Thursday, December 10, 2020

तो चलो आओ खेंले लोकतंत्र-लोकतंत्र खेल, चित् मेरा तो पट् तेरा



किसान आंदोलन के बीच नीति आयोग के सीईओ अमिताभ कांत, द्वारा किए गए एक ट्वीट ने थोड़ी देर के लिए ही सही पर बखेड़ा तो खड़ा कर दिया जिसके बाद उन्हें ये ड्लिीट करना पड़ा. दरअसल उनका ये कहना कि, भारत में लोकतंत्र कुछ ज्यादा ही है...और यहां ’कड़े’ सुधार को लागू करना बहुत मुश्किल है, कईयों को रास न आया.

इस ट्वीट या लिखने वाले से मेरे इस लेख का कोई सरोकार नहीं बल्कि मैं इसके बहाने ’लोकतंत्र’ में हम क्या खोते जा रहे हैं, इस पर एक नजर डालना चाह रही. लेकिन इससे पहले एक नजर एक रिपोर्ट पर भी डालना चाहूंगी जो कहती है कि क्या भारत में लोकतंत्र कमजोर पड़ रहा.

स्वीडन स्थित संस्था ’वी- डेम इंस्टीट्यूट’ की ’2020 की लोकतंत्र रिपोर्ट’ में यह संकेत दिया जाना चिंताजनक हैं कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देशों में से एक कहे जाने वाले भारत में लोकतंत्र कमजोर पड़ रहा है. हालांकि यह रिपोर्ट भारत पर ही है, ऐसा नहीं है. 179 देशों देशों का इसमें जिक्र हैं, जिसमें भारत को 90वाँ स्थान दिया गया है और डेनमार्क को पहला. ’उदार लोकतंत्र सूचकांक’ रिपोर्ट को तैयार करने वाली संस्था वी- डेम इंस्टीट्यूट स्वीडन के गोटेनबर्ग विश्वविद्यालय से जुड़ी है, जिस के अधिकारी कहते हैं कि भारत में लोकतंत्र की बिगड़ती स्थिति की उन्हें चिंता है.

इस रिपोर्ट के अनुसार भारत में मीडिया, सिविल सोसाइटी और मोदी सरकार में विपक्ष के विरोध की जगह कम होती जा रही है, जिसके कारण लोकतंत्र के रूप में भारत अपना स्थान खोने की कगार पर है. भारत का पड़ोसी देश श्रीलंका 70वें स्थान पर है जबकि नेपाल 72वें नंबर पर है. इस सूची में भारत से नीचे पाकिस्तान 126वें नंबर पर है और बांग्लादेश 154वें स्थान पर.

बाबा साहब अम्बेडकर ने लोकतंत्र की व्याख्या करते हुए उसे एक ऐसी जीवन पद्धति कहा जिसमें स्वतंत्रता, समता और बंधुता समाज-जीवन के मूल सिद्धांत होते हैं. जबकि जॉर्ज बर्नार्ड शॉ का लोकतंत्र के बारे में कहना था-लोकतंत्र, अपनी महंगी और समय बर्बाद करने वाली खूबियों के साथ सिर्फ भ्रमित करने का एक तरीका भर है जिससे जनता को विश्वास दिलाया जाता है कि वह ही शासक है जबकि वास्तविक सत्ता कुछ गिने-चुने लोगों के हाथ में ही होती है.

वर्तमान परिस्थितियों पर गौर करें तो उपरोक्त दोनों कथनों में से जार्ज बर्नार्ड शाॅ का कथन कहीं अधिक खरा उतरता है. इन कुछ गिने-चुने लोगों के कारण ही वास्तव में आज लोकतंत्र खतरे में नज़र आ रहा है. महज अपने वोट बैंक की राजनीति करने के लिए देष के भीतर जाति-भाषा की दीवार खड़ी कर दिए जाने से हर नागरिक स्वार्थ सिद्धि में रत नजर आता है. हम भारतीय न रहकर बंगाली-पंजाबी-तमिल-तेलगू-मराठी या जाने और क्या-क्या हो गये. लोकतंत्र की लाठी संभालने वालों के लिए यही काफी नहीं हुआ तो कईक जातियों को उनकी पहचान से रूबरू करा उनका हितैषी बनने का नाटक करने लगा. जाहिर है फिर तो हर पार्टी को ये वोट बैंक का  खेल भा गया और यहीं से शुरू हो गया ’आओ लोकतंत्र-लोकतंत्र खेलें’ का असल खेल .

अगर आप गौर करें तो गत कुछ सालों से आपको नाराजगी, को्रध, नफरत, अधैर्यता और नकारात्मकता भीड़ की शक्ल में बदलती नज़र आती होगी. ध्यान दें तो भारत में औसतन हर दूसरे आदमी को आप तनावग्रस्त और सरकार, परिस्थितियों को कोसता नजर आता है. अच्छा होता हुआ उसे कुछ भी नजर नहीं आता जबकि वातावरण में घोली रही जहरीली बातें उसके जेहन को घुन की तरह पीस रही है. हम जब भी आपस में मिलते है या किसी मुद्दे पर सोषल मीडिया पर बात करते है विचार में भिन्नता दिखते ही बातचीत तेजी से आक्रामक व्यवहार में तब्दील होने लगती है. स्वस्थ माहौल और स्वस्थ परंपरा से बनाये जाने वाले समाज की परिभाषा वाला लोकतंत्र आज क्रब में दफन हो चुके इतिहास की परतों से खुरेंच-खुरेंच कर निर्मित किया जा रहा. देखा जाए तो हम अब आगे देखने के बजाए पीछे देख कर चल रहे है.

भारत के जाने-माने चिंतक प्रताप भानु मेहता ने अपने एक लेख (मार्च 2019) में कहा था, मुझे ऐसा लग रहा है कि हमारे लोकतंत्र के साथ कुछ ऐसा हो रहा है जो लोकतांत्रिक आत्मा को खत्म कर रहा है. हम गुस्से से उबलते दिल, छोटे दिमाग और संकीर्ण आत्मा वाले राष्ट्र के तौर पर निर्मित होते जा रहे हैं. कुछ मायने में लोकतंत्र आजादी, उत्सव का नाम है, ऐसी व्यवस्था में लोग कहां जाएंगे इसे जानना महत्वपूर्ण होता है न कि पीछे कहां से आएं हैं.

सरकार और नागरिकों के बीच अहम भूमिका निभाने वाला सबसे जरूरी स्ंतभ ’मीडिया’ अपनी जिम्मेदारियों से भाग रहा. सरकुलेषन, सरकारी विज्ञापनों, टीआरपी या कह सकते है भारी फंडिंग के मोह में वह तथ्यों को तोड़-मरोड़ के पेष कर रहा है. रिया चक्रवर्ती के मामले में मैंने ऐसे मूर्ख लोगों को भी देखा जो मसाले की तरह परोसे जा रही खबरों को एकता कपूर के सीरियलों की भंाति पूरी निष्ठा से देख ही नही रहे थी बल्कि उस पर यकीन कर विचार-मंथन भी कर रहे थे.

जहां तक विपक्ष की भूमिका का सवाल है वह भी संदिग्ध ही रहती है. नकारात्मकता फैलाने के अलावा वह किसी अहम नतीजे पर पहंुच नहीं पाता. यहां आकर भी वजहें व्यक्तिगत स्वार्थ की क्षतिपूर्ति करने मे मषगूल होती है. और सोषल मीडिया की जहां तक बात है किसी भी चिंगारी को आग में तब्दील करने में इसका कोई सानी नहीं. नोटों के जरिए खरीद-फरोख्त कर अपनी राजनीति चाल कामयाब करना किसी भी पार्टी के लिए आज बेहद आसान हो गया है.

संभवतः यही कारण है कि सकारात्मकता के लक्षणों से दूर होता ’लोकतंत्र’ नागरिक के लिए भी अपनी बात रखने का महज एक हथियार भर रह गया है. इसलिए वह जब चाहे तब भी़ड़, आंदोलन, हड़ताल, आगजनी, दंगे की शक्ल अख़्तियार करने लगा है. फिलहाल तो शुक्र इस बात का है कि देष की सीमाओं-सुरक्षा से जुड़ी समस्याओं और फैसलों पर सवाल नहीं खड़े किए जाते और सब ऐसे मामुलात में एक छतरी के नीचे खड़े नजर आते है वरना तो दूसरे मुल्कों के बीच हमारे लोकतंत्र की धज्जियां उड़ने में देर नहीं लगती.

3 comments:

  1. विरोध तो लोकतन्त्र की आत्मा है और भीड़ यदि दुनिया के दूसरे सबसे विशाल आबादी वाले मुल्क में नहीं तो कहाँ होगी। जाति इस देश की हक़ीक़त है उसके आधार पर आर्थिक तरक़्क़ी होने पे ही जातिवाद ख़त्म होगा। धैर्य रखिए लोकतन्त्र की हाण्डी में खिचड़ी भले धीमे पके मगर वो समाज को सुस्वस्थ रखती है।

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  2. विरोध तो लोकतन्त्र की आत्मा है और भीड़ यदि दुनिया के दूसरे सबसे विशाल आबादी वाले मुल्क में नहीं तो कहाँ होगी। जाति इस देश की हक़ीक़त है उसके आधार पर आर्थिक तरक़्क़ी होने पे ही जातिवाद ख़त्म होगा। धैर्य रखिए लोकतन्त्र की हाण्डी में खिचड़ी भले धीमे पके मगर वो समाज को सुस्वस्थ रखती है।

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  3. विरोध तो लोकतन्त्र की आत्मा है और भीड़ यदि दुनिया के दूसरे सबसे विशाल आबादी वाले मुल्क में नहीं तो कहाँ होगी। जाति इस देश की हक़ीक़त है उसके आधार पर आर्थिक तरक़्क़ी होने पे ही जातिवाद ख़त्म होगा। धैर्य रखिए लोकतन्त्र की हाण्डी में खिचड़ी भले धीमे पके मगर वो समाज को सुस्वस्थ रखती है।

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