Friday, August 28, 2015

'ताकत के दम पर' जातिगत हक़ की नुमांइदगी के ये नये अंदाज


जिस दिन हार्दिक पटेल ने अहमदाबाद में हुक्मरानों को देख लेने की बात कही उस दिन कुछ देर के लिए तो ऐसा लगा जैसे ये आंधी गुजरात ही नहीं देश को भी हिला कर रख देगी। महज 22 साल की उम्र के हार्दिक पटेल के नेतृत्व में गुजरात के पाटीदारों ने पटेलों के आरक्षण के लिए जो तेवरों दिखाए उससे राजनीति के धुरंधर खिलाड़ी भी हक्का बक्का रह गये। लेकिन अफसोस, अपनी ताकत दिखाने का ये जश्न 10 लोगों की जान का काल बनकर भी आया। अब आरक्षण के लिए सत्ताधारियों को ललकारते हार्दिक पटेल की गरम जोशी ने पटेलों को क्या स्वप्न दुःस्वप्न दिखाए, इसका जबाव तो समय को देना हैे। लेकिन क्या अब समय नहीं आ गया कि आरक्षण की हदें तय की जाए और इससे होते ’साइड एफेक्ट’ पर चिंता व्यक्त की जाए। स्थिति भयावह होती जा रही है। अधिकार स्वरूप मांगी जाने वाली आरक्षण की नई परिभाषा भारतीय समाज के टुकड़े टुकड़े कर रही है। योग्यता के ऊपर हक को काबिज़ करने की जोर आज़माईश किसी भी देश काल परिस्थिति के लिए ’आइडियल’ नहीं हो सकती। निश्चित रूप से पूर्व में लिए गए फैसले आज अपना असर दिखा रहा है। देश को जाति धर्म के आरक्षण में लपेटने वाले मंडल कमीशन का जहर अब रग़ों में जहर बन कर दौड़ने लगा है। वक़्त के साथ साथ ये जहर समाज को नफरत की आग में झोंक देगा, ये जानते हुए भी हम अपनी ढपली अपना राग की तर्ज पर झूम रहे हैं।
सामाजिक शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों की स्थिति की समीक्षा के लिए मोरारजी देसाई सरकार ने जब बिंदेश्वरी प्रसाद मंडल की अध्यक्षता में छह सदस्यीय पिछड़ा वर्ग आयोग के गठन की घोषणा की थी तब उन्हें भी संभवतः इसकी कल्पना नहीं होगी कि उनका ये फैसला भविष्य में किस तरह से अपना नकारात्मक प्रभाव दिखायेगा... आरक्षण के नाम पर जाति धर्म कुकरमुत्तों की तरह निकल आएंगे और वोट बैंक का रूप लेते जाएंगे। आज आरक्षण की मांग का राजनीतिकरण नेताओं की चांदी कर रहा है तो बेवकूफ जनता अपने ’सो काॅल्ड’ रहनुमाओं के इशारे पर नाच अपने दिन फिर जाने का सपना देख रही है। अपना उल्लू सीधा करने वाले इन सत्ताधारियों की चाल को नाकाम करने की कोशिश भी की जाती रही है। आपको याद होगा तत्कालीन प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने जब मंडल कमीशन की रिपोर्ट लागू करने की घोषणा की थी तब 14 अगस्त 1990 अखिल भारतीय आरक्षण विरोधी मोर्चे के अध्यक्ष उज्जवल सिंह ने आरक्षण प्रणाली के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी। संभवतः उन्हें भी इसके साइड एफेक्ट का इल्म होगा।  सुप्रीम कोर्ट ने उनकी याचिका पर अपने ’ऐतिहासिक फैसले’ में मंडल आयोग की सिफारिशें लागू करने के फैसले को वैध ठहरा दिया था। लेकिन फैसले में आरक्षण की अधिकतम सीमा 50 प्रतिशत रखने और पिछड़ी जातियों के उच्च तबके को इस सुविधा से अलग रखने का निर्देश दिया था। उस वक्त इस आरक्षण की आग ने देश की आत्मा को झकझोर दिया था और एसएस चैहान, राजीव गोस्वामी, मीनाक्षी जैसे कितने आरक्षण के विरोध की चपेट में आकर अपनी जान गंवा बैठे।
तब से अब तक इस मुत्तालिक़ स्थितियां बदली हो, ऐसा नहीं है। ’आरक्षण’ इस एक शब्द ने धर्म को जाति में और जाति को उपजाति में बदल दिया। सरकारी नौकरी में विकलांग के लिए आरक्षण की मान्यता ने उन्हें भी आंख नाक कान से विकंलाग बना दिया जो शारीरिक रूप से पूर्णतया स्वस्थ हैं। देश काल का न होकर आदमी धीरे धीरे इस आरक्षण के लालच में अपने लोग अपने समाज तक सिमट गया। स्वार्थी हो चुके समाज में आप फिर जिस चीज को हवा दे सकते है तो वो है सिर्फ और सिर्फ नफरत। इस नफरत से अगर किसी ने अपनी रोटी सेंकी तो वो है राजनैतिक पार्टियां और नफरत करने वाले, राजनीतिकारों के खेल को न तब समझ सके, न आज ही समझ पा रहे हैं। ये खेल कुछ नया भी नहीं। 22 साल पहले भी जब मंडल आयोग की सिफारिशें स्वीकार हुई थीं, इसके पीछे सामाजिक बदलाव की इच्छा से अधिक दबाब राजनीतिक समीकरणों का था। इसीलिए इस रिर्पोट के लागू होने के बाद देश में दो चीजें एक साथ हुईं। एक- देश की अर्थव्यवस्था में बड़े पैमाने पर उदारीकरण शुरू हो गया। दो-सरकारी खर्च और वित्तीय घाटा कम करने की कवायद शुरू हो गई। जिसके कारण सरकारी नौकरियों में कटौती जैसी चीजें शुरू हुईं। सरकारी क्षेत्र में रोजगार के अवसर कम होने लगे तो निजी क्षेत्र में रोजगार के अवसर बेतहाशा बढ़ने लगे। अब चूंकि निजी क्षेत्र में किसी के लिए आरक्षण की कोई संभावना नहीं थी इसलिए मंडल आयोग की सिफारिशें लागू होने पर वो वग घाटे में ही रहा जिसके लिए इतना तूफान मचा।
यही वजह है कि आज 25 साल बाद भी जो तर्क आरक्षण के पक्ष और विपक्ष में उस समय दिए जाते थे, वे आज भी अपनी जगह कायम हैं। उस समय जो आरक्षण के समर्थक और विरोधी थे, वे भी वहीं खड़े हैं। जो बदलाव हुआ भी, उसने पिछड़े वर्ग के राजनीतिक आक़ाओं की रफ्तार जरूर तेजी से बढ़ा दी। पिछड़े तो वैसे ही कमजोर और असहाय रहे, उनके कर्णधार जरूर सशक्त होते चले गए। इन सालों में पिछड़े वर्गो का प्रतिनिधित्व करने वाली राजनीतिक ताकतें भी खूब उभरकर सामने आईं। उत्तर प्रदेश व बिहार जैसे राज्यों में पिछड़े वोटों के सहारे कद बढ़ाती ये पार्टियां भी आरक्षण के बीज को सींचने से पीछे नहीं हटी। वैसे भी सत्ताधारियों की इच्छा गरीब पिछड़ों के जीवन को बेहतर करने से ज्यादा उनकी पहचान को समूह में बांटने की अधिक रही है। फिर हर चुनाव में इस समूह से किए गये वायदे, जीत के पक्की तौर पर मिल जाने का यकीन तो करा ही देते है। ऐसी ही परिस्थितियों में प्रतीक के तौर पर कोई एक महत्वाकांक्षी ’हार्दिक’ खड़ा कर ही दिया जाता है। तभी तो राजनीति के आकाश में अचानक ही से हार्दिक पटेल जैसा कोई चमकने लगता है और उन पटेलों की चिंता पर आग बबूला होने लगता है जो अब तक गुजरात ही क्या देश-दुनिया के समृद्धों मे गिने जाते रहे हैं।
हार्दिक पटेल भी कुछ इसी तरह के सपनों को बेचने निकल पड़े है। इस कम व्यस्क नौजवान की राजनीतिक मंशा औरों से कुछ कमतर नजर नहीं आती। पाटीदारों को आरक्षण के नाम पर इकट्ठा कर इसने भी युवा नस्ल की उसी नस को ही छुआ है जिसे बेरोजगारी की मार कहते है। इसलिए इस आंदोलन को उन्होंने ‘अधिकारों की लड़ाई’ कहा है। इस सम्बन्ध में उन्होंने सरकार को आगाह भी कर दिया है कि अगर जरूरत पड़ी, तो वे इस अधिकार को ‘ताकत के दम पर’ भी हासिल करने से परहेज नहीं करेंगे। मतलब स्पष्ट है कि शांति और अहिंसा से अगर मांग पूरी नहीं हुई, तो वे ‘हिंसा का रास्ता चुनने से भी नहीं डरेंगे’। हार्दिक पटेल के इस साफ नजरिये से चैंकने से ज्यादा उस वक्त के लिए सहमने की जरूरत है जबकि भविष्य में ऐसे ही कोई और हार्दिक पटेल किसी और समाज की चिंता लेकर खड़ा होगा और अपने हक के लिए अपनी ताकत का मुज़ाहिरा करेगा ?
अफसोस होता है कि आज़ादी के बाद, दशकों की यात्रा के बाद भी देश में मूल अधिकारों के लिए कोई अपनी ताकत की आजमाईश नहीं करना चाहता। शिक्षा, रोजगार जैसी मूल समस्याएं आज भी भारतीय व्यक्ति के विकास में बाधा बनी हुई है। शिक्षा की कमी जहां सोच का विकास नहीं कर रही वहीं बेरोजगारी का चक्र आत्मविकास के रास्ते में रोड़े अटका रहा है। बेहतर होता हार्दिक पटेल जैसे युवा अपना आक्रोश, अपनी उर्जा आरक्षण का हक मांगने के बजाय इन मूल अधिकारो से लड़ने में लगाते। लेकिन हार्दिक भी जानते है कि इस तरह के रास्ते त्याग और तपस्या की मांग करते है और आपकी महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति में खरे नहीं उतरते। राजनीति के हलकों में शीर्ष तक पहंुचने के लिए राजनीतिक पायदान ही काम आते है। उनके लिए आरक्षण के नाम पर दिखाई गई ये ताकत उस मुकाम की पहली सीढ़ी साबित हुई जहां तक वह पहुंचना चाहते हंै।












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