गालिब का एक शेर याद आ रहा है
यारब, वो न समझे है न समझेगें मेरी बात
दे और दिल उनको, जो न दे मुझको ज़बां और
कुछ ऐसा ही महसूस हुआ जब कंपनी सेक्रेटरीज को दिए गये उद्बोधन में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने एक बार फिर विपक्षियों को अपने तर्कों से मात देने की अच्छी कोशिश कर दी। तीन साल के लेखे-जोखे के साथ उन्होंने पिछली सरकार की वर्किंग को, इस सरकार के कामकाज, से दोयम दर्जे का साबित कर दिया। कुल मिलाकर आंकड़ों से सजी इस स्वर्ण जयंती समारोह में ये साबित हो गया कि देश का विकास पेपर पर कहीें ज्यादा बेहतर और पुख्ता ढंग से किया जा सकता है। और फिर जब सूत्रधार की प्रस्तुति, कागजों में दौड़ते विकास को साक्षात सामने खड़ा कर देने की कूवत रखती हो तो शंका की गुंजाइश तो रह ही नहीं जाती। गत दिनों अर्थशास्त्रियों के अटैक से आहत प्रधानमंत्री भी इस समारोह में अपनी पूरी तैयारी के साथ नजर आये। इलेक्टानिक स्लाइड पर मजबूत आर्थिक आंकड़े पेश कर उन्होंने भले ही विपक्षियों को नाक भौं सिकोड़ने का एक मौका और दिया हो। पर हमेशा की तरह उन्होंने इस बार भी जनता को तो भरोसा दिला ही दिया कि देश सही दिशा में चल रहा है। और फिर विज्ञान भवन में मोदी के इस ’अर्थशास्त्र’ की संस्तुति करने वालों की कमी तो थी नहीं।
भारतीय कंपनी सचिव संस्थान (आईसीएसआई) के स्वर्ण जयंती समारोह में मोदी गरजे-बरसे। उन्होंने विपक्ष पर तंज कसा तो सामने बैठे लोगों से चुटकी भी ली। बड़े बड़े अर्थशास्त्रिों जैसे मनमोहन सिंह, यशवंत सिन्हा, पी चिंदबरम पर भी उन्होनें निशाना साधा। अपने किए कार्यों के बखान में उन्हें पिछली सरकार के हर कर्म में खोट नजर आया। लेकिन उनकी स्पीच सुनते हुए मुझे ऐसा लगा कि वे जो कह रहे है वह अभी सच्चाई से कोसों दूर है। हां कुछ बातें ऐसी भी है जो बेहतरी की ओर इशारा कर रही है। लेकिन यकीनन अभी भारत की स्थिति ऐसी भी नहीं हुई जैसा कि प्रधानमंत्री समझाना चाह रहे है। इसके लिए कुछेक बातों पर नजर डालनी होगी।
हाल ही में जारी फिच रेटिंग्स पर नजर डाले तो भारत की जीडीपी वृद्धि दर के अनुमान को 7.4 प्रतिशत से घटाकर 6.9 प्रतिशत कर दिया है। चालू वित्त वर्ष 2017-18 की अप्रैल-जून तिमाही में आर्थिक वृद्धि में गिरावट के बाद फिच रेटिंग्स ने यह अनुमान घटाया है। हालांकि, साख रेटिंग एजेंसी ने कहा कि वित्त वर्ष की दूसरी छमाही से आर्थिक गतिविधियों में तेजी की उम्मीद है। वर्ष 2016 के नवंबर में नोटबंदी और इस साल जुलाई में माल एवं सेवा कर (जीएसटी) के प्रभाव समेत अन्य कारणों से आर्थिक गतिविधियां प्रभावित हुई हैं। फिच रेटिंग्स ने अपने ताजा वैश्विक आर्थिक परिदृश्य में कहा है, बैंकों की बढ़ी हुई गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों (एनपीए) के कारण भी ऋण वृद्धि और व्यापार निवेश के लिये परिदृश्य कमजोर बना हुआ है।
लगातार गिरती इसी जीडीपी और चरमरा रही अर्थव्यवस्था के कारण मोदी सरकार की मुश्किलें बढ़ रही हैं। विपक्ष तो उन्हें इस मुद्दे पर उन्हें घेर ही रहा है, लेकिन परेशानी तब बढ़ी जब अपनों ने भी आवाज उठानी शुरू कर दी है। हद तो तब हो गई जब बीजेपी के बड़े नेता और पूर्व वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा ने अपने राष्ट्रधर्म का मान रखते हुए देश की गिरती अर्थव्यस्था के लिए वित्त मंत्री अरुण जेटली पर निशाना साधा। यशवंत सिन्हा के इस बैखौफ अंदाज को आम जनता की स्वीकृति मिली तो भाजपा के दिग्गज नेता मीडिया को जबाव देने से कतराने लगे।
नोटबंदी के बाद आर्थिक वृद्धि के मामले पर भारतीय रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने भी कहा था कि सरकार को दुनिया में सबसे तेजी से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था को लेकर अपना सीना तब तक नहीं ठोकना चाहिये जब तक कि लगातार दस साल तक मजबूती जीडीपी वृद्धि हासिल नहीं कर ली जाती है। राजन ने एक इंटरव्यू के दौरान कहा था कि भारत संस्कृति और इतिहास जैसे मुद्दों पर तो दुनिया में बढ़चढ़कर अपनी बात कह सकता है, लेकिन वृद्धि के मोर्चे पर उसे ऐसा तभी ऐसा करना चाहिए जब वह दस साल तक 8 से 10 प्रतिशत की उच्च आर्थिक वृद्धि दर हासिल कर लेता है।
देश की आर्थिक बदहाली पर बोलने वालों में अरूण शौरी भी है जिनका मानना है कि यशवंत सिन्हा, पी चिदंबरम और अन्य अर्थशायत्री तथ्यों के आधार पर अपनी बात रख रहे है। क्या ले तथनहीं माना जाएगा कि पुराने हिसाब किताब से आर्थिक विकास दर 3.7 फीसदी पर आकर सिमट गई है। औद्योगिक उत्पादन 2015-16 के 9 फीसदी से लुढ़ककर 1.7 पर पहुंच गया है। खतरे के इन संकेतों के बावजूर स्थिति सुधरने का नाम नहीं ले रही और ये ढाई लोगों की सरकार किसी की नहीं सुनती। और इस सच को हम आप सब जानते है कि आलोचना स्वीकार्य तभी हो सकती है जब आप उसे ग्रहण कर उसके कारणों पर दृष्टि डालें। लेकिन प्रधानमंत्री आलोचना को नम्रता से स्वीकार तो करते है किंतु उसके साथ वैचारिक संधि तो दूर की बात सुनना भी संभवतः नहीं चाहते। वे अपने ही पैरामीटर पर चलना चाहते है और मानते है कि जो कुछ किया गया वह सही है। जनता की बात जहां तक है वह हमेशा से ’कनफ्यूज्ड’ है। यशवंत सिन्हा बोले तो वह कहेगी सही बात की है बंदे ने, प्रधानमंत्री कहे तो वह उसको भी नकार नहीं सकती। शायद इसी वजह से रघुराम राजन ने भारत को ’अंधों में काना राजा’ कहा था।
देश की ग्रोथ का अंदाजा रोजगार की जबरदस्त मांग को देखकर अपने आप हो जाता है। राहुल गांधी द्वारा बार बार युवाओं की बेरोजगारी और स्टार्ट अप योजना का मजाक उड़ाए जाने पर प्रधानमंत्री जी ने इसी कार्यक्रम मे बताया कि 4 करोड़ 80 लाख पीएफ खाते खुले है। मुद्रा योजना के तहत 9 करोड़ खाता धारकों को 4 लाख करोड़ का कर्ज दिया गया है जिनमें 2 लाख 65 करोड़ ऐसे है जिन्हें पहली बार कर्ज मिला। अगर ये सत्य है तो फिर आप,
वित्तीय सेवा प्रदाता एमबिट कैपिटल की रिर्पोट पर, क्या कहेगे जो कहती है कि भविष्य में भारत में बेरोजगारी और आय असामनता का मेल सामाजिक तनाव का कारण बन सकता है। फ्रांसीसी अर्थशास्त्री के नवीनतम निष्कर्षों में बताया गया है कि वर्ष 1980 से आय असामनता चरणबद्ध तरीके से बढ़ रही है। एमबिट का कहना है कि देश की कुल आबादी के 50 प्रतिशत निम्न आय स्तर वाले की राष्ट्रीय आय में हिस्सेदारी केवल 11 प्रतिशत है, जबकि शीर्ष 10 प्रतिशत की हिस्सेदारी 29 प्रतिशत है। इनकी प्रति व्यक्ति आय 1,850 डॉलर है, जबकि निचले तबके के 66 करोड़ लोगों या देश की 50 प्रतिशत आबादी की प्रति व्यक्ति आय 400 डॉलर से कम है, जो कि हैरान करने वाला है।
यह आंकड़ा मेडागास्कर के नागरिकों के प्रति व्यक्ति आंकड़ों के समान है और यहां तक कि अफगानिस्तान के नागरिकों की प्रति व्यक्ति आय से भी कम है, जो कि 561 डॉलर है। वहीं, दूसरी ओर देश के शीर्ष एक प्रतिशत आबादी 1.30 करोड़ की प्रति व्यक्ति आय 53,700 डॉलर है जो कि डेनमार्क की प्रति व्यक्ति आय से तुलना योग्य और सिंगापुर की प्रति व्यक्ति आय 52,961 डॉलर से ज्यादा है। रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि बेरोजगारी और असमानता के मेल के कारण अपराधों में तेजी जैसे सामाजिक तनाव में वृद्धि हो सकती है।
अनुभव है कि बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में जहां प्रति व्यक्ति आय, राष्ट्रीय औसत की तुलना में कम है और असमानता अधिक है, वहां अन्य राज्यों की तुलना में अपराध की दर ज्यादा है। जो साक्ष्य है उसे हम क्या आइना दिखाते है।
हालांकि वैश्विक वित्तीय सेवा कंपनी मॉर्गन स्टेनली के एक शोध नोट पर अगर गौर करें तो प्रधानमंत्री के पैरामीटर पर संदेह नहीं किया जा सकता और ये हमारे लिये खुश होने की वजह है। इस शोध के अनुसार डिजिटलीकरण से जीडीपी वृद्धि को 0.5 से 0.75 प्रतिशत की बढ़त मिलेगी और अनुमान है कि 2026-27 तक भारत की अर्थव्यवस्था 6,000 अरब डॉलर की हो जाएगी। विशेषज्ञों का मानना है कि सुधारों की वजह से पिछला साल भारत की जीडीपी वृद्धि के लिए व्यवधान वाला रहा है लेकिन मध्यम अवधि में देश की वृद्धि संभावनाएं बेहतर हैं। कंपनी ने अपने नोट में कहा कि हमारे अनुमान के मुताबिक आने वाले दशक में भारत की सालाना जीडीपी वृद्धि दर 7.1 फीसदी से 11.2 फीसदी के बीच रहेगी। इसी प्रकार 2026-27 तक भारत में 120 अरब डॉलर सकल प्रत्यक्ष विदेशी निवेश आने की उम्मीद है।
No comments:
Post a Comment