Friday, August 14, 2015

बार बार खंडित की जाती संसदीय गरिमा

261 करोड़ और 198 घंटे की बर्बादी के साथ ही इस बार का मानसून सत्र भी निपट गया। अपने-अपने स्वार्थ के लिए तमाम दलों द्वारा मचाए कोहराम के चलते संसद का मानसून सत्र बिना किसी परिणाम के, बिना किसी काम के इन माननीयों की बेजा हरकतों की बलि चढ़ गया। संसदीय इतिहास में ये सत्र काले अक्षरों में दर्ज किए जाने लायक है। बेहद शर्मनाक और गैरजिम्मेदाराना व्यवहार वाले हमारे माननीय किसी भी हाल में सम्मानजनक शब्दावली के अधिकारी नहीं है। इस सत्र के कड़ुवे अनुभव आने वाले समय में होने वाले सत्रों को कोई सीख दे पाएं कहना मुश्किल है। समय के साथ-साथ आप इनके और अधिक बदरंग होने की उम्मीद जरूर कर सकते है। तकलीफ कि बात तो यह है कि अपने अपने राम के चलते किसी को यह देखने की फुरसत ही नहीं रही कि इस देश की जनता अपने इन कर्णधारों की नंगई से कितनी शर्मसार हो रही है। अफसोस इस बात का भी होता है कि जब पार्टी दिग्गज या कहें पार्टी आलाकमान भी इस हंगामें में अपने सासंदों को पूरा सहयोग करते है।

एक वक्त था कि सत्र शुरू होने का इंतजार रहता था। यह सोचकर आनंद आता था कि सत्र के दौरान किस दिग्गज का भाषण सुनने लायक होगा और किस बिल पर बहस के दौरान ससंद का माहौल कितना जोशोखरोश भरा होगा। किसी वक्त अनुशासित और शिष्ट वातावरण में चलती ससंद आज इतिहास के पन्नों तक सीमित रह गई है। जिन नेताओं की झलक पाने और उन्हें सुनने की युवाओं, घर के बड़े बुजुर्गों में जेरे बहस तारी होती थी। आज इसके ठीक उलट हंगामा, शोरगुल करने में माहिर होते सासंदों को देशवासी नफरत से देख रहे है। एक तरह से कहा जाए तो अपने फैसले पर षर्मिंदा हो रहे है। शिष्टाचार की धज्जियां उड़ाने वाले ये सासंद कौन सा उदाहरण अपने देश के आगे रख रहे है। मेज कुर्सी माइक पटकने से लेकर अभद्र भाषा का प्रयोग आज आम बात हो गई है। वेल तक पहुंचना तो आम बात होती जा रही है, अब प्ले कार्ड तक पीठासीन के सामने लहराए जाने लगे है। कामकाज निपटाने की जगह ससंद को जंतर मंतर बनाया जा रहा है, जहां धरना प्रदर्शन और नारेबाजी ही अपनी बात को कहने या रखने का एकमात्र साधन समझा जाता है।

एक ओर इस पूरे सत्र के दौरान सत्ता पक्ष यह दिखाने में लगा रहा कि वह तो ससंद चलाना चाह रहा है प्रतिपक्ष ही उसे ऐसा करने से रोक रहा है। दूसरी ओर विपक्ष अपनी मांगों से पीछे हटने को तैयार न होकर सत्ता पक्ष को ही इस सब का दोषी बताता रहा। बड़े बड़े नेताओं की समझदारी पर इस देश की जनता कुर्बान। इनमें से किसी ने भी आपसी मतभेदों को दूर करने कराने की चेष्टा तक नहीं की। जिन बातों को सत्र से पहले सुलझाने की कोशिश होनी चाहिए उन्हें सत्र में हंगामाखेज बनाने के लिए रख छोड़ा गया। सत्ता पक्ष को पता था कि विपक्ष सत्र चलने नहीं देगा जब तक सुषमा स्वराज, वसुंधरा राजे ललितगेट मामले में और शिवराज सिंह चैहान व्यापम घोटाला मामले पर इस्तीफा नहीं दे देते। फिर भी भाजपा इस्तीफे वाली बात पर किसी तरह की असमंजस वाली स्थिति में नजर नहीं आई। संसदीय दल में प्रस्ताव पारित कर उसने कांग्रेस को विध्वंसकारी विपक्ष बता दिया। यही नहीं कांगेस को बाधा डालने वाली तथा विकास विरोधी नीतियों पर काम करने वाली कहकर उसकी कड़ी आलोचना कर डाली। प्रस्ताव में दो-टूक कह दिया गया कि सुषमा स्वराज, वसुंधरा राजे और शिवराज सिंह चैहान का इस्तीफा मांगने का कोई आधार नहीं है। अतः भाजपा संसदीय दल ने विपक्ष का निशाना बने इन तीनों नेताओं के साथ खड़े रहने का संकल्प जता दिया।

भाजपा और विपक्ष ऐसी किसी साझा सहमति की तरफ बढ़ते नहीं दिखे, जिससे संसदीय गतिरोध दूर होता। कांग्रेस और उसके साथ लेफ्ट पार्टियों एवं जनता दल (यू) ने इस्तीफा नहीं तो काम नहीं का चरम रुख अपना रखा है। तीनों नेताओं के इस्तीफे से पहले वे संसद में किसी चर्चा या सत्ता पक्ष का स्पष्टीकरण सुनने को तैयार नहीं हैं। और फिर लोकसभा से एक साथ 25 सांसदों के निलंबन से आग में घी का काम तो हो गया, ससंद की कार्यवाही के मामले में नतीजा सिफर ही रहा। इस बात पर नाराज कांग्रेस सांसदों ने संसद भवन पर धरना दे दिया जिसका नेतृत्व खुद सोनिया गांधी ने संभाला। पार्टी आलाकमान के आने से और साथ साथ नारे लगाने से कांग्रेस का मनोबल तो बढ़ा ही, इस प्रदर्शन में कुछ अन्य विपक्षी दल भी शामिल हो गए।

यकीनन सत्र में बार-बार कार्यवाही स्थगित होने से प्रश्नकाल जाया होता है। संसद और सांसद दोनों का ही प्रयोजन व्यर्थ हो जाता है। समस्याएं जस की तस रह जाती हैं और अपना कीमती वोट देने वाले निमित्त मात्र से लगने लगता है। संसद न चलने से जहां एक ओर महत्वपूर्ण कामकाज नहीं हो पाता और देश के विकास से जुड़े तमाम बिल अटके रह जाते हैं। वहीं संसद में जारी गतिरोध के कारण देश के खजाने को आर्थिक नुकसान भी होता है। संसदीय मामलों के मंत्रालय के अनुमान के मुताबिक, संसद में कामकाज न होने से देश को प्रति मिनट ढाई लाख रुपये का नुकसान होता है। अगर इसके आधार पर एक दिन का नुकसान लगाया जाए तो यह तकरीबन 10 करोड़ रुपये बैठता है।

सत्र के दौरान भारी हंगामें को देखकर विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने जज्बाती भाषण जब दिया तो एकबारगी लगा कि संभवतः अब सांसद शांत बैठ जाए पर ये दांव भी खाली चला गया। उल्टे कांग्रेस के हमले तेज हो गए। सोनिया गांधी ने उन्हें ड्रामा करने में माहिर बताया, तो राहुल गांधी ने विदेश मंत्री से यह बताने को कहा कि उनके परिवार को ललित मोदी से कितने पैसे मिले? सवालों से परेशान भाजपा किसी तरह सदन को चलाये रखने की कोशिश में दिखी तो वहीं दूसरी ओर संसद में काम न चलने देने पर कांग्रेस यह सोच सोच कर फूल कर कुप्पा होती दिखी कि यह सत्र राजनीतिक रूप से उसके लिए फायदेमंद रहा। भ्रष्टाचार के कथित मामलों को लेकर अधिकांश विपक्षी दल भी उसके साथ गोलबंद था तो उसे ये लगना लाजमी भी है कि संसदीय कार्यवाही को पंगु बनाने में वह कामयाब रही।

सही मायने में कहा जाए तो यह सत्र भाजपा को कांग्रेस का जबाव रहा। अगर आपको याद हो तो पिछली दो लोकसभाओं के दौरान उसके संसदीय आचरण का रिकॉर्ड इतिहास में दर्ज मिल जाएंगे। संसद को अवरुद्ध करने को उचित राजनीतिक रणनीति बताने की शुरुआत भाजपा ने ही की। तब उस वक्त भरी बहुमत से जीत कर सत्ता में आए कांग्रेसी नेता कहते थे कि भाजपा आम चुनाव में अपनी हार नहीं पचा पाई, इसलिए असंसदीय व्यवहार कर रही है। आज वस्तुस्थिति उलट है। अब भाजपाई कांग्रेस पर यही इल्जाम लगा रहे हैं।

देखा जाए तो असंसदीय व्यवहार का ताना देने वाले जब खुद सत्ता में होते है तो अपना समय भूल जाते है। दोनों ही अपने अपने वक्त में अपनी जिम्मेदारियों का ठीकरा दूसरे पर मढ़ते नजर आते है। ना जाने कब इन्हें ये समझ आएगा कि देश चलाने के लिए दोनों ही पक्ष जरूरी है। यदि सत्तापक्ष जनादेश का राजकाज चलाने के लिए है तो विपक्ष उसके काम की निगरानी करने के लिए है। आपसी टकराव में तो वे केवल देश के कामकाज ही ठप कर रहे हैं।

जनता के लिए जनता के द्वारा चुने गए सांसदो को यह नहीं भूलना चाहिए कि आज जिस जगह बैठ कर वे अकड़ रहे है यहां से उतारने में जनता भी देर नहीं करेगी। जैसे लगातार संसदीय अवरोध खड़ा करने का अंजाम 2009 में भाजपा भुगत चुकी हैै। संसद का कार्य बाधित कर अपनी रणनीति की सफलता को राजनीतिक फायदे समझकर बैठी कांग्रेस भविष्य के प्रति भी आगाह रहे तो बेहतर होगा।





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