Thursday, January 11, 2018

लघु कथा/ मोती

घर के दरवाजे पर बंधे चार बड़े-बड़े तंदरूस्त, अपने साथियों को देखकर वह समझ गया था कि इस घर के मालिक उनसे बहुत प्यार करते है। और फिर कई दिन की ’रेकी’ करने के बाद ही, यह सोचकर वह भी निश्चिन्त हो पाया था कि यही घर उसके लिए भी ’परफेक्ट घर’ बन सकता है। दिन भर इधर-उधर मारे-मारे फिरने, दूसरों की गालियां खाने से तो अच्छा है  िकवह भी इस घर में अपने इन साथियों के साथ रहे।

लेकिन घर में दाखिला कैसे लिया जाये, यह उसे समझ नहीं आ रहा था। दो तीन दिन घर के चारों ओर चक्कर लगाने के बावजूद उस पर किसी की नजर ही नहीं पड़ रही थी। नजर पड़े भी तो कैसे? उसका न तो कोई डील-डौल है और न ही देखने में शक्ल प्यारी। गली कूचे में कोई देखता तो उसे दुत्कार ही देता। पर अब उसे इसकी परवाह नहीं करनी चाहिए। उसे तो बस इस घर में कैसे आसरा पाया जाये, यही सोचना है।

और उस दिन उसे घर की स्वामिनी जिसे सब ’मनीषा’ पुकार रहे थे, उसे नजर आ गई। कैसा तो प्यार झलक रहा था उनकी आॅंख से। उसने तय कर लिया कि वह इस गृहस्वामिनी को अपना बना के रहेगा। फिर क्या था उसने अपनी इस नई मालकिन पर नजर रखनी शुरू कर दी। एक दिन सुबह-सुबह जब वह अपने उसके साथियों को टहलाने घर से निकली, वह भी उनके पीछे-पीछे कुछ दूरी बनाकर चलने लगा। उनके पीछे चलते हुए वह सोच रहा था कि ऐसा क्या करे कि मालकिन की नजर उस पर पड़ जाये।

घर को लौटते समय वह उनके बिल्कुल करीब पहुंचने की कोशिश करने लगा। जाहिर है उसके साथियों को उसका ये व्यवहार अच्छा नहीं लगा। लेकिन वह उनके पास आता गया। तभी उनमें से एक ने उस पर झपटा मारा, लेकिन मालकिन ने उसे अपनी तरफ खींच लिया। और इसी समय उनकी नजर उस पर पड़ गई। उसने भी तुरंत एक्शन दिया और अपनी दुम जोर-जोर से हिलाकर खुशी का इजहार करने लगा। वह भी मुस्कुरा दी। बस फिर क्या था? उसे तो जैसे बोटी दिख गई। वह भी उनके पीछे-पीछे चल पड़ा।

घर के गेट पर पहुंच कर वह रूक गया और उसके वे चारों बिरादर भीतर जाकर दालान में बैठ गये। मालकिन भीतर चली गई। वह गेट पर खड़ा रहा। भीतर जाना चाहता था लेकिन उन खुूंखार साथियों के कारण उसकी हिम्मत नहीं हो रही थी। तभी उसने देखा घर की मालकिन उनका खाना लेकर आई। उन्होंने बारी-बारी से सबको सहलाते हुए खाना दिया। और ये क्या....वह तो अब उसकी ओर आ रही है। गेट के बाहर आकर उन्होंने उसका खाना रख दिया और उसे देखते हुए मुस्कुराते हुए फिर घर के अंदर चली गई। वह उन्हें जाते देखता रहा, मगर खाने को मुंह तक नहीं लगाया। उसे ये बात बहुत बुरी लगी कि उन्होंने उसको पुचकारा तक नहीं।

कुछ देर बाद उसने देखा वह बाहर आई और बैठकर उसके साथियों के साथ खेलने लगी। उनकी नजर उस पर भी पड़ी। उसको खाना न खाते हुए देखकर शायद उन्हें अपनी गलती का अहसास हुआ। वह उठी और उसके पास आकर उसे सहलाने लगी। जैसे ही उन्होंने प्यार से पुचकारते हुए उसे ’मोती’ पुकारा, उसे तो जैसे अपनी दुनिया मिल गई। फिर वह उसे गेट के भीतर ले गई और अपने हाथ से खाना खिलाने लगी। उसके साथी गुर्रा रहे थे। लेकिन उसे अब उनकी परवाह नहीं थी। वह जो अब मालकिन की शरण में था।

उस दिन के बाद से उसकी घर के गेट के भीतर इंट्री को कोई नहीं रोक सका। मालकिन भी जब सबको खाना देती तो उसके पास आकर उसे भी खाना देती और हां, उसको पुचकारना और उस पर हाथ फेरना नहीं भूलती। मोती खा पीकर दिन भर इधर-उधर घूमता रहता। धीरे-धीरे उसकी उन चारों से भी दोस्ती हो गई। कभी-कभी वह उनके काम भी कर देता। घर की हिफाजत करना अब उसकी भी जिम्मेदारी थी। सब बहुत अच्छा चल रहा था कि...

एक दिन पड़ोस के गुप्ता जी मालिक से मोती की शिकायत करने पहुंच गये। उनको नाराजगी थी कि मोती रोज अपनी ’शिट’ उनके गेट पर कर जाता है। बात सही थी। मोती उनसे बहुत चिढ़ता था। उन्होंने कई बार मोती को आवारा कह कर झिड़का भी था। लेकिन अभी तो वह उसके मालिक-मालकिन पर नाराज हो रहे है। उसे गुस्सा तो बहुत आ रहा है, लेकिन वह क्या करे? उसने देखा उसकी मालकिन उसकी ओर देख-देखकर कुछ बोल रही है। बाद में मोती को उन्होंनेअऐसा न करने के लिए बहुत समझाया। मोती ने उनकी बात रखी भी।

लेकिन कुछ दन बाद शर्मा अंकल मोती की शिकायत लेकर आ गये। उसके कुछ दिन बाद महेश अंकल, सुनीता आंटी मालिक से बहस करने पहुंच गये। मोती देख रहा था मालिक परेशान हो रहे थे, लेकिन वह मालकिन की वजह से कुछ कर नहीं पा रहे थे। सब मालिक पर उसे वहां से भगा देने का दबाव बना रहे थे। उस दिन अचानक ’डाॅग-कैचर’ का नाम सुनकर मोती के कान भी खड़े हो गये थे। उस वक्त तो वह वहां से भाग लिया। लेकिन मालकिन की एक आवाज पर वह फिर चला आया और उनका दुलार पाकर सब भूल गया। आखिर मालकिन की मोहब्बत में वह कालोनी छोड़ कर दूसरी जगह भी तो नहीं जा सकता।

और फिर एक दिन उसने ’डाॅग-कैचर’ गाड़ी को देखा। उनसे छुप कर वह भाग निकला। उसके बाद तो कई दिन तक ये लुक्का-छुपी का खेल चलता रहा, पर वह उनके हाथ नहीं लग सका। लेकिन एक दिन वह हो गया, जिसकी मोती को भी उम्मीद नहीं थी। उसे ’डाॅग-कैचर’ वालों ने पकड़ लिया। अपने पकड़े जाने का उसे दुख नहीं था। उसे तो इस बात का सदमा था कि उसे पकड़वाने में मदद करने वाला कोई और नहीं उसकी मालकिन थी। कितने प्यार से उन्होंने रोज की तरह उस दिन भी, उसे आवाज देकर बुलाया और खाना दिया। साथ बैठी रही और पुचकारती भी रही। ठीक उसी समय ’डाॅग-कैचर’ वालों ने उसे पकड़ लिया। वह खूब चिल्लाया, गुर्राया। न उन लोगों ने छोड़ा, न मालकिन ने उनसे उसे छोड़ने को कहा। बस चुपचाप उसे जाते देखती रही। लेकिन गाड़ी में बंद होते-होते मोती ने देखा कि वह अपनी आंख के आंसू पोंछ रही थी और ऊपर वाले शर्मा जी अपनी खिड़की से झांकते हुए मुस्कुरा रहे थे। 

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