"अब मौन में ही सोना था, मौन में ही जगना। मौन में ही नहाना था, मौन में ही खाना था। मौन क्या था मन के शोर में और-और जलना था। तो क्या मौन मन को जला डालता है? पता नहीं, पर अभी तो यह मौन मन को सुलगा रहा था। बिना धुएं और बिना आंच के धीमी आंच पर जैसे सांस दहक रही थी। मौन की मीठी आंच एक अजीब सी दुनिया में ले जा रही थी। ऑंखे बंद थी और जैसे मदहोशी सी छा रही थी"...विपश्यना शिविर का ये दृश्य तो वहां न जाने वाले ही कल्पना में भी होगा ही। लेकिन इससे इतर जो दृश्यालोकन लेखक दयानंद पांडेय जी के इस लघु उपन्यास में है, उसकी कल्पना शायद ही की गई होगी, मसलन विपश्यना में प्रेम! किताब का शीर्षक ऐसा है कि आपको एक बार इसमें उतरने का मन करेगा ही। और जब आप पृष्ठ दर पृष्ठ आगे बढ़ते है तो तमाम बंदिशों को तोड़ मन की उच्छंखृल प्रवृति से आप खुद को अपने भीतर ही मौजूद पाते है। यही पर आकर इस पुस्तक का उद्देश्य भी पूरा होता है।
कहानी का मुख्य पात्र विनय विपश्यना में जाकर मन को केंद्रित करने के ढोंग का आवरण हटाता है। पूर्णत शांत-स्तब्ध कर देने वाले विपश्यना के वातावरण की चुप्पी में भी दूसरों के मनोभावों को समझने वाले इस पात्र को एक रशियन स्त्री की देह से अपने मन के कोलाहल का ज्ञान हुआ... "अचानक उसका ध्यान टूटता है। ऑख खुलती है। एक गोरी सी रशियन स्त्री के अकुलाए वक्ष पर उसकी ऑंखे धंस गई है। उसकी स्लीवलेस बाहें जैसे बुला रही है। अब ऐसे में कोई कैसे ध्यान करें। जब मन में देह का ध्यान आ जाए तो सारे ध्यान बिला जाते है...सारी विपश्यना बिला जाती है।" स्त्री देह का आकर्षण ऐसा ही है। तमाम कायनात चुप हो भी जाये तो भी स्त्री की देह बोलना बंद नहीं कर सकती। फिर भला पुरूष की कामी भावना विपश्यना में कैसे कैद होकर रह सकती है। इन्हीं भावों को लेखक ने बेहतर संदर्भो के साथ व्याखित किया है। जैसे-जैसे उपन्यास में आप आगे बढ़ते है मौन के बाहरी आवरण को छेदते मन के भावों और मंशाओं को विनय के माध्यम से चिन्हते जाते है।
पुस्तक के आखिरी हिस्से तक आते-आते आपको विपश्यना के मौन एकांत क्षणों को जीने की कोषिष में मन में कूदते फांदते कोलाहल का भी अहसास होने लगता है, जिसे दबाने के भरसक प्रयास में मुख्य पात्र न केवल उसे जी कर वरन् अपने साथ ही लेकर वापस आता है। यही से उसे जीवन के यथार्थ का परिचित होता है... "सांस के स्पर्श से ज्यादा जीवन संघर्ष का स्पर्श है। सांस से ज्यादा संघर्ष आता जाता है। संघर्ष का आन-पान और सांस का आन-पान एकमेव हो गये है।" ध्यान और भाव की रस्साकषी में मन के हार जाने को लेखक ने बखूबी दिखाया है। विपश्यना शिविर में मन से संसार से छोड़ने के प्रयास में विपश्यना स्वरूप केे ही अपने संसार में ही आ जाने से मुख्य पात्र विनय के भीतर की तड़प संयम और मोह के बीच की दीवार को गिरा देती है। इसलिए कहानी के अंत में रहस्योघाट्न व्यक्ति द्वारा अपने मनोभावों को संयमित कर लेने का छलावा मात्र भर रह जाता है...."यह कौन सा विलाप है। विपश्यना में विलाप का यह आलाप विनय को विकल कर देता है। विपश्यना की यह कौन सी साधना है? साधना है या आराधना। सहसा विपश्यना शिविर के ध्यान कक्ष में उस स्त्री का विलाप याद आ जाता है विनय को। वह समझ नहीं पाता कि साधना में है कि विलाप में।"
दयानंद पांडेय के उपन्यासों की लंबी फेहरिस्त में यह उपन्यास कुछ अलग और अपने अनूठेपन से लोगों के बीच चर्चा पा रहा है। भाषा सरल और शैली की कला पर पांडेय जी सदैव की भांति प्रषंसा के योग्य है। यकीनन इस उपन्यास को पढ़कर कोई भी पाठक स्वंय के भीतर झांक उस संघर्ष को स्पर्श कर मौन कर सकता है जो उसके सांस पर भारी है।

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