Monday, December 1, 2025

वैश्विक विज्ञान और प्रौद्योगिकी शिक्षा पर चीन का जोर

 अंतर्राष्ट्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी शिक्षा के दूरगामी लाभ एवं आवश्यकताओं को देखते हुए, अपनी व्यापक विदेश नीति और आर्थिक रणनीतियों (विशेषकर बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव, बीआरआई) में इसे शामिल कर बाहरी पहुँच के साथ घरेलू सुदृढ़ीकरण की ओर अपनी मंशा बता दी है। लेकिन इसका परिणाम भागीदार देशों के लिए क्षमता निर्माण और कौशल हस्तांतरण के मिश्रण के साथ-साथ असममित निर्भरता, बौद्धिक संपदा/गोपनीयता मानदंडों और भू-राजनीतिक प्रभाव से जुड़ी चिंताओं के रूप में सामने आता है।



चीनी अधिकारियों ने, शिक्षा मंत्रालय के नेतृत्व में, छह अन्य विभागों के साथ मिलकर देश भर के प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालयों में ’विज्ञान और प्रौद्योगिकी शिक्षा को मज़बूत’ करने के लिए संयुक्त रूप से दिशानिर्देश जारी कर 2030 तक कर एक आधारभूत शिक्षा प्रणाली स्थापित करने पर एकमत राय की प्रकिया पर कार्य करने पर जोर दिया है। इसकी परिकल्पना में बेहतर पाठ्यक्रम, शिक्षण सुधार, उन्नत मूल्यांकन तंत्र और बेहतर शिक्षक विकास के साथ-साथ इसके प्रमुख पहलुओं में व्यावहारिक अभ्यास के माध्यम से वैज्ञानिक रुचि और भावना को बढ़ावा देने के लिए एक सहयोगी और एकीकृत शिक्षा प्रणाली का निर्माण और एक मुक्त पाठ्यक्रम पारिस्थितिकी तंत्र का विकास करना जैसे मूल उद्येश्य शामिल है जो अंतःविषय ज्ञान को एकीकृत करके छात्रों को जटिल समस्याओं को हल करने में सक्षम बनाता है। ये सुधार योग्यता-आधारित शिक्षण, अनुसंधान और व्यापक मूल्यांकन पर भी ज़ोर देता हैं, साथ ही वास्तविक दुनिया के विज्ञान और प्रौद्योगिकी में अनुभवात्मक अधिगम को समर्थन देने के लिए शिक्षण संसाधनों और वातावरण को उन्नत करता हैं। विज्ञान शिक्षा पर प्रभावी ढंग से ध्यान केंद्रित किए जाने से यह योजना वैश्विक विज्ञान और प्रौद्योगिकी शिक्षा में अनुसंधान और व्यावहारिक नवाचार को आगे बढ़ाने के लिए व्यापक अंतर्राष्ट्रीय आदान-प्रदान और बहुपक्षीय सहयोग को बढ़ावा देती नजर आती है।

बाहरी पहुँच के साथ घरेलू सुदृढ़ीकरण

अंतर्राष्ट्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी शिक्षा के दूरगामी लाभ एवं आवश्यकताओं को देखते हुए, अपनी व्यापक विदेश नीति और आर्थिक रणनीतियों (विशेषकर बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव, बीआरआई) में इसे शामिल कर बाहरी पहुँच के साथ घरेलू सुदृढ़ीकरण की ओर अपनी मंशा बता दी है। लेकिन इसका परिणाम भागीदार देशों के लिए क्षमता निर्माण और कौशल हस्तांतरण के मिश्रण के साथ-साथ असममित निर्भरता, बौद्धिक संपदा/गोपनीयता मानदंडों और भू-राजनीतिक प्रभाव से जुड़ी चिंताओं के रूप में सामने आता है। हालांकि चीन की ैज्म्ड शिक्षा (ज्ञ-12 और उच्च शिक्षा) को बढ़ावा देने की आंतरिक राष्ट्रीय योजनाएँ, बाहरी सहयोग की गुणवत्ता और पैमाने को बढ़ावा देती हैंः जैसे-जैसे चीन घरेलू स्तर पर अधिक विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी क्षमता का उत्पादन करता है, वह साझेदार देशों को अधिक विशेषज्ञता और आकर्षक प्रशिक्षण प्रदान कर सकता है। रॉयटर्स की रिपोर्ट में प्राथमिक स्तर से लेकर ऊपर तक विज्ञान शिक्षण को मज़बूत करने के हालिया निर्देशों पर प्रकाश डाला गया है। ये पहल विकासशील देशों को कैसे प्रभावित करती हैं -इसको विश्लेषणात्मक निष्कर्ष के रूप में देखे तो छात्रवृत्ति और संयुक्त प्रयोगशालाएं इंजीनियरों, वैज्ञानिकों और नीति निर्माताओं को व्यावहारिक विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी प्रशिक्षण प्रदान करती हैं, जिससे स्थानीय क्षमताओं (कृषि, बुनियादी ढांचा तकनीक, डिजिटल कौशल) को बढ़ाया जा सकता है। बुनियादी ढांचे और मानव पूंजी संयोजन की दृष्टि से बीआरआई परियोजनाओं के साथ अक्सर (औपचारिक या अनौपचारिक रूप से) स्थानीय तकनीशियनों और प्रबंधकों के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम भी होते हैं, जिससे टिकाऊ रखरखाव और स्थानीय रोजगार सृजन की संभावना बढ़ जाती है।व्यापक छात्रवृत्ति प्रवाह, कार्यक्रम डिज़ाइन और चीन-प्रधान अनुसंधान नेटवर्क चीनी पाठ्यक्रमों, डेटा मानकों या तकनीकी पारिस्थितिकी प्रणालियों पर निर्भरता पैदा कर सकते हैं, जिससे तकनीकी विकल्पों पर स्थानीय स्वायत्तता कम हो सकती है। हालांकि इस पर विश्लेषकों ने चेतावनी दी है कि इससे साझेदार देशों के भविष्य की तकनीकी प्रगति प्रभावित हो सकती है।

चीन छात्रवृत्ति परिषद (सीएससी) और सरकारी छात्रवृत्तियाँ

सीएससी अंतर्राष्ट्रीय छात्रों और शोधकर्ताओं (चीन आने वाले और चीन से बाहर जाने वाले, दोनों) को वित्तपोषित करने का मुख्य माध्यम है। सीएससी और छात्रवृत्ति रणनीति का विश्लेषण करें तो यह एक रणनीतिक साधन है जो आदान-प्रदान को बढ़ाता है और चीनी संस्थानों से जुड़े सघन शैक्षिक नेटवर्क का निर्माण करता है। सीएससी कार्यक्रम, साथ ही बीआरआई-लक्षित छात्रवृत्तियाँ और संबंधित योजनाएँ, बड़े पैमाने पर हैं और इनका उद्देश्य भागीदार देशों की तकनीकी प्रतिभाओं को प्रशिक्षित करना है। रिपोर्टों के अनुसार, कुछ वर्षों में हज़ारों प्रायोजित आदान-प्रदान हुए हैं। ये छात्रवृत्तियाँ कौशल हस्तांतरण और नेटवर्क निर्माण के प्रत्यक्ष साधन हैं।

विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी सहयोग केंद्र, संयुक्त प्रयोगशालाएँ और लक्षित अनुदान चीन साझेदार विश्वविद्यालयों और सरकारों के साथ संयुक्त अनुसंधान केंद्रों और प्रयोगशालाओं को वित्तपोषित करता है (जो अक्सर कृषि, जन स्वास्थ्य, अवसंरचना इंजीनियरिंग, डिजिटल अवसंरचना और अन्य अनुप्रयुक्त विज्ञानों पर केंद्रित होते हैं)। ये केंद्र प्रशिक्षण, परामर्श और अनुप्रयुक्त अनुसंधान को जोड़ते हैं, जिसका उद्देश्य स्थानीय स्तर पर महत्वपूर्ण तकनीकी समस्याओं का समाधान करना है, साथ ही स्थानीय शोधकर्ताओं को चीनी शैक्षणिक-उद्योग नेटवर्क से जोड़ना है। प्रतिभा पाइपलाइन और ‘वैश्विक शासन/उत्कृष्टता प्रशिक्षण’ नए कार्यक्रम उच्च-स्तरीय शासन/विज्ञान नेतृत्व कौशल (जैसे, ष्उत्कृष्टता के युवाष् शैली की पहल और इसी तरह की प्रमुख प्रशिक्षण योजनाएँ) को लक्षित करते हैं ताकि विकासशील देशों के अभिजात वर्ग को प्रशासनिक, वैज्ञानिक या तकनीकी नेतृत्व की भूमिकाओं के लिए तैयार किया जा सके जहाँ वे बाद में चीनी संस्थानों के साथ बातचीत करेंगे।

एस एंड टी फंडिंग के स्रोत और तीव्रता

दुनिया में दूसरी जगहों की तरह, चीन के इनोवेशन इकोसिस्टम के लिए फंडिंग कई तरह के कमर्शियल और पब्लिक सोर्स से आती है और कई तरह के पब्लिक और प्राइवेट एसएंडटी सेक्टर्स तक जाती है। हालांकि, दूसरी बड़ी और टेक्नोलॉजी में एडवांस्ड इकॉनमी के उलट, चीन में सरकार से जुड़े सोर्स एक अहम भूमिका निभाते हैं, जो देश के एसएंडटी इकोसिस्टम में आने वाली कुल फंडिंग का लगभग 60रू हिस्सा हैं। रोडियम ग्रुप की रिसर्च के अनुसार, 2022 में यूनिवर्सिटी और रिसर्च इंस्टीट्यूट के लिए एसएंडटी बजट का लगभग 70; बजटरी (यानी, सरकारी) सोर्स से था, और इसका 68रू लोकल सरकारों से आया। क्योंकि सरकार से जुड़ी फंडिंग चीन के एसएंडटी सिस्टम की फाइनेंसिंग का बहुत ज़्यादा हिस्सा है, इसलिए कमज़ोर होती फाइनेंशियल हालत से रुकावट का बड़ा खतरा है। लोकल सरकारें, जिनमें से कई पैसे की तंगी का सामना कर रही हैं, 2022 में सरकार के कुल एसएंडटी खर्च का लगभग दो-तिहाई हिस्सा देने के लिए ज़िम्मेदार थीं। एसएंडटी के लिए फंडिंग के दूसरे सोर्स, जिसमें रीइन्वेस्टेड प्रॉफिट से लेकर इक्विटी और लोन तक के कमर्शियल फाइनेंसिंग चौनल शामिल हैं, पर भी धीमी इकोनॉमिक ग्रोथ का दबाव होगा।

नेशनल ब्यूरो ऑफ़ स्टैटिस्टिक्स ऑफ़ चाइना के अनुसार 2023 में,एसएंडटी पर कुल फिस्कल (सरकारी) खर्च 1,199.58 बिलियन युआन था, जिसमें से 66.9रू लोकल सरकारों से और 33.1रू सेंट्रल सरकार से आया। मिनिस्ट्री ऑफ़ साइंस एंड टेक्नोलॉजी के अनुसार, 2024 में, 4,059 यूनिवर्सिटी और इंस्टीट्यूट ने अपनी साइंटिफिक उपलब्धियों को छह चौनलों के ज़रिए कमर्शियल या एप्लाइड आउटपुट में बदला। रिपोर्ट से पता चलता है कि 2024 में, कुल 4,059 यूनिवर्सिटी और इंस्टीट्यूट ने अपनी साइंस-टेक उपलब्धियों को छह चौनलोंः ट्रांसफर, लाइसेंसिंग, इक्विटी इन्वेस्टमेंट, टेक्नोलॉजी डेवलपमेंट, कंसल्टिंग और सर्विसेज़, के ज़रिए बदला, जिसमें कुल 226.9 बिलियन युआन (लगभग 31.9 बिलियन यूएस डॉलर) के कॉन्ट्रैक्ट हुए, जो पिछले साल के मुकाबले लगभग 10 परसेंट ज्यादा था।यूनिवर्सिटीज़ और रिसर्च इंस्टीट्यूट्स के लिए फंडिंग का एक बड़ा हिस्सा लोकल सरकारों से आता है, इसलिए जाहिर है लोकल एडमिनिस्ट्रेशन्स पर बजट का दबाव लगातार सपोर्ट को खतरे में डाल सकता है। जैसा कि रोडियम ग्रुप ने बताया है, लोकल सरकार के रेवेन्यू पर दबाव है, जिससे इनोवेशन फंडिंग को खतरा हो सकता है।

हालांकि यह इस बात का साफ़ उदाहरण है कि चीन न सिर्फ़ रिसर्च बढ़ाने पर ज़ोर दे रहा है, बल्कि उसे मार्केटेबल टेक्नोलॉजी में बदलने पर भी ज़ोर दे रहा है। खास पॉलिसीज़ के ज़रिए, चीन “साइंस-टेक अचीवमेंट ट्रांसफॉर्मेशन” पर ज़ोर दे रहा है जैसे लाइसेंसिंग, स्टार्ट-अप्स, इक्विटी इन्वेस्टमेंट, कंसल्टिंग और दूसरी सर्विसेज़ के ज़रिए एकेडमिक रिसर्च को इंडस्ट्रियल एप्लीकेशन्स में बदलना। 2024 का डेटा (कॉन्ट्रैक्ट्स में 226.9 बिलियन युआन) बताता है कि यह एक मैच्योर और बढ़ता हुआ मॉडल बन रहा है।

बौद्धिक संपदा (आईपी) एवं डेटा साझाकरण संबंधी चिंताएं

संयुक्त परियोजनाएं आईपी स्वामित्व, डेटा प्रशासन और परिणामों तक पहुंच के बारे में प्रश्न उठाती हैं। आलोचक परिवर्तनशील पारदर्शिता और इस जोखिम पर ध्यान देते हैं कि स्थानीय शोधकर्ताओं का परिणामों पर सीमित नियंत्रण हो सकता है। सीएएस ने बीआरआई देशों के अनुसंधान वैज्ञानिकों को प्रशिक्षित करने के लिए चीन में पाँच उत्कृष्टता केंद्र स्थापित किए हैं। इसके अलावा, सीएएस ने अफ्रीका, दक्षिण अमेरिका, मध्य एशिया, दक्षिण और पूर्वी एशियाई देशों में नौ विदेशी संस्थान स्थापित किए हैं। उदाहरण के लिए, श्रीलंका स्थित केंद्र जल प्रबंधन पर केंद्रित है; ब्राजील के साओ पाउलो स्थित केंद्र मौसम और अंतरिक्ष पर अनुसंधान पर केंद्रित है, और ताशकंद स्थित केंद्र मध्य एशिया की क्षेत्रीय विशेषताओं वाली प्राकृतिक उत्पाद औषधियों के अनुसंधान और विकास पर केंद्रित है।

बोस्टन विश्वविद्यालय के वैश्विक विकास नीति केंद्र द्वारा सोमवार को जारी एक अध्ययन में कहा गया है कि बीआरआई ने 2021 तक विकासशील देशों की सरकारों को 330 बिलियन डॉलर से अधिक का ऋण दिया है, जो कुछ वर्षों में विश्व बैंक द्वारा दिए गए ऋण से भी अधिक है। केंद्र के निदेशक केविन गैलाघर ने कहा, ’कुछ हद तक, चीन ने विकासशील देशों में एक विश्व बैंक को जोड़ा है, और यह कोई छोटी उपलब्धि नहीं है और विकासशील देशों द्वारा इसकी बहुत सराहना की जाती है।‘ लेकिन इसी अध्ययन में यह भी बताया गया है कि चीनी ऋण प्राप्त करने वाले कई देश अब अपने समग्र ऋणों से जूझ रहे हैं। इसके अलावा, चीन द्वारा वित्त पोषित बिजली संयंत्र प्रति वर्ष लगभग 245 मिलियन टन कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जित कर रहे हैं, जिससे जलवायु परिवर्तनकारी ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन बढ़ रहा है।

बिला शक शिक्षा कार्यक्रम अनुसंधान प्रशासन, शैक्षणिक अभ्यास और तकनीकी मानकों (डेटा के प्रति चीन के दृष्टिकोण, निगरानी-सम्बन्धी तकनीक आदि सहित) के बारे में मानदंड प्रदान करते हैं। लेकिन समय के साथ, यह संस्थानों की नियामक संस्कृतियों को प्रभावित कर सकता है। किसी प्राप्तकर्ता देश के लिए इसका शुद्ध परिणाम सकारात्मक होगा या नहीं, यह स्थानीय शासन, अनुबंध के विवरण (आईपी, रखरखाव, डेटा), और प्राप्तकर्ता की विजिटिंग स्कॉलर और संयुक्त परियोजनाओं की एकतरफा निर्भरता के बजाय टिकाऊ घरेलू क्षमता में बदलने की क्षमता पर निर्भर करता है।

बीआरआई के सदस्य देशों के बीच विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी में सहयोग कई समानांतर मार्गों पर चलता है, जहाँ चीन का सबसे बड़ा वैज्ञानिक संगठन, चीनी विज्ञान अकादमी (सीएएस), वैज्ञानिक कार्यक्रमों के निर्माण में निर्णायक भूमिका निभाता है। सीएएस के अध्यक्ष, बाई चुनली के अनुसार, ’विज्ञान, प्रौद्योगिकी और नवाचार बीआरआई के विकास की मुख्य प्रेरक शक्ति हैं’ जिससे बीआरआई के भागीदार देशों के सामने आने वाली जलवायु परिवर्तन, जल एवं खाद्य सुरक्षा, जन स्वास्थ्य और पारिस्थितिक चुनौतियों सहित कई विकासात्मक बाधाओं को दूर किया जा सकेगा।

निष्कर्ष

निःसंदेह चीन का एसएंडटी एजुकेशन पर ज़ोर, गरीब देशों में तेज़ी से कैपेसिटी बिल्डिंग के लिए एक इंजन और स्ट्रेटेजिक असर का एक वेक्टर, दोनों है। महत्वाकांक्षी और बड़े पैमाने पर इन्वेस्टमेंट के नजरिए से चीन का एसएंडटी  बहुत बड़ा है और बढ़ रहा है, खासकर आर एंड डी में, जिसमें जीडीपी के मुकाबले कुल खर्च और बजट तीव्रता दोनों में साफ़ तौर पर ऊपर की ओर ट्रेंड है। नेशनल लैब, इंजीनियरिंग सेंटर, यूनिवर्सिटी और सरकार से जुड़े आर एंड डी इंस्टीट्यूट चीन के इनोवेशन सिस्टम का इंफ्रास्ट्रक्चर बैकबोन हैं, जिन्हें सेंट्रल और लोकल दोनों सरकारों का भारी सपोर्ट मिलता है। फिर भी लोकल गवर्नमेंट फंडिंग पर निर्भरता, रिसर्च को कमर्शियल आउटपुट में अच्छे से बदलने की ज़रूरत, और ग्लोबल कॉम्पिटिटिवनेस पक्का करना, ये चीन के लिए लगातार चुनौतियों के रूप में सामने आती रहेगी।

published here: 

https://orcasia.org/article/1481/vashavaka-vajaniana-oura-parathayagaka-shakashha-para-cana-ka-jara


 व्यापक विदेश नीति और आर्थिक रणनीतियों, विशेषकर बेल्ट व्यापक विदेश नीति और आर्थिक रणनीतियों, विशेषकर बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव बने आधार एंड रोड इनिशिएटिव बने आधारपक विदेश नीति और आर्थिक रणनीतियों, विशेषकर बेल्ट एंड रोव्यापक विदेश नीति और आर्थिक रणनीतियों, विशेषकर बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव बने आधारड इनिशिएटिव बने आधार

Friday, March 7, 2025

राजनैतिक भागीदारी बढ़ाये बगैर समानता की बात बेमानी होगी


एक बार फिर हम अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस मनाने जा रहे है है और हर साल की तरह इस वर्ष भी संयुक्त राष्ट्र ने अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस 2025 का विषय सभी महिलाओं और लड़कियों के लिएः अधिकार, समानता, सशक्तिकरण पर त्वरित कारवाई तय किया है। 2025 की थीम, शिक्षा, रोज़गार और नेतृत्व में महिलाओं की प्रगति को आगे बढ़ाने वाली रणनीतियों और उपकरणों को पहचानने पर केंद्रित है। यहां आपको बताते चलें कि अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस की शुरुआत 1911 में हुई थी, जो महिलाओं के अधिकारों की वकालत करने वाले श्रमिक आंदोलनों से प्रेरित था। जर्मन कार्यकर्ता क्लारा ज़ेटकिन ने इस विचार का प्रस्ताव रखा, जिसके कारण अमेरिका और यूरोप में पहली बार इसे मनाया गया। संयुक्त राष्ट्र ने आधिकारिक तौर पर जब इसे 8 मार्च को 1975 में अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के रूप में मान्यता दी, तो निःसंदेह इसका वैश्विक महत्व कालांतर में मजबूत होता चला गया।

हालांकि विश्व आर्थिक मंच की 2024 की वार्षिक वैश्विक लैंगिक अंतर रिपोर्ट को देखें तो वैश्विक लैंगिक अंतर में मामूली सुधार हुआ है और वर्तमान प्रगति के अनुसार इसे पाटने में अभी भी और पाँच पीढ़ियाँ लगेंगी। इसकी वजह राजनीतिक भागीदारी में उनकी उपस्थिति का कम होना। यह वह क्षेत्र है जिसमें उनकी भूमिका बढ़ने का सभी क्षेत्रों में प्रभाव सबसे अधिक पड़ने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता। अफसोस की बात है कि यही वह जगह है जहाँ अंतर सबसे अधिक दिखाई देता है। वैश्विक स्तर पर महिलाओं के लिए शीर्ष-स्तरीय पद अभी भी काफी हद तक दुर्गम बने हुए हैं। हालांकि वैश्विक श्रम-बल भागीदारी में समानता ठीक हो रही है, महामारी के दौरान 62.3ः के निम्नतम स्तर से बढ़कर 65.7ः तक बढ़ोत्तरी नजर आई है।

वैश्विक लैंगिक अंतर सूचकांक चार प्रमुख आयामों में देशों का आकलन करता है जिसमें आर्थिक भागीदारी, शैक्षिक उपलब्धि, स्वास्थ्य रक्षा और राजनीतिक भागीदारी। जिसमें आर्थिक भागीदारी में भारत 142वें स्थान पर है, जो श्रम बल भागीदारी, वेतन समानता और वरिष्ठ पदों पर प्रतिनिधित्व में महत्वपूर्ण असमानताओं को दर्शाता है। शैक्षिक उपलब्धि में 112वें स्थान पर स्थित, भारत ने प्राथमिक, माध्यमिक और तृतीयक शिक्षा में महिलाओं के लिए उच्च नामांकन दर हासिल की है। हालाँकि, पुरुषों और महिलाओं के बीच 17.2 प्रतिशत अंकों का साक्षरता अंतर बना हुआ है। वैश्विक लैंगिक अंतर पर विश्व आर्थिक मंच की नवीनतम रिपोर्ट लैंगिक समानता की दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति को उजागर करती है, जबकि निरंतर चुनौतियों को भी रेखांकित करती है जो पूर्ण समानता में अभी बाधा डाल रही हैं। स्वास्थ्य और जीवन रक्षा में भी भारत 142वें स्थान पर है, जो महिलाओं के लिए स्वास्थ्य सेवा तक पहुँच और परिणामों में चल रही चुनौतियों को और सरकार विफलताओं को दर्शाता है। राजनीतिक सशक्तिकरण में भारत की 65वें स्थान तक पहंुच को हम सुधार के रूप देख सकते है। फिर भी अभी मंत्रिस्तरीय पदों (6.9ः) और संसद (17.2ः) में महिलाओं का प्रतिनिधित्व की कमी इस मुद्दे पर गंभीर चितन की मांग करती है। 

इसमें कोई दो राय नहीं कि महिलाएं दुनिया की आधी आबादी का प्रतिनिधित्व करती हैं बावजूद इसके लैंगिक असमानता हर जगह बनी हुई है। सामाजिक प्रगति को बढ़ने से रोकने में यह स्थिति सबसे बड़ी बाधा है। श्रम बाजार में महिलाएँ अभी भी वैश्विक स्तर पर पुरुषों की तुलना में 23 प्रतिशत कम कमा रही हैं। ऊपर से यौन हिंसा और शोषण, अवैतनिक देखभाल और घरेलू काम का असमान विभाजन और सार्वजनिक कार्यालय में भेदभाव उसके लिए अभी भी सभी बड़ी बाधा बनी हुई हैं। असमानता के ये सभी क्षेत्र महामारी के बाद से और भी बढ़ गए हैं। यौन हिंसा की रिपोर्ट में उछाल आया है। मौजूदा हालातो पर गौर करे तो बाल विवाह को समाप्त करने में अभी अनुमानित सालों लग जायेगें, ऐसा लगता है। रिपोर्ट के अनूसार तो कानूनी सुरक्षा में अंतराल को बंद करने और भेदभावपूर्ण कानूनों को हटाने में 286 साल, कार्यस्थल में सत्ता और नेतृत्व के पदों पर महिलाओं को समान रूप से प्रतिनिधित्व मिलने में 140 साल लगेंगे और राष्ट्रीय संसदों में समान प्रतिनिधित्व हासिल करने में अभी और 47 साल लग जायेगें। यकीनी तौर पर यह कोई प्रशंसनीय स्थिति नहीं है। दरअसल लैंगिक समानता एक सर्वव्यापी उद्देश्य है और इसे राष्ट्रीय नीतियों, बजट और संस्थानों का मुख्य केंद्र बनाना चाहिए।

दुनिया भर के किसी भी मुल्क को ले लें, आज भी लगभग आधी विवाहित महिलाओं के पास अपने यौन और प्रजनन स्वास्थ्य और अधिकारों के बारे में निर्णय लेने की शक्ति नहीं है। सुनने में यह अजीब लग सकता है लेकिन यह कटु सत्य है कि 15-49 वर्ष की आयु के बीच की 35 प्रतिशत महिलाओं ने शारीरिक या यौन अंतरंग साथी हिंसा या गैर-साथी यौन हिंसा का अनुभव किया है। अफ्रीका और मध्य पूर्व के 30 देशों में 15-19 वर्ष की आयु की 3 में से 1 लड़की ने महिला जननांग विकृति/काटने के किसी न किसी रूप का अनुभव किया है। यह एक हानिकारक आम प्रथा है, जिसमें लंबे समय तक रक्तस्राव, संक्रमण (एचआईवी सहित), प्रसव संबंधी जटिलताएं, बांझपन और मृत्यु का जोखिम आम बात है। इस सबंध में देखे तो आइसलैंड, स्वीडन, फ़िनलैंड और नॉर्वे जैसे स्कैंडिनेवियाई देशों ने लैंगिक अंतर को कम करने में अच्छी प्रगति की है। मध्य पूर्व, दक्षिण एशिया और अफ्रीका में महत्वपूर्ण आर्थिक और सामाजिक असमानताएँ अन्य देशों की तुलना में कहीं अधिक गहरी हैं।

संकीर्ण मानसिकता से उबरती भारतीय महिलाएं

भारत की महिलाएँ एक महत्वपूर्ण परिवर्तन से गुज़र रही हैं, पारंपरिक अपेक्षाओं से मुक्त होकर नए रास्ते बना रही हैं। यह परिवर्तन मुझे विभिन्न कारकों से नजर आ रहा है जैसे शिक्षा और आर्थिक सशक्तीकरण के रूप में। शिक्षा और नौकरी के अवसरों तक पहुँच में वृद्धि ने महिलाओं को वित्तीय स्वतंत्रता प्राप्त करने, पितृसत्तात्मक मानदंडों को चुनौती देने और आत्म-सम्मान की भावना को विकसित करने में सक्षम बनाया है। इसका मतलब यह निकलता है कि स्त्री अब अपनी योग्यता का समझ रही है और महत्वाकांक्षा को मारने के बजाय उसको ‘अचीव’ करना सीख रही है। दूसरे सामाजिक और सांस्कृतिक बदलाव के नजरिए में- सोशल मीडिया, शहरीकरण और वैश्विक दृष्टिकोणों के संपर्क में आने से समाज में अधिक उदार और खुले विचारों का निर्माण हुआ है, जिससे महिलाओं को खुद को अभिव्यक्त करने और अपनी आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए प्रोत्साहन मिला है। तीसरे महिला आंदोलन और सक्रियता में उसकी बढ़ती भागीदारी भी उसे एक नई स्त्री के रूप में रख रही। हालांकि इस रूप में कई महिलाएं ऐतिहासिक उदाहरणों के रूप में हमारे ऑखों में कौंध जाती है लेकिन उनकी संख्या सीमित है। आज नारीवादी आंदोलनों, गैर-सरकारी संगठनों (एनजीओ) और वकालत समूहों के विकास के तले अधिकतर महिलाएं अपनी आवाज़ उठाने, अन्याय को चुनौती देने और समान अधिकारों की मांग करने के लिए एक नया मंच खड़ी कर रही है। चौथे सरकारी पहल और नीतियॉं जैसे ‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ योजना’, ‘महिला आरक्षण विधेयक’ और अन्य पहलों ने लैंगिक समानता को बढ़ावा देकर महिलाओं को सशक्त बनाने में मदद की और कन्या भ्रूण हत्या और घरेलू हिंसा जैसे मुद्दों का को बहुत हद तक उसके घृणित रूप से उबारने में सहयोग किया है।

एक तरह से हम कह सकते है कि आज की भारतीय महिलाएँ विभिन्न तरीकों से अपनी भूमिकाएँ और व्यक्तित्व को पुनः परिभाषित कर रही हैं। वह गैर-पारंपरिक करियर जैसे उद्यमिता, खेल और सेना जैसे क्षेत्रों में प्रवेश कर रही हैं रूढ़ियों को तोड़ उन सीमाओं को लांघ रही हैं जहां मात्र अब तक पुरूषों का वर्चस्व रहा। अपनी स्वतंत्रता को सर्वाेपरि रख वह सामाजिक अपेक्षाओं के अनुरूप होने के बजाय शिक्षा, विवाह, करियर और जीवनशैली के बारे में अपने स्वयं के विकल्प चुन रही हैं। यही नहीं आज की स्त्री खुद को रचनात्मक रूप से अभिव्यक्त करना सीख गई है। वह कला, साहित्य, संगीत और अन्य रचनात्मक गतिविधियों के माध्यम से अपनी आवाज़ ढूँढ रही हैं, पारंपरिक मानदंडों को चुनौती दे अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन कर रही हैं। इन सबसे बड़ी बात वह परिवर्तन-निर्माता बन कर उभर रही। महिलाएँ संवैधानिक नेतृत्व की भूमिकाएँ निभा रही हैं जिसकी मदद से वह सामाजिक परिवर्तन ला रही हैं और महिलाओं के अधिकारों की वकालत कर रही हैं और दूसरों को भी ऐसा करने के लिए प्रेरित कर रही हैं। वह चाहे भारत देश की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू हो या प्रदेश की गर्वनर आनंदीबेन हो या फिर हाल में दिल्ली की नवनिर्वाचित मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता।

अपने व्यक्तित्व को पुनः परिभाषित कर रही आज की भारतीय स्त्री सीमाओं को लांघ रही हैं और एक अधिक समावेशी, समतावादी समाज का निर्माण कर रही हैं। 2019 में चंद्रयान-2 का पूर्ण नेतृत्व भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन की दो महिला वैज्ञानिकों द्वारा किया जाना अपने आप में एक मिसाल है। वह स्थिति और भी क्रांतिकारी बन पड़ी जब सर्वाेच्च न्यायालय ने 2020 में सेना कमांडर के रूप में सेवा करने वाली महिलाओं पर सरकार की स्थिति को उलट दिया था। पहली बार 1992 में सशस्त्र बलों में महिलाओं को शामिल किया जाना। उनका लड़ाकू पायलट, लोको पायलट, परिवहन चालक, डॉक्टर, इंजीनियर, सिग्नलर्स, फैक्टरी संचालक आदि सहित कई पुरूष वर्चस्व वाले पदों पर काम करना लंबे समय से चली आ रही परंपरा को चुनौती थी। ये ऐसे उदाहरण हैं जहाँ भारतीय महिलाओं ने खुद को साबित किया है।

भारत में महिला सशक्तीकरण और समानता के दृष्टिकोण से यहां उतार-चढ़ाव दोनों नजर आते हैं। यहां लैंगिक असमानता को समाप्त करने के उद्देश्य से घरेलू नीतियाँ बनाकर, विभिन्न सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि की महिलाओं का समर्थन कर और कई परियोजनाओं पर राज्य सरकारों, स्थानीय गैर-सरकारी संगठनों और निजी निगमों द्वारा काम करने के प्रयासों के बावजूद वह फर्क नहीं नजर आ रहा, जो होना चाहिए। लैंगिक समानता के वैश्विक सर्वेक्षणों में भारत की रैंकिंग में पिछले कुछ वर्षों में सुधार दिखता है पर उसकी रफ्तार बेहद धीमी ही नजर आ रही जबकि भारत में महिलाएँ राजनीति, व्यवसाय, चिकित्सा, खेल और कृषि सहित सभी क्षेत्रों में उभर कर सामने आ रही हैं। 



Tuesday, February 18, 2025

समाजवादी आधुनिकीकरण को साकार करने हेतु चीन की नई शिक्षा नीति


 2035 तक शिक्षा के विषय में महाशक्ति बनने की तैयारी में बीजिंग


जनसांख्यिकीय परिवर्तनों के अनुरूप अपनी शिक्षा प्रणाली को अनुकूलित करने हेतु चीन शिक्षा सुधारों पर ध्यान केंद्रित कर रहा है। 2025 के राष्ट्रीय शिक्षा कार्य सम्मेलन में, शिक्षा मंत्रालय के अधिकारियों ने अपनी शिक्षा प्रणाली को जनसांख्यिकीय परिवर्तनों के अनुकूल बनाने, समानता बढ़ाने और नवाचार को बढ़ावा देने की योजनाओं की रूपरेखा तैयार की। देखना ये है कि ये सुधार कितने कारगर साबित हो पाते है।

सितंबर 2018 में, राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने राष्ट्रीय शिक्षा सम्मेलन में टिप्पणी की थी कि चीन का ध्यानक्षमतासे  ’गुणवत्तापर स्थानांतरित होना चाहिए, और शिक्षा के आधुनिकीकरण को चीन के आधुनिकीकरण का समर्थन करना चाहिए। जिसके बाद 2019 में, चीनी राज्य परिषद ने चीन के शिक्षा क्षेत्र में निरंतर सुधार और उन्नति के लिए दो महत्वपूर्ण योजनाएं प्रकाशित की, जो पूर्ववर्ती सुधारों की श्रृंखला पर आधारित थीं। इन दस्तावेजों के हिसाब से चीन कीशिक्षा आधुनिकीकरण 2035 योजनाऔर शिक्षा आधुनिकीकरण में तेजी लाने के लिएकार्यान्वयन योजना (2018-2022)’, का उद्देश्य मूलतः 2035 तक देश की शिक्षा प्रणाली को काफी हद तक आधुनिक बनाना, समाजवादी आधुनिकीकरण को साकार करना और चीन को शिक्षा का महाशक्ति बनाना निहित है।

वर्तमान में, चीन शिक्षा के आधुनिकीकरण के जरिए पारंपरिक सोच से आगे बढ़कर मजबूत शिक्षा का निर्माण करने वाले महान देश की अवधारणा का अनुसरण करने की आवश्यकता पर बल दे रहा है। ये सच है कि चीन के उदय के साथ, चीनी लोग अधिक सक्रिय, सक्रिय, खुले और उद्यमी बन गए हैं। चीनी नेता की सोच है कि नई शिक्षा नीति सेबेल्ट एंड रोडपहल में सक्रिय रूप से योगदान देगा; सभी देशों और अंतर्राष्ट्रीय संगठनों के साथ सहयोग को व्यापक रूप से मजबूत करेगा; खुलेपन के अर्थ को समृद्ध करेगा, साथ ही खुलेपन के स्तर और इसके अंतर्राष्ट्रीय प्रभाव को बढ़ाएगा; और मानव जाति के लिए साझा भविष्य वाले समुदाय के निर्माण में योगदान देगा।

एकशिक्षा शक्ति’, चीनी भाषा में कहे तोजियाओयू कियांगुओ’, बनने और 2035 तक अपनी शिक्षा योजनाओं का पूर्ण विकास हासिल कर लेने की चीन की महत्वाकांक्षा का परिवर्तनकारी रोडमैप चीन के शैक्षिक विकास को समाजवादी आधुनिकीकरण, तकनीकी नेतृत्व और वैश्विक प्रभाव के व्यापक उद्देश्यों के साथ जोड़ता है। गुणवत्ता, समानता और नवाचार पर जोर देकर, यह प्रणालीगत चुनौतियों जैसे जनसांख्यिकीय बदलाव, घटती जन्म दर और बढ़ती उम्र की आबादी जैसी सामाजिक समस्याओं से शैक्षिक सुधारों के माध्यम से निपटने में सहायता करता है। चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की केंद्रीय समिति और राज्य परिषद द्वारा 19 जनवरी 2025 को जारी, ‘शिक्षा शक्ति निर्माण योजना रूपरेखा 2024-2035’  में शहरी-ग्रामीण असमानताओं को कम करने, सभी नागरिकों के लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तक पहुँच सुनिश्चित करने पर ध्यान केंद्रित करते हुए समानता को विशेष रूप से रेखाकिंत किया गया है।

पूर्ववर्ती सुधारों की श्रृंखला में सर्वाेच्च प्राथमिकता शिक्षा रही

1966 और 1976 के बीच सांस्कृतिक क्रांति ने चीन की शिक्षा को गंभीर रूप से नुकसान पहुंचाया लेकिन 1977 से 1991 तक दुनिया भर के लिए खुलने वाली, एक नई सुधार नीति के साथ, शिक्षा के पुनर्निर्माण के लिए सर्वाेच्च प्राथमिकता बन गई। 1978 चीन के आधुनिक इतिहास में विशेष रूप से महत्वपूर्ण रहा है, क्योंकि इसने समाजवादी आधुनिकीकरण के रूप में सुधार के एक नए युग में प्रवेश किया। राष्ट्र सामूहिक रूप से सुधार और विकास के एक नए मार्ग पर चल पड़ा।  1978 से, चीन में शैक्षिक नीति ने मुख्य रूप से चार चरणों का अनुभव किया हैः- शैक्षिक व्यवस्था की पुनर्प्राप्ति और पुनर्निर्माण (1978-1984); शैक्षिक प्रणाली सुधार की कुल शुरुआत (1985-1992); बाजार अर्थव्यवस्था प्रणाली के सुधार का सामना करने वाली शैक्षिक नीति का समायोजन (1993-2002) और विकास पर वैज्ञानिक दृष्टिकोण (जू और मेई, 2009) के मार्गदर्शन में शैक्षिक नीति का नया विकास। ये सभी चरण शिक्षा प्रणाली में सुधार के उद्देश्य से संपन्न हुए।

जू और मेई (2009) ने बताया कि अर्थव्यवस्था के तेजी से विकास और नौ वर्षीय अनिवार्य शिक्षा की प्राप्ति ने नई सदी में शिक्षा के आगे के सुधार के लिए पर्याप्त आधार प्रदान किया, तो पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना के नेता देंग जियाओपिंग ने वैज्ञानिक और तकनीकी विकास की तलाश में चीन को पश्चिम से सीखने के लिए प्रेरित किया। समकालीन विश्व में परिवर्तनों और चीनी लोगों की अपेक्षाओं के प्रति बेहतर प्रतिक्रिया देने के लिए, चीनी शिक्षा प्रणाली में अभूतपूर्व सुधार शुरू हुआ। सुधार में पूर्व-विद्यालय शिक्षा से लेकर सतत शिक्षा तक सभी पहलुओं को शामिल किया गया है, जिसमें शैक्षिक उद्देश्य, शिक्षकों और शोधकर्ताओं की भूमिका और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग शामिल रहे। इस प्रकार, चीन की शिक्षा प्रणाली प्राथमिक शिक्षा, माध्यमिक और उच्च शिक्षा तथा वयस्क शिक्षा से लगातार बेहतर होती चली गई। निःसंदेह अब तक किए गये कई सुधारों ने चीनी शिक्षा में अभूतपूर्व सुधार हुए।

चीन के नई व्यापक शिक्षा की विशिष्ट विशेषताएं

यू तो यह योजना अपने व्यापक और दूरदर्शी दृष्टिकोण के कारण सबसे अलग है, जो शिक्षा के सभी स्तरों को कवर करती है और वैचारिक, तकनीकी और व्यावसायिक सुधारों को एकीकृत करती है। ये यह भी सुनिश्चित करती है कि शिक्षा का हर चरण, प्रीस्कूल से लेकर आजीवन सीखने तक, राष्ट्रीय विकास लक्ष्यों में योगदान दे। इसमें अविकसित क्षेत्रों में संसाधन वितरण और शिक्षक गुणवत्ता में सुधार लाने के उद्देश्य से बढ़ी हुई फंडिंग और पहल के साथ-साथ, शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों के बीच असमानताओं को कम करने की ओर भी खास ध्यान दिया गया है।

2035 को लक्षित इस योजना के तहत एक आधुनिक शिक्षा प्रणाली की स्थापना, गुणवत्तापूर्ण प्री-स्कूल शिक्षा में सार्वभौमिक उपस्थिति प्राप्त करना, 1 से 9 की उम्र के लिए उच्च गुणवत्ता और संतुलित अनिवार्य शिक्षा, 10 से 12 की उम्र के लिए वरिष्ठ हाई स्कूल में अधिकतम उपस्थिति की अनिवार्यता, व्यावसायिक शिक्षा में उल्लेखनीय सुधार करना, अधिक प्रतिस्पर्धी उच्च शिक्षा प्रणाली का निर्माण करना, विकलांग बच्चों/युवाओं के लिए पर्याप्त शिक्षा प्रदान करने के अलावा समाज की भागीदारी के साथ एक नई शिक्षा प्रबंधन प्रणाली स्थापित करने जैसे विचार को प्रमुखता दी गई है, जैसे केवल सरकारी सहायता पर निर्भर होकर सभी के योगदान से शिक्षा को हर घर तक पहुंचाना। इन लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए, 2035 की योजना में कईकार्योंकी पहचान की गई है, जिनमें शिक्षक की गुणवत्ता और शिक्षा के बुनियादी ढांचे (कानून, नीतियां, योग्यता ढांचा, मूल्यांकन और आकलन) में सुधार; असमानता को कम करना और शिक्षा तक पहुंच को सार्वभौमिक बनाना; आजीवन सीखने को बढ़ावा देना; और विशेष रूप से प्रीस्कूल और वीईटी पर ध्यान केंद्रित करते हुए सभी शिक्षा क्षेत्रों का आधुनिकीकरण करने जैसी अनिवार्यता शामिल हैं।

इस संबंध में ये बात गौर करने वाली है कि नेशनल क्रेडिट बैंक फॉर लाइफलॉन्ग लर्निंग ने अब तक 500 मिलियन से अधिक सीखने की प्रविष्टियाँ दर्ज की हैं, जो बताता है कि चीनी नागरिक को अपने कौशल ज्ञान को बढ़ाने या फिर पुनः कौशल अर्जित करने हेतु कितना उत्सुक हैं। यह व्यवस्था व्यावसायिक शिक्षा और आजीवन सीखने के लिए दी जाने वाली सुविधा के मजबूत ढांचे को रेखांकित करती हैं। कहने को तोडबल फर्स्ट-क्लासपहल ने अंतःविषय अनुसंधान को प्राथमिकता देकर और वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी विषयों को विकसित करके अपने प्रभाव का विस्तार किया है। यह भी प्रशंसनीय बात है कि 2024 तक, चीनी विश्वविद्यालयों में 100 से अधिक विषयों को, दुनिया भर में शीर्ष में से 50वां स्थान दिया गया, जिसमें पर्यावरण विज्ञान, सूचना प्रौद्योगिकी और बायोमेडिसिन जैसे क्षेत्र शामिल हैं।

नई शिक्षा योजना की प्रमुख चुनौतियाँ

फ़ुताओ हुआंग जापान के हिरोशिमा विश्वविद्यालय में उच्च शिक्षा अनुसंधान संस्थान में उप-निदेशक और प्रोफेसर हैं, अपने एक लेख में कहते है चीन को अभी अपनी इस महत्वाकांक्षी योजना को साधने के लिए कई चुनौतियों से पार पाना होगा, जिनमें से खासकर इन दो सबसे बड़ी चुनौतियों से। एक, चीन की घटती जन्म दर, जो 2022 में घटकर 1,000 लोगों पर 6.77 जन्म रह गई, और दूसरी, इसकी तेज़ी से बढ़ती उम्रदराज़ आबादी, जो 2035 तक 60 वर्ष और उससे अधिक आयु की आबादी का लगभग 30 हिस्सा होने का अनुमान है। ये एक ऐसी गंभीर समस्या है जो पीढ़ी दर पीढ़ी एक मज़बूत प्रतिभा पाइपलाइन को बनाए रखने के लिए कई चुनौतियाँ पेश करती हैं। शैक्षणिक संसाधनों, शिक्षक गुणवत्ता और बुनियादी ढाँचे के मामले में शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों के बीच अभी भी महत्वपूर्ण अंतर बना हुआ है। 2022 में, देश के प्राथमिक और माध्यमिक छात्रों में से आधे से अधिक को शिक्षित करने के बावजूद, ग्रामीण स्कूलों में चीन के शीर्ष स्तरीय शिक्षण स्टाफ का केवल 30 हिस्से का योगदान नजर आया। इसके अतिरिक्त, ग्रामीण स्कूलों में प्रति छात्र फंडिंग शहरी स्कूलों की तुलना में लगभग 60 रही, जिससे गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तक पहुंच में असमानताएं और बढ़ गईं। वर्तमान मूल्यांकन प्रणालियाँ अक्सर दीर्घकालिक नवाचार और सामाजिक प्रभाव की कीमत पर रैंकिंग और प्रकाशन गणना जैसे अल्पकालिक परिणामों को प्राथमिकता देती हैं।

यह पूरी तरह से स्पष्ट नहीं है कि चीन की नई शिक्षा नीति के भविष्य में किस तरह के बदलाव सामने आएंगे या आने वाले समय में चीन में शिक्षा का क्या स्वरूप होगा। क्या प्रोफेसरों की जगह एआई समर्थित रोबोट ले लेंगे या विश्वविद्यालय गायब हो जाएंगे या व्याख्यान के रूप में सूचना का पारंपरिक हस्तांतरण अतीत की बात हो जाएगी या फिर विश्वविद्यालय केवल ऑनलाइन पाठ्यक्रम प्रदान करेंगे, ये बात पूरी तरह से साफ नहीं है। फिर भी इतना तो कहा ही जा सकता है कि आधुनिक तकनीक, जैसे एआई के संभावित क्रांतिकारी प्रभाव के संदर्भ में चीन के शिक्षा आधुनिकीकरण 2035 और अंतर्राष्ट्रीय शैक्षणिक समुदाय के बीच कुछ तो अंतर होगा ही।

हालांकि यह भी देखने में आता है कि जब शीर्ष अंतरराष्ट्रीय प्रतिभाओं को आकर्षित करने की बात आती है तो चीनी विश्वविद्यालयों को कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। संयुक्त राज्य अमेरिका और यूनाइटेड किंगडम जैसे उन्नत पश्चिमी देशों के विश्वविद्यालयों की तुलना में, चीनी संस्थान अंतरराष्ट्रीय विद्वानों के लिए फिलहाल कम आकर्षक का केन्द्र बने हुए हैं। अंतर्राष्ट्रीय संकाय की दृष्टि से अमेरिकी विश्वविद्यालयों में कुल कर्मचारियों का लगभग 27 और यूके विश्वविद्यालयों में 19 है लेकिन चीनी विश्वविद्यालयों में 2021 तक यह मात्र 2 अंतर्राष्ट्रीय प्रतिनिधित्व के स्तर पर था।

अकादमिक स्वतंत्रता, नौकरशाही की अक्षमताओं और अंतरराष्ट्रीय विद्वानों के लिए सीमित समर्थन जैसी चुनौतियाँ भी वैश्विक प्रतिस्पर्धा में बाधा डालती हैं और इस बात को उच्च शिक्षा की उच्चतर स्थिति में एक बड़ी बाधा माना जाये तो अनुचित होगा।  अभी भी चीन के लिए शैक्षिक अनुसंधान को व्यावहारिक अनुप्रयोगों में बदलना एक चुनौती बनी हुई है। महत्वपूर्ण अनुसंधान उत्पादन के बावजूद चीन के 20 से भी कम विश्वविद्यालय अनुसंधान व्यावसायीकरण से पर्याप्त राजस्व प्राप्त करते हैं, जबकि संयुक्त राज्य अमेरिका और जर्मनी जैसे देशों में यह आंकड़ा 50 से अधिक है।

 निष्कर्ष

यकीनन यह योजना अपने व्यापक और दूरदर्शी दृष्टिकोण के कारण सबसे अलग है, जो शिक्षा के सभी स्तरों को कवर करती है और वैचारिक, तकनीकी और व्यावसायिक सुधारों को एकीकृत करती है। है। फिर भी अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए, नई योजना को लक्षित सुधारों के माध्यम से चीन को प्रमुख चुनौतियों का समाधान करना ही होगा। ग्रामीण शिक्षा और शिक्षक प्रशिक्षण कार्यक्रमों के लिए वित्त पोषण का विस्तार करके क्षेत्रीय असमानताओं को पाटने में मदद मिल सकती है। जैसा कि फ़ुताओ हुआंग अपने लेख में कोट करते है किसिल्वर एज प्रोग्रामजैसी पहलों को आगे बढ़ाने से शिक्षकों की गुणवत्ता में निरंतर सुधार सुनिश्चित होगा। इसके अलावा वीज़ा प्रक्रियाओं को सरल बना, अकादमिक स्वतंत्रता को बढ़ावा देकर और अंतर्राष्ट्रीय छात्रों के लिए छात्रवृत्ति में इजाफा कर चीन दूसरे देशों के विद्यार्थियों को उच्च शिक्षा लेने हेतु आकर्षित कर सकता है। फिर 2035 के अपने लक्ष्य संधान के लिए ये सब भावी योजना से इतर भी नहीं है। [ 

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