Monday, April 11, 2022

ख़ास अज़ीजों के लिए लिखी कविताएं


कल्पना से परे

कभी शरद ऋतु की खिलती धूप सी
कभी सावन की पहली फुहार सी
कभी बसंत की गुदगुदाती बयार सी 
....तो कभी पतझड़ में झरते सूखे पत्तों के बीच नव कोंपल से खिलती तुम
कितने ही मौसम का सुखद अहसास हो।

बिंदास सी तुम और तुम्हारी खनकती हँसी,
फ़िरोज़ा रंगत में लिपटे तुम्हारे
करिश्माई व्यक्तित्व को देखकर
अक्सर ही लोग पूछने को मजबूर होते है...
ये कौन आया रौशन हो गई महफ़िल जिसके नाम पे...

और तुम्हारा मन !!!
गहरे साग़र सा छुपाये हुए है अपने गर्भ में 
साथ बांटे गये भावुक पलों की अनेकों कही-अनकही पोटलियां 
जो भरोसे की न खुल सकने वाली गांठ से बंधी है

अवसाद के अंधकूप से बाहर खींच लाती 
तुम्हारी सकारात्मक सोच
अनजाने में ही दे देती है कितनों को ही उम्र के वरदान,
अपने ऊर्जावान गुरुत्वाकर्षण से 
काया पलट करती तुम
कल्पना से परे अल्पना
मेरे लिए तो जनमों के पुण्य का प्रसाद है तुम्हारी मित्रता ।

09 april 2022




शिशु मन सी तुम

जीवन संघर्ष की शतरंजी बिसात पर,
दांव पेंचो से दूर,
अपनी सीधी चाल में दुनिया को देखती ....तुममें
मैने महसूस किया है,
रात्रि की गहनता से भी गहरी... उदासी को,
भोर की बेला सी शांति को,
देखी है तुममें नभ की सी विशालता,
और सुना है तुममें उफनते सागर का शोर भी, 
शीतल छांव सा सुकून देती तुम्हारी उपस्थिति
मौन रहकर भी समझ लेती है सबका अंतर्मन,
सच कहूं तो तुममें देखा मैंने
जयशंकर की 'कामायनी' को
कालीदास की 'शकुंतला' को
महादेवी की 'नीर भरी दुख की बदली' को और देखा
निराला की 'वह तोड़ती पत्थर सी स्त्री' को,
समय के झंझावतों से टकराती
कभी बिखरती कभी संभलती
मैंने देखा है तुममें
निच्छल, निष्कपट, निस्वार्थ
'शिशु-मन' से
ईश्वरीय रूप को ।

4 march 2022




तुम्हारा आकाश

स्मृति में है वो पहली भेंट
जब मुग्ध से...किंतु कुछ
संकोचित से तुम खोल रहे थे 
धीरे-धीरे अपनी कविताओं
की गठरी को 
और मैं
महसूस कर रही थी तुम्हारे भीतर
चलते उस अंतर्द्वंद्व को
जिसे तुमने ढाँप रखा था
शब्दोँ में छिपी मौन की मिट्टी से

मुझे याद है वो
दूसरी भेंट भी
जब अर्धरात्रि तुम अपने सपनों और अपनों के मध्य
खोज रहे थे अपने
अनिश्चित से दिखते कल को
घनघोर निराशा के तिमिर में घिरे
एक तिनके का सहारा ढूंढते, 
तुममें
कुछ कर गुजरने की
चाह की वेदना
कई दिनों तक मेरे कानों में
शीशे की तरह पिघलती रही।

और याद है वो तीसरी भेंट भी
जब आत्मविश्र्वास और उत्साह से भरे तुममें 
मैंने महसूस किया उस आग को , जो
अपनी प्रचंडता के साथ देदीप्यमान थी
तुम्हारे मुखमंडल पर 
छूने को विकल
उस आकाश को, जो है सिर्फ तुम्हारा ...
और तुम्हारा
आने वाला कल.

27 feb 2022


....and a poem in English

When I heard about you... 
from my daughter
I start imaging 
how you be look like
how you behave 
how you keeping yourself
are you romantic
You are a loud person or
you have a cool calm personality
are you understanding
are you self center or
you are a caring guy
You are a good listener or you are just speaker...
So many images I made 
Until I met you
And dear son!
What I found in you
A very emotional, lonely person 
in a pleasant impressive personality
Who just know loving others
Very sensitive but alert & lively
whenever I hugged you 
I always feels good positive vibes
Dear son! you know,
every mother always in search of 
that kind of a person 
Who are always ready to do anything 
for her daughter and
keep happy in terms of real happiness
Thankfully you gave me 
that kind of sigh of relief
You give her a family which meant a lot for her
A lot for me
I just want to thank you to being with us 
as my family, 
as my son for forever

2 January 2022