याद है तुम्हें...
हमारी वो पहली मुलाक़ात,
तुम दरवाजे पर खड़े थे,
अपनी मोहिनी मुस्कान लिए
और सम्मोहित सी मैं
कुछ अर्नगल बोलती,
भीतर ही भीतर गुदगुदाती
ले आई थी तुम्हें घर के भीतर,
और...फिर
क्या कहें, क्या न कहें के बीच
औपचारिकता भरी वो हमारी बातें
न जाने कब
बांधने लगी मन को मन से
हमें पता ही न चला...
सच कहूं जो तुमसे कभी न कहा
उस वक्त
उछलते-कूदते मन को मैं
बड़ी कठिनाई से थाम रही थी
तुम्हारी नजरों को
मन की थाह लेने से रोकने का असफल प्रयास कर रही थी
सच्ची-सीधी-सरल सी लगती तुम्हारी बातें
मेरे एकाकी मन को
अपनेपन का बोध करा गए
और तुम्हारी नजरों की वो बेबाकी
न जाने कब
मेरे मन के सोये हुए तार को
जगा गए कि
मुझे पता ही न चला
और फिर जब तुम जाने के लिए उठे
वो कलेजे में उठी कसक
आज भी याद है मुझे
वक्त के वहीं ठहर जाने की तड़प
और थोड़ी देर तुम्हें रोक लेने की ख़्वाहिष
सब जैसे आज भी उसी पल में थम से गये हो
फिर मिलने की औपचारिकता के बीच
एक दूसरे को भर लेने की चाहत को
हम दोनों ने ही छुआ
और जब
तुमने अपने संकोच की दीवार को तोड़
मेरे लरजते हाथों को थामा था....
उस पहली छुअन को याद कर
आज भी असीम सुख से भर जाती हूं...
सच कहती हूं
मैं उस पहली मुलाक़ात को आज भी
नहीं भूल पाती हूं

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