Tuesday, April 28, 2020

कीड़े निकालने के अलावा और इस समय कर क्या रहा विपक्ष ?




बात सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव से ही आरंभ करती हूं। पिछले तीन दिन के उनके बयानों पर प्रकाश डालना चाहूंगी। पहले आज सुबह के समाचार पत्र में उनकी टिप्पणी-कोरोना संक्रमण झेल रहे किसानों पर बेमौसम बरसात, आंधी, ओलावृष्टि की मार आ पड़ी है और सरकार के पास गेहूं व आम की फसल का ब्यौरा नहीं है। किसान के साथ छलावे की यह घटिया राजनीति भाजपा के चरित्र का ही हिस्सा है। किसानों के हितों की भाजपा सरकार को कोई परवाह नहीं।

26 अपैल को वे फरमाते है कि भाजपा सरकारें राजनीति से बाज नहीं आ रही। प्रदेश में कम्युनिटी किचन और आरआरएस के भंडारे में कोई फर्क नहीं दिखता। खाद्य साम्रगी को संघ अपनी बताकर मोदी थैली में भरकर भाजपाई परिवारों में बांट रहा है। ...भाजपा की सरकार क्या संघ का एंजेंडा बनाने के लिए चुनी गई है।

27 अप्रैल को वे राज्य कर्मचारियों के डीए और भत्ते रोकने के फैसले पर अपना बयान जारी करते है। उनके कथनानुसार ये भत्ते रोकने से अल्पवेतन भोगी कर्मचारियों की घरेलू अर्थव्यवस्था बिगड़ जाएगी। बेहतर हो कि सरकार अपनी फिजूलखर्जी पर रोक लगाये।

अब सवाल यहां ये है कि सरकार के हर फैसले के विरूद्ध खड़ा होना ही है तो तर्कसंगत ढग से क्यों नहीं खड़े होते   अचानक ही बिगड़े मौसम में किसानों का दर्द समझ में आपको विपक्ष में रहकर ही क्यों आता है जबकि सरकार-प्रशासन-अधिकारी कोरोना को थामने में उलझे पड़े है। क्या आप नहीं जानते कि हो चुके नुकसान का ब्यौरा जुटा पाना इतना भी आसान नहीं और जल्दी तो कतई नहीं। ऐसे में वही आश्वासन दिये जाते है जो मूलतः कोई भी सरकार देती है। कुछ समय बीत जाने के बाद अगर आपको इस संदर्भ में उचित कारवाई होते न दिखे तो आपका सवाल लाजिमी बनता है।

फिर संघ का एजेंडा और कम्युनिटी किचन जैसे आरोप अखिलेश जी जैसे व्यक्तित्व पर शोभा नहीं देते। सबूत और तर्क की बिना पर कुछ भी बोल देना वह भी ऐसे नाजुक समय पर उचित नहीं है। जनता आपसे भी तो सवाल कर सकती है कि आपकी पार्टी ऐसे नाजुक मौके पर क्यों नहीं कुछ ठोस काम कर रही। अखिलेश जी! जनता सब समझती है और नजर भी रखती है कि कौन-कब उसके साथ खड़ा है या क्यूं नहीं है। चंद लोगों को खुष करने के लिए बयान दे देना किसी बड़ी पार्टी के बड़े नेता के लिए रूचिकर नहीं लगता।

मैे कोई भाजपा की अंधभक्त फैन नहीं। बहुत से ऐसे मौके आये है जब मैंने भाजपा की कई नीतियों पर अपना ऐतराज भी जाहिर किया और सपा काल को जमीनी कार्यों में योगी सरकार से बेहतर माना। लेकिन मौके की नजाक़त देखकर अपनी बात को न रखना किसी भी जिम्मेदार व्यक्ति के लिए प्रशंसनीय नहीं हो सकता। उसके लिए मीडिया को ही रहने दें जो एक अर्से पहले अपनी सामाजिक जिम्मेदारियों को 'टीआरपी' की भेंट चढ़ा चुका। हमारे जिम्मेदार नेताआंे को तो ऐसे तनाव भरे माहौल में सरकार और जनता के हित में खडे़ होना चाहिए। आपने कहा कि बेहतर हो कि सरकार अपनी फिजूलखर्जी पर रोक लगाये। येे बात आप किसी और मौके पर कहते तो शायद उतनी न खटकती, लेकिन जब सरकार आने वाले समय को चुनौती मान कर हर क्षेत्र में हर संभव पैसा बचाने का उपक्रम कर रही, उस समय आपकी ओर से फिजूलखर्ची का कोई ठोस सबूत दिये बिना ये कहना वाजिब नहीं लगता। हर बात पर मीनमेख निकालना ही राजनीति नहीं या फिर महज खबरों में बने रहने के लिए कुछ भी कह देना तो जरूरी नहीं। बेवजह बातों का राजनीतिकरण करना आंख में किरकिरी पैदा करता है और मत भूलिए, जनता इसे याद रखती है। हां, राजनीतिक बिसात पर जरूर वैमनस्य को याद रख कर अपनी चालें नहीं चली जा सकती।

अब बात बसपा नेत्री की। बसपा सुप्रीमो कोरोना वायरस की जांच बढ़ाने और प्रवासी गरीब मजदूरों को भरपेट भोजन की व्यवस्था की मांग कर रही। उनके अनुसार सरकार को चाहिए कि लाॅकडाउन से प्रभावित लोगों को सरकार जल्द से जल्द अपने घर पहुंचाएं। मांग तो उनकी उचित है। संदेह भी नहीं कि इस पर सरकार और प्रशासन ने अपने पूरी ताकत झोंक रखी  है। लेकिन यहां भी जनता का बसपा सुप्रीमो से सवाल है कि इस तरह की मांग के अलावा बसपा पार्टी अपने गरीब-दलित -वंचित लोगों के लिए क्या कर रही?



मुझे माफ करियेगा अगर इस संक्रमण के भयानक दौर में किसी भी विपक्षी पार्टी के द्वारा किए गए सराहनीय प्रयासों को देखने से मैं चूक गई हूं तो। लेकिन सुबह से लेकर शाम तक समाचारों को देखते-पढ़ने में कहीं मुझे इनके किसी भी तरह के सहयोगी प्रयासों की झलक भी देखने को नहीं मिली। दर्द-तकलीफ हम सब देखते है लेकिन उसको स्वंय पर लादने से दूर भागतेे है। विपक्ष में बैठ कर ये भूल जाते है कि हम भी कभी सत्ता में थे और किस तरह से अपनी कार्यो और नीतियों को सामने रख कर अपने मुहं मियां मिटठू बनते थे। कलई तो तब खुलती जब जनता जनार्दन अपनी पसंद को मुहर लगा आपको ख़ारिज कर देती है।

चलते-चलते क्रांग्रेस और उनके दिग्गज नेताओं की भी बात कर लें। सोते-सोते जागते इनके नेताओं को भी गाहे-बगाहे ऐसे मौकों पर कुछ तड़का डाल देने का मन करने लगता है। कभी खराब पीपीई किट की आपूर्ति तो कभी कोरोना टेस्टिंग में बरती जानी वाली पारदर्शिता पर सवाल तो आम बात है। प्रियका गांधी का टवीट् पीपीई किट की खराब सप्लाई के मामले में योगी सरकार को कठघरे में खड़ा करता है। गोया खराब किट की सप्लाई का मिलना सरकार के लिए बेहद सम्मानजनक बात हो। उधर आर्थिक मामलों के प्रकांड विद्वान मनमोहन सिंह भी राष्ट्रीय तौर पर आने वाले आर्थिक आपदा की जगह सरकारी कर्मियों के भत्ते को लेकर चिंतित है जिसे सिर्फ एक साल के लिए टाला भर गया है न कि निरस्त किया गया। पार्टी नेता राहुल गांधी ट्वीट कर गुजरात में फंसे आंध्र प्रदेश के 600 मछुआरों को निकालने के लिए मदद देने की मांग कर रहे। उनका कहना है इन मछुआरों के पास पर्याप्त खाना और पानी नहीं है। हैेरानी होती है इस तरह की समस्याओं के लिए सरकार का मुंह तकने वाली पार्टियों से और उन लोगों से जो खुद बरसों सत्ता में रह चुके है और आज भी दूसरी बड़ी पार्टी होने का दावा करते है।

बड़े तो बड़े छोटे मियां सुभानअल्लाह! आगरा प्रदेष कांग्रेस के अध्यक्ष अजय कुमार लल्लू आगरा माॅडल के पंचर होने की दुहाई दे रहे। आगरा और आगरा के लोगों को लेकर बेहद चितिंत लल्लू जी, बजाय इसके कि वह खुद आगरा माॅडल को सफल बनाने में अपना हाथ आगे बढ़ाये, योगी सरकार का कोरोना मरीजों के प्रति अमानवीय चेहरा दिखाने में सक्रिय है।

कोरोना महामारी के समय जब हर आम व्यक्ति सरकार प्रषासन को सहयोग देने का भरसक प्रयास रहा है तो क्या देश की ’सो काल्ड’ बड़ी पार्टियों का फर्ज नहीं बनता कि वे भी इस आपदा के समय राजनीति छोड़कर कंधे से कंधा मिलाकर अपनी पार्टी के रसूख को मद्देनज़र रख कोरोना पीड़ितों की मदद को आगे आए। सरकार की मदद कर मिसाल कायम करें और दिखा दें कि हिन्दुस्तान ऐसा मुल्क है जहां राजनैतिक पार्टियां निजी स्वार्थ से उठकर आपदाओं का मिलकर सामना करती है। वोट बैंक से इतर ’इंसानियत’ और धर्म-मजहब से हटकर ’राष्ट्रधर्म’ को सर्वाेपरि समझ अपने कत्र्तव्य का निर्वाह करतीं हैं।

काश!!!

Friday, April 24, 2020

पहली मुलाक़ात





याद है तुम्हें...
हमारी वो पहली मुलाक़ात,
तुम दरवाजे पर खड़े थे,
अपनी मोहिनी मुस्कान लिए
और सम्मोहित सी मैं
कुछ अर्नगल बोलती,
भीतर ही भीतर गुदगुदाती
ले आई थी तुम्हें घर के भीतर,
और...फिर
क्या कहें, क्या न कहें के बीच
औपचारिकता भरी वो हमारी बातें
न जाने कब
बांधने लगी मन को मन से
हमें पता ही न चला...

सच कहूं जो तुमसे कभी न कहा
उस वक्त
उछलते-कूदते मन को मैं
बड़ी कठिनाई से थाम रही थी
तुम्हारी नजरों को
मन की थाह लेने से रोकने का असफल प्रयास कर रही थी
सच्ची-सीधी-सरल सी लगती तुम्हारी बातें
मेरे एकाकी मन को
अपनेपन का बोध करा गए
और तुम्हारी नजरों की वो बेबाकी
न जाने कब
मेरे मन के सोये हुए तार को
जगा गए कि
मुझे पता ही न चला

और फिर जब तुम जाने के लिए उठे
वो कलेजे में उठी कसक
आज भी याद है मुझे
वक्त के वहीं ठहर जाने की तड़प
और थोड़ी देर तुम्हें रोक लेने की ख़्वाहिष
सब जैसे आज भी उसी पल में थम से गये हो
फिर मिलने की औपचारिकता के बीच
एक दूसरे को भर लेने की चाहत को
हम दोनों ने ही छुआ
और जब
तुमने अपने संकोच की दीवार को तोड़
मेरे लरजते हाथों को थामा था....
उस पहली छुअन को याद कर
आज भी असीम सुख से भर जाती हूं...

सच कहती हूं
मैं उस पहली मुलाक़ात को आज भी
नहीं भूल पाती हूं





Thursday, April 16, 2020

सावधानी हटी, दुर्घटना घटी यानी संक्रमण से ‘लाॅकडाउन‘ भला


मौत का ज़हर है फिज़ाओं में, अब कहां जा के सांस ली जाए,
बस इसी सोच में हूं डूबा हुआ, ये नदी कैसे पार की जाए।

राहत इंदौरी के लिखी इन पंक्तियों में नोवल कोरोना नाम के खौफनाक वायरस की गिरफ्त में जकड़े लाचार विश्व की दषा साफ बयान होती है। पूरी दुनिया के लोग आषंकित से घरों में बंद होने को मजबूर है। अनिश्चतकाल-आपातकाल-त्रासदी-विभीषिका जैसे लफ्ज़ भी इसके आगे बौने हो रहे। वैश्विक अर्थव्यवस्था तक को ताला लग चुका है। गिरगिट की तरह रंग बदलती इस महाभंयकर महामारी से बचने का एकमात्र उपाय फिलवक्त तो घर में स्वंय को कैद कर लेना है। जरा सी लापरवाही क्या विस्फोट कर दे, ये उन देषों के हालत देखकर समझा जा सकता है जिन्होंने इसे हल्के में लिया।

हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के टीएच चैन स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ के वैज्ञानिकों को इस बात का अंदेशा है कि लापरवाही हुई तो आने वाले समय में वायरस और अधिक घातक और जानलेवा रूप धारण कर लेगा। शोधकर्ताओं के अनुसार सामाजिक दूरी का सख्ती से पालन होगा तभी वायरस को दोबारा फैलने से रोका जा सकता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि वायरस इंफ्लूएंजा के तौर पर दुनियाभर में रहे है। इस आधार पर कम से कम मौजूदा हालात को देखते हुए 20 सप्ताह यानी 140 दिन तक हर हाल में सावधानी बरतनी होगी। शोधकर्ताओं का मानना है कि कोरोना समय-समय पर रंग बदलने वाला वायरस है जो बेहद खतरनाक है। किसी में इसके लक्षण दिखते है तो कोई बिना लक्षण के ही इसकी चपेट में आ जाता है। चीन में हालात सामान्य होने के बाद अचानक से इसकी वापसी हो गई। ऐसा कहीं भी हो सकता है। ऐसे में इसे दोबारा फैलने से रोकने के लिए सावधानी ही सबसे बेहतर उपचार है।

एक अध्ययन में यह भी दावा किया गया है कि कोरोना वायरस के मरीज बीमारी के लक्षण दिखने से दो या तीन दिन पहले ही कई लोगों को संक्रमित कर सकते हैं। हांगकांग यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं के मुताबिक, अध्ययन में पाया गया कि संक्रमण के संपर्क में आने और लक्षण दिखने के बीच अवधि अगर कम है तो यह लक्षण दिखने से पहले भी संक्रमण फैला सकता है। चीन के गुवांग्झू के अस्पताल में भर्ती 94 मरीजों के वायरल शेडिंग के अस्थायी पैटर्न का आंकलन किया गया। नेचर मेडिसिन जर्नल में छपे अध्ययन के मुताबिक, लक्षण दिखने के बाद नियंत्रण उपाय करने से इस बीमारी को फैलने से काफी हद तक रोका जा सकता है। हालांकि कई कारक हैं जो इन उपायों को प्रभावित कर सकते हैं। इन मरीजों में गले के स्वैब लेने के बाद दो से तीन दिन बाद कोरोना वायरस के लक्षण दिखाई दिए। अध्ययन के मुताबिक, 414 स्वैब का परीक्षण किया गया, जिसमें पाया गया कि लक्षण की शुरूआत से पहले इन मरीजों में संक्रमण फैलाने का लोड अधिक था।



कहने का मतलब है कि जितने भी शोध इस वायरस को लेकर सामने आ रहे है उन्हें किसी भी हालत में नजरअंदाज करना उचित नहीं। चीन ने क्या किया, क्या नहीं या उसे क्या करना चाहिए था, की जगह हम अगर अब क्या करें, क्या न करें पर काम करें तो बेहतर होगा। गौर करने की बात ये है कि यह वायरस अमीर-गरीब, गोरा-काला, ऊंच-नीच, धर्म-कर्म देखकर अटैक नहीं कर रहा है। ब्रिटिष नागरिक हो या ब्रिटिष राजकुमार, न्यूयार्क जैसा वैभवषाली देष हो या दुुनिया के गरीब देष सभी इस वक्त इस आपदा से ग्रसित है। एक विशेषज्ञ ने तो बहुत पहले ही कह दिया था कि इस वायरस की चपेट में दुनिया के 80 प्रतिषत लोग आएंगें। वायरस के फैलते संकमण को देखते हुए फरवरी 2020 से कई देषों में अलर्ट जारी किए जाने लगे थे। फिर भी जानते-बुझते की जाने वाली लापरवाही को आप क्या कहेगें? धर्मान्ध और कट्टर लोग, चाहे वे किसी भी सम्प्रदाय के हो, मानवता को अपने स्वार्थवश नुकसान पहुंचाते आये है। चाहे वे भारत में तब्लीगी जमात वाले हो जिन्होंने चेतावनी के बावजूद देशी-विदेशी लोगों का जमावड़ा किया या फिर लुसियाना के धर्मगुरू टाॅम स्पेल जिन्होंने चेतावनी को मानने से इंकार कर दिया और गिरिजाघर खुला रखा, लोगों को इकट्ठा भी किया। इसराइल के हेल्थ मिनिस्टर ने भी सिनेगाॅग खोलकर लोगों को एकत्र किया। उन्होनें यहां तक कह दिया कि प्रार्थना करने से कोरोना नहीं होगा। आज खुद संक्रमित है।

यू ंतो इस वायरस की अनदेखी किए जाने को लेकर डब्ल्यूएचओ की भूमिका भी संदेह के घेरे में है। फिर भी अपने पर लगे आरोपों से खुद को बचाने में लगे डब्ल्यूएचओ की इन बातों को फिलहाल नजरअंदाज करना ठीक नहीं होगा कि लॉकडाउन से कोरोना वायरस को रोकने में क्या सफलता मिली है, इसका आंकलन करने के लिए भी दो हफ्ते का और इंतजार जरूरी है। इस आंकलन के बाद ही प्रतिबंधों को ढीला करना चाहिए और जब तक वैक्सीन नहीं बन जाती तब तक लापरवाही बरतना खतरनाक सिद्ध हो सकता है। फिलहाल तो वैक्सीन बनाने में दुनियाभर के वैज्ञानिकों को अभी तक कोई कामयाबी नहीं मिल पाई है। कुछ दावा कर रहे है उन्होंने इसमें सफलता प्राप्त करने की कगार पर है तो कुछ ये भी मानते हे कि 2021 से पहले इसकी वैक्सीन की खोज मुश्किल है।

वैज्ञानिकों का तो ये भी मानना है कि कोरोना से बुरी तरह प्रभावित देश अमेरिका को 2022 तक सोशल डिस्टेंसिंग का पालन सख्ती से करना होगा हालांकि अमेरिकन प्रेसीडेंट कर रवैया इससे उल्ट ही दिखता है। आज अमेरिका के जो हालात है वह उनकी लाॅकडाउन की घोषणा में की गई देरी का नतीजा है। पर जिद्दी और अहमक राष्ट्रपति का अपरिपक्व अंदाज आज अमेरिका को जिन हालात में ले आया वो इस शक्तिशाली देष के नेतृत्व की खिल्ली ही उड़ा रहा। इस लेख के लिखे जाने तक, अमेरिका के जॉन्स हॉप्किन्स विश्वविद्यालय के अनुसार, 24 घंटे में 2600 लोगों की मौत हुई। इसके साथ ही अमेरिका में मृतकों की की कुल संख्या 28,326 पहुंच गई है जो किसी भी देश के मुकाबले मृतकों की सबसे अधिक संख्या है। सबसे बुरे दौर से गुजर रहे अमेरिका के लिए राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का 15 अप्रैल को दिया गया ये बयान हास्यास्पद लगता है कि अमेरिका कोरोना वायरस महामारी के सबसे बुरे दौर से निकल चुका है और वह 16 अप्रैल को अर्थव्यवस्था को फिर से खोलने के लिए दिशानिर्देशों की घोषणा करेंगे। मानव हित साधने के बजाय राजनीतिक हित साधना आपकी अदूरदर्षिता का परिचय देते है ये कौन अब अमेरिकी मुखिया को बताये?

कोरोना वायरस की तुलना ‘सार्स‘ और ‘प्लेग‘ के करीब-करीब या उससे अधिक भयावह रूप में की जा रही है। हालांकि प्लेग के समय मेडिकल सुविधा इतनी प्रभावी नहीं थी जितनी की सार्स के समय तक हो चुकी थी। प्लेग की त्रासदी झेल चुकी उत्तर प्रदेश में बांदा के अतर्रा में रहने वाली 120 साल की जनिया देवी, कोरोना को प्लेग से बड़ी महामारी नहीं मानती। उन्होंने प्लेग का विकराल रूप देखा था। 1920 में देश में फैली प्लेग महामारी में उनके पति समेत 11 परिजनों की मौत हो गई थी। उन्हें आज भी याद है गांव के लोग एक शव का अंतिम संस्कार करके लौटते थे तो घर पर एक और शव मिलता था। बहुत से शवों को मिट्टी में दफनाना पड़ा था। दफन करने की नौबत इसलिए आई क्योंकि जलाने के लिए लकड़ी की कमी हो गई थी। दहशत इतनी थी कि लोग जल्द से जल्द लाश से छुटकारा पाना चाहते थे। तब इस महामारी से बचने के लिए बाकी बचे गांव के लोगों ने जंगलों में शरण ली थी। हौसले की बानगी जनिया कहती है कि ”उ जमाने मा तौ वैद्य तक नाहीं रहैं, अब तौ हर गांव में डागडर (डाक्टर) हवैं। डरने की कौनो बात नाहीं।”

प्लेग एक तरह का बैक्टीरिया था ,जो छूने से फैलता था। चूहे (रोडन) से होता था, जो मक्खियों से मनुष्य तक पहुंचता था। तेज बुखार, शरीर में तेज दर्द सहित शरीर की ग्रंथियों में सूजन आने के बाद तत्काल मृत्यु होती थी। यह महामारी हॉन्ग कॉन्ग से भारत में आई थी। 1920 में महामारी भारत में अपने चरम पर थी।

आज महामारी से जूझते विश्व के सामने आर्थिक समस्यायें मुंह बांयें खड़ी है। घर में और कई दिन बंद होने के ख्याल भी खासा मानसिक संतुलन बिगाड़ने वाला है। लेकिन हमें नहीं भूलना चाहिए कि इस वक्त लाॅकडाउन मानव सभ्यता को बचाने के लिए बेहद जरूरी है। मशहूर वास्तुविद् और जियोपैथिक रेडिएशन एक्सपर्ट अजय पोद्दार से मैं सहमत हूं कि अपने कृत्यों से मानव ने प्राकृतिक पर्यावरण को बहुत नुकसान पहुंचाया। लोग सोचते है कि एक दिन सब अपने आप ठीक हो जाएगा। आशावाद जीवन में सकारात्मकता लाता है, लेकिन कोरा आशावाद कई बार पलायनवादी भी बन जाता है। प्रकृति की व्यवस्था में जो होता है, बहुत ही सुव्यवस्थित तरीके से होता है। कुदरत के पास कोई कितु-परंतु नहीं है। एक हाथ ले, दूसरे हाथ दे जैसा न्याय है। ये वक्त जीने के लिए आशावादी होने के साथ-साथ व्यवहारिक और यथार्थवादी होने का भी है। इसलिए प्रकृति की समस्याओं से अब और अनजान बने रहना उचित नहीं।

दि न्यूयार्क टाइम्स में टिमोथा एगन के अनुसार हर संकट कोई अनजान रास्ता खोल देता है। देखते ही देखते असंभव से लगने वाली बात संभव हो जाती है। अल्पावधि की किसी तेज दौड़ में इतिहास अंधेरे की ओर ले जा सकता है या प्रबुद्ध जननीति के लिए नया दिन साबित हो सकता है। अमेरिकी इतिहास की महान घटनाएं, जैसे दास प्रथा से मुक्ति, सामाजिक सुरक्षा, साफ हवा-पानी पर अधिकार, इन सभी का जन्म हादसों से ही हुआ। अभी हमारे लिए कोरोना वायरस ही दुख का महाकाव्य है और कई महीनों तक इसकी विभीषिका जारी रहने वाली है। मगर, देखा जाए तो तमाम तकलीफों, प्रियजनों को खोने के दुख और आइसोलेशन में अकेलेपन के बीच हमारे पास एक अवसर है यह विचार करने का कि हम अपनी दुनिया फिर से कैसे रच दें।

इस लाॅकडाउन का पालन करते हुए स्वंय को-अपनों को संक्रमित होने से बचाते हुए नई दुनिया का संकल्प रचते हुए हम क्यों न उस चेतावनी को बार-बार जेहन में बनाये रखें, जो लंबी यात्रा के दौरान घुमावदार रास्तों में अक्सर हमें अलर्ट करता रहता है -सावधानी हटी दुर्घटना घटी !!! 



Wednesday, April 1, 2020

ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है!

अष्टमी है आज। सामान्य दिनों में आज के दिन बच्चे सुबह से ही नहा-धोकर नइ्र्र फ्राक लंहगा पहन हो-हल्ला शुरू कर देते थे। कई दफे तो उनकी, किस घर में कौन जाएगा, की सेंटिग देखकर मुझे हंसी आती थी। इन बच्चों की आवाज से कालोनी गुलजार रहती है और आज ये कैसी अजीब सी सुबह है। मरघट सा सन्नाटा। मां दुर्गा रक्षा करें इस दुनिया की...



आज कोरोना वायरस से संक्रमित लोगों का आकंड़ा 8 लाख पार चुका है। मरने वालों की संख्या 40000 तक पहंुच रही है। लाॅकडाउन का पालन करते लोग अपने-अपने घरों में डरे बैठे है। इस अदृष्य वायरस ने उन्हें अपनों को भी संषकित नजरों से देखने को मजबूर कर दिया है। यकीनन यह युद्ध नहीं है पर युद्ध से भयावह स्थिति है। युद्ध में आप प्रत्यक्ष विरोधियों से लड़ते हो पर यहां आप किससे लड़ रहे हो, कैसे लड़ना है जैसी परिस्थितियों से आये दिन लड़ रहे हो। दोष किसका है ये बेमानी है। ये क्यूं है ये महत्वपूर्ण है।

बढ़ती राष्ट्रवाद की भावना ने जब से जोर पकड़ा, लगभग हर देश किसी न किसी समुदाय से ख़तरा महसूस करने लगा है। स्वंय को श्रेष्ठ समझ कर व्यक्ति दूसरों के धर्म-जीवन शैली को कोसता है। और ऐसे विचारों की आग को हवा देने में, भारी वोट बैंक की चाह रखने वाले देश-दुनिया के सत्तालोलुप, सबसे आगे है। कहीं और जाने की जरूरत नहीं, अपने भारत में ही सांप्रदायिक समीकरणों की वजह से सामाजिक समीकरण बिगड़ते देखे गये। अपनी -अपनी रोटी सेंकते नेता संगठन देष-काल-क्षेत्र से परे इंसानियत मानवता का नैतिक पाठ भूल बैठे। इंसान से बड़ा धर्म को मानने वाले जाहिलों की वजह से दुनिया की आबोहवा बद से बदतर होती जा रही। निजामुद्दीन मरकज में तब्लीगी जमात की सभा इसी का एक उदाहरण है। इंसान को कौम के नाम पर देखने वाले ये भूल जाते है कि मौत आने से पहले आपका धर्म या मजहब नहीं पूछती है। इस वायरस से इन धर्म-देश के ठेकेदारों को समण्ने में क्या मुष्किल पेष आ रही कि यह देष-काल-मजहब से परे अपना जाल फैला रहा है या कहें लोगों को निगल रहा। कट्टरपंथी सत्तालोलुप नेताओं की एक-दूसरे के विचारों का नीचा दिखाने या ना मानने या यूं कहें प्रयोगों से पूरी दुनिया आहत हुई बैठी है। युद्ध के जरिए एक दूसरे को मानसिक और शारीरिक रूप से जर्जर करने वाले देशों को काष! ऐसी स्थिति में हमें अगर शांति और सद्भाव का मतलब समझ आ जाये तो ये वायरस कम से कम दुुनिया भर के जीवन और समुदायों के लिए मानवता परम धर्म की लकीर खीेंचने कामयाब हो जाएगा।

लेकिन अफसोस! ऐसी बातें हो पाना महज काल्पनिक स्वप्न से अधिक कुछ नहीं है।

हैरानी इस बात की भी होती है कि हम दूसरों का आंकलन करते समय खुद का गिरेबान झांक कर क्यूं नहीं देखते। हम क्यूं महसूस नहीं करते कि किसी भी देष या इंसान की तक़लीफ मेरे देश या मेरे कष्ट से कम या अलग कैसे हो सकती है? हम अपनी थाली तो तमाम तरह के व्यंजनों से सजी देखना चाहते है पर उसकी अनाज की जरूरत को नजरअंदाज करते है जो एक जून खाकर किसी तरह अपना जीवनयापन कर रहा है। अपने आलीशान बंगलों में बैठे इसकी कल्पना करना क्यों छोड़ देते है कि बिना छत के रहना क्या होता है? गरीब की बेसिक जरूरत किसी भी धनवान की बेसिक आवष्यकता से परे कैसे हो सकती है। साधारण से जीवन मूल्यों को हम विकास की अंधी दौड़ में शामिल होने के पीछे गंवाते जा रहे है। सच तो ये है कि मानवता का पाठ भूलकर अनजाने में ही हम दानवता का पाठ ग्रहण करते जा रहे है।

सवा अरब की जनसंख्या वाले भारत में आज भी छोटे काम करने वालों को हेय दृष्टि से देखा जाता है. चाहे वह घर में काम करने वाली बाई हो या कचरा उठाने वाला कर्मचारी या घर तक सामान पहुंचाने वाला डिलीवरी बॉय। लेकिन क्या कभी आपने इस बारे में सोचा कि जो सुबह-शाम हमारे घरों की छोटी कभी-कभी बड़ी लगने वाली परेषानियों को चुटकियों में दूर कर देते है वे ये करने से मना कर दे ंतो क्या होगा। हमारे यहां व्यवसाय का सम्मान उसके क्लास को देखकर किया जाता रहा है। 21वीं सदी में है फिर भी, आज भी ये परंपरा बदस्तूर जारी है। हम पैर से रिक्षा खींचने वाले से हद तक नीचे जाकर मोल-भाव करेगे वहीं उबर-ओला टैक्सी वाले को उतनी ही दूरी का तय पैसा बिना बहस के दे देगें। अगर आप ध्यान दें तो संकट के इस वक्त में बड़े फैसले और ‘महत्वपूर्ण’ काम करने वाले ज्यादातर लोग घरों में बंद हैं और मूलभूत काम करने वाले सड़कों पर या अन्य जरूरी काम मे लगे हैं। आप जानते हैं क्यों? क्योंकि आपकी जरूरतों को वे पूरा कर सकंे। हालांकि आपको इस वक्त कई ऐसे छोटे काम करने वालों के ना होने का भी अहसास पीड़ा दे रहा हो जो आपके दिनचर्या के बेहद जरूरी हिस्से रहे है। लेकिन क्या इस अहसास को आप तब भी याद रख सकेगे जब जीवन सामान्य गति में उतर आएगा? संभवतः नहीं।

गत दिनों मेरे एक मित्र ने कहा कि इस समय का उपयोग करंे। साफ-स्वस्थ हो चली हवा से फेफड़ों को मजबूत करें। बात सही थी। आंकड़ें को देखा जाये तो 26 मार्च, 2020 को नोएडा का एयर क्वालिटी इंडेक्स 77 का था. जबकि 2019 में इसी तारीख को यह आंकड़ा 156 यानी इसके दुगने से भी ज्यादा था. लॉकडाउन के चलते स्वस्थ जीवन का सबसे अहम पार्ट स्वच्छ ताजी हवा की गुणवत्ता अचानक बढ़ गई है. यह देखना थोड़ा खुशी देता है कि दिल्ली-एनसीआर जैसे इलाकों में भी आजकल चिड़ियों की चहचहाहट सुनाई देने लगी है.

लेकिन सवाल वही आखिर कब तक? लाॅकडाउन हटा नहीं कि लोग फिर विकास की दौड़ के नाम पर अपनी-अपनी गाड़ियां लेकर निकल पडे़गे, फैक्ट्रियां नियमों को ताक में रखकर फिर से काम करने लगेगी। अभी हम जो दूर होकर भी एक है, पल में फिर अपनी-अपनी वजहों से तलवारें खींचकर एक-दूसरे के सामने खड़े होगें, उसके चरित्र इसकीे असफलता की बयानबाजी पर उतर आयंगें। एक बार हम फिर सुबह के निकले रात घर आने भर की औपचारिता निभाने में मषगूल होगें। हम भूल जाएंगे कि इस लॉकडाउन ने हमें नियमों में रहकर जीवन जीने का, परिवार के साथ वक्त बिताने का, पुराने दोस्तों और छूट चुके रिश्तेदारों को याद करने और उनसे फोन या मैसेजिंग के जरिये संपर्क में बने रहना बताया।

क्या आपको महसूस नहीं होता कि संभवतः यूनीवर्स ने हमें ये समय आत्मचिंतन के लिए ही दे दिया हो? जरा सोच के देखें।

कुदरत के साथ हमारे द्वारा किये जाते नित नये खिलवाड़ ने हमें चेताने के लिए ये खेल खेला हो कि जब इंसान ही नहीं बचेगा, तुम्हारे अपने ही नहीं बचेगें तो किसकी सुरक्षा के नाम पर तेल, पानी, हथियारों का जमावड़ा करोगे। बेतरतीब से काटते जंगलों को किसके नाम पर कालोनियां बसाने के लिए आबाद करोगें। सोचो और संकल्प करो कि तुम दुनिया इंसानों के लिए बनाना चाहते हो ना कि अपनी बढ़ते लालच की इमारत को बुलंद करने के लिए। साफ हवा, हरियाली, साफ नदियां, समृद्ध ज्ञान, स्किल्ड प्रतियोगिता, मुस्कुराते चेहरे, खिलखिलाता बचपन, स्वस्थ शरीर, और लहलहाते खेत खलिहान-क्या इस तरह की देश की परिकल्पना करना मुष्किल है।

कोरोना वायरस लाखों की बलि लेकर अगर शक्तिषाली देषों-नेताओं को मानव जीवन के असल आवश्यक मूल्यों को समझाने में कारगर साबित होता है तो मैं भी इनमें से एक होने को तैयार हूं। हमें सदैव ये याद रखने की जरूरत है कि पंचतत्वों से हम है हमसे पंचतत्व नहीं। इसलिए इनकी रक्षा जान देकर भी करनी पड़े तो पीछे नहीं हटे क्योंकि ये सुरक्षित और समृद्ध है तो ये दुनिया, देश-सीमाएं, घर-परिवार और हमारी आने वाले पीढ़ियां सुरक्षित है।

अंत में बस इतना कहना चाहूंगी कि यह ऐसी भयावह चुनौती है जिससे हम कब उबरेगें, पता नहीं। लेकिन यकीन मानिए यही वह समय है जबकि अपनी परंपराओं के दार्षनिक और आध्यात्मिक संसाधनों को खंगालना आरंभ करना होगा और एकजुटता, भरोसा, उम्मीद, दया का प्रदर्षन करते हुए एक सुर में कहना होगा कि ये विभीषिका हम पर भारी हो सकती है पर हमें तोड़ नहीं सकती। हमें कुदरत स्वंय के पुर्नमूल्यांकन का समय दे रही है और चेता रही है कि देष-काल-सीमाओं से उठकर कर हम स्वस्थ मानसिकता के साथ स्वस्थ खुषहाल मानव जीवन के लिए काम करें। एक दूसरे की उन्नति में अपनी उन्नति का पाठ पढ़ना और पढ़ाना सीखें। अन्यथा आने वाली नस्लें जिंदा रह भी गई तो यही कहती पायी जायेगीं-

ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है...?