Monday, September 14, 2015

’सत्ता’ के क़ाहिलपन ने किया भारत की ’आदर्श’ शिक्षा का नाश

’भारत में अंग्रेजी राज’ (प्रकाशक-ओंकार प्रेस, इलाहाबाद) के तीसरे संस्करण (1938) के छतीसवें अध्याय को पढ़कर, इस बात पर मुझे घोर आश्चर्य हुआ कि भारत किसी समय उच्च सार्वजनिक शिक्षा प्रणाली का केन्द्र ही नहीं रहा अपितु शिक्षण के नजरिए से दूसरे देशों के लिए ’आदर्श’ भी माना गया। इस पुस्तक के अनुसार देश में अंग्रेजी शासन से पहले भारत में शिक्षा हर नागरिक का पहला अधिकार थी। किंतु अंग्रेजी राज के दौरान नरेशों की अकण्र्यमता का लाभ उठाकर बाहरी ताकतों ने देश में शिक्षा के अधिकार को जिस तरह से कुछ लोगों तक सीमित कर दिया, पढ़ने लिखने वाले हिन्दुस्तानियों को रोजी रोटी के लिए मोहताज कर दिया, हिन्दी भाषा की जगह अंग्रेजी भाषा और साहित्य को महत्व दिया, उसका असर आज भी नजर आता है। जो देश कभी उच्च शिक्षा के लिए मानक माना जाता था और अपनी शिक्षा प्रणाली के सहारे विश्व भर में विख्यात था, आज उसी देश के नागरिक गरीबी, काहिलता, रूढ़िवादिता और बेबसी का दामन पकड़े शिक्षा के प्रति बेरूखापन अपनाए हुए है। अंधविश्वास और दकियानूसी परंपराएं उन्हें अक्षरज्ञान का महत्व समझाने में बाधा डाल रही हैं।
सच तो ये है कि तमाम सरकारी प्रयासों के बावजूद शिक्षा को लेकर अभी भी जो बेरूखापन है, इसका बीज बहुत पहले ही अंग्रेज बो कर चले गए। कहने को हम गुलामी से मुक्त हो चुके है लेकिन क्या वाकई ऐसा है? जिस शिक्षा को अंग्रेजों ने अपने स्वार्थ सिद्धि के लिए, हिन्दुस्तानियों से दूर रखने में अपना हित समझा, वैसे ही आज के सरपरस्त भी अपने स्वार्थ से लबरेज, हालात सुधारने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाना चाहते। अंग्रेजों को इस देश से गए सदियां बीत चुकी लेकिन उनके हाथों किए गए शिक्षा के सर्वनाश से हम अभी तक उबर नहीं पा रहे। प्राचीन भारतीय शिक्षा के उच्चतर से निम्नतर और फिर उसके सर्वनाश के इसी मूल का जिक्र इस छत्तीसवें अघ्याय में है।
आज से सवा सौ साल पहले तक यूरोप के किसी भी देश में शिक्षा का प्रचार-प्रसार भारत जितना न था और न ही आबादी के हिसाब से पढ़े लिखों का प्रतिशत भारत से ही अधिक था। इतिहासकार ही नहीं उस वक्त के अंग्रेज प्रशासनिक अधिकारी भी भारतीय शिक्षा की उच्च व्यवस्था के गवाह रहे हंै। प्राचीन समय में या यूं कहें देश में ईस्ट इंडिया कंपनी के आने से पहले भारत के जनसामान्य को मुख्यतः चार प्रकार की संस्थाओं के योगदान से शिक्षित करने का प्रावधान था। एक तरफ असंख्य ब्राहमण आचार्य अपने अपने घरों पर अपने शिष्यों को शिक्षा देते थे तो दूसरी ओर अनेक मुख्य नगरों में उच्च संस्कृत साहित्य की शिक्षा के लिए विद्यापीठ कायम थीं। उर्दू और फारसी की शिक्षा के लिए जगह जगह मक़तब और मदरसे थे, जिनमें हिन्दू मुस्लिम बालक शिक्षा ग्रहण करते थे। इसके अतिरिक्त देश के प्रत्येक छोटे से छोटे ग्राम में भी गांव के समस्त बालकों की शिक्षा के लिए कम से कम एक पाठशाला अवश्य होती थी। उस वक्त ग्राम के समस्त बच्चों की शिक्षा की व्यवस्था करना प्रत्येक ग्राम पंचायत अपना परम कत्र्तव्य मानती थी। ये व्यवस्था तब तक चलती रही जब तक कि ईस्ट इंडिया ने आकर ग्राम पंचायतों को नष्ट नहीं कर दिया। इस संदर्भ में इतिहासकार लडलो ने ब्रिटिश भारत के इतिहास में लिखा है,“ प्रत्येक ऐसे हिन्दू गांव में, जिसका कि पुराना संगठन अभी तक कायम है, मुझे विश्वास है कि आम तौर पर सब बच्चे यहां लिखना पढ़ना और हिसाब करना जानते हंै। किन्तु जहां कहीं कि हमने ग्राम पंचायत का नाश किया है, जैसे बंगाल में, वहां ग्राम पंचायत के साथ साथ गांव की पाठशाला भी लुप्त हो गई है।“
प्राचीन भारत के ग्रामवासियों की शिक्षा के सम्बन्ध में 1823 की कंपनी की एक सरकारी रिपोर्ट में लिखे बयान को देखकर आप उस वक्त की शिक्षा के उत्कृष्ट स्तर का अंदाजा लगा सकते है। इसमें लिखा है कि -“शिक्षा की दृष्टि से संसार के किसी भी अन्य देश में किसानों की व्यवस्था इतनी ऊंची नहीं है जितनी ब्रिटिश भारत के अनेक भागों में।“ यही कारण है कि 19वीं सदी के आरंभ में डा0 एड्रूबेल नामक एक अंग्रेज शिक्षा प्रेमी ने इंगलिस्तान वापस जाकर अपने देश के बच्चों को भारतीय शिक्षा प्रणाली के अनुसार पढ़ाना शुरू किया। 3 जून सन् 1814 को कंपनी के निदेशकों ने बंगाल के गर्वनर के नाम जो पत्र लिखा वह भारतीय शिक्षा की उत्कृष्टता का साक्ष्य है। इसमें लिखा था-“ शिक्षा का जो तरीका बहुत पुराने समय से भारत में वहां के आचार्यों के अधीन है उसकी सबसे बड़ी प्रशंसा यही है कि डा0 बेल, जो कि मद्रास में पादरी रह चुके है, वही तरीका इस देश में प्रचलित कर रहे है। अब हमारी राष्ट्रीय संस्थाओं में इसी तरह के अनुसार शिक्षा दी जा रही है, क्योंकि हमें विश्वास है कि इससे भाषा को सिखाना बहुत सरल और सीखना सुगम हो जाता है। उन्होंने यह भी लिखा कि हिन्दुओं की इस अत्यन्त प्राचीन और लाभदायक शिक्षण संस्था को सल्तनतों के उलट फेर भी कोई हानि नहीं पहुंचा सके।“ ये भारत की उस उच्च शिक्षा के कलमबद्ध साक्ष्य है जिन्हें अपनी आंखों से उस वक्त के इतिहासकारों और अधिकारियों ने देखा और उसका अनुसरण किया।
आज की पश्चिमी शिक्षा प्रणाली में जिसे “म्यूचुअल ट्यूशन“ कहा जाता है यह पश्चिम ने भारत से ही सीखा। इस संन्दर्भ में बेलारी जिले के कलेक्टर ए0 डी0 कैम्पबेल की सन् 1823 की एक रिपोर्ट पर भी गौर करना जरूरी है। वो लिखते है-“ जिस व्यवस्था के अनुसार भारत की पाठशालाओं में बच्चों को लिखना सिखाया जाता है और जिस ढंग से ऊंचे दर्जो के विद्यार्थी नीचे दर्जो के विद्यार्थियों को शिक्षा देते है और साथ-साथ अपना ज्ञान भी पक्का करते हैं, वह समस्त प्रणाली निःसंदेह प्रशंसनीय है और इंगलिस्तान में उसका जो अनुकरण किया गया है उसके सर्वथा योग्य है।“
भारत की इस प्राचीन सार्वजनिक शिक्षा प्रणाली का नाश 19वीं में आरंभ हुआ जबकि ईस्ट इंडिया कंपनी ने देश में अपने पैर जमाने शुरू कर दिए। एक ओर जहां कंपनी की लूट से भारतीय उद्योग धंधो का नाश होने लगा और देश की दरिद्रता में इजाफा होने लगा था। नन्हें नन्हें बच्चे इस दरिद्रता से बचने के लिए पाठशाला जाना छोड़ माता-पिता का मेहनत मजदूरी कर हाथ बंटाने लगे। वहीं दूसरी ओर प्राचीन ग्राम पंचायतों को समाप्त कर दिए जाने से ग्राम पाठशालाओं का भी अंत होने लगा था।
बेलारी जिले के अंग्रेज कलेक्टर ए0 डी0 कैम्पबेल जो अपने से पूर्व और अपने समय की शिक्षा की दशा के गवाह रहे, लिखते है-इस जिले की लगभग 10 लाख आबादी में से इस समय 7 हजार बच्चे भी शिक्षा नहीं पा रहे है, जिससे पूरी तरह जाहिर है कि शिक्षा में निर्धनता के कारण कितनी अवनति हुई है। बहुत से ग्रामों में, जहां पहले पाठशालाएं मौजूद थीं, वहां अब कोई पाठशाला नहीं है और बहुत से अन्य ग्रामों में जहां पहले बड़ी बड़ी पाठशालाएं थीं वहां अब केवल धनाढ्य लोगों के थोड़े से बालक शिक्षा पाते हैं। दूसरे लोगों के बालक निर्धनता के कारण पाठशाला नहीं जा सकते। कैम्पबेल आगे लिखते है कि जिले में अब घटते घटते 533 संस्थाएं रह गई हैं और मुझे यह कहते लज्जा आती है कि इनमें से किसी एक को भी अब सरकार की ओर से किसी तरह की सहायता राशि नहीं दी जाती। प्राचीन व्यवस्था के तहत शिक्षा व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने के लिए हिन्दुू मुस्लिम राजा शिक्षण संस्थाओं को आर्थिक सहायता या जागीरें भेंट किया करते  थे। जिस पर बाद में कंपनी ने रोक लगा दी थी।
जे सी मार्शमैन के एक बयान के अनुसार 1792 में जब ईस्ट इंडिया कंपनी के लिए नया चारटर एक्ट पास होने का समय आया तो पार्लियामेंट के एक सदस्य विलबरफोर्स ने नये कानून में एक धारा ऐसी जोड़नी चाही जिसका अभिप्राय भारतवासियों के लिए शिक्षा के प्रबंध से था। इसके विरोध में पार्लियामेंट के सदस्यों के साथ साथ कंपनी के हिस्सेदारों ने इतना हंगामा काटा कि विलबरफोर्स को अपनी तजबीज वापस लेनी पड़ी। नए अंग्रेज शासक भी हिन्दुस्तानियों की शिक्षा के विरोध में खड़े हो गए थे। ये शासक भारतीयों की शिक्षा को अपने लिए हितकर में नहीं मानते थे। कुल मिलाकर कर इस विरोध का मकसद, भारतवासियों को सदा जात-पात, मत-मतान्तरों के भेद में फंसाना, आपस में एक दूसरे से लड़ाना, उन्हें अशिक्षित रखना था और अंग्रेजी राज की सलामती की चाह रखना सर्वोपरि था।
इस सोच से थोड़ा सा अलग हटकार लार्ड मैकाले का उद्येश्य अंग्रेजी भाषा, साहित्य, विज्ञान को ’हिंदुस्तानी हाई सोसाइटी’ तक पहुंचाना था। मैकाले ऐसे हिन्दुस्तानियों को शिक्षा देना चाहते थे जो रंग और रक्त की दृष्टि से भले ही भारतीय हो किंतु जो अपनी रूचि, भाषा, भाव और विचार में अंग्रेज हों और अंग्रेज सत्ता चलाने के लिए जिनका उपयोग, एक यंत्र की माफिक किया जा सकें। इस तरह से लार्ड मैकाले के इस प्रयोग ने अंग्रेजी पढे़ लिखों भारतीयों की एक ऐसी अलग जाति बना दी जिन्हें अपने देशवासियों के साथ या तो जरा सी भी सहानुभूति नहीं थी और यदि थी भी तो वह भी बहुत कम। देशी भाषाओं को पनपने से रोकने में भी र्लार्ड मैकाले और तत्कालीन गर्वनर जनरल विलियम बेंटिग ने कोई कसर न छोड़ी। यही वजह है कि आज भी देश में हिंदी को जिस सम्मान का अधिकारी होना चाहिए उसे मैकाले की तर्ज में दी गई शिक्षा के आगे अपना वर्चस्व ढूंढना पड़ रहा है। क्या ये वास्तविकता नहीं है कि आज भी मैकाले इस देश में चंद अंग्रेजीदां लोगों के जरिए अपनी ही सत्ता चला रहा है?
भारतीय प्राचीन शिक्षा को बनाए रखने में भी उस वक्त के राजा जहां अपने काहिलपन और अपने स्वार्थ की वजह से अंग्रेजों के आगे घुटने टेकते रहे, आज वैसे ही सत्ता और उसके अन्तर्गत चल रही व्यवस्था का काहिलपन भारतीय शिक्षा को वह मुकाम नहीं दे पा रहा जो कभी उसका हुआ करता था। कंपनी ने भारतीय समाज की जिस कमजोर नस को उस वक्त दबाकर राज किया था आज का शासित वर्ग भी जनता की उसी नस को दबाए हुए है। गरीबी, अंधविश्वास, रूढिवादी परंपरा, जातपात, भेदभाव को हवा देकर जिन अंग्रेजों ने राज किया और देश के विकास में रोड़ा अटका दिया, वहीं आज का सत्ताधारी इन कारणों के बने रहने में ही अपना हित साधने में लगा है। अंग्रेज चले गए, नीति निर्माता भी बदल गए पर नीतियां वही रही और हम कहते है कि हम आजाद हो गए?

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