एक लंबे समय बाद हिन्दू धर्मकोश को कुछ संस्कृतनिष्ठ शब्दों की जानकारी लेने के लिए खोला तो कई ऐसे शब्दों की व्याख्या पर दृष्टि पड़ी जो सामाजिक व्यवस्था के लिए बनाये गये नियमों और हदों को रेखाकिंत करते है। जैसे- 'अगम्या'। अगम्या! जिसका अर्थ है समागम के अयोग्य स्त्री।
विस्तार से पढ़ने पर समझ आता है कि स्त्रियों को संबोधित करते हुए यम स्त्री से शारीरिक संबंध बनाने के संदर्भ में पुरूषों को सचेत कर रहे है। हालांकि यम के कहे कथनों का वर्चस्व बस ब्रहमपुराण में लिपिबद्व होने तक ही सीमित नज़र आता है। उनका अनुसरण किसी भी काल में किया गया हो ऐसा मुझे तो नहीं लगता। वर्तमान समय में तो एक तिहाई समाज ऐसे नियमों के विरूद्ध ही जीवन का भोग कर रहा है। बाक़ी 'अगम्या' शब्द और यम के द्वारा की गई व्याख्या पढ़ने के बाद, ये कहने की आवश्यकता नहीं कि आप स्वंय को आपके आसपास घटित घटनाओं का साक्षी पाएंगे, और कथित श्लोंकों की सत्यता को परिहास में उड़ा देगें।
ब्रहम पुराण, प्रकृति खण्ड, अ0 27 में यम के द्वारा गम्या और अगम्या का जो विवरण दिया गया है, उसके अनुसार उन्होंने इसके जरिए पुरूषों को चेतावनी स्वरूप कुछ खास तरह की जाति विशेष स्त्रियों एवं संबंधों से दूरी बनाये रखने की हिदायत दी है। संपूर्ण श्लोक लिखने के बजाय मैं यहॉं उनका हिन्दी भावार्थ ही आपकी जानकारी के लिए लिख रही।
या अगम्या नृणामेव निबोध कथयामि ते।
स्वस्त्री गम्या च सर्वेषामिति वेदे निरूपिता।।
.......
अस्त्यगम्या च निन्द्याच लोके वेदे पतिव्रते।
शूद्रश्च ब्राहमणी गच्छेद् ब्रहमहत्याशतं लभेत्।।
.......
त्त्समं ब्राहमणी चापि कुम्भीपाकं व्रजेद् धु्रवम्।
यदि शूद्रां व्रजेद् विप्रो व्षलीपतिरेव सः।
उक्त श्लोक एवं अन्य आगे के श्लोकों में यम कहते है कि वेद के अनुसार सबके लिए अपनी स्त्री 'गम्या' हैं और दूसरे की भार्या यानी पत्नी 'अगम्या'। सामान्य नियम तो यही है। विशेष नियम है कि शूद्रों का ब्राहमण पत्नी के साथ और ब्राहमण का शूद्र स्त्री के साथ संगम वर्जित है। ऐसा करने वाला लोक और वेद में निंदनीय है। ब्राहमणी के साथ समागम करने वाला शूद्र सौ बह्महत्याओं का फल पाता है और शूद्र के साथ समागम करने वाली ब्राहमणी शीघ्र ही कुम्भीपाक नरक को जाती है (अमृतलाल नागर जी की 'नाच्यौ बहुत गोपाल' याद आ रही है। हालांकि आप इसे एक फिक्शन भर कह सकते है। लेकिन वर्तमान में सत्यता इससे इतर नहीं है। एक ढूंढो हजार सच आपके सामने होगें। असल समाज की हक़ीकत यही है)।
यम के कथनानुसार, शूद्रा के साथ संभोग करने वाला ब्राहमण 'शूद्रापति' कहलाता है। वह जातिभ्रष्ट हो जाता है। उसे चांडाल से भी अधम कहा जाता है। उसके द्वारा किया गया पिंडदान विष्ठा के समान और तर्पण मुत्र के सदृश होता है। पितरों और देवताओं के पूजन में भी यही होता है। संध्या, पूजा और तप द्वारा करोड़ों जन्मों में संचित ब्राहमण का पुण्य शूद्रा स्त्री के साथ संभोग करने से नष्ट हो जाता है।
हरिवासरभोजी च कुम्भीपाकं व्रजेद् ध्रुवम्।
गुरूपत्नीं राजपत्नीं सपत्नीमातरम् प्रंसूम्।।
सुता पुत्रवधूं श्वश्रूं सगर्भां भगिनीं सति।।
सोदरभ्रातृजायाश्च भगिनीं भ्रातृकन्यकाम्।
अर्थात गुरू-स्त्री, राजा की स्त्री, सौतेली माता तथा उसकी कन्या, पुत्री, पुत्र की स्त्री, गर्भवती स्त्री, सास, बहिन, भाई की पत्नी, शिष्या, भतीजी, शिष्य की पत्नी, भांजी, भतीजे की स्त्री...इन सभी को ब्रह्मा ने सर्वथा समागम के अयोग्य कहा है। जो अधम पुरूष इनमें से किसी एक अथवा अनेक के साथ समागम करता है वह मातृगामी कहा गया है और उसे सौ ब्रहम हत्याओं का पाप लगता है। वह किसी भी प्रकार के धर्मकार्य के योग्य नहीं है। वह अस्पृश्य है और लोक वेद में निंदनीय है। वह कुंभी पाक नरक को जाता है और महा पापी है।
ये सब पढ़ने के बाद मेरे सूक्ष्म चेतन मन-मस्तिष्क को यही समझ आया कि नियम, शब्दावलियां मात्र किसी भी तरह के समाज को अनुशासित रखने के लिए एक गाइडलाइन भर है। आज के समाज का जो रूप हम देख रहे उसमें यम के द्वारा कहीं गई बातों का कोई सिर पैर नहीं है। उस पर चलने वाले 25 प्रतिशत भी है कि नहीं, इसका संदेह ही है। अधिकांश लोगों ने यम के इस कथन को पढा तो क्या सुना भी नहीं होगा।
हॉं व्यवहारिक चलन में ऐसा मामला नज़र आ जाए तो लोग इसका विरोध करते है, फुसफसाते भी है और अगर घर-परिवार के बीच कोई मामला आ जाये तो फिर ये ऑनर किलिंग के रूप में सामने आता है।

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