Friday, October 30, 2015

जाति-धर्म की बाजी पर बढ़ती सत्ता की चाह

डा0 लोहिया कहते थे “धर्म और राजनीति के दायरे अलग-अलग हैं, पर दोनों की जड़ें एक हैं। ’धर्म’ दीर्घकालीन राजनीति है, ’राजनीति’ अल्पकालीन धर्म है। धर्म का काम है, अच्छाई करे और उसकी स्तुति करे। राजनीति का काम है बुराई से लड़े और उसकी निन्दा करे। जब धर्म अच्छाई न करे केवल स्तुति भर करता है तो वह निष्प्राण हो जाता है और राजनीति जब बुराई से लड़ती नहीं, केवल निन्दा भर करती है तो वह कलही हो जाती है। इसलिए आवश्यक है कि धर्म और राजनीति के मूल तत्व समझ में आ जाए। धर्म और राजनीति का अविवेकी मिलन दोनों को भ्रष्ट कर देता है, फिर भी जरूरी है कि धर्म और राजनीति एक दूसरे से सम्पर्क न तोड़ें, मर्यादा निभाते रहे।“ धर्म और राजनीति के साथ साथ चलने का जिक्र जब डा0 लोहिया ने किया था तब उन्होंने सोचा भी न होगा कि आने वाले समय में राजनीति मंषाओं को पूरा करने का केन्द्र जाति-धर्म को बना दिया जाएगा। यह सत्य है कि आज कोई भी चुनाव जाति और धर्म की राजनीति से मुक्त नहीं। अमूमन सभी दल जाति और संप्रदाय के आधार पर ध्रुवीकरण का प्रयास करते है। बिहार का चुनाव तो जातिगत वोटों के आधार पर लड़ा जा रहा है लेकिन जहां तक 2017 में होने वाला यूपी का चुनाव है, वह धर्म आधारित होगा या व्यक्ति विषेष पर टिका होगा ऐसे कयासों पर चर्चाओं का बाजार गरम होने लगा है।

कुछ माह पूर्व ‘दलित जातिवादी राजनीति बनाम हिंदुत्व’ शीर्षक से मैंने एक लेख पढ़ा था जिसकी कुछेक बातों से मैं सहमत थी कि 2014 के चुनाव में भाजपा ने धर्म और जाति, दोनों का इस्तेमाल बड़ी रणनीति के साथ किया, जिसके पीछे वह चालाकी से ‘विकास’ की बात करके जनता को भ्रमित करने में सफल रही, जबकि असली मुद्दा धार्मिक ध्रुवीकरण का ही था। इस दौरान बसपा, सपा और जद (एकी) के सीटें न जीत पाने को मीडिया द्वारा भी इसी तरह प्रस्तुत किया गया कि अब जाति की राजनीति के दिन लद गए। जबकि यह सच नहीं है। जहां तक जाति की राजनीति का सवाल है, भाजपा हमेशा से ऊंची जातियों और हिंदुत्व की राजनीति करती रही है, उसने इस बार भी की। यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है कि विमर्शकारों को भाजपा जाति और धर्म की राजनीति करती नहीं दिखती, जबकि सामाजिक न्याय की राजनीति करने वाले दलों पर हमेशा जातिवादी राजनीति करने का आरोप लगाया जाता रहा है।

राजनीतिक विषेषज्ञ योगेंद्र नारायण का कहना है कि यह सच है कि वोट पर जाति धर्म का असर पड़ता है। आप मतदाता हों या उम्मीदवार, मतदान पर आपके समुदाय का असर पड़ता है। कभी-कभार जाति के आधार पर ध्रुवीकरण इतना तीखा होता है मानो जाति के सिवाय और कुछ नहीं है। लेकिन आंकड़े बताते हैं कि जाति या धर्म वोट पर असर डालने वाले कारकों में से एक है, एकमात्र कतई नहीं। पिछले 10-15 साल में उत्तर प्रदेश और बिहार की परिस्थितियों ने सब के मन में कहीं न कहीं पूरे देश की छवि बना ली है। जबकि हकीकत यह है कि उत्तर प्रदेश और बिहार का जातीय ध्रुवीकरण भारतीय लोकतंत्र में एक अपवाद है उसका सामान्य नियम कतई नहीं। आपको याद होगा जब राष्ट्रीय जनगणना में जाति आधारित जनगणना पर संसद में लालू यादव और मुलायम सिंह यादव ने मांग उठाई तो चिंता हुई थी कि यह कहीं मंडल कमीषन की तरह हंगामाखेज न बन जाए। जो जाति व्यवस्था के खिलाफ थे, उन्हें लगा कि कहीं इससे जाति व्यवस्था को बढ़ावा न मिले। खिलाफत गलत भी नहीं थी। जाति को भी जनगणना में शामिल करने का मुख्य लक्ष्य देर सबेर अपने अपने वोट बैंक को सेट करना था। पंचायत चुनाव हों या विधानसभा या लोकसभा भीतरी इलाकों में आज इसी दम पर जीत हासिल की जाती है। डा0 लोहिया कहा करते थे कि जाति बुरी चीज है, लेकिन जाति जैसी कठोर सच्चाई भी दूसरी नहीं है और जाति तो एक ऐसा सच है, जिसका विश्व में कहीं और उदाहरण ही नहीं मिलता....धर्म आसान है, जाति कठोर है।

कुछ ऐसा ही धर्म के साथ भी है। कहते है धर्म और राजनीति के अविवेकी मिलन से दोनों ही भ्रष्ट हो जाते हैं। साम्प्रदायिक कट्टरता का जन्म इनके मिलन से होता है। यदि धर्म और राजनीति को अलग रख कर देखा जाए तो साम्प्रदायिक कट्टरता से बचा जा सकता है। लेकिन राजनीति करने वाले अपने वोट बैंक और स्वार्थलोलुपता के कारण धर्म का दुरुपयोग करते है और धर्म भी आदर्श का त्यागकर राजनीतिक गलियारों में अपना रुतबा कायम करने की कोशिश में लग पड़ता है। ऐसी स्थिति में जातिगत वोट का स्थान धर्म ले लेता है। बिहार में जातिगत वोट की वजह ही जाति को प्रमुखता देने से है। किंतु उत्तर प्रदेष में दलित वोट बैंक से अलग हटकर अगर कोई वोट बैंक इस बार बनाने का पंयास होगा तो वह धर्म के नाम पर होगा। 2012 का चुनाव जाति धर्म से अलग हटकर व्यक्ति विषेष था। अखिलेष की धुंआधार सायकिल यात्रा ने सपा की छवि को साफ करने में मदद की और दलितों की मसीहा बसपा दरकिनार हो गई। उस वक्त कांग्रेस भाजपा इन दोनों के बीच कहीं नहीं थी। लेकिन आज भाजपा पहले ही तुलना में मजबूत है और उत्तर प्रदेश की सत्ता पाना उसका परम लक्ष्य। लोहिया के समाजवाद के सिद्धांत की समर्थक समाजवादी पार्टी मुस्लिम वोट बैंक को अपना प्रबल पक्षधर मानती थी। कांग्रेस फिलहाल किसी भी जनाधार के बिना इस वक्त मैदान में है। ऐसे में भाजपा और सपा ही रह जाते है जो धर्म के नाम पर उत्तर प्रदेष में अपने राजनीति दांव खेल सकते है। भाजपा राष्ट्रवाद की बात करती है लेकिन उसकी अपनी छवि हिन्दू पार्टी की है जिसका मुख्य जनाधार हिन्दू वोट बैंक ही है। तीसरी पार्टी बसपा है जो दलित वोट बैंक, जिनकी जनसंख्या में भागेदारी 21.6 प्रतिशत हैं, पर प्रबल दावेदारी रखती है। लोकसभा में दलित वोट बैंक के खिसकने से जो बसपा को कमजोर पार्टी समझ बैठे बात उन्हें हाल में मायावती ने एक बार फिर साबित कर दिखया कि बसपा अभी भी उत्तर प्रदेश में अपनी मजबूत पकड़ रखती है। जिस वक्त बिहार चुनाव में बाकी पार्टियां व्यस्त रही मायावती ने कांशीराम के 11वें परिनिर्वाण दिवस के मौके पर आयोजित कार्यक्रम में बड़ी संख्या में भीड़ जुटा कर दूसरे दलों को जता दिया कि पारम्परिक मतदाता आज भी उनके साथ है।

एक बात और है कि पार्टिया भले ही धर्म जाति की राजनीति करे, मतदाता अक्सर अपनी बुद्धिमता का परिचय ही देते मिला है। इसलिए पार्टिया भले ही जाति धर्म के नाम पर जहर का बीज बोने का प्रयास करें, संदेह नहीं कि कहीं भी कोई बड़ी सांप्रदायिक घटना हो या फिर सांप्रदायिक गोलबंदी हो रही हो तो उसके जवाब में एकजुटता की भावना ही उभरकर सामने आती है। जहां तक भारत में रहने वाले मुसलमानों का सवाल है वह वोट देते समय किसी मुस्लिम उम्मीदवार या इस्लामी पार्टी के होने का ख्याल नहीं रखता। यही बात भारत के मुसलमानों को दुनिया के मुसलमानों से अलग करती है। वे हमेषा अपनी आस्था ऐसी पार्टियों में जताते है जिनका नेतृत्व हिंदू के हाथों में रहा है और जिनकी विचारधारा इस्लाम से कतई प्रभावित नहीं रही हो। अगर उन इलाकों को छोड़ दें जहां सीधे-सीधे कांग्रेस और भाजपा में मुकाबला है तो ऐसी कोई जगह नहीं है जहाँ मुसलमानों का 70-80 प्रतिशत वोट किसी एक पार्टी को मिलता हो। यानी कि हिंदुस्तान का मुसलमान उस मायनों में वोट बैंक नहीं है जिस मायने में अमेरिका के अश्वेत, डेमोक्रेटिक पार्टी के हैं या फिर ब्रितानिया के अल्पसंख्यक समूह वहाँ की लेबर पार्टी के वोट बैंक हैं। यही वजह है कि लोकसभा चुनाव में नरेन्द्र मोदी के नाम पर हर मतदाता जात-पांत से उठकर वोट करने चल पड़ा और रिकार्डतोड़ मतों से भाजपा को, जो कि हिंदू पार्टी है, सत्ता पर बिठा दिया।

उत्तर प्रदेश में होने वाले 2017 के चुनाव को राजनीतिक पार्टियां धर्म जाति से प्रभावित करने की कोशिश करेगीं, लेकिन जहां तक मतदाताओं का सवाल है तो अधिकांश का वोट व्यक्ति विशेष पर अधिक होगा। और एक बात कहना चाहूंगी कि जात-पांत धर्म से ऊपर एक और चीज है जिसे ’हवा का रूख’ कहते है। वह जिस ओर होगी, जिसकी होगी सत्ता उसी की होगी।                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                          

Saturday, October 3, 2015

कश्मीर का राग अलापना छोड़ दें आप मियां नवाज शरीफ साहब!

वाल्डोर्फ एस्टोरिया होटल में एक संवाददाता सम्मेलन के दौरान जब प्रधानमंत्री मियां नवाज शरीफ ने पाकिस्तान के आंतरिक मामलों में भारतीय हस्तक्षेप और भारत द्वारा पाकिस्तान की धरती पर आतंकवाद भड़काने संबंधी फाइल को जल्द ही कि उस संयुक्त राष्ट्र के महासचिव को सौंप दिए जाने की बात जब कही तब मैंने अपनी याददाश्त के साथ जोर आजमाईश कर ये याद करने की कोशिश की कि भारत ने कब और कौन सा ऐसा आतंकवादी हमला पाकिस्तान की जमीन पर कियाकी फाइल पाकिस्तान तैयार किए बैठा हैै? इस फाइल की जानकारी देने के बाद उनका ये कहना तो और भी चैंकाने वाला था कि पाकिस्तान शांतिपूर्ण पड़ोसी के संबंधों के लिए उत्सुक है, जबकि उनके ’अशांतिपूर्ण’ रवैये का गवाह अमेरिका, संयुक्त राष्ट्र से लेकर उनका हमजोली चीन भी है।
पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ जब 2014 में नरेन्द्र मोदी के शपथग्रहण समारोह में भारत आए तो उनके व्यवहार से एकबारगी ऐसा लगा कि हो न हो ये दो कद्दावर नेता इस बार किसी नतीजे पर जरूर पहुंचेगे।। उपहारों के आदान-प्रदान ने दोनों देशों के बीच फैले तनाव भरे माहौल को नरम भी किया लेकिन जल्द ही इस बात का यकीन भी दिला दिया कि ये तो महज औपचारिकताएं थी जो निभाई जा रही थीं, अन्यथा परिस्थितियां वैसी ही है जैसी थी। धीरे-धीरे पाकिस्तानी प्रधानमंत्री के बदलते सुरों ने इस बात का भी यकीन दिला दिया कि कठपुतली सरकार चला रहे नवाज शरीफ सेना के दबदबे के आगे लाचार है। इसी दबाव के चलते पाकिस्तानी प्रधानमंत्री अन्तर्राष्ट्रीय मंचों पर अक्सर कश्मीर राग अलापते मिल जाएंगें। बरसों से अलापे जा रहे इस राग का आज भी कोई सुनने वाला नहीं ये जानते हुए भी पाकिस्तान पड़ोसी मसलों को विश्व मंचों पर रखने से बाज नहीं आता। सोच का फ्रर्क देखिये जहां भारत का प्रधानमंत्री ऐसे मंचों का उपयोग आतंकवाद के खिलाफ एक होकर लड़ने के लिए करता है और अपने समय का पूरा सदुपयोग कर देश हित के लिए लोगों से मिलता है तो वहीं पाकिस्तान का प्रधानमंत्री अपना रोना रोकर स्थानीय पाकिस्तानी रेस्ट्रोरेन्टों का मजा लेने चला जाता है। ऐसा लगता है जैसे इस तरह के मंच का उपयोग वे मात्र ’उन’ घरेलू लोगों को संतुष्ट करने के लिए करते है जो गाहे बगाहे इस मसले पर उनकी नीयत पर शक करने लगते है। इसलिए इस बार के यूएन समिट में इस मुद्दे को उठाते हुए उन्होंने न केवल कश्मीर की मांग को दोबारा उठाया वरन् ’शांतिदूत’ का नकाब ओढ़ दोनों मुल्कों में शांति के लिए चार सूत्र भी बता दिए, जिसके जबाव में भारत की विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने उन्हें चार की जगह सिर्फ एक सूत्र पर ही ध्यान देने को कहा और वह यह है कि आतंकवाद छोड़िए और बैठकर बातचीत कीजिए।
कश्मीर और उससे जुड़े ढेरों तथ्यों के बीच एक बात सौ फीसद सही है कि न भारत उसको अपना अभिन्न अंग मानना छोड़ेगा और ना पाकिस्तान इस बात को मानने को तैयार होगा कि कश्मीर भारत का है। यूं कह लें कि कश्मीर का मामला दिमाग से नहीं सीधे दिल से जुड़ा हुआ है। और दिल पर किसकी हुकुमत चली है। दरअसल कुछ मसले ऐसे होते है जिन पर देशों के सियासतदार भी फैसला करने से डरते है। इसके उदाहरण भी मिल जाते हंै। कुछ दिनों पहले मैंने सोशल मीडिया की एक साइट पर पढ़ा था कि सरदार वल्लभभाई पटेल कश्मीर को पाकिस्तान को दे देना चाहते थे, जबकि पंडित जवाहरलाल नेहरू कश्मीरी होने के नाते कश्मीर को भारत के साथ रखना चाहते थे। यह बात पत्रकार कुलदीप नैय्यर की जीवनी से उद्धृत कर पोस्ट की गई थी। अब साठ-सत्तर साल पहले की इन बातों को पूरी प्रामाणिकता के साथ खंगालना आसान काम नहीं है। कुछ लोग महाराजा हरीसिंह को दोष देते है जिन्होंने भारत के साथ विलय के दस्तावेजों पर सहर्ष हस्ताक्षर कर दिए थे। आपको जानकर हैरानी होगी कि जिस कश्मीर को लेकर इतनी हाय तौबा मची है वह आठ-नौ सौ साल पहले एक हिंदू बहुल भूभाग था। इस धरती के पूर्वज (शैव धर्म के अनुयायी) हिंदू थे। बाद में हुए धर्मांतरण ने घाटी में हिंदुओं को अल्पसंख्यक बना दिया, जबकि असल में कश्मीर में हिंदू बहुसंख्यक थे। अब हिंदू बहुसंख्यक हो या मुस्लिम अल्पसंख्यक, सियासत के खेल में, रचे गए कुचक्र में आज कश्मीर दोनों देशों के बीच जातीय दुश्मनी का सबसे बड़ा कारण बन गया है।
एक विदेशी अखबार के संपादकीय में मैंने पढ़ा था कि उन्होंने शरीफ को व्यवहारिक पक्षों को समझकर कश्मीर समस्या के हल के लिए आगे बढ़ने की नसीहत दी थी और ये तक कहा कि उसकी इस कोशिश में साथ देने को भारत सदैव तैयार दिखेगा। दुनिया में कितने उदाहरण ऐसे मिल जाएंगें, जहाँ वर्षो से चली आ रही व्यापक समस्याओं का समाधान बातचीत से ही निकला। लेकिन पाकिस्तान में सत्ता परिवर्तन के बावजूद उम्मीद की कोई किरण कभी नजर नहीं आई। जिस तरह से पाकिस्तान सीजफायर का उल्लधंन करता है वह किसी सभ्य पड़ोसी का सभ्य व्यवहार नहीं कहा जा सकता। सदा से भारत पर किए जाते पाकिस्तान समर्थित आतंकवादियों के हमलों की अनदेखी करना और भारत की ओर से पेश किए जाते सबूतों को मानने से इंकार करना पाकिस्तान की हठधर्मिता का सबसे बड़ा सबूत है। 27 जुलाई को सेना की वर्दी में कपड़े पहने बंदूकधारियों ने पाकिस्तान के साथ सीमा के पास एक भारतीय पुलिस स्टेशन पर हमला किया और जिसमें कम से कम नौ लोग मारे गए थे। इस तरह की बेजा हरकतों को रोकने के बजाय पाकिस्तानी प्रधानमंत्री भारत पर ही उल्टा आतंकवाद फैलाने का ठीकरा फोड़ रहे है।
बेहतर होगा पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इस बात पर गौर फरमाएं कि सिर्फ कश्मीर मुद्दे को उछालते रहने से न तो उनका भला होने वाला है और न ही पाकिस्तान को ही कुछ मिलने वाला है। अफसोस होता है इस बात पर कि ब्रिटिश औपनिवेशिक साम्राज्य के विभाजन में बने पाकिस्तान को 60 से अधिक वर्ष हो रहे है किंतु आज भी कश्मीर विवाद को लेकर उसका अड़ियल रुख नहीं बदलता। इस मुद्दे पर कई मर्तबा निर्णायक समझौते की स्थिति आते-आते रह गई और इसकी वजह अधिकाशतः पाकिस्तान के भीतर राज करते लोग रहे है। फिर भी इस मामले में बातचीत का पहल का रास्ता भारत ने खुला रहा जबकि पाकिस्तान इस मुद्दे के समाधान की दिशा में किसी सकारात्मक पहल की तरफ बढ़ने से बाज आता रहता है। आज स्थ्तिि ये है कि उसकी कथनी और करनी की पोल दुनिया के सामने खुली पड़ी है और इसका सबसे बड़ा उदाहरण लादेन है। लादेन को पाकिस्तान में सेना की मदद से महफूज रहने की उसकी करतूत ने अमरीका की नजरों में उसका भरोसा खत्म कर दिया। संयुक्त अरब अमीरात, जो कि पाकिस्तान का प्रबल समर्थक रहा है, ने गत दिनों भारत के प्रधानमंत्री के संयुक्त अरब अमीरात के दौरे के अवसर पर भविष्य में भारत के साथ घनिष्ठ संबंधों को तवोज्जोह देने के अपने मंसूबों को तब जाहिर कर दिया जब एक संयुक्त बयान के जरिए भारत और अमीरात ने आतंकवाद का औचित्य साबित करने के लिए धर्म के प्रयोग की निंदा की और आतंकवाद का मिलकर मुकाबला करने में आपस में पूर्ण सहयोग का वादा किया। एक के बाद एक झटके खता पाकिस्तान अब अपने लिए नये रहनुमाओं को खोजता फिर रहा है। संयुक्त राष्ट्रसंघ के मंच से उनकी पीड़ा को कितनों ने सुना इस बात से हम आप सब वाकिफ है। चीन से उसकी करीबी जगजाहिर है अब अमेरिका के घोर विरोधी रूस को भी वह अपना बना लेने की कवायद में जुटा है। 
पाकिस्तान हो या उसके सिपहसलाहकार भारत की तरक्की उन्हें फांस की तरह चुभती है। ब्रिटिशराज के खात्मे के साथ एक ही वक्त में फिर से विकास का रास्ता पकड़ने में पाकिस्तान कहीं पीछे छूट गया और भारत आगे बढ़ गया। इसलिए किसी तरह भारत में अस्थिरता बनाए रखना ही उसने अपना मकसद बना लिया है। वरना ऐसा क्या है कि दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक जुड़ाव में बेइंतहाई जुड़ाव होने के बाद भी सियासतदारों के दिल इतने तल्ख़ है। इस मुत्तालिक़ फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ साहब का एक शेर याद आ रहा है- 

इक तर्ज़-ए-तग़ाफ़ुल है सो वो उनको मुबारक़
इक अर्ज़-ए-तमन्ना है सो हम करते रहेगें     (तग़ाफ़ुल-बेपरवाही)