Wednesday, December 16, 2020

सही बात रखना भी जब मौत का सामान ले आये...!

 रोहुल्लाह जाम

डाॅन अखबार द्वारा पाकिस्तान में पत्रकारों पर हो रहे क़ातिलाना हमले पर ये टिप्पणी क़ाबिले गौर है है कि एक लोकतांत्रिक व्यवस्था वाला मुल्क होकर भी वह अपने मीडियाकर्मियों की हिफाजत नहीं कर पा रहा. ‘इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ जर्नलिस्ट’ ने वैश्विक पत्रकारिता पर हाल में एक श्वेत-पत्र जारी किया है, जिसके मुताबिक, पत्रकारिता के लिहाज से दुनिया के पांच सबसे खतरनाक मुल्कों में एक नाम पाकिस्तान का भी है. 

श्वेत-पत्र कहता है कि साल 1990 से आज तक यहां 138 खबरनवीसों को मौत के घाट उतारा जा चुका है. यह आंकड़ा इस मुल्क में प्रेस की आजादी की गंभीर स्थिति का अंदाजा करा देता है. यह श्वेत-पत्र उसी वर्ष में जारी हुआ है, जब ‘फ्रीडम नेटवर्क’ ने एक साल के भीतर पाकिस्तान में पत्रकारों के खिलाफ,कत्ल, मारपीट, पाबंदी, धमकी व कानूनी वाद के 91 मामले दर्ज किए हैं. हालांकि इन दिनों पत्रकारों के कत्ल की वारदातें कम हुई हैं, मगर उन्हें डराने-धमकाने, मुकदमे में फंसाने और दंडित करने की घटनाएं पहले से काफी अधिक बढ़ गई है. 

अखबार लिखता है जिन हालात में पाकिस्तान के भीतर पत्रकारों को आज काम करना पड़ रहा है, वे बेहद चिंताजनक हैं और यहां आलोचना व आजाद ख्याली के लिए जगह सिमटती जा रही है। पत्रकारों को खुलेआम सोशल मीडिया पर धमकाया जाने लगा है और अक्सर जिस आईडी से धमकी आती है, वह सरकार से वाबस्ता होती है. इस साल अनेक पत्रकारों को देशद्रोह के मामले में सलाखों के पीछे धकेल दिया गया, जबकि कइयों को उठा लिया गया और काफी हंगामे व अवाम के दबाव के बाद ही उनकी रिहाई मुमकिन हो सकी. यही नहीं, पत्रकारों के कत्ल या उन पर हुए हमलों से जुड़े मुकदमों में कुछ नहीं होता. 

जियो टीवी के एंकर हामिद मीर पर 2014 में ही कातिलाना हमला हुआ था, वह आज भी इंसाफ का इंतजार कर रहे हैं. हामिद की गिनती पाकिस्तान के उन चंद पत्रकारों में होती है जिन्हें आतंकवाद और सुरक्षा मामलों का विशेषज्ञ तो माना ही जाता है, उन्हें जोखिमपूर्ण पत्रकारिता के लिए भी जाना जाता है. कभी ओसामा बिन लादेन का साक्षात्कार कर चुके हामिद अरसे से तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान जैसे अनगिनत आतंकी संगठनों के निशाने पर हैं और उन्हें अनेक बार धमकियां भी मिल चुकी है. पत्रकार व विश्लेषक रजा रूमी भी ऐसे ही हमलों के शिकार हो चुके है. .

‘इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ जर्नलिस्ट’ के  श्वेत-पत्र के हवाले से कहें तो केवल पाकिस्तान ही नहीं बल्कि हर वह देष में जहां पत्रकारों ने राजनीतिक हलकों के गोपनीय या कह सकते है छद्म मामलों को उजागर करने का प्रयत्न किया तो उनका हश्र बुरा ही हुआ. पाकिस्तान के सलीम शहजाद हो या भारत की गौरी लंकेश, सऊदी अरब के पत्रकार जमाल खशोगी हो या ईरान के मशहूर पत्रकार रोहुल्लाह जाम, इन सभी की हत्या इनकी लिखी-कही गई खबरों में विरोधी रुझान का होना था. वरिष्ठ पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या ने पूरे देश को हिला कर रख दिया और लगभग पूरे साल यह मामला सुर्खियों में छाया रहा. 

भारत के तमिलनाडु राज्य में राजधानी चेन्नई से सटे कांचीपुरम जिले के कुंद्राथूर में 27 वर्षीय टेलीविजन पत्रकार इसरावेल मोसेस पर कुछ लोगों ने उनके घर के बाहर हंसुओं से हमला कर मार डाला. मीडिया में आई खबरों के अनुसार मोसेस ने अपनी कई रिपोर्टों में कुंद्राथुर इलाके में गांजे की अवैध बिक्री और सरकारी जमीन की अवैध बिक्री का विषय उठाया था.दूसरी तरफ भोपाल की राजधानी के बाहरी इलाके के जंगलों में पत्रकार सय्यद आदिल वहाब की लाश मिली है.35 वर्षीय वहाब एक स्थानीय टीवी समाचार के लिए काम करते थे.

अकल्पनीय है किंतु सत्य है कि भारत में ही 2014 से 2020 के बीच 12 पत्रकार गिरफ्तार किए गए हैं और 27 पत्रकार मारे गए. गिरफ्तारी का ताजा-तरीन उदाहरण रिपब्लिक भारत के सीईओ अर्नब गोस्वामी है. 

आईपीआई के मुताबिक, 1997 से लेकर 2020 के बीच इन 23 साल में विष्व भर में 1928 पत्रकारों की हत्या हुई है. इसमें अकेले भारत में 1997 से 2020 के बीच कुल 74 पत्रकारों की हत्या हुई है. इंटरनेशनल न्यूज सेफ्टी इंस्टीट्यूट (आईएनएसआई) की रिपोर्ट में कहा गया कि 2013 में रिपोर्टिग के दौरान दुनिया भर में 134 पत्रकार और मीडिया को सहायता देने वाले कर्मी मारे गए. उनके अनुसार खैबर पख्तूनख्वा, बलूचिस्तान और कबायली इलाके तो पत्रकारों के लिए कत्लगाह से कम नहीं.

इस तरह के हमले लोकतंत्र के चैथे स्तंभ को लहूलुहान तो कर ही रहे पत्रकारों की सुरक्षा को लेकर सवाल भी उठा रहे है. पत्रकार अगर पत्रकारिता की वचनद्धता निभाता है तो उसे मौत और धमकियों का ईनाम मिलता है. किसी देष को ब्लेकमेल करने के लिए पत्रकार का अपहरण कर ब्लैकमेल करना या उन्हें मारकर देष को उसकी औक़ात बताना आतंकवादियों का खेल होता है. लेकिन अपने ही देष में असुरक्षित महसूस करते पत्रकार शायद इन्हीं कारणों से सत्ताधारियों के हाथ का खिलौना बनने को मजबूर है और उसी की जुबान बोलने को राजी भी. कहना अतिष्योक्ति नहीं होगा कि जो तैयार नहीं होते उन्हें देख ही लिया जाता है...!!!! 


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