स्वतंत्रता दिवस [15 अगस्त ] की 75वीं वर्षगांठ पर
सत्य वचन कहूँ तो
भूख है, ग़रीबी है
जेब आधों से ज्यादा की ख़ाली है
अंधी-अनपढ़ जनता जिसकी दीवानी है
फ्री वादों से सजी वो...
छप्पन भोग सी दिखती थाली है
बढ़ती भीड़ गिनती की हद पार है
तनाव है, क्रोध है, उन्माद की बीमारी है
जात है, वर्ग है, प्रान्त है
उत्तर है, दखिन है, पूर्व व पछिम है
सबकी अपनी ढपली, अपनी ही एक कहानी है
कानून की आँख में पट्टी है तो
अख़बार जो कह दें वो ख़बर सच्ची है
टैक्स-जीएसटी की मार है, आदमी बेबस-लाचार है
रुपए की गिरती दिन-ब-दिन औक़ात है
तहख़ानों में जाने कब के छुपे राज़ है
जिधर देखो उधर रोज़ ही निकल रहे माल है...
भाषणों का मकड़जाल है
मन की बात कहने को ‘सरकार‘ है
ढोंग है, फरेब है, वोटों का हेर-फेर है
बाहर काट है, तो भीतर साठ-गाँठ है
आस्तीन में छिपे सांप है
लाठी जिसकी, सत्ता उसी के हाथ है
कहने को बापू के आदर्श हमारी थाती है
लेकिन वे भी दो अक्टूबर को चढ़ते फूलों की भांति है
हे राम! सी आह में
बस यूं कह लें
ईश्वर-अल्लाह किसी तरह बस साथ है
रोजी-रोटी, रोज ही यहां एक बड़ा सवाल हैै
गरीब के पेट को मिल रहा अनाज उसकी जेब के हद से पार है...
एक्सप्रेस वे हैं, जगमगाते मॉल है
आसमां छूते कंक्रीट के जंगल है
विकास की सीढ़ी चढते कई और भी आयाम है
दूर मुन्नी के गांव में रोशनी नहीं तो क्या
चकाचौंध की चादर ओढ़े मेट्रो नगर तो गुलज़ार है
होली-दीवाली-विवाह तक सीमित संस्कार है
पहले महज तन ग़ुलाम थे
अब मन-मस्तिष्क दोनों ही ग़ुलाम है
देश की नमक-मलाई चाट
विदेश के मुख जोहती आज की संतान है
अमृत्व की इस बेला में झूम रहे हम
ये सोच कर निहाल है कि
अब हम अंग्रेजों से पूर्ण आज़ाद है
मगर फिर भी...
देश का नाम रोशन करने को
नित-नव फूटती कोपलों की यहां भरमार है
देश-प्रेम की लौ में मर-मिटने को कुछ परवाने बेताब है
रग़ो में दौड़ते-फिरने के वो नहीं क़ायल,
इबारतें अपने ख़ून से लिखने को हरदम तैयार है
जो कभी नहीं भूलें, कि वे भारत मॉं की संतान है
कर्ज़ उसका अदा करने में ही उनका नाम है
ऐसी वतन-परस्ती को हमारा सलाम है
जो तिरंगा ओढ़ कर, लहरा के कहते है
ये ही मेरी आन-बान और शान है
मेरे भारत के जन-गन-मन की पहचान है।
जेब आधों से ज्यादा की ख़ाली है
अंधी-अनपढ़ जनता जिसकी दीवानी है
फ्री वादों से सजी वो...
छप्पन भोग सी दिखती थाली है
बढ़ती भीड़ गिनती की हद पार है
तनाव है, क्रोध है, उन्माद की बीमारी है
जात है, वर्ग है, प्रान्त है
उत्तर है, दखिन है, पूर्व व पछिम है
सबकी अपनी ढपली, अपनी ही एक कहानी है
कानून की आँख में पट्टी है तो
अख़बार जो कह दें वो ख़बर सच्ची है
टैक्स-जीएसटी की मार है, आदमी बेबस-लाचार है
रुपए की गिरती दिन-ब-दिन औक़ात है
तहख़ानों में जाने कब के छुपे राज़ है
जिधर देखो उधर रोज़ ही निकल रहे माल है...
भाषणों का मकड़जाल है
मन की बात कहने को ‘सरकार‘ है
ढोंग है, फरेब है, वोटों का हेर-फेर है
बाहर काट है, तो भीतर साठ-गाँठ है
आस्तीन में छिपे सांप है
लाठी जिसकी, सत्ता उसी के हाथ है
कहने को बापू के आदर्श हमारी थाती है
लेकिन वे भी दो अक्टूबर को चढ़ते फूलों की भांति है
हे राम! सी आह में
बस यूं कह लें
ईश्वर-अल्लाह किसी तरह बस साथ है
रोजी-रोटी, रोज ही यहां एक बड़ा सवाल हैै
गरीब के पेट को मिल रहा अनाज उसकी जेब के हद से पार है...
एक्सप्रेस वे हैं, जगमगाते मॉल है
आसमां छूते कंक्रीट के जंगल है
विकास की सीढ़ी चढते कई और भी आयाम है
दूर मुन्नी के गांव में रोशनी नहीं तो क्या
चकाचौंध की चादर ओढ़े मेट्रो नगर तो गुलज़ार है
होली-दीवाली-विवाह तक सीमित संस्कार है
पहले महज तन ग़ुलाम थे
अब मन-मस्तिष्क दोनों ही ग़ुलाम है
देश की नमक-मलाई चाट
विदेश के मुख जोहती आज की संतान है
अमृत्व की इस बेला में झूम रहे हम
ये सोच कर निहाल है कि
अब हम अंग्रेजों से पूर्ण आज़ाद है
मगर फिर भी...
देश का नाम रोशन करने को
नित-नव फूटती कोपलों की यहां भरमार है
देश-प्रेम की लौ में मर-मिटने को कुछ परवाने बेताब है
रग़ो में दौड़ते-फिरने के वो नहीं क़ायल,
इबारतें अपने ख़ून से लिखने को हरदम तैयार है
जो कभी नहीं भूलें, कि वे भारत मॉं की संतान है
कर्ज़ उसका अदा करने में ही उनका नाम है
ऐसी वतन-परस्ती को हमारा सलाम है
जो तिरंगा ओढ़ कर, लहरा के कहते है
ये ही मेरी आन-बान और शान है
मेरे भारत के जन-गन-मन की पहचान है।
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