Wednesday, December 12, 2018

सुधर जाओ कि ‘सिहांसन‘ खाली कराने ‘जनता‘ आती है और अब क्या कहने को बाकी है


दो बातों की वजह से आज ये लेख लिखने का मन किया. (एक) जो मन से मांगा उसका पूरा होना और (दो)े समय के साथ ‘आत्मविश्वास‘ से माथा दमकते देखना.

पहले बात, पहली वजह की. जब 5 राज्यों में विधानसभा चुनाव की तारीखें घोषित हुई तो दिल से कहीं ये इच्छा जागृत हुई कि इस बार ये तारीखें सब उलट-पलट कर दें. एक्ज्टि पोल के नतीजों से मन खिन्न था लेकिन मतदान के प्रतिशत पर नतीजों के पलटने का यकीन भी था. और जो हुआ वह वही था जो जनता ने चाहा था. भाजपा शासित राज्यों में उसकी हार से मेरी प्रसन्नता की वजह आम लेकिन खास थी, जिसका जिक्र आगे करूंगी. 2014 के आम चुनाव के लिए मैं खुद भाजपा और मोदी पर ‘सपोटिव‘ लेख लिखा करती थी. लेकिन आज ठीक इसके उलट मैं उसके खिलाफ खड़ी नजर आती हूं. आखिर क्यों ऐसा करने को मैं या कोई आम जन मजबूर हो जाता है. क्या इस पर कभी ‘मन की बात‘ को सुना जाता है.

दरअसल सत्ता परिवर्तन की नौबत तब आती है जब आप पिछली सरकारों के रवैये से त्रस्त हो जाते है और बेहतरी के लिए दूसरी पार्टी को ही उससे बेहतर मानते हुए उसे मौका देना चाहते है. हालांकि आप जिस सोच के साथ किसी भी पार्टी का चुनाव करते है अक्सर वे सभी कुछ समय बाद फेल भी नजर आते है. क्योंकि सभी सरकारें बेसिक समस्या के बात करके सबसे पहले उसे ही नजरअंदाज करती है. सत्ता मिलते ही वह ‘उनकी‘ तुष्टि के साधन पहले ढूढ़ने लगती है जिन्होंने अपनी पूंजी का दांव उन पर खेला होता है. ऐसे में भला मूर्ख जनता से किए गये वायदों की किसे परवाह? लेकिन जनता भी चुनाव की ताक में बैठी होती है. तमाम तरह के गुणा-भाग के बाद उसे भी फिर ‘भूतकाल‘ ‘वर्तमान‘ से कम अवसरवादी या कम बेईमान नजर आने लगता है. और यही सत्ता परिवर्तन का एक बड़ा कारण बन जाता है.


2014 में जब भाजपा मोदी के चेहरे के साथ इस नारे को लेकर उतरी कि अच्छे दिन आने वाले है तो बहुतों को यकीन हो चला कि वाकई अच्छे दिन आने ही वाले है. इसी नारे ने उन्हें पूर्ण बहुमत वाली सरकार बना दिया. कुछ दिन तक तो लगा कि जैसे देश और देशवासियों के दिन फिरने वाले है लेकिन 2 साल बीतते ना बीतते सरकार और उसकी मंशा जाहिर होने लगी. अपनी ही पं्रशसा में डूबी सरकार और उसके नुमांइदों को अपने ही ‘मन की बात‘ कहने-करने से फुर्सत नहीं मिल रही. यहां तक कि पिछले 60 साल में हुए विकास के आंकड़े  को भी ‘जीरो‘ फीगर देने में भी उन्हें गुरेज नहीं हुआ. ‘सरकार‘ के झूठ को भी सच की चादर में लपेट के पेश करने की अदा पर एक शेर याद आ रहा है-
आइना देख तू अपनी वफा का
कि तू कैसा था और कैसा लगे है

कहने का मतलब ये है कि आपने चुनाव से पहले जो विकास का चेहरा दिखाया वह अंत तक आते-आते जीवनमारक की शक्ल में सामने आया. आप अपने ‘सो कॉल्ड‘ विकास की पोटली को अपने मन से चाहे जैसे भी बढ़ा-चढ़ा के दिखाना चाहे ‘विकास‘ की वास्तविकता का सामना तो आम जनता ही करती है या कहे दिन-प्रतिदिन झेलती है. जिस देश की आधी से ज्यादा आबादी अभी भी भूखे-नंगो की श्रेणी में आती हो, जिस देश में विकास की परिभाषा महज मुंबई, दिल्ली, बंगलौर, चेन्नई, कोलकत्ता तक ही सीमित हो, जहां आज भी शौच करने आदमी खेतों का रूख करता हो, लड़कियां पैदा होते ही फेंक या मार दी जाती हो, जहां स्वच्छता के नाम पर महज कागजी काम किए जाते हो, जहां अनियंत्रित ट्रैफिक कल्चर से आपको रोज दो-दो हाथ करने पड़ते है और जहां वीआईपी के लिए अलग कानून और आमजन के लिए अलग कानून हो वहां विकास की बातें बेमानी नहीं लगती?

सरकार जनता के मन के काम कर रही है ये बात तो तब साबित हो जब बुलेट ट्रेन की जगह नियमित रेल सफर को सुरक्षित और सुगामी बनाने की कवायद की जाए. इंटरनेशन ब्रांड को तरजीह देने की जगह अपने यहां के प्रोडक्ट की मार्केटिंग को पहले तरजीह दी जाए. फास्ट फूॅड के चेन पर चेन खुलवाने के बजाए कोई भूखा न सोए, इसकी व्यवस्था की जाए. लोग सिविल सेन्स का पालन कड़ाई से करें इसके लिए सख्त इंतजाम किए जाएं. दुरूस्त सड़क यातायात, बेहतर सीवर प्रणाली, बेहतर बिजली-पानी की व्यवस्था, नदियों की स्वच्छता, हरियाली बढ़ाने के लिए काम किया जाए. हर हाथ में काम हो ऐसा तरीका अपनाया जाए तब जाकर कहीं विकास की बात पर आप खरे उतर पाएंगे.

लेकिन आपने क्या कर रहे है? आप जनता से मिली इस ताकत का दुरूपयोग करने में लगे है. स्वंत्रत रूप से काम करने वाली संस्थाओं को अपने कब्जे में करने की आपकी हिटलरशाही, आपके बेतुके बोल, आपके जनविरोधी फैसलों ने ही जनता को आपके विजय रथ को रोकने पर मजबूर कर दिया. कुछ दिन पहले तक भले ही लोग 2019 के लिए भाजपा को ही एकमात्र पार्टी मान कर चल रहे होगे लेकिन क्या इन पांच राज्यों के नतीजों ने ये साबित नहीं कर दिया कि जनता ही जनार्दन है और वह कब किसे सिंहासन सौप दे इसकी भनक भी नहीं लगने देती. एक तरह से भाजपा के सामने लचर दिखने वाली कांग्रेस को देखकर फिर से आस तो जग ही गई. तो ‘साहेब और पार्टी‘ अब भी न चेते तो राम नाम सत्य है ये जताने में जनता देर न करेगी.

अब बात दूसरी करना चाहूंगी. पांच राज्यों के चुनाव नतीजों के बाद कांग्रेस की प्रेस कांफ्रेस में राहुल गांधी को देखकर मुझे पहली बार ये अहसास हुआ कि ये शख़्स इतना भी ‘इग्नोर‘ करने वाला नहीं लग रहा. कहीं न कहींं अचानक से उनके हावभाव में दिखते आत्मविश्वास ने ये साबित करने पर मुझे मजबूर किया कि यकीनन ये नरम सा दिखने वाला चेहरा आने वाले वक्त में फायर ब्रांड में अवतरित हो सकता है और इस पर जनता अपना दांव खेल सकती है. नरम ‘हिंदुत्व‘ से गरम ‘ब्रांड‘ में अवतरित होकर लिखी जाती इस एक नई इबारत को लोग अब दिल से पढ़ना चाहेगें. चाहेगें क्या पढ़ना शुरू कर दिया है.

कांग्रेस की इस जीत के पीछे कुछ हद तक दुआ में उठे वे हाथ भी रहे जो भाजपाईयों को कही न कहीं सबक सीखाना चाहते थे और 2019 के लिए एक मजबूत विपक्ष को खड़ा कर देना चाहते थे. इसमें उन्हें सफलता मिली. अपनी उपस्थिति बनाये रखने के लिए राजनीतिक चौसर में चालें क्या चली जाएगी ये एक अलग विषय है फिलहाल जनता ने अपना रूख स्पष्ट कर दिया. राहुल गांधी ने अपनी नेतृत्व क्षमता का शानदार प्रदर्शन कर विपक्षियों के ही हथियार से उनको मात दे दी. 67 जनसभाएं और हर जगह मंदिरों-मस्जिदों में माथा टेक कर अपनी एकपक्षीय सेक्यूलर इमेज को धो डाला. राजस्थान के चुनाव में तो उनका हिंदुत्व रूप अपने प्रखरता के सीमा पर रहा. क्या ख्वाजा की दरगाह, क्या पुष्कर के मंदिर, वे हर जगह मौजूद नजर आये. इस तरह से भाजपा के हिदुत्व के गढ़ में सेंध कर कर उन्होंने अपना विजय रथ पूरे आत्मविश्वास के साथ उतार दिया. पार्टी अध्यक्ष में रूप में अभी उनका एक साल ही पूरा हुआ है. ऐसे में यह जीत असाधारण परिणाम के तौर पर सामने है जो संभवतः 2019 के आम चुनाव में अपने पूरे जालो-जलाल के साथ भाजपा को चुनौती देने की स्थिति में होगी.

रामधारी सिंह दिनकर की कालजयी कविता के कुछ पंकितयां लिखे बिना इस लेख की इतिश्री न हो सकेगी-

हुंकारों से महलों की नींव उखड़ जाती,
सांसों के बल से ताज हवा में उड़ता है,
जनता की रोके राह,समय में ताव कहां?
वह जिधर चाहती, काल उधर ही मुड़ता है.
सिहांसन खाली करो कि जनता आती है.

ये चेतावनी नही तो क्या है, ये भाजपाईयों को अब तो समझ ही लेना चाहिए.

Wednesday, December 5, 2018

मजाज़, जो बक़ौल फ़ैज़ अहमद 'फ़ैज़' इन्कलाब का 'ढ़िढोरची' नहीं, इन्कलाब का 'मुतरिब' था





इन्कलाबी शायर ‘मजाज़’, महज 44 साल की छोटी सी उम्र में, उर्दू साहित्य को आला दर्जे की अपनी शायरी से नवाज दुनिया से कूच कर गये थे. ’मजाज’ को उर्दू शायरी का ‘कीट्स’ कहा जाता है, क्योंकि उनके पास ’अहसास-ए-इश्क़’ व्यक्त करने का बेहतरीन लहजा था, जो उनके समकालीन शायरों के पास नहीं था. वहीं उनका इंकलाबी मिजाज आपको चौंका देता है. बका़ैल फिराक़ गोरखपुरी, ’मजाज़’ की कविता में बौद्धिक पहलू काफी निखरा हुआ मिलता है किंतु इश्क़ उनकी चेतना का आधार मालूम होता है. प्रेम की असफलता की कसक उनके काव्य में साफ मालूम होती है, लेकिन वे असका आधार सामाजिक असमानता मानते है. जो भी हो इस बात का अफसोस ताउम्र उनके चाहने वालों को रहेगा कि एक बेहद जिंदादिल, हाज़िर जवाब, यारों के यार और महफिलों की शान कहे जाने वाले इंसान असरार-उल-हक ’मजाज’ की जिन्दगी का ज्यादातर हिस्सा मुसीबतों और तकलीफों के दरम्यान गुजरा.
अजमेर के ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती के गुरु ख़्वाजा उस्मान हारुनी के खानदान से ताल्लुक रखने वाले असरार को अलीगढ़ यूनीवर्सिटी में वह सब मिला, जिनकी मौजूदगी में मजाज़ के फन को रौशनी मयस्सर होना लाजमी था. विश्वविद्यालय के मस्त माहौल ने मजाज को रूमानी शायर बनने में खासी मदद की. उनकी एक बेमिसाल नज्म् “नज्र-ए-अलीगढ़”, इसी दौरान लिखी गई. इस नज्म् के लिखे जाने के पीछे भी एक किस्सा है. एक मर्तबा भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी गए, तो उन्होंने वहां के विद्वान मंडली से ये जानना चाहा कि क्या यूनिवर्सिटी का अपना कोई तराना है, जो उसे खास पहचान देता है. कोई पुख्ता जवाब न मिलने पर उन्होंने हैरान होकर कहा कि उन्हें इस बात का यकीन नहीं हो रहा कि अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी जैसी नामी संस्था का अपना कोई तराना नहीं. नेहरु की इस बात का गहरा असर हुआ. पहली मर्तबा असरार उल हक के लिखे तराने को स्ट्रेचे हॉल में गाया गया-
ये मेरा चमन है मेरा चमन, मैं अपने चमन का बुलबुल हूँ
सर शार-ए-निगाह-ए-नरगिस हूँ, पाबस्ता-ए-गेसू-ए-सुंबुल हूँ
फितरत ने सिखाई है हमको, उफताद यहाँ परवाज यहाँ
गाए हैं वफा के गीत यहाँ, छेड़ा है जुनूं का साज यहाँ
इस फर्श से हमने उड़-उड़कर, अफ़लाक के तारे तोड़े हैं
नाहीद से की है सरगोशी, परवीन से रिश्ते जोड़े हैं
आ-आके हजारों बार यहाँ, खुद आग भी हमने लगाई है
फिर सारे जहाँ ने देखा है ये आग हमीं ने बुझाई है
हर आह है खुद तासीर यहाँ, हर ख्वाब है खुद ताबीर यहाँ
तदबीर के पाए संगीं पर, झुक जाती है तक़दीर यहाँ
जर्रात का बोसा लेने को, सौ बार झुका आकाश यहाँ
खुद आँख से हमने देखी है, बातिल की शिकस्त-ए-फाश यहाँ
जो अब्र यहाँ से उठेगा, वो सारे जहाँ पर बरसेगा
हर जू-ए-रवां पर बरसेगा, हर कोहे गरां पर बरसेगा
हर सर्व-ओ-समन पर बरसेगा, हर दश्त-ओ-दमन पर बरसेगा
खुद अपने चमन पर बरसेगा, गैरों के चमन पर बरसेगा
हर शहर-ए-तरब पर गरजेगा, हर कस्रे तरब पर कड़केगा
ये अब्र हमेशा बरसा है, ये अब्र हमेशा बरसेगा

मजाज़ के आलोचक मानते है अलीगढ़ का ये दौर उनकी जिन्दगी को नया मोड़ देने वाला रहा। यहां तक आते-आते उनकी शायरी रूमानी से इन्कलाबी शायरी में में तब्दील होने लगी. साहित्यकारों की बड़ी फौज इन्कलाब के गीत गा रही थीं. भला अलीगढ़ इससे कैसे अछूता रह सकता था. अलीगढ़ तमाम जाने माने कवि-लेखकों का गढ़ बनता जा रहा था. डा0 अशरफ, अख्तर हुसैन रामपुरी, सब्त हसन, सज्जाद जहीर सभी अलीगढ़ आ चुके थे. अंग्रेजी हुकूमत का दौर जोरों पर था.पत्र पत्रिकाएं प्रकाशित होकर ’जब्त ’हो रही थीं. ऐसे में मजाज़ और उनकी शायरी इससे कैसे अछूती रहती. दूसरे समाजवादी साथियों की सोहबत में मजाज़ भी तरक्की पसंद तथा इंकलाबी शायरों की सोहबत में शामिल हो गये. ऐसे माहौल में मजाज़ ने ’इंकलाब’ जैसी नज्म बुनी. इसके बाद तो जैसे नज़्म का दौर ही शुरू हो गया और उन्होंने रात और रेल ,नजर, अलीगढ, नजर खालिदा, अंधेरी रात का मुसाफिर, सरमायादारी जैसे रचनाएं उर्दू अदबी दुनिया को दी. उनके इंकलाबी तेवर इस नज़्म में दिख जाएंगे-

बोल ! अरी, ओ धरती बोल !
राज सिंहासन डाँवाडोल!
बादल, बिजली, रैन अंधियारी, दुख की मारी परजा सारी
बूढ़े, बच्चे सब दुखिया हैं, दुखिया नर हैं, दुखिया नारी
बस्ती-बस्ती लूट मची है, सब बनिये हैं सब व्यापारी बोल !
और यहां मजाज जब कविता करते हैं तो कुछ और ही नजर आते हैं। देखिये-
इक नन्ही-मुन्नी सी पुजारिन
पतली बाहें, पतली गर्दन
भोर भये मन्दिर आई है
आई नहीं है माँ लाई है
वक्त से पहले जाग उठी है
नींद अभी आँखों में भरी है
ठोड़ी तक लट आई हुई है
यूँही सी लहराई हुई है ...
’मजाज’ औरत की आजादी के कायल थे। उन्होंने उसे इसका अहसास कराया और लिखा-

तेरे माथे पे ये आँचल तो बहुत ही खूब है लेकिन
तू इस आँचल से इक परचम बना लेती तो अच्छा था

ऐसे इंकलाबी शायर का आल इण्डिया रेडियो की पत्रिका ‘आवाज’ के सहायक संपादक के तौर पर दिल्ली आना ज़िंदगी का रूख बदल गया बुखारी भाईयों, जिन का महकमे में बहुत दबदबा था, के फिरका-परस्त और नापाक ख़्यालात ’मजाज़’ बर्दाश्त नहीं कर पाये और महज 2 वर्ष की मुलाज़मत के बाद ही रेडियो छोड़ दिया. इस दौरान दिल्ली में हुए नाकाम इश्क ने उन्हें ऐसे दर्द दिये कि जो ’मजाज़’ को ताउम्र सालते रहे. इश्क में नाकामी से मजाज़ ने शराब पीना शुरू कर दिया. शराब की लत इस कदर बढ़ी कि लोगों ने कहना शुरू कर दिया कि मजाज़ शराब को नहीं, शराब ’मजाज’ को पी रही है. ये दो बरस उन पर बेहद भारी पड़े और वो नफ़्सीयाति तौर पर इस सदमे को दिल से लगा बैठे और दिल्ली को छोड़ लखनऊ आ गये. दिल्ली से विदा होते वक्त उन्होंने कहा-

रूख्सत ए दिल्ली! तेरी महफ़िल से अब जाता हूं मैं
नौहागर जाता हूं मैं नाला-ब-लब जाता हूं मैं

’मजाज़’ ऐसे शायर थे जिनके शेरों में इश्क़ की इंतहा देखी जा सकती है तो टूटे दिल की खामोशी को सुना जा सकता है और ये महज कल्पना की उड़ान पर उतर के आये हो ऐसा नहीं. मजाज़ यॅूं भी दिल से रूमानी शायर थे. फिर ऐसे शख़्स को मोहब्बत होना लाजिमी था. लेकिन इश्क़ में हारे मजाज़ ने जब इस तल्ख़ तजुर्बे का घूंट पिया तो उनकी ज़माने से शिका़यत ने भी लफ़जों की शक्ल में ही निकलना गवारा किया-

मैं आहें भर नहीं सकता कि नगमें गा नहीं सकता,
सुकूं लेकिन मेरे दिल को मयस्सर आ नहीं सकता
कोई नगमें तो क्या अब मुझ से मेरा साज भी ले ले
जो गाना चाहता हूँ, आह, वो मैं गा नहीं सकता
वो मुझको चाहती है और मुझ तक आ नहीं सकती
मैं उसको पूजता हूँ और उसको पा नहीं सकता
हदें वो खींच रखी हैं हरम के पासबानों ने
के बिन मुज़रिम बने पैग़ाम भी पहुँचा नहीं सकता

मजाज को माशूका से ज्यादा रवायती, दकियानूसी सोच, समाजी ढाँचे और उसके निजाम से नाराजगी थी और उसने इसी को अपनी नाकाम मोहब्बत की वजह समझा.

मुझे शिकवा नहीं दुनिया की उन जुहराजबीनों से
हुई जिनसे न मेरे शौक-ए-रुस्वा की पजीराई
जमाने के निजामे-जंग-आलूदा से शिकवा है
कवानीने-कुहन आईने-फर्सूदा से शिकवा है

लखनऊ आकर मजाज़ 1939 में सिब्ते हसन ,सरदार जाफरी के साथ मिलकर ’नया अदब’ का सम्पादन करने लगे, जो आर्थिक कठिनाईयों की वजह से ज्यादा दिन तक नहीं चल सका. कुछ दिनों बाद में मजाज़ ने फिर दिल्ली वापसी की और ‘हार्डिंग लाइब्रेरी’ में असिस्टेन्ट लाइब्रेरियन के पद पर काम किया. लेकिन मायूस दिल को अब दिल्ली कहां रास न आने वाली थी. निराश होकर एक बार फिर दिल्ली छोड़ी और बंबई चले गए, लेकिन उन्हें बंबई भी रास न आया. बंबई की सडकों पर आवारा ’मजाज़’ ने वो लिख दिया जो हरशख़्स की जुबान पर बेसाख़्ता चढ़ गया. यू तो इसमें मजाज़ ने अपने दिल की बात कही, लेकिन पढ़ने वाले हर शख़्स ने उसे अपना दर्द समझा. अपनी इस सर्वाधिक लोकप्रिय नज्म ‘आवारा’ के मार्फत उन्होंने दिल के तारों को झनझना दिया-

शहर की रात और मैं, नाशाद-ओ-नाकारा फिरूँ
जगमगाती जागती, सड़कों पे आवारा फिरूँ
गैर की बस्ती है, कब तक दर-ब-दर मारा फिरूँ
ऐ गम-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ
झिलमिलाते कुमकुमों की, राह में जंजीर सी
रात के हाथों में, दिन की मोहिनी तस्वीर सी
मेरे सीने पर मगर, चलती हुई शमशीर सी
ऐ गम-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ
ये रुपहली छाँव, ये आकाश पर तारों का जाल
जैसे सूफी का तसव्वुर, जैसे आशिक का ख़याल
आह लेकिन कौन समझे, कौन जाने जी का हाल
ऐ गम-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ
फिर वो टूटा एक सितारा, फिर वो छूटी फुलझड़ी
जाने किसकी गोद में, आई ये मोती की लड़ी
हूक सी सीने में उठी, चोट सी दिल पर पड़ी
ऐ गम-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ
रात हँस-हँस कर ये कहती है, कि मयखाने में चल
फिर किसी शहनाज-ए-लालारुख के, काशाने में चल
ये नहीं मुमकिन तो फिर, ऐ दोस्त वीराने में चल
ऐ गम-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ
हर तरफ बिखरी हुई, रंगीनियाँ रानाइयाँ
हर कदम पर इशरतें, लेती हुई अंगड़ाइयां
बढ़ रही हैं गोद फैलाये हुये रुस्वाइयाँ
ऐ गम-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ
रास्ते में रुक के दम लूँ, ये मेरी आदत नहीं
लौट कर वापस चला जाऊँ, मेरी फितरत नहीं
और कोई हमनवा मिल जाये, ये कि़स्मत नहीं
ऐ गम-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ
मुंतजिर है एक, तूफान-ए-बला मेरे लिये
अब भी जाने कितने, दरवाजे है वहां मेरे लिये
पर मुसीबत है मेरा, अहद-ए-वफा मेरे लिए
ऐ गम-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ
जी में आता है कि अब, अहद-ए-वफा भी तोड़ दूँ
उनको पा सकता हूँ मैं ये, आसरा भी छोड़ दूँ
हाँ मुनासिब है ये, जंजीर-ए-हवा भी तोड़ दूँ
ऐ गम-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ
एक महल की आड़ से, निकला वो पीला माहताब
जैसे मुल्ला का अमामा, जैसे बनिये की किताब
जैसे मुफलिस की जवानी, जैसे बेवा का शबाब
ऐ गम-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ
दिल में एक शोला भड़क उठा है, आखि़र क्या करूँ
मेरा पैमाना छलक उठा है, आखि़र क्या करूँ
जख्म सीने का महक उठा है, आखि़र क्या करूँ
ऐ गम-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ
मुफलिसी और ये मजाहिर, हैं नजर के सामने
सैकड़ों चंगेज-ओ-नादिर, हैं नजर के सामने
सैकड़ों सुल्तान-ओ-जबर, हैं नजर के सामने
ऐ गम-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ
ले के एक चंगेज के, हाथों से खंजर तोड़ दूँ
ताज पर उसके दमकता, है जो पत्थर तोड़ दूँ
कोई तोड़े या न तोड़े, मैं ही बढ़कर तोड़ दूँ
ऐ गम-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ
बढ़ के इस इंदर-सभा का, साज-ओ-सामाँ फूँक दूँ
इस का गुलशन फूँक दूँ, उस का शबिस्ताँ फूँक दूँ
तख्त-ए-सुल्ताँ क्या, मैं सारा कस्र-ए-सुल्ताँ फूँक दूँ
ऐ गम-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ
जी में आता है, ये मुर्दा चाँद-तारे नोंच लूँ
इस किनारे नोंच लूँ, और उस किनारे नोंच लूँ
एक दो का जिक्र क्या, सारे के सारे नोंच लूँ
ऐ गम-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ

......ये नज़्म ‘मजाज’ की ‘आहंग’ नाम की किताब से है. इस किताब की चाहत इस कदर थी कि चाहने वालों ने कई-कई कॉपियां खरीद डालीं. तोहफे में ‘आहंग’ ही भेंट की जाती. हर शहर में ‘आहंग’ की ही धूम थी. आंहग उनका एकमात्र काव्य संग्रह है, जिसकी भूमिका में फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ ने लिखा है कि “मजाज़ इन्कलाब का ढ़िढोरची नहीं, इन्कलाब का मुतरिब है, उसके नज़्में में बरसात के दिन की सी सुकूंबख़्श खुनकी है और है बहार की रात की सी गर्म जोश तासीर आफ़रीनी.“ वास्तव में ये कहना गलत न होगा कि इश्क़ की जो तड़प ’मजाज’ ने पैदा की उतनी शायद ही किसी और शायर के नसीब में आई हो. कुछ शेर पढ़ें, आप खुद ही इसे मानने लगेंगे-

दफ्न कर सकता हूँ सीने में तुम्हारे राज को
और तुम चाहो तो अफ्साना बना सकता हूँ मैं
इश्क़ का जौक़-ए-नजारा मुफ्त में बदनाम है
हुस्न खुद बे-ताब है जल्वा दिखाने के लिए
कब किया था इस दिल पर हुस्न ने करम इतना
मेहरबाँ और इस दर्जा कब था आसमाँ अपना
कुछ तुम्हारी निगाह काफिर थी
कुछ मुझे भी खराब होना था
मुझ को ये आरजू वो उठाएँ नकाब खुद
उन को ये इंतिजार तकाजा करे कोई
तुम्हीं तो हो जिसे कहती है नाखुदा दुनिया
बचा सको तो बचा लो कि डूबता हूँ मैं
हम अर्ज-ए-वफा भी कर न सके कुछ कह न सके कुछ सुन न सके
याँ हम ने जबाँ ही खोली थी वाँ आँख झुकी शरमा भी गए
हिन्दू चला गया न मुसलमाँ चला गया
इंसाँ की जुस्तुजू में इक इंसाँ चला गया
हुस्न को शर्मसार करना ही
इश्क का इंतिकाम होता है
बहुत मुश्किल है दुनिया का सँवरना
तिरी जुल्फों का पेच-ओ-ख़म नहीं है
देखना जज्बे मोहब्बत का असर आज की रात
मेरे शाने पे है उस शोख का सर आज की रात
नर्गिस-ए-नाज में वो नींद का हल्का सा खुमार
वो मेरे नगमा-ए-शीरीं का असर आज की रात
हुस्न को बे-हिजाब होना था
शौक को कामयाब होना था
क्या कहूँ किस शौक से आया था तेरी बज्म में
छोड़ कर खुल्दे अलीगढ़ की हजारों महफिलें
कितने रंगीं अहदो पैमां तोड़ कर आया था मैं
दिल नवाजाने चमन को छोड़ कर आया था मैं
इक नशेमन मैंने छोड़ा इक नशेमन छूट गया
साज बस छेड़ा ही था मैंने के गुलशन छूट गया
दिल में सोजे ग़म की इक दुनिया लिए जाता हूँ मैं
आह तेरे मय क़दे से, बे-पिए जाता हूँ मैं

मजाज को लखनऊ बेहद पसन्द था. लखनऊ के बारे में उनकी यह नज्म उनके लगाव को खूबसूरती से प्रकट करती है.
फिरदौसे हुस्नो इश्क़ है दामाने लखनऊ
आंखों में बस रहे हैं गजालाने लखनऊ
एक जौबहारे नाज को ताके है फिर निगाह
वह नौबहारे नाज़ कि है जाने लखनऊ।
याद आएंगे मुझे तेरे ज़मीनो आसमाँ
रह चुके हैं, मेरी जौलाँगाह तेरे बोस्ताँ

दिल-खुश और अजीम शायर ’मजाज़’ की हाजिरजबाबी के किस्से भी खूब है. सोहबत उनकी हर बड़े शायर के साथ थी लेकिन ’सीरत’ ऐसी कि किसी को नहीं बख्शते थे. बात अधूरी रहेगी अगर मजाज़ के बेतकल्लुफ अदा का जिक्र न किया जाए. ऐसे ही कुछ किस्सों में से कुछ यहां आपके लिए-

एक रोज एक दम तन्हा बैठे मजाज़ एक कॉफी हाउस में दोस्तों का इंतजार कर रहे थे. मजाज इस कॉफी हाउस में अक्सर आते रहते थे. कुछ ही देर में एक साहब जो उनसे वाक़िफ थे, इसी कॉफी हाउस में आ पहुंचे और मजाज़ के बगल वाली कुर्सी पर जम गए. इब्तेदाई तकल्लुफ और इधर-उधर की एक दो बातों के बाद अपने लिए कॉफी का ऑर्डर दिया और गुनगुनाना शुरू कर दिया-
अहमकों की कमी नहीं गालिब
एक ढूंढो हजार मिलते हैं
मजाज़ ने भी मौके का फायदा उठाया और उनकी तरफ देखते हुए कह दिया -“ढूंढने की नौबत भी कहाँ आती है हजरत! खुद-ब-खुद तशरीफ ले आते हैं.“
.................................................................
अदबी बहस और गुफ्तगू के दौरान मजाज़ और फिराक़ में बहुत ठनती थी. ऐसी ही एक संजीदा गुफ़्तगू के दौरान फिराक ने आव देखा न ताव अचानक ही लहजा बदल कर मजाज़ की खिल्ली उड़ाने की गरज से हंसते हुए कहा, “मजाज़ ! तुमने क़बाब बेचने क्यों बंद कर दिए ?”
“आपके यहाँ से गोश्त आना जो बंद हो गया फ़िराक साहब”, मजाज़ ने बड़ी संजीदगी से जवाब दिया.
फ़िराक, मजाज को जोश समझने की ग़लती का ख़ामियाजा मज़ाक ही मज़ाक में उठा चुके थे.
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‘जोश’ मलीहाबादी शराब पीते वकत टाइम पीस सामने रख कर पीते थे और हर पंद्रह मिनट के बाद नया पेग बनाते थे, हालांकि बाज दफा ये पाबंदी तीसरे-चौथे पेग के बाद नज़रे-जाम हो जाया करती थी. ऐसे ही एक शब किसी सोहबत में पी रहे थे, जिसमें मजाज़ भी शामिल थे. पहले पेग को हलक से नीचे करते ही टाइम पीस की तरफ देख कर मजाज़ से कहने लगे -“देखो मजाज़ ! मैं कितने डिसिपिलन से शराब पीता हूँ, अगर तुम भी घड़ी सामने रख कर पिया करो तो बद-एहतियाती से महफूज़ रहोगे. “
ये पहले पेग का असर था या ‘जोश’ साहब के पठानी तेवर का कारनामा, मक्खी के छत्ते को छेड़ चुके थे .मजाज़ ने दफ़अतन जवाब दिया -
“घड़ी तो क्या ‘जोश’ साहब ! मेरा बस चले तो घड़ा सामने रख कर पिया करूँ . “
‘जोश’ साहब के एक पेग का नशा भी जाता रहा.
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शराब को लेकर एक दफा राजा महमूदाबाद ( महमूदाबाद इस्टेट, सल्तनत-ए-अवध की सबसे बड़ी रियासत थी. इस का बादशाह आजादी के जमाने में मुस्लिम लीग का खास मेंबर और जिन्नाह का करीबी दोस्त भी था) ने बहुत प्यार से मजाज़ से कहा ,“मजाज़ अगर तुम मान लो तो एक बात कहूँ !”
“आपका हुक्म सर आँखों पर, फरमाइये राजा साहब क्या इरशाद है ?”, मजाज ने निहायत शाइस्ता लहजे़ में जवाब दिया.
“मैं चाहता हूँ के तुम्हारे लिए दो सौ रुपये माहवार का वज़ीफा मुक़र्रर कर दूँ.”
“बड़ा करम है हुजूर का “
“लेकिन तुम खुदा के लिए ये शराब पीना छोड़ दो। ये लत अच्छी नहीं और तुम जैसे नामी-गिरामी शायर को ये शोभा भी नहीं देता “
“शराब पीना छोड़ दूँ?, मजाज़ ने निहायत हैरानी और बेचारगी से राजा साहब की तरफ देखते हुए कहा, “फिर आपके दो सौ रुपये मेरे किस काम आया करेंगे?”

तो ऐसी थी मजाज़ की सीरत. उनकी ’आवारा’ नज़्म ने मुझ पर कुछ ऐसा जादू चलाया कि मैं मजाज़ की क़ायल हो गई. कहीं उनके दर्द को महसूस करने लगी. जितना उन्हें जानने की कोशिश की उतना उस शायर के लिए तक़लीफ हुई. उनके दर्द का इलाज शराब भी न कर सकी. हां, इस लत ने जरूर उनके शरीर में जहर का काम किया. आखिरकार वही हुआ जिसका डर सभी को था.

5 दिसम्बर 1955 की एक तन्हा ठंडी रात मस्तिष्क की नस फट गई और मजाज़ को हर दर्द से निज़ात दे गई. एक शायर की कहानी और उसकी नज़्म हर उस दिल की अमानत हो गई जो इश्क में फ़ना हो जाने की कूवत रखता हो. कुछ इस तरह-
मिटते हुओं को देख के क्यों रो न दें ’मजाज़’
आखिर किसी के हम भी मिटाये हुये तो हैं