Tuesday, September 27, 2016

’समाजवाद’ बनाम ’परिवारवाद’

लोहिया राजनीति में वंशवाद को बढ़ावा देने के पक्ष में कतई खिलाफ थे। उनके समाजवाद की अवधारणा की विरासत पर खड़ी हुई राजनीतिक पार्टियां आज मूल उद्देश्यों से भटकती नजर आ रही है। वरना उन्हीं के शिष्य ’समाजवाद’ के नाम पर ’परिवारवाद’ बढ़ाने और स्थापित करने में न लगे होते। 
समाजवादी पार्टी के प्रमुख मुलायम सिंह यादव की छोटी बहू अपर्णा यादव के, सियासती मैदान में उतर पड़ने की बात से पार्टी कार्यकर्ताओं में कुनबे में बढ़ती ’राजनैतिक चाह’ चिंता का विषय बन गई है। एक कार्यकर्ता का कहना है कि अच्छी बात है। अपर्णा जुझारू है, काबिल है, मुखर है और सबसे बड़ी बात महिला सषक्तिकरण का एक चेहरा बन कर उभर रही हैं। किंतु सवाल यह है कि फिर एक और सीट में इसी परिवार का सदस्य ही क्यों? क्या इसलिए कि बाहरी लोगों पर भरोसा नहीं रहा? या इसलिए कि आने वाले विधानसभा चुनाव में मुख्यमंत्री महिला वोट को महत्वपूर्ण मान रहे है? सपा प्रमुख का कद बढ़ता अगर ये चेहरा एक राजनैतिक परिवार से न होकर किसी भीड़ से निकल कर आता? लोग ये कहने से तो बाज आते कि 6 सासंद, 2 विधायक, 3 जिला पंचायत अध्यक्ष, दो ब्लाॅक प्रमुख के अलावा कई अन्य महत्वपूर्ण पदों पर अपने कुनबे को ’प्रमोट’ करती समाजवादी पार्टी अब ’समाजवाद’ नहीं ’परिवारवाद’ की राह पर चल पड़ी है? आखिर इतनी बड़ी पार्टी को क्यों हर बार अपने परिवार में ही कोई काबिल चेहरा नजर आता है?
कार्यकर्ताओं के बीच इस तरह के सवाल तो बहुतेरे है लेकिन उन्हें इसका जबाव नहीं मिल पा रहा। मेरी समझ से जबाव तो एक ही है कि ’परिवारवाद’ का बीज जब एक बार बो दिया जाता है तो फिर आप उसमें नई बेलों को ’फूटने’ से नहीं रोक सकते अन्यथा उसकी ’ग्रोथ’ ही रूक जाएगी। ग्रोथ रूकने का मतलब है कि अपने अस्तित्व को खतरे में डालना। और फिर जब बात परिवार की हो तो सिद्धांत नगण्य हो जाते है। सपा प्रमुख जमीन से निकले और संघर्ष की राजनीति से अपने मुकाम पर पहुंचे है। वे पार्टी और परिवार दोनों की अहमियत को बखूबी समझते है। उनके इस पारिवारिक चयन पर पार्टी के ही एक अनुभवी कार्यकर्ता का अपना अनुभव बोल पड़ा कि देखियेगा! जब तक नेताजी है तभी तक ये पार्टी भी है। कहने का मतलब यहां ये है कि नेता जी के ’समाजवाद’ की बदलती परिभाषा के पीछे भी एक कहानी है जिसे ढांप कर रखना पार्टी हित में है। तो फिर बात सिर्फ और सिर्फ परिवारवाद की ही की जाए।
इसीलिए इस ’वाद’ को आगे बढ़ाने हुए पहले समाजवादी पार्टी के प्रमुख मुलायम सिंह यादव के परिवार के राजनैतिक एवं संस्थागत परिचय पर एक नजर डालना जरूरी हो जाता है। सपा प्रमुख इस समय स्वंय आजमगढ़ से सांसद है। उनके पुत्र अखिलेष यादव इस समय प्रदेष के मुख्यमंत्री है और विधान परिषद सदस्य है। छोटे भाई षिवपाल सिंह यादव प्रदेष सरकार के कई महत्वपूर्ण विभागों के वरिष्ठ मंत्री है और सपा के प्रमुख प्रवक्ता भी है। षिवपाल के बेटे आदित्य यादव उर्फ अंकुर पीसीएफ के चैयरमैन है। षिवपाल की पत्नी सरला यादव जिला सहकारी बैंक, इटावा की निदेषक हैं। मुलायम सिंह के भतीजे अनुराग यादव समाजवादी युवजन सभा के राष्ट्रीय सचिव हैं। मुलायम सिंह के चचेरे भाई रामगोपाल यादव राज्यसभा सदस्य हैं। इनके अलावा लोकसभा में पौत्र तेजप्रताप सिंह यादव मैनपुरी से, पुत्रवधू डिम्पल यादव कन्नौज से, बड़े भाई अभयराम के बेटे धर्मेन्द्र यादव बंदायू से और रामगोपाल के पुत्र अक्षय यादव फीरोजाबाद से सांसद है। रामगोपाल के भतीजे अरविंद यादव हाल ही में स्थानीय प्राधिकारी क्षेत्र से एमएलसी चुने गए है। सपा प्रमुख के एक और छेाटे भाई राजपाल सिंह के बेटे अभिषेक यादव उर्फ अंषुल हाल ही में इटावा जिला पंचायत के अध्यक्ष चुने गए हैं तो सांसद धर्मेंद्र यादव की बहन संध्या मैनपुरी जिला पंचायत अध्यक्ष निर्वाचित हुई हैं। सांसद तेजप्रताप की मां मृदुला यादव सैफई की ब्लाॅक प्रमुख है। मुलायम के बहनोई अजंट सिंह यादव भी ब्लाॅक प्रमुख चुने गए है। भाई राजपाल यादव की पत्नी प्रेमलता जिला पंचायत सदस्य है। रामगोपाल यादव के भतीजे बिल्लू यादव भी ब्लाॅक प्रमुख है। रामगोपाल यादव के भतीजे की पत्नी मीनाक्षी यादव मैनपुरी से जिला पंचायत सदस्य है।
कुल मिलाकर सपा प्रमुख के परिवार के 21 सदस्य भिन्न जगहों से प्रदेष की राजनीति के केन्द्र से सीधे जुड़े है और अपने वर्चस्व का प्रदर्षन गाहे-बगाहे करते ही रहते है। यहां मकसद समाजवादी पार्टी की ’हेरारकी’ पर ही उंगुली उठाने का नहीं है, ये हवा तो पूरे देष में बह रही है। यहां सवाल उस समाजवादी आदर्ष, उस सोच का है जो राम मनोहर लोहिया के षिष्यों का कभी लक्ष्य रही। राममनोहर लोहिया के समाजवाद की आदर्ष विरासत पर खड़ी ये राजनीतिक पार्टियां मूल उद्देश्यों से भटकती नजर आ रही है। वरना लोहिया के शिष्य ’समाजवाद’ के नाम पर ’परिवारवाद’ बढ़ाने और स्थापित करने में न लगे होते। लोहिया राजनीति में वंशवाद को बढ़ावा देने के पक्ष में कतई नहीं थे। तभी तो जब देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने राजनीति में परिवारवाद की शुरूआत की थी और अपने जीवन काल में ही अपनी बेटी इंदिरा गांधी को कांग्रेस का अध्यक्ष बनवा दिया तब लोहिया ने मर्माहत होकर कहा था कि देश की आजादी का मूल उद्देश्य अब शायद ही पूरा हो। अब कांग्रेस नेहरू परिवार की जागीर बन कर देश का सर्वनाश ही करेगी। यही हुआ। आज कांग्रेस नेहरू परिवार की जागीर बन कर रह गयी है। यही अधिकाषतः पार्टियों का हाल हो रहा है। पार्टियां अब स्व-सम्पति की तरह ’यूज’ की जा रही है और उत्तर प्रदेष ही इसका अपवाद हो, ऐसा नहीं है।
लाहिया के समाजवाद के नाम पर बिहार में लालू-राबड़ी ने 15 सालों तक राज किया। लालू जब चारा घोटाले में जेल गये तब उनकी पत्नी राबड़ी देवी मुख्यमंत्री बना दी गयी। उनका पूरा ससुराल ही विधानसभा और संसद में चला गया। साधु यादव-सुभाष यादव नामक लालू के दो साले एक साथ संसद के सदस्य बन गये। बेटी मीसा .......... तो सुपुत्र      यादव इस समय बिहार के उपमुख्यमंत्री है। इसी क्रम में देखा जाए तो
अकाली दल के प्रकाशसिंह बादल के एक दर्जन पारिवारिक लोग कुर्सियों पर काबिज हैं। हरियाणा में स्वर्गीय देवीलाल के पुत्र चैटाला और उनके बेटे कुर्सियों इस परंपरा का निर्वहन कर रहे हैं। कश्मीर में स्व. शेख अब्दुला के बाद उनके बेटे फारूख अब्दुला और उनके भी बेटे उमर अब्दुला क्रमशः केन्द्र व राज्य में काबिज है। महबूबा मुफ्ती अपने स्व. पिता भूतपूर्व केन्द्रीय गृह मन्त्री की विरासत की मालकिन हैं। हिमांचल के भारतीय जनता पार्टी के वर्तमान मुख्यमंत्री के पुत्र अनुराग ठाकुर राष्ट्रीय युवा मोर्चा संभाल रहे हैं। हरियाणा के दो भूतपूर्व बड़े नेता चैधरी बंशीलाल व भजनलाल के वंशज राजनीति में सक्रिय हैं। मध्यप्रदेश के राज घराने वाले सिंधिया परिवार की पीढ़ियां राजनीति की अग्रिम पंक्ति में सक्रिय रही हैं। तमिलनाडू में करुनानिधि पुत्र, पुत्री, भतीजे व अन्य रिश्तेदारों के साथ वंषानुगत परिपाटी को आगे बढ़ा रहे है। केरल मे स्वर्गीय करुणाकरण ने तो पुत्र मोह मे पार्टी से ही विद्रोह कर दिया था। कर्नाटक में स्वनामधन्य हरदनहल्ली देवेगौड़ा के उखाड़ पछाड़ में उनके बेटे का मुख्यमंत्री बनना और हटाया जाना ज्यादा पुराना नहीं हुआ है। आन्ध्र में फिल्मों से आये राजनेता मुख्यमंत्री एन.टी.आर की विरासत में पत्नी लक्ष्मी और दामाद चंद्रबाबू नायडू के राजकाज की बातें अब भी लोगों को याद होगी। आंध्र में ही पूर्व मुख्यमन्त्री राजशेखर रेड्डी के पुत्र जगन के हक की लड़ाई केवल कुर्सी के लिए लंबी चली थी। झारखंड में शिबूसोरेन का व उनके बेटे का राजनीतिक दांवपेंच सिर्फ कुर्सी के लिए चलता रहा। शिवसेना प्रमुख बाला साहब का पुत्र-पौत्र प्रेम और राजनीति में परिवारवाद को वर्चस्व देना, सभी जानते है। एन.सी.पी. नेता शरद पवार की बेटी राज्यसभा में और भतीजा विधान सभा में उनके आदर्शों का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। समाजवादी पार्टी उसमें शीर्ष स्थान पर अपनी बढ़त बनाए हुए है। गांधी परिवार तो ये आरोप सदियों से झेल रहा है। ऐसे परिवारों को लेकर हुई बहुतेरी तू-तू मैं-मैं के बावजूद कोई ठोस राजनीतिक विमर्श आज तक नहीं निकल सका।
वंषानुगत उम्मीदवारी के अलावा आपस में राजनैतिक संबंधों को प्रगाड़ करने होड़ भी राजनीति के लिए कोई नई बात नहीं। अपने क्षेत्र को विस्तार देने के लिए, आपसी गठजोड़ का तालमेल सही बैठाने के लिए पहले राजा महाराजा भी विवाह के जरिए आपसी संबंधों को मजबूती प्रदान करते थे। यहीं काम उ0प्र0 में सपा, बिहार में राजद और पंजाब में अकाली दल कर रहा है। ये बड़े नेता राजनीति के मैदान में भले ही आपस में एक दूसरे के घुर विरोधी नजर आते हो लेकिन सत्ता के गलियारों के बाहर ये सास, बहू, बेटा, दामाद, बेटी, साला और समधी होते हैं। फर्क है तो इस बात का कि पूर्व में बादषाह हो या राजा उसकी मंषा विस्तार बढ़ाने के पीछे जनता का हित सर्वोपरि होता था। आज इसके उलट परिवार हित को पहले मान्यता दी जा रही है। दरअसल इसी परिवारवाद के चलते राजनीति भी कुछेक लोगों की थाती होती जा रही है। ये वंषवाद भारतीय राजनीति के लिए दंष बनता जा रहा है। प्रधानमंत्री हो या मुख्यमंत्री या फिर संसदीय सीट, हर जगह परिवार को दी जाने वाली प्राथमिकता या कह ले बन रहे आरक्षित मामले उन योग्य या जरूरतमंदों की पहुंच से दूर हो रहे है जो निष्चित रूप से इसके हकदार है।
राजनीति में परिवारवाद को अगर लोहिया की नजर से देखा जाए तो ये कोई सामान्य मुद्दा नहीं बल्कि गहन सोच का विषय है। लोहिया इसके दुष्प्रभाव से भलीभंाति वाकिफ थे। इसी लिए वे सदैव इसके खिलाफ बोलते रहे। ये दुखद ही है कि पूरे विश्व के लोकतांत्रिक इतिहास में भारत ही एक ऐसा देश है, जहां राजनीति में परिवारवाद की जड़ें मजबूत होती जा रही है।  देश का प्रजातंत्र ’परिवारतंत्र’ नजर आने लगा है। इस परिवारतंत्र को कितना लोकतांत्रिक कहा जा सकता है, यह सवाल दिनों दिन बढ़ता जा रहा है। लेकिन एक प्रबुद्ध नागरिक की इस बात को भी नकारा नहीं जा सकता कि अब परिवारवाद कोई मुद्दा नहीं है। जनता बुद्धिमान है, अपना वोट देकर पार्लियामेन्ट भेजती है। कल को मेरा बेटा या पोता चुनाव लड़ना चाहेगा तो कौन रोक सकता है। यही जनतंत्र है।