वरिष्ठ पत्रकार एवं सुप्रसिद्ध उपन्यासकार-कहानीकार श्री दयानंद पांडे जी के प्रेरित करने पर मैंने ये कहानी लिखी, जिसको वे अपने कालजयी कार्य 'कथा-लखनऊ' में स्थान देना चाहते थे। 'कथा-लखनऊ' 300 वर्षों के कहानीकारों का कथा संग्रह है, जो पूर्व में तय प्रकाशक की लापरवाही से समय पर प्रकाशित न हो सका। चूंकि इस कहानी को मैंने बहुत ही यत्न से सजाया-संवारा था इसलिए मैं इसको जल्द से जल्द कहीं प्रकाशित देखना चाहती थी। जिंदगी का क्या भरोसा ? सो पांडे जी की सहर्ष अनुमति पाकर अपनी कहानी को अपने ही ब्लॉग में पोस्ट कर दिया। पुस्तक का कवर पांडे जी से प्राप्त हो गया। उम्मीद करती हूं शीघ्र ही पुस्तक भी प्रत्यक्ष आ जाये। प्रतीक्षा है...
नीरजा की अधूरी प्रेम-कथा का आरंभ मैं कुमार के उस पत्र से करना चाहूंगी जो उसने नीरजा की बेवफाई ( उसके अनुसार) के एवज में लिखा था...
प्रिय नीरजा!कई बार अपने मन की तकलीफ़ और खुशियों से मेरा सरोकार बढ़ाने के लिए तुमने मुझे ख़त लिखे हैं। मैंने सोचा आज मैं भी ऐसा ही करूं। पहले मेरा सोच थोड़ा हटकर था। मुझे लगता था कि संकेत में ही बात ज्यादा कही जा सकती है। महाबलीपुरम् की रेत में तुम्हारे निशान खोजने की बात मेरे लिए एक पंक्ति में कही जा कर ही काफी थी। वह एक पंक्ति ही मेरे ख़्याल में तुम्हारे वहां न होने की मेरी कसमसाहट को ज्यादा खूबसूरती से व्यक्त कर देती थी। फिर रेचन क्यों हो, क्यों किया जाए?-ऐसा सोचता था। अब मेरे अपने सोच पर ही मेरा यकीन कम होने लगा है। मुझे लगता है शायद खोलकर, विस्तार से कहना और कभी-कभी लिखना भी उतना ही ज़रूरी है।
3 दिसंबर, 17
सुबह 4.15
नीरजा के चेहरे पर, पत्र की हर लाइन के साथ भाव बदल रहे थे। खत खत्म होने के साथ-साथ उसके मन की चक्की उसे पिसने लगी।...तो जनाब आज सुबह-सुबह ये सब लिखने बैठे थे। तभी फोन नहीं उठा रहे थे। खुद आने के बजाय पत्र लिखते है, ये दिखाने के लिए कि उन्हें हमारे बीच के इन सम्बन्धों पर बहुत बेहद गर्व है। मैं ही हूं जो नुक्ता-चीनी कर रही। गो टू हेल...। नीरजा गुस्से में ख़त के टुकड़े-टुकड़े कर देती है। उसका मन जोर-जोर से चीख़ने-चिल्लाने का हो रहा था। इतने सालों तक उसकी हॉं में हॉं ही मिलाई। कोई शिक़वा-कोई शिक़ायत न की। अब मुझे ही भाषणबाजी झाड़ रहे। समझता क्या है? मेरी भी जिंदगी है। मैं करना चाहती हूं शादी...। तुम भागते हो घर बसाने से...लेकिन मुझे अपना घर-परिवार चाहिए...तुम करना चाहो तो ठीक नही तो जहां मेरी मर्जी होगी वहां कर लूंगी।
खुद से बातें करती, रोते-रोते नीरजा कब फर्श पर ही सो गई, उसे पता ही न चला। जब ऑंख खुली तो सिर भारी था और ऑंख भी सूजी सी लगी। उसने उठ कर अपना चेहरा धोया...आइने पर नज़र पड़ी..वाकई ऑखें सूज गई थी। अचानक उसे कुमार के ख़त की याद आई। वह बाहर के कमरे की ओर वापस आई। देखा पत्र के टुकड़े इधर-उधर बिखरे पड़े थे। पंखे की हवा ने उन्हें उडा़ कर पूरे कमरे में फैला दिया था। नीरजा उन टुकड़ो को देख फिर रोने लगी। पर अबकि गुस्से में नहीं, कुमार के प्रेम भरे अल्फाज़ों पर, जो उसने इस पत्र में उतारे थे। इतना प्यार करता है और मैं उसकी नीयत पर शक़ करती हूं। मन शांत हुआ तो नीरजा ने भरी आंखों से तितर-बितर पड़े उन टुकड़ो को बीनना शुरू किया और उनके आपस में जोड़ बैठाने लगी। उन टुकड़ों को बिठाते हुए उसे कुमार से हुई पहली मुलाक़ात याद गई.. उसके मुरझाए चेहरे पर मुस्कुराहट की लहर दौड़ गई।
पहली बार जब नीरजा कुमार से मिली तो उसके चेहरे की मोहिनी मुस्कान ने उसे कैसा तो बांध दिया था। ....हमेशा की ही तरह वह फ्लाइट से उतरने वाली लास्ट पैसेंजर थी। भीड़-भाड़, धक्कामुक्की के साथ उतरना उसे उतरना क़तई पसंद न था। जैसे ही वह बाहरी दरवाजे की ओर बढ़ी, कुमार को काकपिट् से बाहर निकलते देखा। पायलट की पोशाक ...ऑखें में रे-बैन का चश्मा...कितना हैंडसम लग रहा था। दरवाजे के सामने उसे देखकर वह मुस्कुराया और हाथ आगे कर बोला...आफ्टर यू। वह भी मुस्कुरा दी और सीढ़ियां उतरने लगी। आखिरी सीढ़ी पर उसका पैर फिसला और वह लड़खड़ाकर गिरने ही वाली थी कि पीछे से आते कुमार ने उसे संभाल लिया। कैसी तो शर्मिंदा हो रही थी उस समय वह अपने आप पर। लेकिन वह था कि उसे थामे हुए बोले जा रहा था...“आप ठीक तो है न?...चोट तो नहीं लगी?..दर्द तो नहीं हो रहा? मैं अभी आपके लिए व्हीेलचेयर मंगवाता हूं।...आप परेशान न हों।“
“कुमार! आखिर तुम समझ क्यों नहीं रहे। मैं कब तक तुम्हारे इंतजार में बैठी रहूं। एक बार किसी के साथ कहीं चली गई तो कौन सा पहाड़ टूट पड़ा। मेरे साथ ही काम करता है।...और फिर तुम्हारे पास तो मेरे लिए समय ही नहीं। कभी ईस्ट तो कभी साउथ..लगता है जैसे एयरलाइन्स के पास तुम्हारे अलावा कोई और पायलट ही नहीं। आखिर मेरी भी तो कुछ जरूरतें है.... मैं भी तो कहीं अपने-आप के लिए सुकून का पल खोजूंगी। तुम मिलोगे नहीं, किसी और से मैं बात नहीं कर सकती। बस ऑफिस-घर... घर आफिस करते रहो.....मुझे क्या समझा है तुमने? “
....“तो क्या इसका मतलब ये होगा कि तुम किसी और के साथ चल दोगी। ये ही है हमारा आपस का कमिटमेंट ? हम दोस्त ही नहीं, एक तरह से एक दूसरे के जीवन साथी ही है। एक लबे अर्से से हम एक-दूसरे के लिए पूरक ही नहीं, वचनबद्ध भी है...। फिलहाल मैं तो यही मानता हूं।... तुम शायद नहीं। मैं बाहर जाता हूं...बहुतेरी साथी लड़कियों से मिलता-जुलता हूं, पर मज़ाल है किसी की ओर आंख उठा के भी देखूं। क्योंकि मेरे जेहन में सिर्फ तुम रहती हो। मेरे अंतरंग क्षणों की हमदम...साथी...या जो तुम कहना चाहो। और तुम बिना मुझे बताए उसके साथ चली गई। कैसे...? बताओ। मुझे इतना गुस्सा आ रहा है कि मैं क्या जो कर डालूं। मन तो हो रहा है कि तुम्हारा गला दबा दूं या खुद को खत्म कर दूं...।“
नीरजा, कुमार को गुस्से से भरे हुए घर से जाते देखती रही।
....और अगली सुबह मिला उसका ये ख़त, जिसे उसने कल जोड़-जाड़ के सही किया। 24 घंटे से ज्यादा हो गया, पर उसकी कॉल बेक नहीं हुई। इस बीच वो कुमार को 6-7 बार फोन कर चुकी थी। फोन पर लगातार घंटी भी जा रही थी। पर कुमार फोन नहीं पिक कर रहा था। मीटिंग में हूं...फ्लांइग पर हूं, करता हूं कॉल बेक...बस यहीं मैसेज आ रहे थे। लगता है अभी तक गुस्से में है...। शुक्रवार उसका ऑफ होता है...तब उसके घर चली जाऊंगी। यही सही होगा....नीरजा खुद को समझाने की कोशिश कर रही थी। शुक्रवार क्या उसके बाद भी नीरजा उसके घर दो बार हो आई। लेकिन ताला ही मिला। कई दिन से उसके पड़ोसियों ने भी उसे नहीं देखा। ऑफिस गई तो उसकी लगातार ड्यूटी का पता चला। ... जानबूझकर बढ़वायी होगी उसने अपनी फ्लांइग। मुझसे दूर भागने के लिए। अब नीरजा को अपने किये पर अफसोस भी हो रहा था। फिर भी... इतनी भी क्या नाराज़गी? सामने तो आये...माफ़ी मांग लंूगी...उसको किसी तरह मना ही लूंगी। पर मिले तो सही...अब तो 15 दिन होने को आ रहे। क्या एक बार फोन भी नहीं कर सकता। इतना भी क्या बिजी है। ओफ! जाने कब आयेगा...नीरजा की उदासी और इंतजार दोनों बढ़ते जा रहे थे।
नीरजा! नीरजा!!... कुमार की आवाज़ सुन नीरजा दरवाजे की ओर भागी। ओह! ये कुमार ही है। दरवाजा खोलते ही नीरजा उससे लिपट गई और रो पड़ी। रोते-रोते कहने लगी....“कहॉं थे तुम इतने दिन...कितनी बार तुम्हारे घर गई। आफिस गई...मैसेजे़ज-फोन किए। तुमने कॉल बेक तक नहीं की और न ही कोई ढंग का जवाब दिया। इतनी भी क्या नाराज़गी कुमार!“
“मैं नाराज और तुमसे...? सवाल ही नहीं उठता। अरी पगली! मैं बस अब कुछ फैसला कर लेना चाह रहा था। इसलिए तुमसे दूर हो गया कुछ दिन के लिए। बस!“
“कैसा फैसला...?“
“यही कि हमें जल्द से जल्द शादी कर लेनी चाहिए...इससे पहले कि तुम बूढ़ी हो जाओ...“ हॅसता है।
“सच! सच कह रहे हो ना..“
“बिल्कुल! मेरी जान..., अभी यकीन दिला देता हूं। अपना हाथ दो मुझे।“ नीरजा के हाथ देते ही कुमार ने उसकी अंगुली में बेहद खूबसूरत सी हीेरे की अंगूठी पहना दी और बोला...“मैडम नीरजा! ये नाचीज़ आपको अपना जीवन-साथी बनाना चाहता है। क्या आप अपनी इजाजत देगी...।“ अवाक् सी नीरजा ने हामी भरी। ख़ुशी के मारे उसकी ऑंखे छलक पड़ी। कुमार ने उसका माथा चूम लिया और उसका चेहरा हाथ में लेकर पूछने लगा...,“हैप्पी ?“ नीरजा ने हॅंस के अपनी गरदन हिला दी। आज वाकई उसकी ख़ुशी का ठिकाना न था।
और फिर वह हो गया जो दोनों ने कभी एक-दूसरे के साथ नहीं होने देना चाहा था...पर अंततः उसी राह को अपनी आखिरी मंजिल समझ सात फेरों के बंधन में बंध गए। शादी के एक साल बाद नीरजा को कुमार के पत्र के सही-सही मायने समझ आने लगे थे। ‘सखा भाव‘ और ‘पत्नीवत‘ के मायनों का संबंध अंतरंग बंधनों की आजादी से कितना गहरा होता है। बिना मांगे अधिकार दे देना...और मांग कर उस पर हक़ भी जताना, ये बारीक सा दिखने वाला फर्क़ वैवाहिक संबधों में कुंुठा पैदा करता है। उनके साथ ऐसा तो कुछ नहीं हुआ। लेकिन कुछेक तल्खि़यां कभी-कभी दोनों के बीच आ जाती थी। बावजूद इसके वे दोनों अपने इस नये बंधन में बेहद खुश थे, जब तक कि ग्रहण की छाया उन पर नहीं पड़ी।
“कैसी बात कर रहे है। ऐसा कुछ नहीं है। डाक्टर कह रहे है न सब ठीक हो जाएगा। क्यों ख़्वामख़्वाह चिंता करते हो। हम हर तरह का इलाज देखेंगे। मैं हूं ना तुम्हारे साथ।“ नीरजा ने बोल तो दिया, लेकिन सच तो ये है कि वह भी खुद नहीं जानती कि आगे क्या होने वाला है। ल्यूकेमिया उसे भीतर ही भीतर निगल रहा था। एडवांस स्टेज की ओर बढ़ती कुमार की बीमारी के लिए, डाक्टर के पास उम्मीद बनाये रखें..., कहने के अलावा कुछ नहीं था। प्लाज्मा सेल में तेजी से कैंसर फैलने के कारण डाक्टर्स के लिए इलाज कर पाना भी कंट्रोल से बाहर हो रहा था।
पिछले दो साल से हर दिन बढ़ रहे इलाज के खर्चों को नीरजा अब तक किसी तरह खींच रही थी। कुमार के एक साल पहले नौकरी छोड़ देने के बाद से घर की स्थिति डांवाडोल सी थी। हालांकि नीरजा आशावान थी और अपने ईश्वर पर भरोसा भी रखती थी लेकिन कुमार हिम्मत छोड़ रहा था। हमेशा हॅसने -बोलने वाला कुमार शांत और उदास रहने लगा। नीरजा जानती थी कि वह हर घड़ी अपने बारे में कम उसके बारे में सोचकर अधिक ख़ौफज़दा हो रहा है। दोनों के बीच एक अजीब तरह की ख़ामोशी तारी हो रही थी। नीरजा कुमार को खुश रखने का हर संभव प्रयास करती। लेकिन दिन-प्रतिदिन उसकी गिरती सेहत को देखकर भीतर ही भीतर खुद भी कुछ टूटता सा महसूस करती। काश! उसने कुमार के कहने पर उस वक्त आर्ब्सन न करवाया होता। तब उसे भी क्या पता था शादी करते ही वह प्रेग्नेंट हो जाएगी। उस वक्त कुमार चाहता था दो साल तक वह बस उसके साथ दुनिया-जहान की सैर करें। फिर इतनी जल्दी बच्चा कर लेने से नीरजा घर-गृहस्थी के जंजाल में उलझती चली जाती। अपनी टूरिंग जॉब में वह हर पल नीरजा को बस अपने करीब ही देखना चाहता था।
लेकिन तक़दीर को तो कुछ और ही मंजूर था। दो साल के अंतहीन प्रेम की यात्रा का अंतिम पड़ाव ऐसा खौफ़नाक होगा किसे पता था? सिंगापुर में कुमार की हालत खराब होने पर हास्पिटल भर्ती करना पड़ा। सारे टेस्ट के बाद जो रिर्पाेट आयी उसने नीरजा को जैसे आसमान से नीचे फेंक दिया। उसकी चेहरे की रौनक क़ाफूर हो गई। कुमार का सामना करने की उसकी हिम्मत नहीं हो रही थी। लेकिन डाक्टर ने जब कहा कि अभी स्टेज 2 पर है और इसे संभाला जा सकता है, तो उसे कुछ तसल्ली हुई। हालांकि इलाज लंबा और बेहद मॅंहगा था। तो क्या....कुमार के लिए कुछ भी।
और तब से एक साल बीतने को आ रहा...और कुमार पर इलाज का कोई असर क्यों नहीं हो रहा। उसकी सेहत दिन-पर-दिन गिरती ही जा रही थी।
“नीरजा! एक बात कहूं। नाराज तो नहीं होओगी...।“
“कुछ फालतू बात करोगे तो हां...“ नीरजा, कुमार के बगल में लेटते हुए उसके कंधे पर अपना सिर टिकाते हुए बोली...“अच्छा बोलो। क्या कहना चाहते हो....“
“पता नहीं क्यों मुझे लगता है, अब मैं और न जी सकूंगा। लेकिन तक़लीफ़ मुझे इस बात की नहीं है। मुझे बस तुम्हारा ध्यान रहता है। मेरा दर्द तब दुगुना हो जाता है जब सोचता हूं कि मेरे बाद तुम कैसे अकेले अपना जीवन काटोगी....“.
.“....कुमार! ये क्या फालतू की बकवास लेकर बैठ गये...“, उसके कंधे से सिर हटाकर नाराजगी से नीरजा बोली।
“आज कह लेने दो नीरजा... प्लीज! जाने फिर मौेक़ा मिले न मिले। जब मैंने तुमसे शादी करने का फैसला किया, तब ही से तुमको लेकर बहुत सारे सपने बुनने शुरू कर दिए थे। खुशियों से भरा-पूरा संसार तुम्हारे साथ बसाना चाहता था। तुम्हें दुनिया की हर खुशी देना चाहता था। लेकिन देखो अब कितना लाचार से हो गया हूं। न दैहिक सुख और न भौतिक सुख...कुछ भी तुम्हें नहीं दे पा रहा। ऐसा जीवन तो नहीं चाहा था अपने या तुम्हारे लिए। न जाने क्या गलती हो गई। मुझमें तो कोई व्यसन भी नहीं था। फिर ये जानलेवा बीमारी मुझे ही क्यों हुई? अब लगता है काश! तुमको उस वक्त जाने दिया होता...तुम्हारा जीवन तो बचता। तुम्हारी खुशियों का गला घोंट दिया मैंने। सच कहता हूं नीरजा, जब देखता हूं कि तुम्हारी दुनिया मेरे इर्द-गिर्द ही समेटती जा रही है तो कसमसा के रह जाता हूं। तुम्हारी क्रियेटिविटी को मेरे कारण जंग लग गया है....“
“....ऐसा कुछ नहीं है कुमार साहब“ “बीच में टोकती है, “मैं बहुत खुश हूं तुम्हारे साथ। तुम्हारे साथ के सिवा मैंने कभी कुछ चाहा भी नहीं। हिम्मत रखो, सब ठीक हो जाएगा। हम फिर से अपनी खुशियां वापस ले आयेगें। बस तुम निराश मत हो मेरी जान!“
“जानता हूं तुम यही कहोगी। लेकिन मैं खुद को कैसे दिलासा दूं। तुम चाहो तो मेरा ये बोझ कम कर सकती हो...मेरी एक बात मानकर।“
“अच्छा...ऐसा क्या? तो कहो। जरूर मान लूंगी।“
“मेरे जाने के बाद तुम दूसरी शादी कर लेना....। कोई अच्छा जीवन साथी जो तुमको प्यार करता हो, तुम्हारी केयर करे। जो तुम्हारा सम्मान भी करे। वैसे तुमसे तो हर कोई प्यार कर बैठता है। इतनी अच्छी जो हो। मन-शरीर दोनों से बहुत सुंदर। बोलो फिर बसाओगी ना अपना सुंदर संसार, जैसा मैंने देखा था तुम्हारे लिए... वैसा ही संसार। कहो, वादा करती हो...“
रूंधे गले, भरी ऑंखों से नीरजा कुछ कहने के बजाय कुमार के सीने से लग गई।
“सच डार्लिंग। आज ये सब कह कर मैं बहुत हल्का महसूस कर रहा हूं।...हनी! मैने अगर कभी कुछ अच्छा किया है तो ईश्वर से उसके बदले तुम्हारे लिए असीम सुख और प्यार भरे जीवन का वरदान ही मागूंगा। लेकिन नीरजा! एक आखि़र बात और कहता हूं...तुम किसी के साथ भी अपना घर-संसार बसाओ मुझे मत भूलना और न ही कभी ये बात भूलना कि इस दुनिया में कोई था जो तुम्हें अपनी जान से भी ज्यादा प्यार करता था। यहां तक कि मरने के बाद भी...“
रात का 1 बज रहा था...। नीरजा न जाने कब उसकी बांहों में ही सो गई थी।
और अगली सुबह...
उसकी अगली सुबह... और उसके बाद की कई सुबहें...नीरजा दीवानावार कुमार को खोजती रही। उसका फोन भी घर पर ही बज रहा था। उसके सारे संपर्कों पर रिश्तेदार-दोस्त-पुलिस...सबने साथ मिलकर सर्च कर लिया। मिलना तो दूर की बात...उसका किसी तरह का कोई समाचार भी न मिल रहा था। समय बीतने के साथ-साथ उसके मिलने की उम्मीदें भी धूमिल पड़ने लगी....। 3 साल तक चले अनवरत सर्चिंग आपरेशन के बाद अनिश्चिंतता के भंवर में फंसी नीरजा, जिंदगी के गहराते अंधेरों में अब खुद को डूबता सा महसूस कर रही थी...। जरा सी भी आहट उसे चौंका देती और वह... कुमार! कुमार!! ये तुम हो... कहती आवाज़ की दिशा की ओर भागती फिरती। उसके निराश मन को तो बस कुमार के अंतिम अल्फाज़ ही लौ लग गई थी...“इस दुनिया में कोई था जो तुम्हें अपनी जान से भी ज्यादा प्यार करता था। यहां तक कि मरने के बाद भी...।“
आज नीरजा का 56वां जन्मदिन है। घर के भीतर तेज आवाज़ में संगीत चल रहा है। उसके दोस्तों ने उसके लिए पार्टी रखी है। पर इन सबसे दूर, अतीत की स्मृतियों में क़ेैद नीरजा की सूनी नजरें, दरवाजे के बाहर किसी के इंतज़ार में टकटकी लगाए बैठी है....।

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