जब आप पीछे मुड़कर देखते है और उसे वर्तमान स्थिति से तौलते है तो समाज को कहीं अधिक वीभत्स रूप में पाते हैं। अब वह चाहे भारतीय समाज हो या विदेशी सरजमीं-सोच, भीड़ कुछ भी पूर्व से बेहतर नहीं पाते। दस वर्ष पूर्व लोकमत समाचार पत्र (12 अगस्त, 2011) के संपादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित इस लेख में सोशल मीडिया को हथियार की तरह इस्तेमाल करने का तरीका आज भी वैसा ही हैं। कसते नेटवर्किंग साइट के नियम-कानूनों के बावजूद इनकी धज्जियां उड़ाने में छद्म नाम आज भी समाज का चेहरा बिगाड़ने के लिए निरंतर एक्टिव
बीते चार दिनों से लंदन में चल रहे दंगाई बवाल को तो फिलवक्त शांत कर दिया गया है किंतु मैनचेस्टर, सैलफोर्ड, लिवरपूल, वुलवरहैम्टन, नॉटिघम, लिसेस्टर, ग्लेसेस्टर, ब्रिस्टल और मिडलेड अभी भी पगलाई हिंसा के शिकार हो रहे हैं। बर्किघम में भड़की इस चिंगारी को ब्रितानी सरकार की 16000 अतिरिक्त पुलिस फौज भी नियंत्रित नहीं कर पा रही है। दुनिया की बेहतरीन पुलिस माने जाने वाली स्काटलैंड यार्ड भी इस बार हो रहे दंगों को सबसे मुश्किल दंगा मान रही है। आधुनिक संचार प्रणाली को अपना ढाल और हथियार बना चुकी दंगाई भीड़ को पुलिस के लिए भी काबू कर पाना मुश्किल हो रहा है। नक़ाबपोश चेहरों के पीछे कौन है, उसकी मंशा क्या है-ये जाहिर नहीं हो पा रहा। बेमकसद हो रहे इन दंगों के पीछे सिर्फ हैवानियत भरे चेहरे काम कर रहे है। ये वे लोग वे है जो सिर्फ शगल करना चाहते हैं। दिशाहीन है, खुद से नाराज हैं और अपनी असफलताओं का ठीकरा समाज पर फोड़ना चाहते है। ओछी हरकत और अभद्र व्यवहार इनकी पहचान है। ये ऐसे लोग है जो हर देश-काल-समाज में आपको नज़र आते हैं। इनके कोई नाम नहीं होते और चेहरे नक़ाबदार होते हैं। ये फेसबुक और ट्वीटर के फर्जी सदस्य है, जिन्हें समाज को कुछ देने के लिए नहीं खपना है बल्कि उनसे लेने का पूरा हिसाब करना है। सही फरमाते हैं ब्रिटिष प्रधानमंत्री डेविड कैमरून कि ब्रिटेन का समाज बीमार हो चुका है। जिस रक्तिम लाल चेहरे के साथ कैमरून ये बात कह रहे थे, उससे साफ जाहिर हो रहा था कि ब्रिटेन में हो रहे दंगों की विक्षिप्त मानसिकता को लेकर वह बहुत आहत है। उनकी इस बात में भी दम है कि समाज में जबावदेही की भी कमी होती जा रही है।
डेविड कैमरून की बात सुनकर 1984 के उन दंगों की याद ताजा हो आजी, जब भारतीय प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद किसी एक की जलाई तीली ने देश भर में सांप्रदायिकता की आग को भड़काने का घृणित काम किया था। उस वक्त पर भी तत्कालीन अंतरिम प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने कड़क लेकिन ठोस स्वरों में बवालियों को यह संदेश दिया कि इस तरह की गुस्ताखि़यां किसी भी हालत में बर्दाश्त नहीं की जाएगी। बावजूद इसके भीड़ में छुप कर वार करते इन नक़ाबपोश लोगों को रोक पाना सरकार-सेना दोनों के लिए ही असंभव सा हो रहा था। भारत में तो दंगे भड़का देना ऐसे नक़ाबपोश चेहरों के लिए बहुत मुश्किल काम नहीं है और ये बात यहां के अराजक तत्व भलीभॉंति जानते है। सर्वधर्म समभाव की भावना वाले इस देष में बहुत सारे ऐसे लोग भी है जो ऐसे मौकों की तलाष में रहते है।
दरअसल तकनीक के गलत इस्तेमाल ही 9/11 या फिर 26/11 जैसे हादसे जन्म लेते हैं। आतंकवादी गतिविध्यिों में मिशन को अंजाम देने के लिए आतंकी सेटेलाइट के जरिए एक-दूसरे से बिना किसी की नज़र में आये संपर्क में बने रहते हैं और सुरक्षा एंजेसियों की नजरों में धूल झोंक कर अपने काम को अंजाम देते हैं। लंदन में लगी आग को जगह-जगह फैलाने में फेसबुक-ट्वीटर जैसी सोशल नेटवर्किंग साइट ने खूब मदद की। ब्लैकबेरी स्मार्ट फोन तकनीक के मैसेजर सेवा ने दंगाइयों के साथियों को इकट्ठा करने, उन्हें समय-स्थान की सूचना देने में जो भूमिका निभाई उसने इस चिंगारी को आग में बदलने का काम किया। फिर तो इस आग ने दूर-दराज के इलाकों को भी अपनी गिरफ्त में लेने में देर नहीं की। यहॉं तक कि पुलिस के लोकेशन की जानकारी भी त्वरित गति से संदेश पहुंचाने वाली तकनीक के जरिए साथियों को दी जाती रही। यही वजह रही कि लंदन पुलिस के निश्चित तय स्थान तक पहुंचते-पहुचते दंगे दूसरे इलाकों में शुरू हो जाते। सुरक्षा एंजेसियों की पहंुच से दूर पब्लिक डोमेन और मोबाइल संचार तंत्र ने अनजाने में ही सही, अराजक तत्वों के हाथ में ऐसे हथियार दे डाले, जो देश-दुनिया के किसी भी कोने से सुंदर-सभ्य समाज का चेहरा कुरूप कर सकते है। यही कारण था कि कैमरून समाज के उन लोगों की जवाबदेहियों पर सवाल खड़ा कर रहे थे जो महज बाज़ार को अपने काबू में रखने के लिए उपभेक्तावादी संस्कृति को बढ़ावा दे रहे है।
किसी भी उत्पाद को बाजार तक पहुंचाने और उस पर अपना वर्चस्व कायम रखने की होड़ की दौड़ में उसके नकारात्क पहलुओं पर सोच को तो जैसे तिलांजलि दे दी गई है। तमाम तरह के आधुनिक हथियारों से लैस पुलिस फोर्स और सुरक्षा एंजेसियां होने के बावजूद लंदन इस वक्त इन बवालियों के आगे चारों खाने चित्त पड़ा है। ऐसे में भारत के लिए भी चिंता का विषय कम नहीं है, जो यू ही कई तरह के बाहरी और आंतरिक चुनौतियों को भिड़ रहा है। यहां बवाल भड़काने वालों की तादाद और मंशा लंदन के इन बवालियों से कहीं ज्यादा बलवान है। लंबे समय तक ब्लैकबेरी को भारत में लाइसेंस न दिये जाने के पीछे उसका सुरक्षा एंजेसियों के दायरे से मुक्त होना रहा। इसलिए यहां भी वहीं समाज के प्रति जबावदेही वाली बात आती है। आज भारत में कम से कम 11 लाख लोगों के पास ऐसा आधुनिक संचार उपकरण है जिस पर देश की कोई एंजेसी किसी तरह की निगरानी नहीं कर सकती। जाहिर है यह बात उन राष्ट्रविरोधी ताकतों को लुभाएगी जो सुरक्षा एंजोसियों की ऑंख से बचकर काम करना चाहते है।
2012 के ओलंपिक मेजबानी की तैयारी में लगे लंदन को इन हालातों पर काबू पाने के लिए ही नहीं जूझना होगा, साथ ही यह दोबारा न हो, इसके लिए इसकी जड़ों को ही खोद कर उसमें मट्ठा डालना होगा। वरना खेल के इस महा उत्सव में भाग लेने आने वाले प्रतिभागियों को ऐसे बवालों के फिर से होने का डर सालता रहेगा। चूंकि ब्रितानी इतिहास दंगों से भरा पड़ा है और 2011 के इन दंगों की एक और कड़ी जुडने से कई दिनों तक इससे लगे घाव भी दुखते रहेगें। इसलिए कैमरून के उन शब्दों को नजरअंदाज किए बगैर अपनी-अपनी जबावदेही के लिए आगे बढ़ना ही होगा। लेकिन ब्रिटिष प्रधानमंत्री हो या अन्य किसी देश के प्रधानमंत्री-उन्हें भी यह समझना होगा कि तेजी के साथ बदलती मानसिकता से ग्रस्त विद्रूप होते समाज के चाल-चलन को सुधारना है तो सबसे पहले देश के नीति-नियंताओं को अपनी नीतियों में फेर बदल करना होगा। कहने का मतलब है सबसे पहले उन्हंे ही अपनी जबावदेही तय करनी होगी। फिर कहीं उनके द्वारा संचालित या नियंत्रित संस्थाओं को नैतिक मुल्यों के सममान की आदत डलवानी होगी।
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