Friday, May 25, 2018

जापान में कंस्ट्रक्शन उद्योग में महिला-विरोधी माहौल आज भी नहीं बदला

न्यूयार्क टाइम्स में मारी साइतो का लेख पढ़ रही थी. उससे एक बात तो साफ समझ आई कि पुरूष-महिला की बराबरी के अधिकार की समस्या भारत की ही नहीं, बल्कि हर देश की है. भारत में भी एक समय था महिलाओं को शिक्षा से वंचित रखा जाता था, मुख्यधारा से नही जुड़ने दिया जाता था और न ही कोई रोजगार करने दिया जाता था, उन्हें सिर्फ घर की चारदीवारी में कैद करके रखकर कभी मंगलसूत्र के बन्धन में तो कहीं ममता के मोह में बांधकर, कहीं पत्नी के रूप में तो कहीं मां के रूप में कैद रखा गया. यह सच है कि अब हालात पहले जैसे नही हैं महिलाएं, शिक्षित होने लगीं हैं, हर क्षेत्र में आगे बढने लगी हैं.
भारतीय संविधान ने भी महिला व पुरुष को समानता का अधिकार दिया है, साथ ही हमारी सरकारों ने भी महिलाओं के लिए अनेक योजनाएं चालू की हैं, इसके बावजूद समाज में महिला-पुरुष को लेकर अनेक तरह के भेद-भाव बना दिए गये हैं और हर जगह महिलाओं को कमतर आंकने की कोशिश की गई है. जापान की स्थिति पढ़कर तो मुझे फिर भी भारत में औरतों की हालत इतनी बुरी भी नहीं लगती.
मारी साइतो के लेख के अनुसार जापान में नौकरी करने वाली महिलाओं को महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों से दूर रखा जाता है और उन्हें वेतन व मजदूरी भी तुलनात्मक रूप से कम दी जाती है. उसमें भी कंस्ट्रक्शन उद्योग का माहौल महिला-विरोधी होने के लिए कुख्यात है.
कार्यस्थलों मे महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के लिए प्रधानमंत्री शिंजो आबे ने ‘वुमैनोमिक्स’ नाम से एक पहल की है. इसके तहत महिला कर्मचारियों को महत्व देने और आगे बढ़ाने वाली कंपनियों को प्रोत्साहित किया जाता है. इसका नतीजा ये है कि जापान में महिला कर्मचारियों की जितनी संख्या अभी है, उतनी पहले कभी नहीं थी. यही नहीं, इस देष के कार्यबल में महिला कामगारों के शामिल होने की दर अमेरिका से अधिक है. लेकिन कंस्ट्रक्शन क्षेत्र में महिलाओं की कमी पहले जैसी ही है.
एक छोटी कंस्ट्रक्शन कंपनी जैमकेन की मुख्य कार्यकारी जुनको कोमोरिता कहती है, जापान में अब भी ऐसे बहुत लोग हैं, जो कार्यस्थल में किसी महिला से निर्देश लेना पसंद नहीं करते.
साइतो बताती है इंजीनियर की नौकरी में निशिहाको इसका सबसे ताजा उदाहरण है.सुपरवाइजर की अपनी नौकरी के पहले दिन जापान की एक कंस्ट्रक्शन साइट पर माहो निशिहोका का अनुभव बहुत अच्छा नहीं था. जिन लोगां के काम पर उसे नजर रखनी थी, उन्होंने उसके निर्देषों की अनदेखी तो की है, उससे बात करने तक से इन्कार कर दिया था. उस साइट पर वह अकेली प्रषिक्षित इंजीनियर थी, इसके बावजूद एक आदमी ने उसे कंकरीट के एक पुल का निरीक्षण करने से न सिर्फ रोक दिया, बल्कि निशिहाको पर चिल्लाते हुए कहा था, औरत होकर तुम सुपरवाइजर का काम क्यों कर रही हो? निशिहाको का डरना स्वाभाविक था. नौकरी करते उन्हें बीस साल बीत चुके हैं, लेकिन माहौल में आज भी कोई फर्क नहीं आया है.
मारी साइतो अपने लेख में आगे कहती है कि यह उस देष का हाल है, जहां जन्म दर कम होने और प्रवासी कामगारों से जुड़े कानून के सख्त होने के कारण श्रमिकों की भारी कमी है. इसका खामियाजा सिर्फ कंस्ट्रक्शन उद्योग को नहीं, अर्थव्यवस्था को भी भुगतना पड़ रहा है. हालांकि निर्माण उद्योग और सरकार, दोनों अब महिलाओं को रोजगार देने के मामले में प्रयत्नषील है. मसलन, अनेक कंस्ट्रक्शन कंपनियां महिला कामगारों के लिए पोर्टेबल शौचालय और ड्रेसिंग रूम उपलब्ध करा रही हैं लेकिन पिंक टाॅयलेट्स की व्यवस्था देख पुरूष श्रमिक बिफर जाते हैं.
निशिहोका कहती हैं कि सरकार को ऐसा माहौल बनाना चाहिए, जिससे श्रमिकों के लिए काम करना आसान हो. युहो नाकामुरा एक सुपरवाइजर हैं, जिन्हें व्यस्त महीनों में आधी रात तक रूकना पड़ता है. दरअसल निर्माण क्षेत्र में महिलाओं के न आने की एक बड़ी वजह काम की लंबी अवधि भी है. एक तो उन्हें देर शाम तक रोके रखा जाता है, उस पर कई बार उन्हें सप्ताहांत में भी बुला लिया जाता है.

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