Friday, December 3, 2021

कतरन 1 / सोशल नेटवर्किंग के नक़ाबपोश चेहरे

जब आप पीछे मुड़कर देखते है और उसे वर्तमान स्थिति से तौलते है तो समाज को कहीं अधिक वीभत्स रूप में पाते हैं। अब वह चाहे भारतीय समाज हो या विदेशी सरजमीं-सोच, भीड़ कुछ भी पूर्व से बेहतर नहीं पाते। दस वर्ष पूर्व लोकमत समाचार पत्र (12 अगस्त, 2011) के संपादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित इस लेख में सोशल मीडिया को हथियार की तरह इस्तेमाल करने का तरीका आज भी वैसा ही हैं। कसते नेटवर्किंग साइट के नियम-कानूनों के बावजूद इनकी धज्जियां उड़ाने में छद्म नाम आज भी समाज का चेहरा बिगाड़ने के लिए निरंतर एक्टिव 

बीते चार दिनों से लंदन में चल रहे दंगाई बवाल को तो फिलवक्त शांत कर दिया गया है किंतु मैनचेस्टर, सैलफोर्ड, लिवरपूल, वुलवरहैम्टन, नॉटिघम, लिसेस्टर, ग्लेसेस्टर, ब्रिस्टल और मिडलेड अभी भी पगलाई हिंसा के शिकार हो रहे हैं। बर्किघम में भड़की इस चिंगारी को ब्रितानी सरकार की 16000 अतिरिक्त पुलिस फौज भी नियंत्रित नहीं कर पा रही है। दुनिया की बेहतरीन पुलिस माने जाने वाली स्काटलैंड यार्ड भी इस बार हो रहे दंगों को सबसे मुश्किल दंगा मान रही है। आधुनिक संचार प्रणाली को अपना ढाल और हथियार बना चुकी दंगाई भीड़ को पुलिस के लिए भी काबू कर पाना मुश्किल हो रहा है। नक़ाबपोश चेहरों के पीछे कौन है, उसकी मंशा क्या है-ये जाहिर नहीं हो पा रहा। बेमकसद हो रहे इन दंगों के पीछे सिर्फ हैवानियत भरे चेहरे काम कर रहे है। ये वे लोग वे है जो सिर्फ शगल करना चाहते हैं। दिशाहीन  है, खुद से नाराज हैं और अपनी असफलताओं का ठीकरा समाज पर फोड़ना चाहते है। ओछी हरकत और अभद्र व्यवहार इनकी पहचान है। ये ऐसे लोग है जो हर देश-काल-समाज में आपको नज़र आते हैं। इनके कोई नाम नहीं होते और चेहरे नक़ाबदार होते हैं। ये फेसबुक और ट्वीटर के फर्जी सदस्य है, जिन्हें समाज को कुछ देने के लिए नहीं खपना है बल्कि उनसे लेने का पूरा हिसाब करना है। सही फरमाते हैं ब्रिटिष प्रधानमंत्री डेविड कैमरून कि ब्रिटेन का समाज बीमार हो चुका है। जिस रक्तिम लाल चेहरे के साथ कैमरून ये बात कह रहे थे, उससे साफ जाहिर हो रहा था कि ब्रिटेन में हो रहे दंगों की विक्षिप्त मानसिकता को लेकर वह बहुत आहत है। उनकी इस बात में भी दम है कि समाज में जबावदेही की भी कमी होती जा रही है।


डेविड कैमरून की बात सुनकर 1984 के उन दंगों की याद ताजा हो आजी, जब भारतीय प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद किसी एक की जलाई तीली ने देश भर में सांप्रदायिकता की आग को भड़काने का घृणित काम किया था। उस वक्त पर भी तत्कालीन अंतरिम प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने कड़क लेकिन ठोस स्वरों में बवालियों को यह संदेश दिया कि इस तरह की गुस्ताखि़यां किसी भी हालत में बर्दाश्त नहीं की जाएगी। बावजूद इसके भीड़ में छुप कर वार करते इन नक़ाबपोश लोगों को रोक पाना सरकार-सेना दोनों के लिए ही असंभव सा हो रहा था। भारत में तो दंगे भड़का देना ऐसे नक़ाबपोश चेहरों के लिए बहुत मुश्किल काम नहीं है और ये बात यहां के अराजक तत्व भलीभॉंति जानते है। सर्वधर्म समभाव की भावना वाले इस देष में बहुत सारे ऐसे लोग भी है जो ऐसे मौकों की तलाष में रहते है।

दरअसल तकनीक के गलत इस्तेमाल ही 9/11 या फिर 26/11 जैसे हादसे जन्म लेते हैं। आतंकवादी गतिविध्यिों में मिशन को अंजाम देने के लिए आतंकी सेटेलाइट के जरिए एक-दूसरे से बिना किसी की नज़र में आये संपर्क में बने रहते हैं और सुरक्षा एंजेसियों की नजरों में धूल झोंक कर अपने काम को अंजाम देते हैं। लंदन में लगी आग को जगह-जगह फैलाने में फेसबुक-ट्वीटर जैसी सोशल नेटवर्किंग साइट ने खूब मदद की। ब्लैकबेरी स्मार्ट फोन तकनीक के मैसेजर सेवा ने दंगाइयों के साथियों को इकट्ठा करने, उन्हें समय-स्थान की सूचना देने में जो भूमिका निभाई उसने इस चिंगारी को आग में बदलने का काम किया। फिर तो इस आग ने दूर-दराज के इलाकों को भी अपनी गिरफ्त में लेने में देर नहीं की। यहॉं तक कि पुलिस के लोकेशन की जानकारी भी त्वरित गति से संदेश पहुंचाने वाली तकनीक के जरिए साथियों को दी जाती रही। यही वजह रही कि लंदन पुलिस के निश्चित तय स्थान तक पहुंचते-पहुचते दंगे दूसरे इलाकों में शुरू हो जाते। सुरक्षा एंजेसियों की पहंुच से दूर पब्लिक डोमेन और मोबाइल संचार तंत्र ने अनजाने में ही सही, अराजक तत्वों के हाथ में ऐसे हथियार दे डाले, जो देश-दुनिया के किसी भी कोने से सुंदर-सभ्य समाज का चेहरा कुरूप कर सकते है। यही कारण था कि कैमरून समाज के उन लोगों की जवाबदेहियों पर सवाल खड़ा कर रहे थे जो महज बाज़ार को अपने काबू में रखने के लिए उपभेक्तावादी संस्कृति को बढ़ावा दे रहे है।

किसी भी उत्पाद को बाजार तक पहुंचाने और उस पर अपना वर्चस्व कायम रखने की होड़ की दौड़ में उसके नकारात्क पहलुओं पर सोच को तो जैसे तिलांजलि दे दी गई है। तमाम तरह के आधुनिक हथियारों से लैस पुलिस फोर्स और सुरक्षा एंजेसियां होने के बावजूद लंदन इस वक्त इन बवालियों के आगे चारों खाने चित्त पड़ा है। ऐसे में भारत के लिए भी चिंता का विषय कम नहीं है, जो यू ही कई तरह के बाहरी और आंतरिक चुनौतियों को भिड़ रहा है। यहां बवाल भड़काने वालों की तादाद और मंशा लंदन के इन बवालियों से कहीं ज्यादा बलवान है। लंबे समय तक ब्लैकबेरी को भारत में लाइसेंस न दिये जाने के पीछे उसका सुरक्षा एंजेसियों के दायरे से मुक्त होना रहा। इसलिए यहां भी वहीं समाज के प्रति जबावदेही वाली बात आती है। आज भारत में कम से कम 11 लाख लोगों के पास ऐसा आधुनिक संचार उपकरण है जिस पर देश की कोई एंजेसी किसी तरह की निगरानी नहीं कर सकती। जाहिर है यह बात उन राष्ट्रविरोधी ताकतों को लुभाएगी जो सुरक्षा एंजोसियों की ऑंख से बचकर काम करना चाहते है।

2012 के ओलंपिक मेजबानी की तैयारी में लगे लंदन को इन हालातों पर काबू पाने के लिए ही नहीं जूझना होगा, साथ ही यह दोबारा न हो, इसके लिए इसकी जड़ों को ही खोद कर उसमें मट्ठा डालना होगा। वरना खेल के इस महा उत्सव में भाग लेने आने वाले प्रतिभागियों को ऐसे बवालों के फिर से होने का डर सालता रहेगा। चूंकि ब्रितानी इतिहास दंगों से भरा पड़ा है और 2011 के इन दंगों की एक और कड़ी जुडने से कई दिनों तक इससे लगे घाव भी दुखते रहेगें। इसलिए कैमरून के उन शब्दों को नजरअंदाज किए बगैर अपनी-अपनी जबावदेही के लिए आगे बढ़ना ही होगा। लेकिन ब्रिटिष प्रधानमंत्री हो या अन्य किसी देश के प्रधानमंत्री-उन्हें भी यह समझना होगा  कि तेजी के साथ बदलती मानसिकता से ग्रस्त विद्रूप होते समाज के चाल-चलन को सुधारना है तो सबसे पहले देश के नीति-नियंताओं को अपनी नीतियों में फेर बदल करना होगा। कहने का मतलब है सबसे पहले उन्हंे ही अपनी जबावदेही तय करनी होगी। फिर कहीं उनके द्वारा संचालित या नियंत्रित संस्थाओं को नैतिक मुल्यों के सममान की आदत डलवानी होगी।

मार्क जुकरबर्ग जैसे सोशल नेटवकिंग साइट डेवलप करने वालों को इस तरह की साइट बनाते वक्त उसके सकारात्मक पहलुओं पर काम करते वक्त उसके नकारात्मक पहलुओं पर भी अपनी जबावदेही को समझना होगा। ब्लैकबेरी जैसे संचार उपकरण बनाने वालों भी बाजार की जरूरतों को ध्यान में रखते समय अपनी जबावदेही को प्रमुखता से जगह देनी होगी जिससे उत्पाद के विनाशक  या दुरूपयोग होने की गुंजाइशों पर भी काम किया जाये। सरकारों को पब्लिक डोमेन के अलावा इन संचार उपकरणों के लिए कुछ कठोर नीतियां लागू करनी होगी और अराजक तत्वों को भी ये संदेश देना होगा कि सभ्य समाज में रहने के भी अपने कुछ क़ायदे-का़नून है और इसमें रहने वालों को अपनी हद में रहना होगा। अपनी बात कहने का हक़ हर नागरिक को है, किंतु उसको कहने के तरीके सीखना जरूरी है। स्थिर, मौन किंतु ठोस आचरण ही दूर तलक बात का असर करता है। और यह बात दूसरो को समझाना ही नहीं स्वंय भी समझनी होगी।

Sunday, November 7, 2021

हक़ीक़त क्या और सियासत क्या के फेर में उलझा मैं

                                             [एक मतदाता का खुला पत्र मुख्यमंत्री के नाम ]                                  



आदरणीय मुख्यमंत्री जी,

आपके नेतृत्व में चले उत्तर प्रदेश सरकार के शासन के कुछ ही दिन शेष बचे है। इस वक्त जिस तेजी से योजनाओं के रिबन काटे जा रहे है, यकी़नन ये मतदाता को लुभाने के लिए अधिक है। ऐसा आप ही कर रहे है ऐसा कहना भी उचित नहीं होगा। चुनाव से पूर्व ये नज़ारे देखने को अक्सर मिल ही जाते है कि मेरे जैसा तर्कसंगत मतदाता भी एकबारगी इन कागज़ी दावों पर क्षण भर के लिए यक़ीन कर बैठता है। दुष्यंत कुमार की निम्न पंक्तियों में कहूं तो ऐसे नादान मतदाताओं से पूरा प्रदेश भरा पड़ा है जो सियासत की फरेबी चालों को समझ नहीं पाता-

मस्लहत.आमेज़ होते हैं सियासत के क़दम
तू न समझेगा सियासत तू अभी नादान है

फिलहाल तो आज मैं भी आपसे कुछ अपने मन की बात करना चाहता हूं। आप इसे अन्यथा न लेगें मुझे इसका भरोसा है। मुझे हमेशा से लगता रहा कि हमारी व्यवस्था में ही कुछ ऐसी बुनियादी गड़बड़ी है जिससे अच्छे-भले लोग भी जो करने आते है वह कर नहीं पाते। आपको साल भर काम करते देखकर समझ आया कि परंपरागत चल रही शासन की विचारधाराओं में जड़ें जमाना और आती परिस्थितियों की आंधी को झेलना या एक नई विचारधारा में खुद को ढालने की कोशिश करना क्रांतिदर्शी मनीषियों का प्रयास तो हो सकता है पर सरकार को बनाये रखने या उसे लंबी आयु देने का राजनीतिक धर्म कतई नहीं हो सकता। सत्ता में आने पर अपनी विचारधाराएं लागू करने या फिर क्रांति ला देने की बड़ी-बड़ी बातें अब फ़िजूल की खूंटियों की तरह ही लगती है। जो सिर्फ लटकाने भर का ही काम करती रही है। सबसे बड़ी चीज होती है व्यवहारिकता, जिनके नतीजे सामने होते है और आज की तारीख़ में देखे तो ये व्यवहारिकता भी पारदर्शी और जबावदेह सरकार के ब्रोशर भर ही है। कहते है हाथ कंगन को आरसी क्या, पढ़े-लिखे को फारसी क्या। जब यकीन से जनता का दर्द समझकर आपने उसे दूर कर ही दिया तो शब्दों की चाशनी में भिगोए, आंकड़ों के जाल से बुने रंगीन फोल्डर बेमानी हो जाते है। राज्य के प्रत्येक नागरिक की खुशहाली ही आपके सफल शासन का आइना बन जाती है। ऐसे में विपक्ष लाख ख़्याली पुलावों की थाली परोसे, मतदाता की हालिया  शासन से आत्मसंतुष्टि और शासक के प्रति निष्ठा ही उसे किसी और का चुनाव करने से रोकती है।

माननीय! आकंडों की सत्यता हम सब जानते है। एक मूर्ख व्यक्ति ही इसके बहकावे में आ सकता है। और इस देश का मतदाता तो महामूर्खों की श्रेणी मंे ही आता हैे। बुद्धिजीवी वर्ग या इसकी काट करने वाले अपने-अपने स्वार्थ की बेड़ियों में जकड़े है। उनको इसकी सत्यता को परखने का कोई अरमान नहीं। इस परखने से ज्यादा उन्हें अपनी नौकरी अपने फायदे की पोटली प्यारी है। लेकिन इसमें उनका दोष भी नहीं। अपने आसपास चुप की जाती ज़ुबानों को देखकर वे ऑंख में पट्टी बांधना ही श्रेयकर समझते है। लेकिन मैं आपका एक ऐसा मतदाता हूं जो अपने पसीने की कमाई पर ही जीवित हूं। तो अब नही ंतो कब अपना दर्द आपसे कहूंगा। आप कहते है कि आपने नौकरी एवं रोजगार सृजन को सर्वोच्च प्राथमिकता दी है। आपके सरकार के प्रशस्ति पत्र के अनुसार बेरोजगारी की दर जो वर्ष 2017 में 17.5 प्रतिशत थी आपके सुशासन के मार्च 2021 के कार्यकाल तक आते-आते घटकर 4.1 प्रतिशत रह गई। संभवतः मैं और मेरे जानने-न जानने वाले कई लोग इसी 4.1 प्रतिशत में रह गये। हम में से कई 2014 के बाद से बेरोजगारी का रोना रो ही रहे और कर्ज़ की जिं़दगी जीने को मजबूर है। इनमें से कुछ तो कोविड के शिकार हो गये और कुछ ने अपनी गरीबी से तंग आकर आत्महत्या तक कर ली। बाक़ी बचे उम्मीद की छूटती डोर को अभी तक पकड़ के बैठे है जिनमें से एक मैं भी हूं। अब आप ही बतायें इस उम्मीद के भरोसे जीने को मजबूर मैं ये कैसे मान लूं कि प्रदेश में रोजगार की धारा प्रवाहित हो रही है।

आप दावा करते है कि प्रदेश देश में दूसरी बड़़ी अर्थव्यवस्था बन गया है। प्रति व्यक्ति आय दुगुनी गई है। मैं समझ नहीं पा रहा कि इस बात पर गर्व करूं या इसका रोना रोऊं। क्योंकि नोटबंदी के बाद से कई छोटे-मोटे घंधे यू भी बंद हो गये थे। क्योंकि ये अधिकतर ब्लैक मनी से ही चलाये जाते थे। जाहिर है इसके कारण काम भी बंद हुए और नौकरियां तो जानी ही थी। करोना के बाद तो कमजर्फ़ मालिकों की बन आयी। उन्होंने स्टाफ तो कम किया ही प्रति व्यक्ति वेतन भी कम कर दिया। क्या स्कूल, क्या मीडिया, क्या फैक्टरी और क्या दूसरे सेक्टर। सभी ने आय में कटौती कर दी। कितने ही साथियों ने कंपनी छोड़कर कर्ज़ लेकर अपना काम डालना आरंभ किया। मैं अपनी अज्ञानता के लिए आपसे क्षमा चाहूंगी पर इसका कोई प्रमाण मुझे तो नज़र नहीं आता। हर तरफ हाहाकार मचा रहता है। ये सच है हम फिर भी जी रहे है और कर्ज़ की पी रहे है। करोना के चलते अगर कोई सेक्टर फला-फूला तो वह फार्मा सेक्टर रहा और चांदी हुई तो आक्सीजन, आक्सीमीटर और एम्बुलेंस चलाने वालों की। 

माननीय! आप बेहतर जानते है कि कोई भी जीवन पद्धति और विचार-धारा अपनी जमीन, हवा, पानी, अपने वातावरण और अपने आसमान की देन होती है। उसकी अच्छाइयां लेकर बुराइयों का त्याग नहीं किया जा सकता। सभी जीवन पद्धतियां और विचारधाराएं अपने पूरे गुण दोष के साथ ही स्वीकार या अस्वीकार्य की जानी चाहिए। लेकिन यह भी एक कड़वी सच्चाई है कि कोई भी राज्य या फिर देश उस रास्ते पर चलकर सफलता, सार्थकता, मुक्ति या मोक्ष नहीं पा सकता जो पूरी तरह से उसका अपना न हो और मतदाता मात्र एक अंक भर नहीं कि उनका जोड़-घटाव कर अपने खेमे की मजबूती का आंकड़ा तैयार किया जाए। बदलती सत्ताओं से त्रस्त मतदाता खुद अब एक गिनती या जाति के रूप नहीं बल्कि राज्य के एक सम्माननीय नागरिक के तौर पर अपनी पहचान चाहता है। उसके वाजिब अधिकार को वायदों के प्रपत्र के बजाय नागरिक के मूल अधिकार के नाम पर बिना किसी हील-हुज्जत के मिलते देखना चाहता है।

मुख्यमंत्री महोदय! विकास की मीनारें और संसाधनों के भंडार किसे नहीं लुभाते। लेकिन मुझे लगता है कि विकास की होड़ में अपनी हैसियत से ज्यादा उसका ऐसा पहाड़ खड़ा करने की कोशिश नहीं की जानी चाहिए कि आम आदमी का दम घुटने लगे। आखिर बोझ तो घूम-फिर कर उसी पर आता है। आवश्यकता देश के हर नागरिक को सेहतमंद और खुशहाल रखने की होनी चाहिए। इसके लिए जरूरी है कि उसकी बेसिक आवश्यकताओं का टोटा न हो। स्वास्थ्यवर्धक और सस्ते अनाज उसका मौलिक अधिकार हो। चिकनी सड़कें, अनवरत बिजली सप्लाई और स्वास्थ्यवर्धक पानी हर वर्ग की सुविधा का एकमात्र लक्ष्य माना जाए। सुस्ंास्कारी शिक्षा देने का मानक सभी के लिए एक जैसा हो। भयरहित समाज की कल्पना मात्र कोरी न लगे। गरीब के लिए अन्न भंडार और भोजन केन्द्र की बात फाइलों से बाहर हक़ीकत में उतरे। जाति भेद, वर्णभेद की रोटी सेंकने के बजाए ऐसा देश-काल हो जो दूसरों के लिए मिसाल बनें। आपके शुरूवाती क़दमों से ऐसे ही भयरहित समाज की उम्मीद जगी थी लेकिन अंतिम वर्ष के आते-आते ये भी एक छलावे में तब्दील हो गई। 

गीता में भगवान का कहा मेरे कानों में गूंज रहा- तू तो निमित्त है; करने वाला मैं हूं, फल भोगने वाला मैं हू और मैं ही मरता-जीता और मारता हूं; इसलिए सारा सोच-विचार छोड़कर मेरी इच्छा का निमित्त हो जा। लुब्बे-लुबाब यह कि मैं भी सत्ता-शासक वर्ग के लिए एक निमित्त मात्र भर होता जा रहा हूं। जिसका इस्तेमाल जरूरत के लिए होता है और फिर चंद लुभावने वायदों के रहमोकरम पर सत्ता के अहसान के बोझ तले मैं अगले पांच सालों तक घुटन भरे माहौल में जीने को मजबूर होता हूं।

मुक्तिबोध ने कहा था सूखा हुआ टूटा पत्ता हल्की सी हवा में किसी भी तरफ उड़ जाता है। लेकिन गहरी जड़ों वाला वटवृक्ष तूफान में एक से दूसरी तरफ झुकता हुआ भी उखड़ता नहीं। आपसे मेरा विनीत आग्रह है आपसे बन पड़े तो हमारे लिए बड़े-बड़े वायदों की गठरी नहीं बल्कि मूल अधिकारों जैसे बेरोजगारी, स्वास्थ्य, शिक्षा, सस्ते अनाज-साग-सब्जी के साथ-साथ बिजली-पानी-सड़क और शहरों की बदहाल दैनदिनीं व्यवस्था को डंके की चोट पर ठीक करने का ऐलान करिए। मुझे पूरा यकीन है निर्भय-निष्पक्ष सत्ता के दंड को लेकर जिस क्षण से आपने अपनी इन घोषणाओं को भरोसे के धरातल पर उतारा, उस दिन से जाति-धर्म के नाम पर वोट-वोट करने वालों के लिए आपसे बढ़कर चुनौती और कुछ नहीं होगी। आप मुक्तिबोध के उसी वटवृक्ष की तरह हो जाएगें जिसे हिलाया तो जा सकता है पर उखाड़ा नहीं।

सादर।

आपका एक मतदाता । 



Saturday, October 2, 2021

'अनृत' से 'अनर्थ' के बीच झूलती राजनीति और मंदबुद्धि मतदाता



‘विकास की लहर‘ और ‘पारदर्शी सरकार‘ का दावा करने वाले भूल जाते है कि काम अपने-आप में बोलता है। उसे रंगीन छपे चिकने कागज़ पर उतारने की आवश्यकता नहीं। वह साक्षात नज़र आता है, उसके लिए डमी या नाटकीय पात्रों या बड़े-बड़े साइन बोर्डों की आवश्यकता नहीं होती। चुनाव के दौरान उसका रेचन करना खुद के गढ़े अनृत की पोटली को सत्यापित करने जैसा ही लगता है। क्योंकि जगमगाते रोशनी से नहाये शहर को छोड़ते ही इसकी सत्यता की पुष्टि अपने नग्न स्वरूप में सामने नज़र आती है। फैलती भयावह बीमारी के दौरान महज स्व-स्वार्थवश देर से लिए गये निर्णयों से मौत की चादर से जमीन को पटते जिसने देखा हो, करूण विलाप के चीत्कारों की आवाज से जिनके हृदय अभी भी दग्ध है, उस जनता के दर्द को सहानभूति से ज्यादा राजनैतिक इस्तेमाल की वस्तु समझकर उसका प्रचार-प्रसार करना मानवता की हत्या ही तो है। पर हाय री! भारत की अबोध अनपढ़ गरीब जनता 500 रूपल्ली और 5 किलो अनाज के लिए सात खून भी माफ़ कर देने में क्षण भर को नही हिचकिचाती।

इसमें कोई संदेह नहीं इसमें कि जनता की याददाश्त ज्यादा पीछे तक नहीं जाती। इसीलिए अक्सर कई विकास कार्यों के बटन चुनाव से छहः महीने पहले ही फटाफट दबाये जाने लगते है। अब कमजोर लेकिन असल भारतीय मतदाता इतना जागरूक और तर्कसंगत भी नहीं कि सत्ता पक्ष के नेपथ्य में लिखी जा रही स्क्रिप्ट के मजमूं को समझे या अचानक से ही अंगुली करते विपक्ष के मनोभावों को ताड़ सके। अर्द्धसत्य पर गढ़े जाते चुनावी मुद्दों से लेकर विकास के लॉलीपॉप तक की यात्रा को वह एक बटन को दबा देने भर के अपने हक़ूक़ी फर्ज़ पर छोड़, रोज़ की दाल-रोटी के इंतजाम में दिमाग खपाने को ही अपने कर्म की इतिश्री मान लेता हैं। जी, यही है असल मतदाता जिसे फुसलाना हुक्मरानों को भलीभंाति आता है। बाकी तो सेंटिग का खेल ही है जो उच्च किस्म के राजनीतिक पंडों-पार्टियों के बीच खेला जाता है। शंतरज की इस बिसात में बहुत हद तक चुनाव नतीजों के आने से पहले ही शह-मात की सेंंिटग हो जाती है। मतदाता का रोल और उसकी आवश्यकता भी यही आकर समाप्त हो जाते हैं। 

मुद्दे से थोड़ा अलग होकर इसी राजनीति के लेटेस्ट तांडव का जिक्र करना जरूरी है, जहां मतदाता की सोच भी अपनी-अपनी पार्टी की बयानबाजी पर निर्भर होते देखी। पार्टियों के खेल समझने के बजाय जाति-धर्म के नाम पर ठगी जाती जनता सिक्के का वही पहलू देखती है जो उसे दिखाया जाता है। लखीमपुर खीरी में हुए अनर्थ को पार्टी नज़रिए से देखने की जगह उसकी सत्यता जानने की उपक्रम नहीं किया गया। किसी ने जानने की चेष्टा न कि किसान का मुद्दा जाति विशेष पर क्योंकर चला गया?  लोगों की निर्मम हत्या हो गई। उस हत्या पर सबने अपनी-अपनी रोटी सेंकनी शुरू कर दी। राजनीति करने वाले भूल जाते है कि देश में करोड़ों किसान आज भी गरीबी रेखा से नीचे जी रहे है। उन्हें इस राजनीति से कोई सरोकार नहीं। उसके लिए दो जून रोटी की ही चिंता से मुक्ति नहीं मिलती। किसान बिल पर हंगामा काटने वालों के पीछे भी राजनीति चालें ही है। आग भड़की रहे स्वार्थ पूर्ति होने तक बस। फिर कौन किसान, कैसा किसान!

यहीं पर मतदाता सवालों के घेरे में खुद आ जाता है जो राजनीति पर बात तो करेगा लेकिन अपनी असुविधाओं को वाणी देना नहीं सीखेगा-विशेषकर शासक वर्ग के सामने और फिर जब आज जैसा शासकवर्ग हो तो क्या कहने? ऐसे जनसेवक के मुख्यद्वार से आगे जाने की भी हिम्मत नहीं होती गरीब बेकस मतदाता की। या कह लें उसके लिए 4 साल तक ये द्वार ग़ाहे-बग़ाहे ही खुलते है। उसकी विपदा ये है कि उसका तो राम भी यही है, रावण भी यही! अब ऐसी भोली मूर्ख जनता को छलना कौन सी बड़ी बात है। ऐसी जनता को जगाना भी आसान नहीं होता क्योंकि इसके भी उसके तय मानक है। जैसे गत दिनों एक उबर डाइवर से, जिसका नाम अल्ताफ था, मैंने यूं ही चलते-चलते जिक्र छेड़ दिया कि भइया! चुनाव आ रहे है। किस पार्टी को वोट देने का सोच रहे। इस बार तो आप पार्टी भी सारी सीटों से चुनाव लड़ रही और उसने बिजली 300 यूनिट तक फ्री देने की घोषणा भी कर दी है। तो उसका जबाब था कि, पहले तो देखेंगे मैडम हमारे इलाके में कौन उम्मीदवार खड़ा हो रहा है। अब जिससे रोज़ का मिलना जुलना हो और हमारे काम भी आ रहा है तो बिला शक़ उसी को वोट देगें। लेकिन जैसा कि आपने कहा अगर कोई पार्टी हमारी रोज की जरूरतों पर इनायत फरमाने को तैयार है तो हम उसके बारे में सोच सकते है। 

यही है हमारी वह जनता जो ग़रीबी-रेखा से नीचे जी रही है। इनकी सोच यहीं तक सीमित है। किसी ने ठीक ही कहा है-जन क्रांतियां जन-जागृति से संभव है और उसकी आकांक्षा जनता के भीतर से उत्पन्न होती है। ऊपर से थोपी हुई क्रांतियां निष्फल रहा करती है। देखा ये गया है कि इस कार्य के लिए भी वह जिन निःस्वार्थ और बुद्धिजीवी समझे जाने वाले वर्ग की आवाज़ का सहारा लेकर वह अपनी पीड़ा को सत्ता के पीठासीन अधिकारी तक पहुॅंचाने की कोशिश करता है वह स्वंय ही राजाश्रय प्राप्त कर अपने स्वर्णजटित पिंजरे के भीतर से फड़फडाने का अभिनय मात्र करता है। इसका उदाहरण मीडिया से बेहतर और क्या होगा? सत्य कड़वा है लेकिन वर्तमान मीडिया इसी कर्म में लिप्त है। हालात ये है कि सालों से मूर्ख बनाई जाती जनता भी पांच साला सरकार के अंतिमवें वर्ष में विन्रमता की मूर्तियों में तब्दील होते नेताओं के दिव्य दर्शन की आदी हो चुकी है। जबकि इस तरह के कटाक्ष की आवश्यकता नहीं होती अगर सही मायनों में सत्ता हासिल होते ही जनता का हित एक पल को न भुलाया जाता। उन्हें बिजली-पानी-सड़क-भर पेट राशन जैसी मूल सुविधाओं के अधिकार को सहानूभूति की तरह न बांटा गया होता।

हालांकि चुनाव को सब चीजों का आदि और अंत मान लेना भी लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं। लेकिन अगले पांच साल की सत्ता के लिए कराये जाने चुनावों के विकृत हो चुके महत्व के कारण ही विधायक या सासंद पांच साल बाद ही अपना मुॅंह अचानक ही बार-बार दिखाने लगते है। जिस गरीब जनता को वह दुत्करते फिरते है उन्हीं की चरण वंदना की फोटो सोशल मीडिया पर नज़र आने लगती है। सरकार की नीतियां-परियोजनाएं की फाइल्स भी टुकड़ों में काम करती हैं। आज भूमि पूजन होगा तो साल भर बाद शिलान्यास फिर कहीं जाकर पांचवें साल में ग्राम्य या क्षेत्र विकास की एक झलक देखने को प्राप्त होगी। 

विडंबना ये है कि सारी फसाद की जड़ वह धारणा है जो दर्शाती है कि वोट देकर सरकार बनाना और वोट लेकर सरकार बनना ही लोकतंत्र की एकमात्र कारवाई भर है। भारतीय मतदाता एक बार वोट देने के बाद सरकार की तरफ ही टुकुर-टुकुर देखता रह जाता है कि अब जो करना है सरकार को ही करना है। जहां तक विपक्ष का सवाल है वह नुक्ताचीनी करने के अलावा खुद से कोई ठोस क़दम नहीं उठाता। सरकार की नाक़ामी पर थू-थू करना और प्रशंसनीय कार्य को चुनावी हथकंडा कह देना बड़ी सहजता से हो जाता है। कोरोना के ग्रहण के समय जब दोनों पक्षों को एक साथ काम करना चाहिए था तो घरों में अपनी जान बचाते विपक्षी सरकार की व्यवस्था पर तंज कस रहे थे। लंबे समय से सत्ता की पारी खेलते लोगों को अगर ये बताना पड़े कि कब बोलें और कब चुप रहे तो यह भारतीय राजनीति के लिए शर्मनाक है। सत्ता पक्ष के हर कार्य सराहनीय हो जरूरी नहीं लेकिन विपक्ष की उठती हर अंगुली भी उचित हो ये भी सही नहीं। और न ही दोनों पक्षों के लिए यह भूलना सराहनीय कहा जाएगा कि जिस जनता से वे सत्ता सुख भोग रहे उसे अपने मात्र स्वार्थवश याद किया जाये। 

हर बार मतदाता रामराज्य की कल्पना से कभी ये तो कभी वो बटन दबाता है। लेकिन यह कल्पना आज के सत्ताभोगियों के बीच करना बेमानी है। रामनामी दुपट्टे में लिपटी सत्ता मंदिर तो बना देगी लेकिन पेट की बढ़ती ज्वाला को मंहगाई से लगी आग से, राख में बदलने से न रोक पाएगी। वोटर को महज मजहब के चश्में से देखने वाली सत्ता अधिक दिन मजहबी टोपी के सहारे भी जनता को मूर्खता के वायदों की चाशनी न खिला सकेगी और न ही दलित उत्थान के नाम पर फक़त झूठ का घोल पिलाने वाली सत्ता बराबरी का दर्ज़ा या सामाजिक परिवर्तन की बयार ला सकेगी। कुल मिलाकर बात ये है कि कोई भी पार्टी एक चुनाव जीतकर जनता के सिर पर बैठ जाए और अपनी मनमर्जी करने लगे ये अधिकार उसको नहीं दिया जाना चाहिए। जब तक जनता और नागरिक संस्थाएं अपनी जिम्मेदारियों को नहीं समझेगी या लोगों को संगठित कर, इन पांच साल के लिए शासक बन बैठे माननीयों के खिलाफ, कोई सीधी कारवाई करेगीं तब तक कुछ नहीं हो सकेगा। और यह भी सत्य है कि सरकार किसी की भी बनें, वह तो वहीं करेगा जो उसको रास आता है।

इसलिए मेरा मानना है कि जनता को भी यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि वह इस चुनावी रण में वह कृष्ण है जो दोनों पक्षों को सबक सिखाने मैदान में उतर रहा है और वह ही अर्जुन भी जो अपनी तर्जनी के उपयोग से लक्ष्य भेद भी कर रहा है। मतदान का ये एक दिन सिर्फ उसका और उसका है। उसे अपने भारतीय होने पर गर्व होना चाहिए। हर धर्म-मज़हब-जाति-वर्ण से उठकर अपनी भारतीयता की जात को ऊपर रखना चाहिए। कही-गढ़ी या बुनी गई बातों में भेद कर तर्कसंगत चयन द्वारा ही अपने चुनावी अधिकार का उपयोग करना सीखना होगा। तभी वह एक जागरूक मतदाता का फर्ज निभा सकेगे। अगर उसे लगता है उसके साथ गत पांच साल में छल-कपट किया गया है तो इस अनृत से अनर्थ की यात्रा का हिसाब बराबर करने का यही उचित समय है।

















Friday, October 1, 2021

क़ुदरत


अक्सर मुग्ध हो जाती हूँ
तुम्हारे खिंची रेखाओं पर
यूँ ही रंग भर-भर कर
पुलकित कर देती हो
तन-मन और प्राण।
आज फिर तुमने
रच दिया नभ पर ये विहंगम दृश्य
और उड़ेढ़ कर रख दिया
मेरे भीतर
रस और आह्लाद
से भरा एक पूरा आकाश!

Monday, September 27, 2021

पॉंच कविताएं


न्याय

मोहब्बत जितनी है मुझमें

नफ़रत भी उतनी ही रखती हूं

ये फैसला तुम्हारा है

तुम क्या पाना चाहोगे

मैं तो बस ये जानती हूं

जो भी पाओगे मुझसे, भरपूर ही पाओगे।


तख़्त

जब नहीं होता कुछ करने को,

तब

बरामदे पर अपने ‘तख़्त‘ पर बैठ

बुनती हूं

एक ऐसी सपनीली दुनिया

जो है सिर्फ... 

और सिर्फ मेरी।


प्रतीक्षा

हॉं, करती हूं मैं उसकी 

प्रतीक्षा

रखती हूं उस मार्ग पर दृष्टि

जहांॅं से वह गया 

फिर कभी न आने का कहकर।


सारा आकाश

सुनो!

ये दीवारें, ये चौख़ट 

नहीं है तुम्हारा पूरा आकाश

याद रखो

समय के साथ परंपरा की ओढ़नी

आदर्श की बेड़ियां

झुका देगीं तुम्हारे कंधों को

इसलिए उठो

और नाप डालो वो सारा आकाश

जिन पर तुम्हारी नन्हीं अंगुलियां

खींचा करती थी अपने

सपनों का संसार।


मंत्र

ऊॅं नमः शिवाय्!

यही प्राण वायु है

मेरे

अवचेतन देह का

और यही है मेरे

जीवन और मृत्यु के मध्य

का एकमात्र

परम दर्शन।


Friday, September 24, 2021

अगम्या, यम-कथन और सत्य दर्शन


एक लंबे समय बाद हिन्दू धर्मकोश को कुछ संस्कृतनिष्ठ शब्दों की जानकारी लेने के लिए खोला तो कई ऐसे शब्दों की व्याख्या पर दृष्टि पड़ी जो सामाजिक व्यवस्था के लिए बनाये गये नियमों और हदों को रेखाकिंत करते है। जैसे- 'अगम्या'। अगम्या! जिसका अर्थ है समागम के अयोग्य स्त्री। 

विस्तार से पढ़ने पर समझ आता है कि स्त्रियों को संबोधित करते हुए यम स्त्री से शारीरिक संबंध बनाने के संदर्भ में पुरूषों को सचेत कर रहे है। हालांकि यम के कहे कथनों का वर्चस्व बस ब्रहमपुराण में लिपिबद्व होने तक ही सीमित नज़र आता है। उनका अनुसरण किसी भी काल में किया गया हो ऐसा मुझे तो नहीं लगता। वर्तमान समय में तो एक तिहाई समाज ऐसे नियमों के विरूद्ध ही जीवन का भोग कर रहा है। बाक़ी 'अगम्या' शब्द और यम के द्वारा की गई व्याख्या पढ़ने के बाद, ये कहने की आवश्यकता नहीं कि आप स्वंय को आपके आसपास घटित घटनाओं का साक्षी पाएंगे, और कथित श्लोंकों की सत्यता को परिहास में उड़ा देगें।

ब्रहम पुराण, प्रकृति खण्ड, अ0 27 में यम के द्वारा गम्या और अगम्या का जो विवरण दिया गया है, उसके अनुसार उन्होंने इसके जरिए पुरूषों को चेतावनी स्वरूप कुछ खास तरह की जाति विशेष स्त्रियों एवं संबंधों से दूरी बनाये रखने की हिदायत दी है। संपूर्ण श्लोक लिखने के बजाय मैं यहॉं उनका हिन्दी भावार्थ ही आपकी जानकारी के लिए लिख रही। 

या अगम्या नृणामेव निबोध कथयामि ते।

स्वस्त्री गम्या च सर्वेषामिति वेदे निरूपिता।। 

.......

अस्त्यगम्या च निन्द्याच लोके वेदे पतिव्रते।

शूद्रश्च ब्राहमणी गच्छेद् ब्रहमहत्याशतं लभेत्।।

.......

त्त्समं ब्राहमणी चापि कुम्भीपाकं व्रजेद् धु्रवम्।

यदि शूद्रां व्रजेद् विप्रो व्षलीपतिरेव सः।

उक्त श्लोक एवं अन्य आगे के श्लोकों में यम कहते है कि वेद के अनुसार सबके लिए अपनी स्त्री 'गम्या' हैं और दूसरे की भार्या यानी पत्नी 'अगम्या'। सामान्य नियम तो यही है। विशेष नियम है कि शूद्रों का ब्राहमण पत्नी के साथ और ब्राहमण का शूद्र स्त्री के साथ संगम वर्जित है। ऐसा करने वाला लोक और वेद में निंदनीय है। ब्राहमणी के साथ समागम करने वाला शूद्र सौ बह्महत्याओं का फल पाता है और शूद्र के साथ समागम करने वाली ब्राहमणी शीघ्र ही कुम्भीपाक नरक को जाती है (अमृतलाल नागर जी की 'नाच्यौ बहुत गोपाल' याद आ रही है। हालांकि आप इसे एक फिक्शन भर कह सकते है। लेकिन वर्तमान में सत्यता इससे इतर नहीं है। एक ढूंढो हजार सच आपके सामने होगें। असल समाज की हक़ीकत यही है)। 

यम के कथनानुसार, शूद्रा के साथ संभोग करने वाला ब्राहमण 'शूद्रापति' कहलाता है। वह जातिभ्रष्ट हो जाता है। उसे चांडाल से भी अधम कहा जाता है। उसके द्वारा किया गया पिंडदान विष्ठा के समान और तर्पण मुत्र के सदृश होता है। पितरों और देवताओं के पूजन में भी यही होता है। संध्या, पूजा और तप द्वारा करोड़ों जन्मों में संचित ब्राहमण का पुण्य शूद्रा स्त्री के साथ संभोग करने से नष्ट हो जाता है।

हरिवासरभोजी च कुम्भीपाकं व्रजेद् ध्रुवम्।

गुरूपत्नीं राजपत्नीं सपत्नीमातरम् प्रंसूम्।।


सुता पुत्रवधूं श्वश्रूं सगर्भां भगिनीं सति।।

सोदरभ्रातृजायाश्च भगिनीं भ्रातृकन्यकाम्।

अर्थात गुरू-स्त्री, राजा की स्त्री, सौतेली माता तथा उसकी कन्या, पुत्री, पुत्र की स्त्री, गर्भवती स्त्री, सास, बहिन, भाई की पत्नी, शिष्या, भतीजी, शिष्य की पत्नी, भांजी, भतीजे की स्त्री...इन सभी को ब्रह्मा ने सर्वथा समागम के अयोग्य कहा है। जो अधम पुरूष इनमें से किसी एक अथवा अनेक के साथ समागम करता है वह मातृगामी कहा गया है और उसे सौ ब्रहम हत्याओं का पाप लगता है। वह किसी भी प्रकार के धर्मकार्य के योग्य नहीं है। वह अस्पृश्य है और लोक वेद में निंदनीय है। वह कुंभी पाक नरक को जाता है और महा पापी है।

ये सब पढ़ने के बाद मेरे सूक्ष्म चेतन मन-मस्तिष्क को यही समझ आया कि नियम, शब्दावलियां मात्र किसी भी तरह के समाज को अनुशासित रखने के लिए एक गाइडलाइन भर है। आज के समाज का जो रूप हम देख रहे उसमें यम के द्वारा कहीं गई बातों का कोई सिर पैर नहीं है। उस पर चलने वाले 25 प्रतिशत भी है कि नहीं, इसका संदेह ही है। अधिकांश लोगों ने यम के इस कथन को पढा तो क्या सुना भी नहीं होगा। 

हॉं व्यवहारिक चलन में ऐसा मामला नज़र आ जाए तो लोग इसका विरोध करते है, फुसफसाते भी है और अगर घर-परिवार के बीच कोई मामला आ जाये तो फिर ये ऑनर किलिंग के रूप में सामने आता है।


Tuesday, September 21, 2021

मेरी बेटी !

तुम्हें कोई गौर से देखेगा
तो ढूंढ ही लेगा मुझको,
लेकिन नही ढूंढ सकेगा तुम में छिपे 
उस कोलाहल को 
जो दुबक कर बैठ जाता है
तुम्हारे चेहरे की मोहक 
मुस्कान, दिव्य आभा और 
तुमसे निकलते तेज
प्रकाश पुंज के पीछे
यही हो तुम...
सिर्फ 'यही', अपने वास्तविक रूप में
रक्त संबधों की जटिलता, 
पहचान और उनके अस्तित्व की 
आंच से परे,
ये गढ़ा है तुमने ख़ुद से 
यही तुम्हारी अपनी पहचान है
यूँ ही रहो, ऐसे ही बढ़ो
ऐसे ही फलो 
मेरे रक्त में पली
मेरी गुलाब सी कली
सच कहूं तो
मुझे अच्छा लगता है
ये सुनना
देखो ये इरिशिका की माँ है!!!


बेटी के जन्मदिवस पर लिखे मेरे मनोभाव!


Monday, August 2, 2021

लघु कथा/ मकड़ी और मैं

कुछ अजीब सी ही बात लगेगी आपको।....लेकिन है बिलकुल सच। कुछ दिन पहले एक मकड़ी से मेरी दोस्ती हो गई। वह कुछ बोलती नहीं...बेजुबान जो है। लेकिन समझती सब है, ये साबित होगया। अब आप पूछेगें, “वो कैसे?“ ....तो यही बताने के लिए तो ये कहानी लिखने बैठ गई। 

मकड़ी के जालों ने मुझे हमेशा आकर्षित किया। खंडहरों में बेहद डरावने और घरों में द्ररिद्रता की निशानी समझे जाने वाले इन जालों में मुझे हमेशा आर्ट नज़र आया। बेहद ख़ूबसूरती से बुना हुआ जाल... मकड़ी के दिमाग़ की दाद देने पर मजबूर कर देता है। इसीलिए मुझे अगर कहीं जाल दिखता तो मैं उससे तोड़ने का प्रयास नहीं करती। लेकिन उस दिन अपने बाथरूम के ठीक नल के बगल में ऊपर से नीचे की ओर आते जाले को देखकर पता नहीं क्यों में बिगड़ गई....

उसकी इस हिमाक़त पर मेरी नाराज़गी जायज़ भी थी। आफ्टर ऑल कुछ जगहों का इन प्राणियों को लिहाज होना चाहिए। जहां देखो मुॅंह उठाये अपनी इमारत खड़ी करने लगते है। इनकी ऐसी की तैसी...कहकर मैने उसके जाल पर जोर से एक मग पानी का फेंक दिया। जाल टूट गया था और मकड़ी पानी के साथ बह गई होगी, ये सोचकर मैंने प्राप्त हो चुकी अपनी प्राइवेसी का भरपूर आनंद उठाया। हालांकि मन कसक भी रहा था ये सोच कर कि किसी का घर तोड़ दिया। लेकिन अपने इस अपराध बोध को मैंने खुश्बूदार बॉडी वाश के झाग में उड़ा दिया। अब मन शांत और प्रसन्न था...।

सभी कर्मों से निपट बाथरूम के सामान को समेट जैसे ही बाल्टी को किनारे लगाने लगी...देखा वही मकड़ी बाल्टी से चिपकी पड़ी थी। पानी की तेज मार से भी उसने अपने बचाव का रास्ता पा लिया था। ठीक ही कहते है... ‘जाको राखै साइंयां मारे सकै न कोई।‘ चलो मेरे मन का भी बोझ उतरा। लेकिन अब क्या? ये फिर अपनी नींव रखनी शुरू कर देगी। अब मेरा इसे मारने का भी मन नहीं। कौन सुबह-सुबह अपने हाथ ख़ून से रंगने चाहेगा। तो क्या किया जाए? कुछ देर सोचने के बाद मैंने तय किया इससे बात करनी होगी...यहां अपना स्ट्रक्चर खड़ा करने से पहले इसको मेरी भी कुछ कंडीशन माननी होगी।

हॉं...यही उचित होगा...। यह तय कर मैंने उससे कहा...“देखो मिस! मुझे तुम्हारे यहां रहने से कोई एतराज़ नहीं है। आखिरकार तुम्हें भी उसी ने बनाया जिसने मुझे। तुमको भी जीने का अधिकार है।...तो तुम यहां इत्मीनान से अपना महल खड़ा कर सकती हो। बस एक शर्त है...एक छोटे से दायरे तक उसे रखो, जहां मर्जी आये... उधर की ओर कंस्ट्रक्शन मत करने लगो। तुम छोटी सी हो...आखिर तुमको अपने लिए कितनी जगह चाहिए। तो बेहतर होगा एक कोने में अपना छोटा सा जाल बुन लो। इस पर मुझे भी कोई एतराज़ नहीं होगा। लेकिन कहीं तुमने ज्यादा जगह पर कब्जा किया तो मुझसे बुरा कोई न होगा। समझी...बस एक ही बार कहूंगी। मैं भी अकेली ही रहती हूं इस घर में...अच्छा है तुम्हारा साथ होगा। बस अपनी हद में रहना...।“

ये कहकर मैं अपने बाथरूम से बाहर आ गई। 

और अगले दिन क्या देखती हूं...आप यकीन नहीं करेगें। उसने उसी जगह पर अपना छोटा सा निर्माण कर लिया था। मैंने भी उसको उसके काम पर दाद देकर कहा...“गुड! बस कंडीशन याद रखना। इससे ज्यादा फैलाव करोगी तो अवैध कब्ज़ा मानकर तुम्हारा स्ट्रक्चर ढहा दूंगी।...वैसे एक बात है, ये तो तुमने साबित कर दिया कि तुम लोग भी बात सुनते हो। हम ही इंसान तुमको कीड़े-मकोड़े समझ दुत्कारते है।“ 

उसके कई दिन तक मैंने देखा...वह मेरे आदेशानुसार सीमित दायरे में ही अपना काम करती रही। ...और मैं सुबह उसे देखकर उसी तरह खुश होती जैसे कोई अनुशासित मेहमान को देखकर होता है। उससे कुछ चर्चा होती। जो किसी से नहीं कह सकती उससे कहती। मेरा जी भी हल्का हो जाता। अब लगता है लोग पैट क्यों पालना पसंद करते है? मुझे भी इसका अहसास होने लगा था। 

लेकिन आज...क्या देखती हूं। न जाला, न मकड़ी। ऐसा लग रहा था वहां कभी कुछ था ही नहीं। मैंने कहीं सुना था मकड़ी शिफ़्ट होने से पहले अपने बनाए जाले को स्वंय ही निगल जाती है। हैरान हूं...? और हम इंसान जिस स्थान को छोड़ते है वहॉं अपनी गंदगी छोड़ के जाते है। सोचने की बात है एक मकड़ी भी मेरे ज्ञान चक्षु खोल गई...।


Thursday, April 22, 2021

मुश्किल घड़ी थी, ईश्वर और उसके बंदों ने आखिर पार लगा दिया

प्रयोगात्मक अनुभव से बड़ा कोई ज्ञान नहीं, ये सौ आना टका सही बात है। इसका कड़वा अनुभव मुझे भी हो गया।

16 अप्रैल को जब में दिल्ली से लखनऊ के लिए दिल्ली एयरपोर्ट टी 2 पहुंची, तब तक सब ठीक था। रेल यात्रा करना चाहती थी पर बेटी को सुरक्षित यात्रा आकाश मार्ग ही लगी। मैंने भी हां कर दी। यही ग़लत फैसला था, संभवतः। सुरक्षा दूरी महज सामान जमा करने तक थी। मुझे अपने जहाज के लिए गेट नंबर 21 पहुंचना था। पहुंची...पर वहां का हाल देखकर जी ख़बरा गया। हमसे पहले भुवनेश्वर के यात्री वहां पहले से ही थे, हमारे बाद एक और उड़ान के यात्री उस हाल में इकट्ठा हो रहे थे। आप सोच सकते है कितना हेल्दी वातावरण होगा?

लगभग 1 घंटा वहां बैठना पड़ा क्योंकि आंधी की वजह से उड़ान को डिले कर दिया गया। माहौल अजीब सा लग रहा था और भारी भी। लेकिन कोई चारा नहीं था। किसी तरह जहाज के लिए रवानगी हुई। पूरा जहाज जैम पैक्ड था। भगवान की कृपा कहूंगी मीडिल सीट में कोई नहीं आया। किसी तरह यात्रा पूरी हुई। पढ़े-लिखे लोग भी जाहिलपना दिखाते है, ये ऐसी जगहों पर खूब दिखता है। जहाज रूका नहीं कि सब एक साथ खड़े हो गये, एक दूसरे से लगभग चिपक कर, जैसे अगर नहीं उतरे तो जहाज वापस चल देगा। केवल एक ही आदमी था जिसने इस बात पर अपनी नाराजगी जाहिर की। लेकिन किसी को कोई फर्क नहीं पड़ा।

अपना सामान लेकर बाहर आई तो ये पता नहीं था कि उबर-ओला का ये हाल होगा। 20 मिनट की दूरी के लिए 750-850 से नीचे बुकिंग नहीं हो रही थी। आॅटो थोड़ा कम था पर एयरपोर्ट चार्जेज, जो एक ही दिन पहले 60 से 90रू कर दिए गये थेे, हर हाल में देने ही थे। आटो इसलिए अंदर आने से कतरा रहे थे। कहा भी दे देगें आ जाओ पर न आये। आपदा को भी धंधा बना लेना, ये इंडिया जैसे देशो में ही होता है। बमुश्किल एक घंटे बाद बेटी के लगातार प्रयास के बाद ओला बुक हुई, जबकि मैं मेट्रो पकड़ने के लिए निकल ही पड़ी थी।

बुख़ार सा मुझे लगने लगा था, खांसी सी भी आने लगी थी।

किसी तरह थकी-थकी सी घर पहुंची। अगले दिन शाम तक बुख़ार बढ़ गया और 18 तारीख तक 102 पर पहुंच गया। इसी दौरान कभी साथ एक ही ग्रुप में काम की हुई वरिष्ठ पत्रकार ताविषी श्रीवास्तव की दुखःद निधन की सूचना ने मेरी सांस को बोझिल कर दिया। मुझे लगा मैं भी गई...फिर बेटी का ख़्याल आया, जो ख़ुद बुख़ार में थी। मैंने तुरंत लेट कर ब्रीदिंग एक्ससाइज किया और ईश्वर को पुकारा...अभी नहीं भगवान!...अभी नहीं! ईश्वर की कृपा से थोड़ी राहत मिली। पर बुख़ार और कंपकंपाहट शरीर तोड़ रही थी। होश मे खुद को रखते हुए मैंनें बेटी से पहले अपनी दो दोस्तों को फ़ोन किया-एक अल्पना, दूसरी इरा। अल्पना ने कोविड दवा स्टार्ट करने को कहा तुरंत। उसको कोविड हो चुका था। दवा का प्रेस्कीप्शन वो पहले ही भेजी थी, क्योंकि उसे भी डायरिया के बाद ये हुआ था और डायरिया मुझे भी 3-4 दिन से था ही। पर मुझे ये सामान्य सी बात लगी थी।

इरा मेरे घर के पास ही थी। वह अपने साथ मुझे अपने घर ले आई। उसकी तीमारदारी से मैं आज बहुत हद तक बेहतर महसूस कर रही। ईश्वर उसको स्वस्थ और प्रसन्न रखे। वह ना होती तो शायद आज मैं भी न होती। ईश्वरीय अवतार ही है मेरे लिए। इस बीच, खुद बहुत बुख़ार में होकर भी मेरी बेटी मेरे लिए दिल्ली से अपना काम कर रही थी। डाक्टर से सलाह, दवाइयां, आक्सीमीटर आदि आदि। और साथ में उसके दोस्त कुशल, शालिन, शरियत और मोहित, योशिता उसकी-मेरी हौसला अफज़ाई करने में लगे रहे। बेटी की फ्लैट मेट काव्या ने भी उसे काफी सहयोग किया। इन सब की मैं बहुत अहसानमंद हूं। और राकेश मिश्रा को कैसे भूलूं, जिसने लोकल में डाक्टर से लेकर मेरे कोरोना टेस्ट की व्यवस्था की। 

फिलहाल 2-3 दिन बहुत बुरे बीते। दवाएं डोलो, निम्सी और डाक्सी के लिए जूझना प़ड़ा। आक्सीमीटर बड़ी मुश्किल से मिला, जो मिलने पर काम ही नहीं कर रहा था। फिर चेंज करवाने के लिए इंतजार करना पड़ा। बेटी, बहन और भांजी अभी भी बुख़ार में है। उनके तो टेस्ट स्मेल सब नदारद...। ऐसे में आपको केवल ईश्वर का सहारा होता है। वरना बाहर के हालात तो आपको शायद ज़िंदा न रहने दें। आप पावरफुल हो या धनवान, सुनवाई मुश्किल से ही हो रही। यहां तो दोनों में ही सामान्य स्थिति। किस-किस से कहे, किस-किस का रोना रोए वाला हाल है। 

इस बीच में दोष देने वाले सरकार, उसकी व्यवस्था को कस कर दे रहे। टिवट्र पर गालियां कोसना जारी है। आक्सीजन की बढ़ती मांग ने व्यवस्था की कलई खोल के रख दी। न जाने हमने पिछले दिनों क्या तैयारी की कि अब बदतर होते हालात संभल नहीं पा रहे। चुनाव रैलियों में सरकारों की लापरवाही खूब दिखी। भयानक और संभले हालात के आंकड़ें भी अपनी-अपनी सरकारों के हिसाब से आ रहे। यूं कहें सत्ता के खिलाड़ी अपना खेल अच्छा खेल रहे। लेकिन इन सबके बावजूद हम स्वंय कितने जिम्मेदार नागरिक की भूमिका निभा रहे है, ये भी देखना जरूरी है। बार-बार चेताने के बावजूद हम अनपढ़ गंवारों जैसा व्यवहार करते है। हमारी लापरवाही ने हमें फिर बुरे हालात में झोंक दिया और ये कितने वीभत्स हालात हमें दिखायेगा, ये रोज के आंकड़े देखकर अहसास हो जाता है। 

अभी और कुछ कहने के बजाय अपनी नेगेटिव रिर्पोट का इंतजार है और बेटी-बहन-भांजी के लिए प्रार्थना है कि वह जल्दी स्वस्थ हो। प्रार्थना करती हूं कि भगवान मेरे देश को जल्द से जल्द इस आपदा से मुक्त करें। 

तथास्तु!


Wednesday, January 6, 2021

कंट्रोल महानुभाव! कंट्रोल!...2022 की ख़ातिर ही सही


निसार उन के जाएँ जो सच जाने उस को
फसाना हमारा, जबानी तुम्हारी

यह शेर नसीम देहलवी जी ने कहा है और यहां इस का जिक्र कुछ भी बोल देने की आदत से लाचार उन महानुभावों के लिए है जो बयानबाजी करते वक्त भूल जाते है कि फ़सानों के पांव नहीं होते वे हवा की माफिक फिजां में फैलने में देर नहीं करते. आपके मुंह से निकली बात भी किसी वायरस की माफ़िक लोगों के जे़हन में धर कर जाती है. कहना आप कुछ चाहते है और कह कुछ जाते है. यानी जनमानस के मनोभावों को अपनी आवाज देने के फेर में विवाद का मौजूं खड़ा कर देते है. अब कभी-कभी तो ये आपके हित में हो जाता है लेकिन अक्सर आपका अहित कर जाता है. जैसे हाल में सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव का वैक्सीन को लेकर दिये गये बयान को ही ले लें. 

यॅंू तो कोरोना टीके पर सियासत होना लाजिमी था. लेकिन क्या ये मुफ़ीद नहीं होता कि वैक्सीन पर जनता को गुमराह करने के बजाय हम उसको लेकर सावधानियां बरतने या फिर उसको लेकर लोगों को जागरूक करने का प्रयास करते है. अखिलेश यादव को भाजपाई वैक्सीन में खामियां नजर आती है इसलिए उन्होंने ने जनता को चेताने के लिए कह दिया मैं तो नहीं लगाऊंगा भाई. जाहिर सी बात है लोगों की सुरक्षा की चिंता आपको होती होगी, हमें इसका यकीं भी है लेकिन सवाल मेरा ये है कि अक्सर विपक्ष में आने के बाद ही क्यों आप नेताओं को जनता का सबसे ज्यादा ख़्याल या यूं कहें चिंता होती है? मानती हूं विपक्षियों का आवाज उठाना सही है लेकिन जन-साधारण से जुड़ी चीजों की खिलाफ़त ठीक नहीं. सरकार की नीतियां से आप इत्तिफ़ाक न रखते हों तो अवष्य आवाज़ बुलंद करें. आखिरकार ये अधिकार भी आपको आपके संविधान ने दे ही रखा है. 

अखिलेश के इस बयान पर कि उन्हें भाजपाई कोरोना की वैक्सीन पर भरोसा नहीं इसलिए वे इसे नहीं लगाएंगे, उन्हीं की परिवार की सदस्या, राजनैतिक और सामाजिक क्षेत्र की एक्टिव मेंबर अपर्णा यादव कहती है कोरोना की इमरजेंसी यूज के लिए मंजूर की गई कोरोना वायरस वैक्सीन को किसी पॉलिटिकल पार्टी से नहीं जोड़ा जाना चाहिए. वैक्सीन पूरे विश्व के लिए है. यह किसी राजनीतिक पार्टी से संबंधित नहीं है. अखिलेश यादव का यह बयान भारत के वैज्ञानिकों और डॉक्टर्स की बेइज्जती करना है.

अब आप ही कहें जब आपके अपनों को ले बात समझा से परे लगी तो जनता को तो बेतुकी लगनी ही थी. कोई भी वैक्सीन किसी पार्टी की कैसे हो सकती है. अमेरिका में फाइजर वैक्सीन पर काम रिपब्लिकन के समय आरंभ हुआ और अब जब लगाई जा रही है तो सत्ता डेमोक्रेटस के हाथ में है तो क्या वहां भी उसे ये कह कर खारिज नहीं किया जाना चाहिए कि ये तो रिपब्लिकन वैक्सीन है और हमें इस पर भरोसा नहीं. वहां अगर वैक्सीन का विरोध अगर है भी तो सरकार की नीतियों पर है उसकी पार्टी या उसकी पार्टी की वैक्सीन पर नहीं. दरअसल वैक्सीन का पूरा मामला किसी पार्टी विषेष का नहीं बल्कि मेडिकल कम्यूनिटी और डाक्टर के बीच का हैं. 

अखिलेश यादव भूल रहे है कि 2022 के चुनाव कुछ महीनों की दूरी पर है और ऐसे बयान उनकी लोकप्रियता को कम करते है. कभी-कभी जो काम मीठे बोलों और आपकी समझदारी से संभव होता है वो तीखे और कटाक्ष भरी बातों से नेस्तनाबूंद होने में भी देरी नहीं लगाता. मुझे तो कभी-कभी उनके दिए बयानों से ऐसा महसूस होता है जैसे वे मान कर बैठ गये है कि 2022 की सत्ता उन्हें नहीं मिलने वाली अन्यथा वे संभल कर चलना ‘प्रिफर’ करते. इधर दिए गए उनके बयान उन्हें कुछ चापलूसों का नेता बनाते होगें जनता का नहीं. जनता का नेता बनने के लिए जनता के बीच होना होता है. लाल टोपी पहन या पहनवाकर आये दिन की बैठकी आपको सोशल मीडिया पर ’एक्टिव’ तो दिखाती है लेकिन जनता का हमदर्द साबित नहीं करती. लाल रंग क्रांति का प्रतीक है और क्रांति रंग नहीं ’उम्मीद’ का परचम लहराती है. 

मैं कोई भाजपा मुरीद नहीं लेकिन एक बेहतर विपक्ष की जरूर आकांक्षी हूं. और सच कहूं तो मैं ही नहीं मेरे साथ जुड़े लोग भी ये देखने को आतुर है कि कब सपा एक मजबूत विपक्ष के तौर पर उत्तर प्रदेश की नुमांइदगी करती दिखेगी. सत्ता पक्ष को विपक्ष का भय होना चाहिए. जनता के बीच विपक्ष की लोकप्रियता ही सत्ता पक्ष और अधिक एक्टिव बनाती है. ऐसे में वे काम भी मुमकिन हो जाते है जो बरसों से कर नहीं हो पा रहे थे. लेकिन ऐसी स्थिति लाने के लिए आपका जनता से साबका होना जरूरी है और बड़़बोलेपन पर लगाम लगाना तो कहीं ज्यादा आवश्यक हो जाता है. अख़्तर अंसारी ने ठीक ही फरमाया है-

जिस को दुनिया ज़बान कहती है
उस को जज़्बात का कफ़न कहिए