रावण कर्मो के अनुसरण को 
और तुम्हारी मर्यादा का मात्र जाप करने को
हे राम! 
मुझे क्षमा करना।

 

 

















Sunday, October 2, 2022

कविता/ अक़्स




कहा था न मैंने
नीयत-ए-शौक़ भर न जाए कहीं
तू भी दिल से उतर न जाए कहीं
तब इस बात पर तुम हॅंसे थे और कहा था
ये कभी नहीं हो सकता
लेकिन देखो
तुम भी उतर ही गये दिल से
अब न तुम्हारी याद रही बाक़ी और 
न वो बात ही रही बाक़ी, पर
रूको!
यह भी तो पूरा सच नहीं, क्योंकि
अब जो शख़्स है मुझ में 
फिर क्यूं
वह दिखता है तुम्हारी ही तरह पत्थर, चुप और अकेला सा।