Friday, September 4, 2015

’पेज 3’ कल्चर और स्याह-सफ़ेद जिंदगी के कड़ुवे सच

अधिक दिन नहीं हुए इस बात को गुजरे जबकि ’अरूषी हत्याकांड’ से हम सब भौंचक रह गये थे। तब ये यकीन करना मुश्किल हो रहा था कि कोई मां बाप कैसे अपनी ही औलाद को कत्ल कर सकते है। इस मर्डर के कारणों ने पिछले कई हाई प्रोफाइल हत्याओं को बहुत का पीछे छोड़ दिया। पत्नी, प्रेमिका या पति की बेवफाई या फिर किसी अन्य कारण से हुए मर्डर में ’अरूषी हत्याकांड’ माता पिता के निष्कपट संबंधों पर भी एक प्रश्नचिह्नलगा गया। फिर भी अरूषी की हत्या एक सोची समझी साजिश नहीं कही जा सकती थी। लेकिन शीना की हत्या पूर्व नियोजित थी। हैरान कर देने वाली बात यह है कि जिस समय नुपुर तलवार और उनके पति डा0 तलवार पर अपनी ही बेटी की हत्या का केस में मुजरिम साबित हो रहे थे, उसी समय एक मां अपनी ही बेटी की हत्या को अंजाम देने की तैयारी कर रही थी।
शीना बोरा, यह नाम है उस बदकिस्मत लड़की का, जिसे बचपन में ही उसके माता-पिता ने त्याग दिया और उसके जीवन का अंत अपनी ही मां इंद्राणी मुखर्जी के हाथों हो गया। जिस तरह अरूषी हत्याकांड की परत दर परत चैंका रही थी वैसे ही शीना बोरा हत्याकांड के जितने खुलासे हो रहे हैं, वह ना सिर्फ चैंकाने वाले हैं, बल्कि यह सवाल भी खड़े कर रहे हैं कि कोई मां अपनी बेटी के साथ ऐसा कैसे कर सकती है। शीना की जिंदगी कितनी भयावह थी इसका अंदाजा उसकी डायरी पढ़ने से होता है। उसकी डायरी के कुछ अंश ही उसकी निजी जिंदगी और हाई प्रोफाइल स्टेटस रखने वाली मां इंद्राणी मुखर्जी के बीच के संबंधों को उजागर करते है, जो आइएनएक्स मीडिया की पूर्व सीइओ रह चुकी हैं।
दरअसल, शीना हो या इंद्राणी या फिर अरूषी, ये जिन संस्कारों से पल कर...बल्कि ’पल कर’ कहना गलत होगा, जिस तरह के माहौल से गुजर कर आते है उसका अंजाम कुछ ऐसा ही होता है। जहां अधिकांशत अपने संस्कारों की बलि चढ़ाकर महानगरों की हाई प्रोफाइल सोसाइटी या फिर हाई प्रोफाइल पदों तक पहंुचने का सफर महत्वाकांक्षाओं की सीढ़ी चढ़कर ही पूरा किया जाता है, इसकी परवाह किए बगैर कि उसके लिए क्या देना होगा और कैसे देना होगा।जब आप पैसा, स्टेट्स की अंधी दौड़ में शामिल हो जाते है तो वह किसी भी कीमत पर चाहिए ही होती है। इसके लिए परपंरा संस्कार की गठरी लपेट के बैठना ’आर्थोडाक्स’ सोच जैसा लगता है। ऐसे महत्वाकांक्षी लोगों की सोच तो ये होती है कि अगर आपमें हुनर है, काम के तरीके आते है और आपमें आकर्षण भी है, तो फिर उस लाइन में मत खड़े हों जिसमें पहले से ही कई खड़े अपना भाग्य आजमा रहे है। बेहतर है थोड़ा से अलग हटकर, अपनी मर्जी और किसी का सहारा लेकर उस स्टेटस तक पहुंचे। ये स्टेट्स और पावर के भूखे उस वक्त नींद से जागते है जब इनको अपने किए, अपने बनाए पर पछतावा होता है।
शीना बोरा की हत्या हाई सोसाइटी के लोगों द्वारा किया गया कोई पहला कांड नहींहै। इससे पहले भी कई ऐसी हत्याएं र्हुउ है जिनमें मामले हाई प्रोफाइल लोगो से जुड़े थे। 1999 में दिल्ली के एक नाइट क्लब में मॉडल जेसिका लाल की हत्या का मुख्य आरोपी मनु शर्मा एक राजनैतिक परिवार से ताल्लुक रखता था। मनु शर्मा को 2006 में उम्रकैद की सजा सुनाई जा चुकी है। नोएडा (उत्तर प्रदेश) में 2008 में 14 वर्षीय आरुषि तलवार और उसके नौकर हेमराज की घर में रहस्यमय तरीके से हत्या हुई और यह केस कई सालों तक सुर्खियों में रहा। टीवी एग्जीक्यूटिव नीरज ग्रोवर की 2008 में कन्नड़एक्ट्रेस मारिया सुसाइराज और उसके प्रेमी जेरॉम मैथ्यू ने बेरहमी से हत्या की थी। इस दिल दहला देने वाले क्राइम में मर्डर के बाद शव को कई टुकड़ों में काटा भी गया था। इस सनसनीखेज हत्याकांड के आरोपियों को सजा मिल चुकी है। हिट एंड रन केस का नाम आते ही दो केस दिमाग में आते हैं, जिसमें पहला है अभिनेता सलमान खान और दूसरा दिल्ली के बिजनेसमैन संजीव नंदा का है। साल 1999 में दिल्ली के लोधी रोड इलाके में रहने वाले बिजनेसमैन फैमिली के संजीव नंदा ने सात लोगों को अपनी कार से कुचल दिया था। अंकुर अरोड़ा मर्डर केस, भंवरी देवी मर्डर केस, नानावती मर्डर केस सभी हाई सोसाइटीज से जुड़े थे। इन हत्याओं की पृष्ठभूमि ने उस सोसाइटी के चेहरे से नकाब उतार दिया जिसे हम उच्च संभ्रात समाज के नाम से जानते है।
हालांकि ये हम सभी जानते है कि कोई भी इंसान दुर्गुणों या बुरे कर्मों के साथ पैदा नहीं होता। उसके बचपन से लेकर युवावस्था तक परिस्थितियां कैसी है और कैसे वह उससे बच के या उसमें ढल कर आता है, इस बात पर बहुत कुछ तय होता है। इंद्राणी भी कुछ इसी तरह के माहौल से दो चार होकर ’टाॅप कुर्सी’ तक पहंुची। महत्वाकांक्षाओं की तेज जद में उसने हर उस संबंध को बेमानी समझा जिसमें उसके लिए कुछ नहीं था और ये उसे उसके पिछले अनुभवों ने ही सिखाया। अपने परिवार में जब हम घर के बड़ों को त्याग, सहनशीलता के साथ व्यवहार करते देखते हैं तो कहीं न कहीं हम भी उन संस्कारों का अनुकरण करने को बाध्य होते है। यहीं बाध्यता हमें इंसान बनाती है और संबंधों का मान रखना सिखाती है। ऐसे संस्कार सीखने से नहीं, अहसास से आते है। लेकिन आज के समाज में पैसा, जायदाद, स्वार्थ में फंसे ऐसे कई परिवारों की संख्या बढ़ रही है जिनके लिए इन संस्कारों का कोई मतलब नहीं।ये समस्या बिंदास और खुले विचारों वाली इंद्राणी की ही नहीं उसके जैसे कईयों कीहैं जो तेजी से उस मुकाम तक पहुंचने के लिए अपने जमीर की भी परवाह नहीं करते तो संबधों को कैसे समझेगें। अफसोस तो इस बात का है कि इनकी बढ़ती तादाद जाने अनजाने में हमारे समाज-परिवार को संस्कारहीन और दिखावटी बनाने में सहयोग कर रही है।
आपको मधुर भंडारकर की फिल्म ’पेज थ्री’ अगर याद हो तो आपको उसमें दिखाई गई हाई सोसाइटीज और उनके दोहरे चरित्र भी याद होंगे। इससे बिल्कुल भी अलग नहीं है ये समाज, जो खुलकर ’लाइफ’ का मजा लेता है, किसी भी तरह के बंदिश को नहीं मानता औरशराब- शबाब के बीच अपने व्यवसायिक हितों की क्षतिपूर्ति करता है। एक तरह से कहा जाए तो अपनी मर्जी के हर वो काम करता है जो उसे हर तरह का सुख दे और किसी भी तरह के तनाव से दूर रखें। दूसरों के प्रति पत्थर सी भावनाएं रखने वाले इन लोगों पर जब भावनात्मक प्रहार होता है तो ये बिलबिला उठते हैं। डा0 तलवार हो या इंद्राणी जब अपने पर पड़ी तो जान लेने पर उतारू हो गएं। डा0 तलवार जिस तरह की ’लाइफ’ जीते रहेे उससे उन्होंने अपने ही घर को जलते देखा तो सहन नहीं कर सके। मुझे तो इन पढ़े लिखे समझदार कहे जाने वाले लोगों से बेहतर गांव के वो अनपढ़ गंवार लगते है जो अपने घर को पारंपरिक संस्कारों के साथ चलाते है और एक सभ्य समाज का निर्माण करते हैं।
शीना की हत्या की चाहे कोई भी वजह रही हो, हमें एक सभ्य समाज पर पड़ते इसके असर पर जरूर गौर करना चाहिए। समय कभी पलट कर नहीं आता इसलिए इसके और भयावह होने का ही खतरा अधिक रहता है। हाई सोसाइटीज की उस बनावटी दुनिया में खुद की असलियत छुपाती इंद्राणी आज अपने अतीत के पन्नों के साथ खुली किताब की मानिंद अखबारों और चैनलों में सनसनीखेज खबर के तौर पर परोसी जा रही है। इस हाई प्रोफाइल ड्रामे पर चैनल ही नहीं बालीवुड भी कमाई करने को तैयार है। अरूषी हत्याकांड पर दो दो डायरेक्टर फिल्म बना चुके है एक निर्देशक मनीष गुप्ता तो दूसरी मेघना गुलजार।फिर महेश भट्ट क्यों पीछे रहे उन्होंने शीना हत्याकांड को लेकर मिलती जुलती अपनी फिल्म की स्क्रिप्ट की घोषणा कर दी है। महेश भट्ट हो या फिर रामगोपाल वर्मा, ये सब भी उसी सोसाइटी से आते है जिसमे दूसरों के लिए कोई इमोशन नहीं। भले ही किसी की जान गई हो या कोई अपनी जिंदगी की दुर्गति पर रो रहा हो, इनके लिए वह महज एक स्टोरी प्लाॅट से अधिक कुछ नहीं। ’पेज 3’ कल्चर और स्याह-सफ़ेद जिं़दगी के कड़ुवे सच जब सामने आते है तो हर किसी को उसमें दिलचस्पी होने लगती है। सेक्स, रोमांस और कानपरेन्सी ही कहानी को रोचक बनाती है और फिर वह हाई सोसाइटी से हो तो क्या कहने!

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