Wednesday, December 12, 2018

सुधर जाओ कि ‘सिहांसन‘ खाली कराने ‘जनता‘ आती है और अब क्या कहने को बाकी है


दो बातों की वजह से आज ये लेख लिखने का मन किया. (एक) जो मन से मांगा उसका पूरा होना और (दो)े समय के साथ ‘आत्मविश्वास‘ से माथा दमकते देखना.

पहले बात, पहली वजह की. जब 5 राज्यों में विधानसभा चुनाव की तारीखें घोषित हुई तो दिल से कहीं ये इच्छा जागृत हुई कि इस बार ये तारीखें सब उलट-पलट कर दें. एक्ज्टि पोल के नतीजों से मन खिन्न था लेकिन मतदान के प्रतिशत पर नतीजों के पलटने का यकीन भी था. और जो हुआ वह वही था जो जनता ने चाहा था. भाजपा शासित राज्यों में उसकी हार से मेरी प्रसन्नता की वजह आम लेकिन खास थी, जिसका जिक्र आगे करूंगी. 2014 के आम चुनाव के लिए मैं खुद भाजपा और मोदी पर ‘सपोटिव‘ लेख लिखा करती थी. लेकिन आज ठीक इसके उलट मैं उसके खिलाफ खड़ी नजर आती हूं. आखिर क्यों ऐसा करने को मैं या कोई आम जन मजबूर हो जाता है. क्या इस पर कभी ‘मन की बात‘ को सुना जाता है.

दरअसल सत्ता परिवर्तन की नौबत तब आती है जब आप पिछली सरकारों के रवैये से त्रस्त हो जाते है और बेहतरी के लिए दूसरी पार्टी को ही उससे बेहतर मानते हुए उसे मौका देना चाहते है. हालांकि आप जिस सोच के साथ किसी भी पार्टी का चुनाव करते है अक्सर वे सभी कुछ समय बाद फेल भी नजर आते है. क्योंकि सभी सरकारें बेसिक समस्या के बात करके सबसे पहले उसे ही नजरअंदाज करती है. सत्ता मिलते ही वह ‘उनकी‘ तुष्टि के साधन पहले ढूढ़ने लगती है जिन्होंने अपनी पूंजी का दांव उन पर खेला होता है. ऐसे में भला मूर्ख जनता से किए गये वायदों की किसे परवाह? लेकिन जनता भी चुनाव की ताक में बैठी होती है. तमाम तरह के गुणा-भाग के बाद उसे भी फिर ‘भूतकाल‘ ‘वर्तमान‘ से कम अवसरवादी या कम बेईमान नजर आने लगता है. और यही सत्ता परिवर्तन का एक बड़ा कारण बन जाता है.


2014 में जब भाजपा मोदी के चेहरे के साथ इस नारे को लेकर उतरी कि अच्छे दिन आने वाले है तो बहुतों को यकीन हो चला कि वाकई अच्छे दिन आने ही वाले है. इसी नारे ने उन्हें पूर्ण बहुमत वाली सरकार बना दिया. कुछ दिन तक तो लगा कि जैसे देश और देशवासियों के दिन फिरने वाले है लेकिन 2 साल बीतते ना बीतते सरकार और उसकी मंशा जाहिर होने लगी. अपनी ही पं्रशसा में डूबी सरकार और उसके नुमांइदों को अपने ही ‘मन की बात‘ कहने-करने से फुर्सत नहीं मिल रही. यहां तक कि पिछले 60 साल में हुए विकास के आंकड़े  को भी ‘जीरो‘ फीगर देने में भी उन्हें गुरेज नहीं हुआ. ‘सरकार‘ के झूठ को भी सच की चादर में लपेट के पेश करने की अदा पर एक शेर याद आ रहा है-
आइना देख तू अपनी वफा का
कि तू कैसा था और कैसा लगे है

कहने का मतलब ये है कि आपने चुनाव से पहले जो विकास का चेहरा दिखाया वह अंत तक आते-आते जीवनमारक की शक्ल में सामने आया. आप अपने ‘सो कॉल्ड‘ विकास की पोटली को अपने मन से चाहे जैसे भी बढ़ा-चढ़ा के दिखाना चाहे ‘विकास‘ की वास्तविकता का सामना तो आम जनता ही करती है या कहे दिन-प्रतिदिन झेलती है. जिस देश की आधी से ज्यादा आबादी अभी भी भूखे-नंगो की श्रेणी में आती हो, जिस देश में विकास की परिभाषा महज मुंबई, दिल्ली, बंगलौर, चेन्नई, कोलकत्ता तक ही सीमित हो, जहां आज भी शौच करने आदमी खेतों का रूख करता हो, लड़कियां पैदा होते ही फेंक या मार दी जाती हो, जहां स्वच्छता के नाम पर महज कागजी काम किए जाते हो, जहां अनियंत्रित ट्रैफिक कल्चर से आपको रोज दो-दो हाथ करने पड़ते है और जहां वीआईपी के लिए अलग कानून और आमजन के लिए अलग कानून हो वहां विकास की बातें बेमानी नहीं लगती?

सरकार जनता के मन के काम कर रही है ये बात तो तब साबित हो जब बुलेट ट्रेन की जगह नियमित रेल सफर को सुरक्षित और सुगामी बनाने की कवायद की जाए. इंटरनेशन ब्रांड को तरजीह देने की जगह अपने यहां के प्रोडक्ट की मार्केटिंग को पहले तरजीह दी जाए. फास्ट फूॅड के चेन पर चेन खुलवाने के बजाए कोई भूखा न सोए, इसकी व्यवस्था की जाए. लोग सिविल सेन्स का पालन कड़ाई से करें इसके लिए सख्त इंतजाम किए जाएं. दुरूस्त सड़क यातायात, बेहतर सीवर प्रणाली, बेहतर बिजली-पानी की व्यवस्था, नदियों की स्वच्छता, हरियाली बढ़ाने के लिए काम किया जाए. हर हाथ में काम हो ऐसा तरीका अपनाया जाए तब जाकर कहीं विकास की बात पर आप खरे उतर पाएंगे.

लेकिन आपने क्या कर रहे है? आप जनता से मिली इस ताकत का दुरूपयोग करने में लगे है. स्वंत्रत रूप से काम करने वाली संस्थाओं को अपने कब्जे में करने की आपकी हिटलरशाही, आपके बेतुके बोल, आपके जनविरोधी फैसलों ने ही जनता को आपके विजय रथ को रोकने पर मजबूर कर दिया. कुछ दिन पहले तक भले ही लोग 2019 के लिए भाजपा को ही एकमात्र पार्टी मान कर चल रहे होगे लेकिन क्या इन पांच राज्यों के नतीजों ने ये साबित नहीं कर दिया कि जनता ही जनार्दन है और वह कब किसे सिंहासन सौप दे इसकी भनक भी नहीं लगने देती. एक तरह से भाजपा के सामने लचर दिखने वाली कांग्रेस को देखकर फिर से आस तो जग ही गई. तो ‘साहेब और पार्टी‘ अब भी न चेते तो राम नाम सत्य है ये जताने में जनता देर न करेगी.

अब बात दूसरी करना चाहूंगी. पांच राज्यों के चुनाव नतीजों के बाद कांग्रेस की प्रेस कांफ्रेस में राहुल गांधी को देखकर मुझे पहली बार ये अहसास हुआ कि ये शख़्स इतना भी ‘इग्नोर‘ करने वाला नहीं लग रहा. कहीं न कहींं अचानक से उनके हावभाव में दिखते आत्मविश्वास ने ये साबित करने पर मुझे मजबूर किया कि यकीनन ये नरम सा दिखने वाला चेहरा आने वाले वक्त में फायर ब्रांड में अवतरित हो सकता है और इस पर जनता अपना दांव खेल सकती है. नरम ‘हिंदुत्व‘ से गरम ‘ब्रांड‘ में अवतरित होकर लिखी जाती इस एक नई इबारत को लोग अब दिल से पढ़ना चाहेगें. चाहेगें क्या पढ़ना शुरू कर दिया है.

कांग्रेस की इस जीत के पीछे कुछ हद तक दुआ में उठे वे हाथ भी रहे जो भाजपाईयों को कही न कहीं सबक सीखाना चाहते थे और 2019 के लिए एक मजबूत विपक्ष को खड़ा कर देना चाहते थे. इसमें उन्हें सफलता मिली. अपनी उपस्थिति बनाये रखने के लिए राजनीतिक चौसर में चालें क्या चली जाएगी ये एक अलग विषय है फिलहाल जनता ने अपना रूख स्पष्ट कर दिया. राहुल गांधी ने अपनी नेतृत्व क्षमता का शानदार प्रदर्शन कर विपक्षियों के ही हथियार से उनको मात दे दी. 67 जनसभाएं और हर जगह मंदिरों-मस्जिदों में माथा टेक कर अपनी एकपक्षीय सेक्यूलर इमेज को धो डाला. राजस्थान के चुनाव में तो उनका हिंदुत्व रूप अपने प्रखरता के सीमा पर रहा. क्या ख्वाजा की दरगाह, क्या पुष्कर के मंदिर, वे हर जगह मौजूद नजर आये. इस तरह से भाजपा के हिदुत्व के गढ़ में सेंध कर कर उन्होंने अपना विजय रथ पूरे आत्मविश्वास के साथ उतार दिया. पार्टी अध्यक्ष में रूप में अभी उनका एक साल ही पूरा हुआ है. ऐसे में यह जीत असाधारण परिणाम के तौर पर सामने है जो संभवतः 2019 के आम चुनाव में अपने पूरे जालो-जलाल के साथ भाजपा को चुनौती देने की स्थिति में होगी.

रामधारी सिंह दिनकर की कालजयी कविता के कुछ पंकितयां लिखे बिना इस लेख की इतिश्री न हो सकेगी-

हुंकारों से महलों की नींव उखड़ जाती,
सांसों के बल से ताज हवा में उड़ता है,
जनता की रोके राह,समय में ताव कहां?
वह जिधर चाहती, काल उधर ही मुड़ता है.
सिहांसन खाली करो कि जनता आती है.

ये चेतावनी नही तो क्या है, ये भाजपाईयों को अब तो समझ ही लेना चाहिए.

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