Friday, October 1, 2021

क़ुदरत


अक्सर मुग्ध हो जाती हूँ
तुम्हारे खिंची रेखाओं पर
यूँ ही रंग भर-भर कर
पुलकित कर देती हो
तन-मन और प्राण।
आज फिर तुमने
रच दिया नभ पर ये विहंगम दृश्य
और उड़ेढ़ कर रख दिया
मेरे भीतर
रस और आह्लाद
से भरा एक पूरा आकाश!

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