Sunday, October 2, 2022

कविता/ अक़्स




कहा था न मैंने
नीयत-ए-शौक़ भर न जाए कहीं
तू भी दिल से उतर न जाए कहीं
तब इस बात पर तुम हॅंसे थे और कहा था
ये कभी नहीं हो सकता
लेकिन देखो
तुम भी उतर ही गये दिल से
अब न तुम्हारी याद रही बाक़ी और 
न वो बात ही रही बाक़ी, पर
रूको!
यह भी तो पूरा सच नहीं, क्योंकि
अब जो शख़्स है मुझ में 
फिर क्यूं
वह दिखता है तुम्हारी ही तरह पत्थर, चुप और अकेला सा।

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