कुछ दिनों पूर्व केंद्र सरकार ने नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे के छठे राउंड के आंकड़े जारी किए हैं. इससे पता चला कि पिछले चार-पांच साल में बच्चों के पोषण में कोई प्रोग्रेस नहीं हुआ है.
हंगर इंडेक्स ने साल 2020 के सर्वे में भारत की स्थिति पाकिस्तान, नेपाल और बांग्लादेश जैसे देशों से भी खराब होने की रिपोर्ट के लगभग दो महीने बाद ही जारी हंगर वॉच और नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे के नतीजे भी भारत में भूख और कुपोषण की समस्या का भयावह रूप पेष कर रहे हैं. जाने-माने अर्थशास्त्री और सामाजिक कार्यकर्ता ज्यां द्रेज के अनुसार भूख और कुपोषण भारत की घरेलू समस्याओं के बीच सबसे बड़ी चिंता होनी चाहिए. अब यह है या नहीं यह बिल्कुल दूसरी बात है, लेकिन यह होना जरूर चाहिए था.
अल्पपोषण, बाल दुबलापन, बाल ठिगनापन और बाल मृत्यु दर के आधार पर तैयार की जाने वाली ये रिपोर्ट बताती है कि भारत की 14 प्रतिशत आबादी अल्पपोषित (अपर्याप्त कैलोरी लेने की मात्रा) 34.7 प्रतिशत बच्चों की स्टंटिंग दर (5 वर्ष से कम उम्र के बच्चों में उम्र की तुलना में कम हाइट वाली) दर्ज की गई और ‘बाल मृत्यु’ दर 3.7 प्रतिशत है. जबकि ‘वेस्टिंग’ दर (5 वर्ष से कम उम्र के बच्चों में हाइट की तुलना में कम वजन) 17.3 प्रतिशत ही है.
इन आंकडों की हकी़कत जानने के लिए बहुत दूर जाने की जरूरत नहीं होती. आपके आसपास फैली ग़रीबी की फटी चादर नित प्रति आपको नज़र आती ही होगी. उस पर कोरोना काल इस पर कहर बन के बरस गया. जाँ निसार अख़्तर का शेर है-
न मिले भीक तो लाखों का गुजारा ही न हो
हर साल रिफ्रेस किए जाने वाले इन आंकड़ों का असर सुधार की दिशा में दिखता हो मुझे नहीं लगता. जमीनी तौर पर तो नहीं ही दिखता. मेरा तो विचार है कि हर बात पर हंगामा बरपा करने वाले भूख-कुपोषण को मुद्दा बनायें. राजनीति करने वाले या मीडिया तंत्र भूखमरी जैसी विह्द स्थिति पर भी बहसबाजी कर अपनी रोटी सेंक सकते है या टीआरपी बढ़ा सकते है. आंदोलन कारी चक्का जाम कर अपने हित साध सकते है. यकीनन उनका फायदा तो है ही इसमें कुछ हद तक इस हो-हंगामें का फायदा भूखमरी का शिकार हो रही उस ग़रीब को भी मिल जाएगा जिसको जमीन से न उठने देने की कसमें इस देश का तंत्र सदियों से कर रहा.

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